Jain Sangh, South Africa

Jain Sangh, South Africa A page for all the Jains in South Africa. A home away from home,so that, culture is not forgotten.

There are around 7 million Jain's in the world, and even fewer in South Africa

नरक में रही हुई आत्मा भयंकर दुखों को सहन करके 100 वर्ष में जितने कर्मों का क्षय करती है, उतने ही कर्मों का क्षय मात्र नव...
14/05/2023

नरक में रही हुई आत्मा भयंकर दुखों को सहन करके 100 वर्ष में जितने कर्मों का क्षय करती है, उतने ही कर्मों का क्षय मात्र नवकारसी का छोटा सा पच्चक्खाण करने वाला व्यक्ति करता है !

नवकारसी पच्चक्खाण अर्थात प्रातः काल सूर्योदय से लगाकर 48 मिनिट तक कुछ भी खाना पीना नहीं एवं सूर्योदय के 48 मिनट होने के बाद नीचे बैठकर दाहिनी यानी Right हाथ की मुट्ठी बंद करके तीन बार नवकार महामंत्र गिनने के बाद खाना - पीना आदि आरंभ करना !

यह पच्चक्खाण नवकार बोलकर पारा जाता है यानी पूरा किया जाता है इसलिए इसे नवकारसी पच्चक्खाण कहते हैं ! अतः नवकार गिनकर यह पच्चकखान पारना चाहिए वरना पच्चक्खाण भंग होने का दोष लगता है ! नवकारसी का पच्चक्खाण नवकारसी का समय आने से पहले यानी सूर्योदय के बाद 48 मिनट पूरे हो उससे पहले ही लेना चाहिए !

नवकारसी का पच्चक्खाण परमात्मा के सामने हाथ जोड़कर यह बोलकर लेना : *उग्गए सूरे, नमुक्कार-सहिअं मुट्ठीसहियं पच्चक्खामि चउव्विहं पि आहारं, असणं, पाणं, खाइमं, साइमं, अन्नत्थणाभोगेणं, सहसागारेणं, महत्तरागारेणं, सव्वसमाहि-वत्तियागारेणं वोसिरामि.*

नवकारसी का पच्चक्खान अगर कोई गुरु भगवंत आपके आसपास हों तो गुरु से ही लेना चाहिए और यदि गुरु भगवंत का योग नहीं है तब स्वयं लेना चाहिए 🙏🏻

22/04/2023

Akshay Tritya 2023 ki sabko shubhecha 🙏 Jai Jinendra.

🙏🙏🙏🙏🙏 Akshaya Tritya Saturday 22 April, 2023🌺अक्षय तृतीया पर्व की महिमा🌺भव्यात्माओं! भगवान ऋषभदेव का जब छह माह का योग पू...
21/04/2023

🙏🙏🙏🙏🙏 Akshaya Tritya Saturday 22 April, 2023

🌺अक्षय तृतीया पर्व की महिमा🌺

भव्यात्माओं! भगवान ऋषभदेव का जब छह माह का योग पूर्ण हो गया तब वे यतियों-मुनियों की आहार विधि बतलाने के उद्देश्य से शरीर की स्थिति के लिये निर्दोष आहार हेतु निकल पड़े। महामेरू भगवान ऋषभदेव ईर्यापथ से गमन कर रहे हैं, अनेकों ग्राम नगर शहर आदि में पहुँच रहे हैं। उन्हें देखकर मुनियों की चर्या को न जानने वाली प्रजा बड़े उमंग से साथ सन्मुख आकर उन्हें प्रणाम करती है। उनमें से कितने ही लोग कहने लगते हैं कि हे देव! प्रसन्न होइये और कहिये क्या काम है ? हम सब आपके किंकर हैं, कितने ही भगवान के पीछे-पीछे हो लेते हैं। अन्य कितने ही लोग बहुमूल्य रत्न लाकर भगवान् के सामने रख देते हैं और कहते हैं कि हे नाथ! प्रसन्न होइये, तुच्छ भेंट स्वीकार कीजिये, कितने ही सुन्दरी और तरुणी कन्याओं को सामने करके कहते हैं प्रभो! आप इन्हें स्वीकार कीजिये, कितने ही लोग वस्त्र, भोजन, माला आदि अलंकार ले-लेकर उपस्थित हो जाते हैं, कितने ही लोग प्रार्थना करते हैं कि प्रभो! आप आसन पर विराजिये, भोजन कीजिये इत्यादि इन सभी निमित्तों से प्रभु की चर्या में क्षण भर के लिए विघ्न पड़ जाता है पुनः वे आगे बढ़ जाते हैं। इस प्रकार से जगत को आश्चर्य में डालने वाली गूढ़ चर्या से विहार करते हुए भगवान के छह माह व्यतीत हो जाते हैं।

🌠राजा श्रेयांस के सात स्वप्न🌠

एक दिन रात्रि के पिछले भाग में हस्तिनापुर के युवराज श्रेयांसकुमार सात स्वप्न देखते हैं। प्रसन्नचित्त होते हुए प्रात: राजासोमप्रभ के पास पहुंचकर निवेदन करते हैं कि हे भाई! आज मैंने उत्तम-उत्तम सात स्वप्न देखे हैं सो आप सुनें-

✨प्रथम ही सुवर्णमय सुमेरूपर्वत देखा है,

✨दूसरे स्वप्न में जिनकी शाखाओं पर आभूषण लटक रहे हैं ऐसा कल्पवृक्ष देखा है,

✨तृतीय स्वप्न में ग्रीवा को उत्पन्न करता हुआ सिंह देखा है,

✨चतुर्थ स्वप्न में अपने सींग से किनारे को उखाड़ता हुआ बैल देखा है,

✨पंचम स्वप्न में सूर्य और चंद्रमा देखे हैं,

✨छठे स्वप्न में लहरों से लहराता हुआ और रत्नों से शोभायमान समुद्र देखा है और

✨सातवें स्वप्न में अष्ट मंगल द्रव्य को हाथ में लेकर खड़ी हुई ऐसी व्यंतर देवों की मूर्तियां देखी हैं । सो इनका फल जानने की मुझे अतिशय उत्कंठा हो रही है।

🌺राजा सोमप्रभ द्वारा स्वप्नों का फल बताना🌺

भाई के स्वप्नों को सुनते हुए राजा सोमप्रभ कुछ अकल्पित ही श्रेष्ठ फलों की कल्पना करते हुए पुरोहित की तरफ देखते हैं कि पुरोहित निवेदन करता है-

हे राजकुमार! स्वप्न में मेरूपर्वत के देखने से यह स्पष्ट ही प्रकट हो रहा है कि जिसका मेरूपर्वत पर अभिषेक हुआ है ऐसा कोई देव आज अवश्य ही अपने घर आयेगा और ये अन्य स्वप्न भी उन्हीं के गुणों की उन्नति को सूचित कर रहे हैं। आज उन भगवान के प्रति की गई विनय के द्वारा हम लोग अतिशय पुण्य को प्राप्त करेंगे। आज हम लोग जगत में बड़ी भारी प्रशंसा, प्रसिद्धि और संपदा के लाभ को प्राप्त करेंगे इस विषय में कुछ भी संदेह नहीं है और कुमार श्रेयांस तो स्वयं ही इन स्वप्नों के रहस्य को जानने वाले हैं। इस तरह से पुरोहित के वचनों से प्रसन्न हुए दोनों भाई स्वप्न की और भगवान की कथा करते हुए बैठे ही थे कि इतने में योगिराज भगवान ऋषभदेव नेहस्तिनापुर नगर में प्रवेश किया।

🌳भगवान ॠषभदेव का हस्तिनापुर में प्रवेश🌳

उस समय भगवान के दर्शनों की इच्छा से चारों तरफ अतीव भीड़ इकट्ठी हो गई। कोई कहने लगे-देखो-देखो, आदिकर्ताभगवान ऋषभदेव हम लोगों का पालन करने के लिए यहां आए हैं, चलो जल्दी चलकर उनके दर्शन करें और भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करें। कोई कह रहे थे कि संसार का कोई एक पितामह है ऐसा हम लोग मात्र कानों से सुनते थे सो आज प्रत्यक्ष में उनके दर्शन हो रहे हैं। अहो! इन भगवान के दर्शन करने से नेत्र सफल हो जाते हैं, इनका नाम सुनने से कान सफल हो जाते हैं और इनका स्मरण करने से अज्ञानी जीवों के भी अन्तःकरण पवित्र हो जाते हैं। कोई कहने लगे ओहो! ये भगवान् तीन लोक के स्वामी होकर भी सब कुछ छोड़तेकर इस तरह अकेले ही क्यों विहार कर रहे हैं ?

कोई स्त्री बच्चे को दूध पिलाते हुए भी अपने से अलग कर धाय की गोद में छोड़कर भगवान के दर्शन के लिए दौड़ पड़ी, कोई स्त्री कहने लगी सखी! भोजन करना बन्द कर, जल्दी उठ और यह अर्घ्य हाथ में ले, अपन चलकर जगतगुरु भगवान की पूजा करेंगे। इत्यादि कोलाहल के बीच से निकलते हुए भगवान मनुष्यों से भरे हुए नगर को सूने वन के समान जानते हुए निराकुल छोड़ कर वाँद्री चर्या का आश्रय लेकर विहार कर रहे हैं। इसी बीच सिद्धार्थ नाम का द्वारपाल आकर गदगद् वाणी से बोलता है-

✨राजा सोमप्रभ और राजा श्रेयांस द्वारा भगवान का नवधा भक्ति पूर्वक आहार कराना ✨

महाराज! तीन जगत् के गुरू भगवान ऋषभदेव स्वयं ही अकेले इधर आ रहे हैं।’ इतना सुनते ही राजा सोमप्रभ और राजकुमार श्रेयांस दोनों ही भाई अन्तःपुर सेनापति और मंत्रियों के साथ तत्क्षण ही उठ पड़े और राजमहल के आंगन तक बाहर आ गए। दोनो भाइयों ने दूर से ही भगवान को नमस्कार किया। उनके चरणों में अर्घ्य सहित जल समर्पित किया। भगवान के मुखकमल को देखते ही कुमार श्रेयांस को अपने कई भवों का जातिस्मरण हो आया, उनको रोमांच हो गया। ऐसा प्रतीत हुआ कि मानो मेरे घर में तीन लोक की सम्पदा ही आ गई है-उन्हें आहार देने की सारी विधि याद आ गई। शीघ्र ही पड़गाहन विधि को करते हुए भगवान की तीन प्रदक्षिणायें दीं। अन्दर ले गये, उन्हें उच्च आसन पर बैठने के लिए निवेदन किया-

भगवान! उच्च आसन पर विराजमान होइये। पुन: प्रभु के चरणों का प्रक्षालन करके मस्तक पर गंधोदक चढ़ाकर अपना जीवन धन्य माना और अष्ट द्रव्य से पूजा की। पुन: पुन: प्रणाम करके मन, वचन, काय की शुद्धि का निवेदन किया, पुनः आहार जल की शुद्धि का निवेदन करके भक्ति से हाथ जोड़कर बोल

🎋सर्वप्रथम इक्षुरस का आहार🎋

नाथ! यह प्रासुक इक्षुरस है इसे ग्रहण कर मुझे कृतार्थ कीजिए। भगवान् ने उस समय खड़े होकर अपने दोनों हाथों की अंजुली बनाई और उसमें आहार लेना शुरू किया।

राजकुमार श्रेयांस भगवान के हाथ की अंजुली में इक्षुरस दे रहे हैं। राजासोमप्रभ और रानी लक्ष्मीमती भी प्रभु के करपात्र में इक्षुरस देते हुए अपने आप को धन्य समझ रहे हैं। इसी बीच गगनांगण में देवों का समूह एकत्रित हो गया और रत्नों की वर्षा करने लगा, मंदार पुष्पों को बरसाने लगा, मंद सुगंध पवन चलने लगी, दुंदभि बाजे-बजने लगे और अहोदान, महादान, आदि ध्वनि से आकाशमंडल शब्दायमान हो गया।

✨आहार दान देकर अपने आपको कृतकृत्य मानना✨

इस समय दोनों भाइयों ने अपने आपको बहुत ही कृतकृत्य माना क्योंकि कृतकृत्य हुए भगवान ऋषभदेव स्वयं ही उनके घर को पवित्र करने वाले हैं। उस समय दान की अनुमोदना करने वाले बहुत से लोगों ने भी परम पुण्य को प्राप्त किया था। भगवान ऋषभदेव आहार ग्रहण कर वन की ओर प्रस्थान कर गये। राजा सोमप्रभ और श्रेयांस भी कुछ दूर तक भगवान् के पीछे-पीछे गये पुन: भगवान् को हृदय में धारण किये हुए ही वापस लौटते समय उन्हीं के गुणों की चर्चा करते हुए और प्रभु के पद से चिन्हित पृथ्वी को भी नमस्कार करते हुए आ गये। उस समय पूरे हस्तिनापुर में एक ही चर्चा थी कि राजकुमार श्रेयांस को प्रभु को आहार देने की विधि कैैसे मालूम हुई। यह आश्चर्यमयी दृश्य देवों के हृदय को भी आश्चर्यचकित कर रहा था। देवों ने भी मिलकर राजाश्रेयांस की बड़े आदर से पूजा की।

भरत महाराज भी वहाँ आ गये और आदर सहित राजकुमार श्रेयांस से बोले-

हे महादानपते! कहो तो सही तुमने भगवान के अभिप्राय को कैसे जाना ? हे कुरुराज! आज तुम हमारे लिए भगवान के समान ही पूज्य हुए हो, तुम दानतीर्थ की प्रवृत्ति करने वाले हो और महापुण्यवान हो, इसलिये मैं तुमसे यह सब पूछ रहा हूँ कि जो सत्य हो वह अब मुझसे कहो।

इस प्रकार सम्राट के पूछने पर श्रेयांस कुमार बोलते हैं- राजन्! जिस प्रकार प्यासा मनुष्य सुगंधित स्वच्छ शीतल जल के सरोवर को देखकर प्रसन्न हो उठता है वैसे ही भगवान् के अतिशय रूप को देखकर मेरी प्रसन्नता का पार नहीं रहा कि मुझे उसी निमित्त से जातिस्मरण हो आया जिससे मैंने भगवान् का अभिप्राय जान लिया।

✨राजा श्रेयांस द्वारा अपना पूर्व भव बताना✨

वह क्या ? मुझे भी सुनाओ। महाराज! आज से आठवें भव पूर्व विदेह क्षेत्र की पुंडरीकिणी नगरी के राजा वज्रजंघ और रानी श्रीमती ने बड़े ही प्रेम से वन में चारणऋद्धिधारी युगल मुनियों को आहारदान दिया था। उस समय राजा के मंत्री, सेनापति, पुरोहित और सेठ भीआहारदान की अनुमोदना कर रहे थे और पास में कुछ ही दूर से देखते हुए नेवला, वानर, व्याघ्र और सूकर ये चार पशु भी आहार देखकर प्रसन्नमन होते हुए उसकी अनुमोदना कर रहे थे। आहार होने के अनंतर कंचुकी ने कहा- राजन् ! ये दोनो ही मुनि आपके ही युगलिया पुत्र हैं। महाराज वज्रजंघ को अतीव हर्ष हुआ। वे उनके चरणों के निकट बैठकर अपनी रानी श्रीमती के, अपने मंत्री आदि चारों के तथा नेवला आदि चारों के भी पूर्व भव पूछने लगे। मुनिराज ने भी अपने दिव्य अवधिज्ञान के द्वारा क्रम-क्रम से सभी के पूर्व भव सुना दिये;

अनंतर बतलाया कि-

आप इस भव से आठवें भव में जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र की अयोध्यानगरी में राजा नाभिराय की महारानी मरूदेवी की कुक्षि से प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के रूप में अवतार लेंगे। आपकी रानी श्रीमती का जीव हस्तिनापुर के राजा सोमप्रभ का भाई श्रेयांस कुमार होगा। आपके ये मंत्री आदि आठों जीव भी अब से लेकर आठ भव तक आपके साथ सम्बन्ध स्थापित करते हुए आपके तीर्थंकर के भव में आपके ही पुत्र होवेंगे और उसी भव से मोक्ष की प्राप्ति करेंगे।

हे चक्रवर्तिन्! आप उस समय राजा वज्रजंघ के मतिवर नाम के महामंत्री थे, सो इस भव में भगवान् के ही पुत्र होकर चक्रवर्ती हुए हो। उस समय के राजा वज्रजंघ के जो आनंद नाम के पुरोहित थे; उन्हीं का ही जीव आज आपके भाई बाहुबली हुए हैं जो कि कामदेव हैं। अकंपन सेनापति का जीव ही आपका भाई ऋषभसेन हुआ है जो कि आज पुरिमतालपुर नगर का अधीश्वर है, धनमित्र सेठ का जीव आपका अनंतविजय नाम का भाई है। दान की अनुमोदना से ही उन्नति करने वाले व्याघ्र का जीव आपका अनंतवीर्य नाम का भाई है, शूकर का जीव अच्युत नाम का भाई है, वानर का जीव वीर नाम का भाई है और नेवला का जीव वरवीर नाम का भाई है अर्थात् राजा वज्रजंघ के आहारदान के समय जो मतिवर मंत्री आदि चार लोग दान की अनुमोदना कर रहे थे और जो व्याघ्र आदि चारों जीव अनुमोदना कर रहे थे वे दान की अनुमोदना के पुण्य से ही क्रम -क्रम से मनुष्य के और देवों के सुखों का अनुभव करके अब इस भव में तीर्थंकर के पुत्र होकर महापुरूष के रूप में अवतीर्ण हुए हैं और सब इसी भव से प्रभु के तीर्थ से ही मोक्षधाम को प्राप्त करेंगे। मैं भी भगवान का गणधर होकर अंत में मोक्षधाम को प्राप्त करूंगा।

🙏दान की महिमा🙏

सम्राट भरत! यह दान की महिमा अचिन्त्य है, अद्भुत है और अवर्णनीय है। देव भी इसकी महिमा को नहीं कह सकते हैं पुनः साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या है? राजन! जो दाता, दान, देय और पात्र इनके लक्षणों को समझकर सत्पात्र में दान देता है वह निश्चित ही मोक्ष का अधिकारी हो जाता है। देखो! इस आहारदान के बिना मोक्षमार्ग चल नहीं सकता है; अतः आहार, औषधि, शास्त्र और अभय इन चारों दानों में भी आहारदान ही सर्वश्रेष्ठ है और वही शेष दानों की भी पूर्ति कर सकता है।’ इस प्रकार से विस्तृत भवावली और अपना या भगवान ऋषभदेव का व राजकुमार श्रेयांस के कई भवों तक पारस्परिक सम्बन्ध सुनकर भरत चक्रवर्ती अत्यधिक प्रसन्न हुए और बोले-

कुरूवंशशिरोमणे! भगवान ऋषभदेव जैसा ना तो कोई उत्तम सत्पात्र होगा और न आप जैसा महान दातार होगा, न आप जैसी नवधाभक्तिकी विधि ही होगी, न आपके जैसा उत्तम फल को प्राप्त करने का अधिकारी ही हर कोई बन सकेगा। आप इस युग में दानतीर्थ के प्रथम प्रर्वतक कहलाओगे। युग-युग तक आपकी अमर कीर्ति यह भारत वसुन्धरा गाती ही रहेगी। इत्यादि प्रकार से राजकुमार श्रेयांस का सत्कार करके राजा भरत अयोध्या नगरी की तरफ प्रस्थान कर गये।

❓अक्षय तृतीया नाम क्यों पड़ा

जिस दिन भगवान का आहार हुआ था उस दिन वैशाख सुदी तृतीया थी। अतः उस दान के प्रभाव से ही वह अक्षय तृतीया इस नाम से आज तक इस भारत भूमि में प्रचलित है क्योंकि जहां पर भगवान का आहार होता है वहां पर उस दिन भोजनशाला में सभी वस्तु अक्षय हो जाती है अत: इसका यह नाम सार्थक हो गया है तथा वह दिन इतना पवित्र हो गया कि आज तक भी बिना मुहूर्त देखे शोधे भी बड़े से बड़े मांगलिक कार्य इस अक्षय तृतीया के दिन प्रारम्भ कर दिये जाते हैं। सभी सम्प्रदाय के लोग भी इस दिन को सर्वोत्तम मुहूर्त मानते हैं। इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है। यह है आहार दान का माहात्म्य जो कि सभी की श्रद्धा करने योग्य है।

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*Param Puja Virag Muni ji Maharaj Saheb* k Charno mein Koti Koti Vandan 🙏🏻Virag Muni ji Maharaj Saheb ki bhavna 131 ki h...
20/04/2023

*Param Puja Virag Muni ji Maharaj Saheb* k Charno mein Koti Koti Vandan 🙏🏻

Virag Muni ji Maharaj Saheb ki bhavna 131 ki hai. Aaj Maharaj Saheb ka 98 upwas hai.

Param Pujya Virag Muni Maharaj Saheb abhi *Rajnand Goan* *Chattisgarh* mein virajmaan hai. 🙏

Kal unke upwas mein 1800 se adhik anumodhana k upwas kiye Gaye. Jin mein se hamare Jain Sangh South Africa parivaar k @⁨~Nikhil Jain⁩ un mein se ek hai... Khub khub anumodhana @⁨~Nikhil Jain⁩ 🙏🏻

Param Pujya Virag Muni Maharaj Saheb ki anumodhana K 25-30 upwas doosre Dharamo mein bhi hue.... Khub khub anumodhana 🙏 🙏🙏*Jainam Jayanti Shasanam* 🙏🙏

16/04/2023

Special thanks on behalf of Jain Sangh, to Payalben for being the strongest link between Marlboro Temple Marlboro Temple and Jain Sangh, South Africa And Mohnishbhai Gala for keeping the machinery of the Sangh up and running.
Video courtesy Gala

16/04/2023

Jain Sangh would be glad to forward special thanks to Marlboro Temple to let us celebrate Janam Kalyanak (birthday) of our beloved God Shri Mahavir Swami 🙏 at the Temple premises. It was much encouragement to our kids especially. 🙏 Jai Jinendra

Shri Mahavir Janam Kalyanka 2023Jain Sangh, South Africa celebrated the big day on 9th April, as it was a weekend. Many ...
16/04/2023

Shri Mahavir Janam Kalyanka 2023

Jain Sangh, South Africa celebrated the big day on 9th April, as it was a weekend. Many many weeks of preparation, dedication, love and enthusiasm made this event a success.

Families put the efforts to not only prepare and practice along with the kids, but also went extra mile and did the preparation prior and during the event for it to be a success.

member Nehaben made sure the script prepared by herself and parents were followed by the kids for the drama. It had wonderful meaning of the 14 swapna that Trishla Mata had.
member Vaishaliben made sure Jamanvar for Sangh was sponsored and done with lot of love and variety of food.
member Kavitaben was the MC and had prepared everything with a short notice. It held together the whole program well.

Once again, we would like to thank each and every member for their wonderful efforts and high attendance.

Jain Ayambil is tough. Khub khub anumodana pathaaviye tapasviyo ni. All ayimbil tapasvi were given great honor and anumodna on stage. Kids too did tapasya. It is inspirational and commendable.

Jai Jinendra 🙏

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14/04/2023

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शीघ्र ही पढ़े, और ज्ञान प्राप्त करें... 7 star होटल नहीं,7 star book छोटी - छोटी 7 पुस्तकों का बहुत ही सुंदर, मजेदार नया सेट नि:शुल्...

09/04/2023

Jai jenedra
Pranam

4th April was Mahavir Janam Kalyanak

We will be celebrating on10 th April Monday

*Venue* Malbro community hall .

*Time* 2 pm to7 pm

Programme details

As we celebrating
MAHAVIR JANMA KALYANAK

Drama by kids
Prepared by Neha Shah Neha Piyu Neha Piyu

Group Dance by ladies .

Those who wish to sing stavan or any skit on
Mahavir janam mahotsav

All Jain Sangh Members are humbly requested to attend. 🙏🙏

Address

Pretoria
0037

Opening Hours

Monday 10:00 - 21:00
Tuesday 10:00 - 21:00
Wednesday 10:00 - 21:00
Thursday 10:00 - 21:00
Friday 10:00 - 21:00
Saturday 10:00 - 21:00
Sunday 10:00 - 21:00

Telephone

+27658409293

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