07/20/2025
द्रोहक स्वर: अन्तर्मनक जीत
उदय नारायण सिंह 'नचिकेता'
एम्हर अखबार सबटा मे 'दक्षेश' नाम बहुत चलि पड़ल छै जकरा सुनितहि हमर मोन विद्रोह क' उठैत अछि। केहन दन एक टा राक्षसीय भावना उत्पन्न क’ दैत अछि ओ । दक्षिण एशिया कें दक्षेश नहि कहब त’ 'ग्लोबल साउथ' कें की कहबै? कियैक त’ जत्तेक अन्हार सबटा त’ एशिया आ अफ्रीका के इयैह सब देश मे भेंटत ई बात बहुल प्रचारित अछि। मुदा एहन सब पछुआयल देश मे जनमि कय तैयो एतहुका लेखिका सब अपन अपन साहित्यिक परिदृश्य मे बहुत दिन सँ प्रतिरोध, पहचान, आ' परिवर्तन के कथ्य लेल उपजाउ जमीन के रूप मे काज क' रहल छथि - खास क' कय एहन सब महिला के जीवन के उदाहरण कें कथाक माध्यम सँ प्रचारित कय जे सब असंख्य बाधा के बावजूद, अपन भीतर मे स्वायत्तता स्वतंत्रता कें समाज संसार आ दुनिया सँ छीनि लेबाक, वापस क' लेबाक साहस देखबैत छथि ।
ग्लोबल नॉर्थ अथवा उत्तरी गोलार्ध मे जे हमसब देखै छी तात्कालिक मुक्ति वा बाहरी सफलता के माध्यम सँ जीत कें साहित्यक पाश्चात्यीकरण कहल जा सकै छै एहन कथ्य प्रचारित होइ छै ताहि सँ दूर, यिवोन वेरा (जिनक पोथीक शीर्षक छलनि 'बटरफ्लाई बर्निंग'), मरियामा बा (उपन्यास: 'सो लॉन्ग ए लेटर'), शशि देशपांडे ('दैट लॉन्ग साइलेंस'), आ' अरुंधती राय ('गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स') के उपन्यास आतंरिक क्रांति प्रस्तुत करै छथि । हुनका लोकनिक प्रधान पात्र खाली मुक्त नहि होइत छथि; ओ सभ अपन अस्तित्वक शर्त के पुनर्परिभाषित करैत छथि, प्रायः एकांत, पीड़ा वा अवहेलना मे रहियहु कय ।
हिनका सभक ई-सब कृति साधारणतया कोनो ने कोनो महिला पर केंद्रित होइ छनि जे गहन मानसिक आ' भावनात्मक बाधा के स्थिति सँ गुजरि रहल छथि - आंतरिक विचारधारा, विरासत मे भेटल कतेको तरहक वंचना आ' आघात, धार्मिक रूढ़िवादिता, आ' संरचनात्मक पितृसत्तात्मकता - ई सबटा भावना सँ लड़ैत खसैत चलैत हेलैत ई सब जेना बहि रहल होथि । हुनकर सभक जीत, भले ही हमेशा हुनक समुदाय द्वारा तत्काल मान्यता नै मिलै छै, लेकिन हुनका सभक अपन आत्मत्व के सशक्त घोषणा के रूप मे अवश्य ठाढ़ होइ छै । हिनका सभक अपन कहानी मे वर्णित दक्षिणी दुनिया तखन मात्र कोनो स्थानीय वा खाली क्षेत्रीय कहानी नहि, बल्कि कोना तरहक दबाव कें सहैतो महिला मानस मे समता समेकता आ' सार्वभौमिकता कें ध्यान देल जाय छै, से आब हमसब बूझि रहल छी। आर मैथिली के नारी हस्ताक्षर एहने परिवेश मे पनपि रहल अछि।
पहिने यवोन वेरा केरऽ 'बटरफ्लाई बर्निंग' मे फेफेलाफी केर चरित्र कें ल' सकै छी – जकरा मे देखी त’ लागत जेना खंडहर के बीच मे अस्तित्व अपन मुक्ति के पहचान कें स्पष्ट क' रहल अछि। ज़िम्बाब्वे देशक 1940 के दशक के एकटा औपनिवेशिक शहर बुलावायो के घटना पर लिखल जेल छल ई उपन्यास- यिवोन वेरा केर 'बटरफ्लाई बर्निंग'। फेफेलाफी के जीवन ओना त दुर्भाग्य आ दुःख सँ भरल छलनि मुदा हुनका मे एकटा भयंकरी महारौद्री भाव छलनि - कियैक त’ हुनका मे आत्मनिर्णय लेली तरसै वाला एक टा युवा, बुद्धिमान अश्वेत महिला नुकायल छलथि । अपन माय के क्रूर हत्या सँ ओ अनाथ भेल छलीह आ' तकर संगहि फुम्बाथा के एहन आहार प्रेमक जटाजाल मे आबद्ध छलथि जिनका मे स्वामित्व भाव बेसी छलनि। एहन फेफेलाफी कें कतेको तरहक आनुगत्य आ' वशीकरण के सामना करय पड़ै छै: उपनिवेशवाद, लैंगिक हिंसा, आ' आर्थिक शोषण आ' समाजक सीमांत दिसि धक्का खाइत सत्ता । देखै बाला होइ छनि हुनक जूझबाक कहानी।
प्रश्न ई जे फेफेलेफी के द्वंद्व आ' हुनक केंद्रीय मानसिक बाधा की छलनि - ओ एक द्वैत छलनि : एक्कहि संग प्रेमक लालसा आ' स्वायत्तता क’ इच्छा। । जाहि समाज मे महिला के भविष्य के पटकथा आज्ञाकारिता आ' बलिदान क’ कलम सँ लिखल जाय छै, ओहि समाज मे फेफेलेफी के नर्स बनब आ' अपन शरीर पर नियंत्रण मे रखै के संकल्प (विशेष रूप सँ एक दर्दनाक स्व-प्रशासित गर्भपात के माध्यम सँ) एकटा कट्टरपंथी निर्णय छलनि । काव्यात्मक विखंडन सँ भरपूर वेरा के गद्य हुनकर नायिका के आंतरिक अव्यवस्था आ परिवर्तन के प्रतिबिंबित करैत अछि। ई उपन्यास पारंपरिक अर्थ मे मात्र नारी पात्र कें संकल्पे नहि दैत अछि - फेफेलेफीक विजय एक टा दार्शनिक तत्त्व सेहो छनि। ई दर्शन हुनक कोनो पुरुष, प्रेमी या शासन-व्यवस्था द्वारा परिभाषित नै होमय देबा मे निहित छनि । ओ अधीनता सँ बेसी स्वतंत्रता कें चुनैत छथि, चाहे ओ कतबो दुखद किएक नहि हो। वेरा के हाथ मे मनोवैज्ञानिक मुक्ति सामाजिक विद्रोहो सँ बेसी अधिक विध्वंसकारी भ' जाय छै । फेफेलाफी केर आंतरिक युद्ध, जकरा मे बाहरी आघात आ' परिवर्तनक माध्यम बनबा लेल उताहुल भावना मिलायल छै, ओकरा भावनात्मक रूप मे अफ्रीकी साहित्य के सब सँ जटिल नायिका मे शामिल करैत छै ।
ओम्हर हमरा लोकनिक सामने आर एक टा महिला पात्र अछि - मरियामा बा’ के उपन्यास 'सो लॉन्ग ए लेटर' मे रामौले – जे अपन प्रतिक्रिया के माध्यम सँ अपन आत्म सम्मान कें देखाबैत अछि । वेरा के दुखद अवहेलना के विपरीत मरियामा बा’ एकटा शांत मुदा कम गहींर प्रतिरोध प्रस्तुत करैत छथि। उत्तर औपनिवेशिक सेनेगल के एक टा अधबूढ़ स्कूली शिक्षक रामातुलाये बहुविवाह के माध्यम सँ अपन पति के विश्वासघात कें देखबाक बाद अपन सबसँ नीक मित्र कें लिखै छथि । ई उपन्यास एकटा पत्रात्मक कथ्यक माध्यमे पाठकक सन्मुख खुलैत अछि, जे एकटा एहन रूप अछि जे आत्मनिरीक्षण आ वृद्धिशील परिवर्तनक अनुमति दैत अछि।
रामौलाये के मानसिक बाधा आने तरहक छलनि - सांस्कृतिक रूप सँ ई विरासत मे हुनका भेंटल छलनि; ओ बहुत दिन सँ धैर्य आ' मौन कें महिला के गुण के रूप मे स्वीकार करैत छली । धर्म, मातृत्व, आ' सामाजिक रूप सँ स्वीकृत कर्तव्य के भाव ओकरा सामना करै के बजाय सहन करब सिखा' दैत छै । मुदा जेना-जेना पत्र आगू बढ़ैत अछि, एकटा सूक्ष्म सुधार होइत जाइत अछि । ओकरा अपन स्वीकरण आ' आज्ञाकारिता के दोष-रेखा देखबय लागैत छै । ओ खाली पतिक पसंदे कें सामना नहि करैत छथि अपितु अपन आंतरिक अधीनता कें सेहो सामना करैत छथि।
पत्रक अंत धरि रामौलाये अपन गरिमा वापस पाबि लैत छथि । सुविधा के लेल दोसर विवाह करै सँ मना क' दै छथि आ' अपन कन्या कें स्वतंत्र रूप सँ सोचै विचारै बला पालन-पोषण करै वाला एक टा शिक्षित, एकल माँ के रूप मे अपन पहचान कें अपनाबैत छथि । हुनक विजय नाटकीय नै छनि - ई ध्यानात्मक छै, जकर जड़ आत्मसम्मान मे छै । मरियामा बा, जे स्वयं अफ्रीकी नारीवाद के अग्रणी प्रवक्ता छथि, अपन कोमल गद्य के प्रयोग क' कय एक तरहक शांत क्रांति के उजागर करै छथि जे सार्वजनिक विद्रोह सँ भिन्न अवश्य छै मुदा नारी के आंतरिक दृढ़ संकल्प के द्योतक छै जे प्रतिभाशाली महिले के भीतर भ' सकै छै।
हिनका लोकनिक तुलना मे आब राखै चाहै छी शशि देशपाण्डे के 'दैट लॉन्ग साइलेंस' के नायिका जया कें – जे अन्तर्मनक चुप्पी कें तोड़ैत अछि । रामौलाये चिट्ठी लिखैत छथि त’ शशि देशपाण्डे क जया अपन डायरी मे लिखि कय रखैत छथि । दैट लॉन्ग साइलेंस (1988) मे हमसब जया कें देखैत छी, जे एकटा मध्यमवर्गीय शहरी भारतीय महिला छथि आ' जे अपन वैवाहिक जीवनक बहुत रास समय सांस्कृतिक अपेक्षाक भार सँ नीरव छथि - शाब्दिक आ प्रतीकात्मक दुनू रूप मे, आ' अहिना समय अतिवाहित करैत छथि । ओ एकटा टिपिकल "नीक पत्नी" छथि जे धीरे-धीरे, लगभग अगोचर रूपें, अपन आवाज, रचनात्मकता, आ आकांक्षा कें समर्पित क' देने छथि, भाग्यक हाथ मे सुपुर्द क' दैत छथि । जया क मानसिक अवरोध 'मौनता' छैक, जकरा ओ शुरू मे बलिदानक रूप मे ग्रहण करैत छथि - एकटा होनहार लेखिका, घर मे शांति बचाबय लेल सालों से अपना कें दबा कय रखने छथि। ओकर पति क दुश्चरित्रता के कांड, जाहि सँ दुनू अस्थायी रूप सँ अलग भ’ जाइत छथि, ओकर जागरण क अद्भुत उत्प्रेरक बनि जाइत छै। देशपांडे के कथ्य तनावपूर्ण, चिंतनशील, आ जेना 'धोखा-देबय-वाला' सरल छनि। सफलता विद्रोह के माध्यम सँ नै, चेतना में बदलाव के माध्यम सँ भेंटैत अछि। रामौलाये जकाँ ओहो निष्क्रिय गुण के बजाय भावनात्मक ईमानदारी क चयन करै छै, जकरा चलते ओकर मौनते प्रतिरोधक पटभूमि बनि जाय छै।
चारिम कोण मे राखि सकैत छी अरुंधती रायक उपन्यास 'द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स' के मुख्य पात्र अम्मू केँ – जाहि मे प्रेम एकटा विद्रोहक रूप मे देखाओल गेल अछि । एतय अविस्मरणीय माँ मे अम्मू भरिसक एहि समूह के सब सँ प्रतीकात्मक रूप सँ उद्भासित नायिका छै । जाति, लिंग-विषमता, आ' राजनीतिक रूढ़िवादिता तीनो के सामना करै छै तलाकशुदा आ' बदनाम अम्मू - जे अपन बच्चा सभक संग अपन माता-पिताक घर मे रहैत छथि । हुनक मानसिक अवरोध लाज, अपराधबोध आ' आंतरिक पितृसत्तात्मक निर्णय सँ उपजल छनि । पति कें छोड़ि देबाक बाद फेर सँ पुरुष-कामिताक इच्छा महसूस करय वाली महिला, आ' ताहू पर एकटा दलित पुरुष वेलुथा लेल पागल - अम्मू अपन जाति-विधिनिषेधक उल्लंघन त’ करिते छथि - ताही संग नारी के यौन आत्मबोधक बोझ सेहो उठाबैत छथि। एकहि संग कोमल आ आगजनी करय बला ओकर दलित पुरुषक प्रति प्रेम जेना ओकर हथियार आ' ओकर बर्बादी - दुनू बनि जाइत छैक।
दक्षिणी पृथ्वी के ई चारि टा नायिका अलग अलग सांस्कृतिक आ' ऐतिहासिक संदर्भ मे निवास करै छथि - जिम्बाब्वे के उपनिवेशवाद, सेनेगल के आजादी के बाद के इस्लाम आरोपित विधि-निषेध, भारतीय मध्यमवर्गीय पितृसत्तात्मकता, आ' केरल के जाति-विभक्त ईसाई धर्म मे रहियहु कय दलित वर्ग कें बारब - हुनकर सभक कहानी कें सशक्त तरीका सँ एक दोसरा के जेना परिपुष्ट करै छै । एतय दर्शित प्रत्येक महिला मानसिक बाधा के एक विशिष्ट विन्यास सँ लड़ैत छथि - ई सब क्यो इतिहासक जननेता अथवा राष्ट्रीय नायक नै बनैत छथि, मुदा हुनका लोकनिक जीत मात्र आन्तरिक द्रोहक विजय होइत छनि।
[पोस्ट साभार: उदय नारायण सिंह 'नचिकेता' सरक फेसबुक वाल सँ]