Academy Of Literature, Art & Culture

Academy Of Literature, Art & Culture साहित्य, कला, संस्कृति

।। जन्मदिवस: डॉ जगदीश मिश्र ।।अपन भाषा, समाज आ आत्मगाथाकेँ साहित्यिक अभिव्यक्ति देनिहार मैथिलीक साहित्यरथी केँ जन्मदिनक ...
04/15/2026

।। जन्मदिवस: डॉ जगदीश मिश्र ।।

अपन भाषा, समाज आ आत्मगाथाकेँ साहित्यिक अभिव्यक्ति देनिहार मैथिलीक साहित्यरथी केँ जन्मदिनक अनंत शुभकामना ओ बधाइ।

मैथिलीक आधुनिक पीढ़ीक एकटा महत्वपूर्ण हस्ताक्षर बालमुकुन्द केँ जन्मदिनक अनंत शुभकामना ओ बधाइ।
12/25/2025

मैथिलीक आधुनिक पीढ़ीक एकटा महत्वपूर्ण हस्ताक्षर बालमुकुन्द केँ जन्मदिनक अनंत शुभकामना ओ बधाइ।

मैथिली साहित्यक प्रगतिशील धाराक एकटा सशक्त रचनाकार Raman Kumar Singh जी केँ जन्मदिनक खूब रास शुभकामना ओ बधाइ।
12/25/2025

मैथिली साहित्यक प्रगतिशील धाराक एकटा सशक्त रचनाकार Raman Kumar Singh जी केँ जन्मदिनक खूब रास शुभकामना ओ बधाइ।

08/10/2025

【खेमचन्द प्रकाश : जिन्होंने दुनिया को लता मंगेशकर और किशोर से मिलवाया】

वह संगीतकार जिसने दुनिया को कंठकोकिला लता मंगेशकर और हरफ़नमौला किशोर कुमार से मिलवाया।नई पीढ़ी भले ही न जानती हो पर जो लोग 'भारतीय फिल्म संगीत' की विकास यात्रा से जुड़े रहे हैं बख़ूबी जानते हैं कि खेमचंद प्रकाश (1907-1950) का फिल्म-संगीत को क्या विशिष्ट योगदान है। फिल्मों में कई दिग्गज गायिकाओं के बीच जब लता मंगेशकर संघर्ष कर रही थीं और कोरस गा रही थीं तब उन्होंने उसका हाथ पकड़ कर उसे 'बेटी बनाकर' नूरजहां के 'आभा मंडल' से निकाल कर लता मंगेशकर बनाया। खेमचंद प्रकाश ने उनसे लगातार पूर्वाभ्यास कराके फ़िल्म 'जिद्दी' (1948) का "..चंदा रे जा रे जा.." गाना गवाया। यह पहला गाना था, जिसने लता मंगेशकर की आवाज को अलग पहचान दी। इसी फिल्म जिद्दी’ (1948) में उन्होंने सिंगिंग स्टार किशोर कुमार से ‘मरने की दुआएं क्यूं मांगूं, जीने की तमन्ना कौन करे’ गवाकर पहला ब्रेक दिया। इस तरह खेमचन्द प्रकाश ने हिन्दी फ़िल्म संगीत को दो ऐसे 'सितारे' दिए, जिनकी आवाज़ों की सुर-सरिता में डुबकियां लगाते रहेंगे आज भी, कल भी और आने वाले कल भी। खेमचन्द प्रकाश के संगीत निर्देशन में जब कमाल अमरोही की फ़िल्म 'महल' (1949) ने लता जी की आवाज़ के लिए संभावनाओं का अनंत आसमान खोल दिया। अपनी जिस सर्वश्रेष्ठ रचना को खेमचंद प्रकाश फ़िल्म से हटाना चाहते थे। आज दुनिया उन्हें उसी गीत से याद करती है। वो रचना थी 'आएगा आनेवाला।'

राजस्थान के सुजानगढ़ क़स्बे में जन्मे संगीतकार खेमचंद प्रकाश को संगीत विरासत में मिला था। उनके पिता पंडित गोवर्धन प्रसाद जयपुर के महाराज माधो सिंह (द्वितीय) के दरबारी गायक थे। खेमचंद 19 बरस की उम्र में यहीं दरबारी गायक और कत्थक-नर्तक बन गए। पर क़िस्मत में कुछ और ही बदा था। बीसवीं सदी में भारत के राजाओं और महाराजाओं की स्थिति ख़राब थी।जयपुर से निकलकर खेमचंद प्रकाश कुछ दिनों के लिए राजा गंगा सिंह के बुलावे पर बीकानेर चले गए। वहां मन नहीं लगा तो नेपाल के राजदरबार में गायक हो गए। कुछ समय बाद वहां से कलकत्ता आकर 'रेडियो रेडियो से जुड़ गए। यहां उनकी मुलाक़ात संगीतकार तिमिर बरन से हुई, जिन्होंने खेमचंद को ‘न्यू थिएटर्स’ के लिए अनुबंधित कर लिया।1935 में आई पहली ‘देवदास’ का संगीत तिमिर बरन का ही था। माना जाता है कि इसके गाने ‘बालम आये बसो मेरे मन में’ और ‘दुःख के दिन अब बीतत नाहीं’ खेमचंद ने ही कंपोज़ किये थे। हालांकि, इनके गीतकार केदार शर्मा इनका क्रेडिट महान कुंदन लाल सहगल को देते हैं।

1938 में ‘न्यू थिएटर्स’ की एक और फ़िल्म आई थी स्ट्रीट सिंगर। वही जिसमें केएल सहगल ने ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए’ गाया था। इस फ़िल्म में एक हल्का-फुल्का गाना था ‘लो मैडम खा लो खाना।’ यह खेमचंद पर फ़िल्माया गया था। उन दिनों पृथ्वीराज कपूर अपनी थिएटर कंपनी ‘पृथ्वी थिएटर्स’ लेकर शहर-शहर घूमते थे। उन्होंने कलकत्ते में ये फ़िल्म देखी। वो खेमचंद की प्रतिभा पहचान गए और उन्हें बॉम्बे आने के लिए प्रेरित किया। 1939 के आसपास खेमचंद प्रकाश मायानगरी चले आये। उनके संगीत निर्देशन में 1939 में पहली फिल्म आई- ‘मेरी आंखें।’ इसी साल एक और फिल्म आई-‘गाजी सलाउद्दीन।’ जिसमें उन्होंने नौशाद को सहायक के रूप में रख कर ब्रेक दिया। खेमचंद प्रकाश के संगीत सफर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव रही, फिल्म ‘तानसेन’ (1943)। इसमें के.एल सहगल और खुर्शीद के गाए गीतों ने धूम मचा दी। सहगल का 'राग दीपक' आधारित गीत ‘जगमग जगमग दिया जलाओ’ के लिए खेमचंद ने एक माह तक कठोर परिश्रम किया था। दीपक राग में यह आज भी अद्वितीय प्रयोग माना जाता है और हां, फ़िल्म तानसेन उद्योग की महानतम फिल्मों में से एक थी, जिसने बैजू बावरा (1952), बसंत बहार (1956), संगीत सम्राट तानसेन (1959), रानी रूपमती (1960) और मीरा (1979) जैसी अन्य संगीतमय फिल्मो के लिए मार्ग प्रशस्त किया।इसी तरह फ़िल्म महल के गाने,"..आएगा आने वाला " ने पूरी फ़िल्म में एक 'सिग्नेचर-ट्यून' के रूप में काम किया और इसी का अनुगमन बाद में आने वाली थ्रिलर फिल्मो :जैसे 'मधुमती', 'वो कौन थी' और 'मेरा साया' में देखा गया।

खेमचन्द प्रकाश का एक और महत्वपूर्ण योगदान यह था कि उन्होंने फिल्मों में न केवल हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत तत्वों का इस्तेमाल किया बल्कि अपनी गीत सेटिंग में जलतरंग,पियानो और शहनाई का उपयोग करने वाले पहले संगीत निर्देशकों में से एक बन गए। बड़े बड़े संगीत धुरंधरों द्वारा खेमचन्द प्रकाश को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में वर्णित किया गया है, जिसका हिंदी फिल्म संगीत में योगदान उनके द्वारा रचित गीतों से कहीं अधिक माना है। एक किंवदंती के अनुसार नेपाल के राजदरबार में गायक की नौकरी के दौरान खेमचंद एक बार बीमार हुए तो एक नेपाली नर्स ने उनकी बहुत सेवा की। कहा जाता है कि दोनों में प्रेम हो गया था। खेमचंद प्रकाश की पत्नी का निधन हो चुका था और उनके आख़री दिनों में यह नर्स उनकी सेवा में जी जान से जुटी रही। जानकारों का कहना है कि खेमचंद प्रकाश के निधन के बाद यह नर्स पागल हो गई थी। कुछ जानने वालों ने मदद की कोशिश भी की, लेकिन उसने कोई मदद नहीं ली।कभी लोकप्रिय साहित्य के बेताज बादशाह रहे गुलशन नंदा ने उस नर्स और खेमचंद प्रकाश के जीवन को ले कर एक उपन्यास लिखा था- ‘सिसकते साज़. बाद में 1976 में इस पर‘महबूबा’ नाम से. एक फिल्म भी बनी थी.

1935 से फिल्मों से जुड़े खेमचंद प्रकाश ने केवल 15 साल काम किया और उस दौरान उन्होंने क़रीब 50 फिल्मों में संगीत दिया। फ़िल्म 'महल' का संगीत खेमचंद प्रकाश के कॅरियर का सबसे बड़ा धमाका साबित हुआ। लेकिन वे अपनी यह धमाकेदार कायाबी नहीं देख पाए। 'महल' सिनेमाघरों में पहुंचने से दो महीने पहले 10 अगस्त, 1949 को उनका देहांत हो गया. तब वे सिर्फ 41 साल के थे। आज खेमचन्द प्रकाश की 72 वीं पुण्यतिथि पर हम इस महान आत्मा संगीतकार को नमन करते है।

ज़माना बड़े गौर से सुन रहा था
तुम्हीं सो गए दास्ताँ कहते कहते।

- मनोहर महाजन

साभार : The Followup

[मुंशी प्रेमचंद जयंती: सादर नमन]
07/31/2025

[मुंशी प्रेमचंद जयंती: सादर नमन]

[सादर नमन]
07/28/2025

[सादर नमन]

07/20/2025

द्रोहक स्वर: अन्तर्मनक जीत

उदय नारायण सिंह 'नचिकेता'

एम्हर अखबार सबटा मे 'दक्षेश' नाम बहुत चलि पड़ल छै जकरा सुनितहि हमर मोन विद्रोह क' उठैत अछि। केहन दन एक टा राक्षसीय भावना उत्पन्न क’ दैत अछि ओ । दक्षिण एशिया कें दक्षेश नहि कहब त’ 'ग्लोबल साउथ' कें की कहबै? कियैक त’ जत्तेक अन्हार सबटा त’ एशिया आ अफ्रीका के इयैह सब देश मे भेंटत ई बात बहुल प्रचारित अछि। मुदा एहन सब पछुआयल देश मे जनमि कय तैयो एतहुका लेखिका सब अपन अपन साहित्यिक परिदृश्य मे बहुत दिन सँ प्रतिरोध, पहचान, आ' परिवर्तन के कथ्य लेल उपजाउ जमीन के रूप मे काज क' रहल छथि - खास क' कय एहन सब महिला के जीवन के उदाहरण कें कथाक माध्यम सँ प्रचारित कय जे सब असंख्य बाधा के बावजूद, अपन भीतर मे स्वायत्तता स्वतंत्रता कें समाज संसार आ दुनिया सँ छीनि लेबाक, वापस क' लेबाक साहस देखबैत छथि ।

ग्लोबल नॉर्थ अथवा उत्तरी गोलार्ध मे जे हमसब देखै छी तात्कालिक मुक्ति वा बाहरी सफलता के माध्यम सँ जीत कें साहित्यक पाश्चात्यीकरण कहल जा सकै छै एहन कथ्य प्रचारित होइ छै ताहि सँ दूर, यिवोन वेरा (जिनक पोथीक शीर्षक छलनि 'बटरफ्लाई बर्निंग'), मरियामा बा (उपन्यास: 'सो लॉन्ग ए लेटर'), शशि देशपांडे ('दैट लॉन्ग साइलेंस'), आ' अरुंधती राय ('गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स') के उपन्यास आतंरिक क्रांति प्रस्तुत करै छथि । हुनका लोकनिक प्रधान पात्र खाली मुक्त नहि होइत छथि; ओ सभ अपन अस्तित्वक शर्त के पुनर्परिभाषित करैत छथि, प्रायः एकांत, पीड़ा वा अवहेलना मे रहियहु कय ।

हिनका सभक ई-सब कृति साधारणतया कोनो ने कोनो महिला पर केंद्रित होइ छनि जे गहन मानसिक आ' भावनात्मक बाधा के स्थिति सँ गुजरि रहल छथि - आंतरिक विचारधारा, विरासत मे भेटल कतेको तरहक वंचना आ' आघात, धार्मिक रूढ़िवादिता, आ' संरचनात्मक पितृसत्तात्मकता - ई सबटा भावना सँ लड़ैत खसैत चलैत हेलैत ई सब जेना बहि रहल होथि । हुनकर सभक जीत, भले ही हमेशा हुनक समुदाय द्वारा तत्काल मान्यता नै मिलै छै, लेकिन हुनका सभक अपन आत्मत्व के सशक्त घोषणा के रूप मे अवश्य ठाढ़ होइ छै । हिनका सभक अपन कहानी मे वर्णित दक्षिणी दुनिया तखन मात्र कोनो स्थानीय वा खाली क्षेत्रीय कहानी नहि, बल्कि कोना तरहक दबाव कें सहैतो महिला मानस मे समता समेकता आ' सार्वभौमिकता कें ध्यान देल जाय छै, से आब हमसब बूझि रहल छी। आर मैथिली के नारी हस्ताक्षर एहने परिवेश मे पनपि रहल अछि।
पहिने यवोन वेरा केरऽ 'बटरफ्लाई बर्निंग' मे फेफेलाफी केर चरित्र कें ल' सकै छी – जकरा मे देखी त’ लागत जेना खंडहर के बीच मे अस्तित्व अपन मुक्ति के पहचान कें स्पष्ट क' रहल अछि। ज़िम्बाब्वे देशक 1940 के दशक के एकटा औपनिवेशिक शहर बुलावायो के घटना पर लिखल जेल छल ई उपन्यास- यिवोन वेरा केर 'बटरफ्लाई बर्निंग'। फेफेलाफी के जीवन ओना त दुर्भाग्य आ दुःख सँ भरल छलनि मुदा हुनका मे एकटा भयंकरी महारौद्री भाव छलनि - कियैक त’ हुनका मे आत्मनिर्णय लेली तरसै वाला एक टा युवा, बुद्धिमान अश्वेत महिला नुकायल छलथि । अपन माय के क्रूर हत्या सँ ओ अनाथ भेल छलीह आ' तकर संगहि फुम्बाथा के एहन आहार प्रेमक जटाजाल मे आबद्ध छलथि जिनका मे स्वामित्व भाव बेसी छलनि। एहन फेफेलाफी कें कतेको तरहक आनुगत्य आ' वशीकरण के सामना करय पड़ै छै: उपनिवेशवाद, लैंगिक हिंसा, आ' आर्थिक शोषण आ' समाजक सीमांत दिसि धक्का खाइत सत्ता । देखै बाला होइ छनि हुनक जूझबाक कहानी।

प्रश्न ई जे फेफेलेफी के द्वंद्व आ' हुनक केंद्रीय मानसिक बाधा की छलनि - ओ एक द्वैत छलनि : एक्कहि संग प्रेमक लालसा आ' स्वायत्तता क’ इच्छा। । जाहि समाज मे महिला के भविष्य के पटकथा आज्ञाकारिता आ' बलिदान क’ कलम सँ लिखल जाय छै, ओहि समाज मे फेफेलेफी के नर्स बनब आ' अपन शरीर पर नियंत्रण मे रखै के संकल्प (विशेष रूप सँ एक दर्दनाक स्व-प्रशासित गर्भपात के माध्यम सँ) एकटा कट्टरपंथी निर्णय छलनि । काव्यात्मक विखंडन सँ भरपूर वेरा के गद्य हुनकर नायिका के आंतरिक अव्यवस्था आ परिवर्तन के प्रतिबिंबित करैत अछि। ई उपन्यास पारंपरिक अर्थ मे मात्र नारी पात्र कें संकल्पे नहि दैत अछि - फेफेलेफीक विजय एक टा दार्शनिक तत्त्व सेहो छनि। ई दर्शन हुनक कोनो पुरुष, प्रेमी या शासन-व्यवस्था द्वारा परिभाषित नै होमय देबा मे निहित छनि । ओ अधीनता सँ बेसी स्वतंत्रता कें चुनैत छथि, चाहे ओ कतबो दुखद किएक नहि हो। वेरा के हाथ मे मनोवैज्ञानिक मुक्ति सामाजिक विद्रोहो सँ बेसी अधिक विध्वंसकारी भ' जाय छै । फेफेलाफी केर आंतरिक युद्ध, जकरा मे बाहरी आघात आ' परिवर्तनक माध्यम बनबा लेल उताहुल भावना मिलायल छै, ओकरा भावनात्मक रूप मे अफ्रीकी साहित्य के सब सँ जटिल नायिका मे शामिल करैत छै ।
ओम्हर हमरा लोकनिक सामने आर एक टा महिला पात्र अछि - मरियामा बा’ के उपन्यास 'सो लॉन्ग ए लेटर' मे रामौले – जे अपन प्रतिक्रिया के माध्यम सँ अपन आत्म सम्मान कें देखाबैत अछि । वेरा के दुखद अवहेलना के विपरीत मरियामा बा’ एकटा शांत मुदा कम गहींर प्रतिरोध प्रस्तुत करैत छथि। उत्तर औपनिवेशिक सेनेगल के एक टा अधबूढ़ स्कूली शिक्षक रामातुलाये बहुविवाह के माध्यम सँ अपन पति के विश्वासघात कें देखबाक बाद अपन सबसँ नीक मित्र कें लिखै छथि । ई उपन्यास एकटा पत्रात्मक कथ्यक माध्यमे पाठकक सन्मुख खुलैत अछि, जे एकटा एहन रूप अछि जे आत्मनिरीक्षण आ वृद्धिशील परिवर्तनक अनुमति दैत अछि।

रामौलाये के मानसिक बाधा आने तरहक छलनि - सांस्कृतिक रूप सँ ई विरासत मे हुनका भेंटल छलनि; ओ बहुत दिन सँ धैर्य आ' मौन कें महिला के गुण के रूप मे स्वीकार करैत छली । धर्म, मातृत्व, आ' सामाजिक रूप सँ स्वीकृत कर्तव्य के भाव ओकरा सामना करै के बजाय सहन करब सिखा' दैत छै । मुदा जेना-जेना पत्र आगू बढ़ैत अछि, एकटा सूक्ष्म सुधार होइत जाइत अछि । ओकरा अपन स्वीकरण आ' आज्ञाकारिता के दोष-रेखा देखबय लागैत छै । ओ खाली पतिक पसंदे कें सामना नहि करैत छथि अपितु अपन आंतरिक अधीनता कें सेहो सामना करैत छथि।
पत्रक अंत धरि रामौलाये अपन गरिमा वापस पाबि लैत छथि । सुविधा के लेल दोसर विवाह करै सँ मना क' दै छथि आ' अपन कन्या कें स्वतंत्र रूप सँ सोचै विचारै बला पालन-पोषण करै वाला एक टा शिक्षित, एकल माँ के रूप मे अपन पहचान कें अपनाबैत छथि । हुनक विजय नाटकीय नै छनि - ई ध्यानात्मक छै, जकर जड़ आत्मसम्मान मे छै । मरियामा बा, जे स्वयं अफ्रीकी नारीवाद के अग्रणी प्रवक्ता छथि, अपन कोमल गद्य के प्रयोग क' कय एक तरहक शांत क्रांति के उजागर करै छथि जे सार्वजनिक विद्रोह सँ भिन्न अवश्य छै मुदा नारी के आंतरिक दृढ़ संकल्प के द्योतक छै जे प्रतिभाशाली महिले के भीतर भ' सकै छै।
हिनका लोकनिक तुलना मे आब राखै चाहै छी शशि देशपाण्डे के 'दैट लॉन्ग साइलेंस' के नायिका जया कें – जे अन्तर्मनक चुप्पी कें तोड़ैत अछि । रामौलाये चिट्ठी लिखैत छथि त’ शशि देशपाण्डे क जया अपन डायरी मे लिखि कय रखैत छथि । दैट लॉन्ग साइलेंस (1988) मे हमसब जया कें देखैत छी, जे एकटा मध्यमवर्गीय शहरी भारतीय महिला छथि आ' जे अपन वैवाहिक जीवनक बहुत रास समय सांस्कृतिक अपेक्षाक भार सँ नीरव छथि - शाब्दिक आ प्रतीकात्मक दुनू रूप मे, आ' अहिना समय अतिवाहित करैत छथि । ओ एकटा टिपिकल "नीक पत्नी" छथि जे धीरे-धीरे, लगभग अगोचर रूपें, अपन आवाज, रचनात्मकता, आ आकांक्षा कें समर्पित क' देने छथि, भाग्यक हाथ मे सुपुर्द क' दैत छथि । जया क मानसिक अवरोध 'मौनता' छैक, जकरा ओ शुरू मे बलिदानक रूप मे ग्रहण करैत छथि - एकटा होनहार लेखिका, घर मे शांति बचाबय लेल सालों से अपना कें दबा कय रखने छथि। ओकर पति क दुश्चरित्रता के कांड, जाहि सँ दुनू अस्थायी रूप सँ अलग भ’ जाइत छथि, ओकर जागरण क अद्भुत उत्प्रेरक बनि जाइत छै। देशपांडे के कथ्य तनावपूर्ण, चिंतनशील, आ जेना 'धोखा-देबय-वाला' सरल छनि। सफलता विद्रोह के माध्यम सँ नै, चेतना में बदलाव के माध्यम सँ भेंटैत अछि। रामौलाये जकाँ ओहो निष्क्रिय गुण के बजाय भावनात्मक ईमानदारी क चयन करै छै, जकरा चलते ओकर मौनते प्रतिरोधक पटभूमि बनि जाय छै।

चारिम कोण मे राखि सकैत छी अरुंधती रायक उपन्यास 'द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स' के मुख्य पात्र अम्मू केँ – जाहि मे प्रेम एकटा विद्रोहक रूप मे देखाओल गेल अछि । एतय अविस्मरणीय माँ मे अम्मू भरिसक एहि समूह के सब सँ प्रतीकात्मक रूप सँ उद्भासित नायिका छै । जाति, लिंग-विषमता, आ' राजनीतिक रूढ़िवादिता तीनो के सामना करै छै तलाकशुदा आ' बदनाम अम्मू - जे अपन बच्चा सभक संग अपन माता-पिताक घर मे रहैत छथि । हुनक मानसिक अवरोध लाज, अपराधबोध आ' आंतरिक पितृसत्तात्मक निर्णय सँ उपजल छनि । पति कें छोड़ि देबाक बाद फेर सँ पुरुष-कामिताक इच्छा महसूस करय वाली महिला, आ' ताहू पर एकटा दलित पुरुष वेलुथा लेल पागल - अम्मू अपन जाति-विधिनिषेधक उल्लंघन त’ करिते छथि - ताही संग नारी के यौन आत्मबोधक बोझ सेहो उठाबैत छथि। एकहि संग कोमल आ आगजनी करय बला ओकर दलित पुरुषक प्रति प्रेम जेना ओकर हथियार आ' ओकर बर्बादी - दुनू बनि जाइत छैक।

दक्षिणी पृथ्वी के ई चारि टा नायिका अलग अलग सांस्कृतिक आ' ऐतिहासिक संदर्भ मे निवास करै छथि - जिम्बाब्वे के उपनिवेशवाद, सेनेगल के आजादी के बाद के इस्लाम आरोपित विधि-निषेध, भारतीय मध्यमवर्गीय पितृसत्तात्मकता, आ' केरल के जाति-विभक्त ईसाई धर्म मे रहियहु कय दलित वर्ग कें बारब - हुनकर सभक कहानी कें सशक्त तरीका सँ एक दोसरा के जेना परिपुष्ट करै छै । एतय दर्शित प्रत्येक महिला मानसिक बाधा के एक विशिष्ट विन्यास सँ लड़ैत छथि - ई सब क्यो इतिहासक जननेता अथवा राष्ट्रीय नायक नै बनैत छथि, मुदा हुनका लोकनिक जीत मात्र आन्तरिक द्रोहक विजय होइत छनि।

[पोस्ट साभार: उदय नारायण सिंह 'नचिकेता' सरक फेसबुक वाल सँ]

[जन्मदिवस: Shivashankar Shriniwas]मैथिलीक वरिष्ठ कथाकार शिवशंकर श्रीनिवासक कथा ओहि सभ मानवीय मूल्यक पुनराविष्कारक प्रयास...
07/02/2025

[जन्मदिवस: Shivashankar Shriniwas]

मैथिलीक वरिष्ठ कथाकार शिवशंकर श्रीनिवासक कथा ओहि सभ मानवीय मूल्यक पुनराविष्कारक प्रयास थिक, जकरा हमरा लोकनि धीरे-धीरे बिसरैत जा रहल छी। ओ चेतनाक गह्वर मे पैसि कऽ स्मरण करबैत छथि जे माटि सँ उपजल जीवनमे प्रेम, करुणा, आ सहानुभूतिक संग-संग अदम्य जिजीविषा बसैत अछि।

जन्मदिवस पर अनंत शुभकामना ओ बधाइ।

#मैथिली #कथाकार

[A must read article "Rewriting India’s Republic of Letters"]The article "Rewriting India’s Republic of Letters" publish...
06/24/2025

[A must read article "Rewriting India’s Republic of Letters"]

The article "Rewriting India’s Republic of Letters" published in The Wire examines a major shift in India's literary landscape. For long, English and Hindi dominated the national stage, often sidelining regional languages. However, a new literary wave is emerging driven by powerful works in languages like Kannada, Tamil, Malayalam, Assamese, and Maithili, now reaching wider audiences through skilled translation and independent publishing.

Writers such as Banu Mushtaq, who won the International Booker Prize, and Perumal Murugan, awarded the JCB Prize, represent this shift. Their stories, rooted in caste, gender, and rural life, reflect voices from the margins gaining global recognition. The article also highlights how translators and small publishers are playing a critical role in dismantling traditional literary hierarchies and creating space for linguistic diversity.

This article is essential reading for anyone interested in Indian literature, translation, and cultural politics. It offers a sharp, timely perspective on how regional voices are reshaping the idea of a national literary identity.

Authors like Banu Mushtaq, Perumal Murugan and dozens of others from across the country and changing the way we listen to stories, refocusing our attention to the plurality that exists all around us.

[हार्दिक बधाइ: पार्वती तिर्की]साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार 2025हिन्दी कविता संग्रह : फिर उगना
06/20/2025

[हार्दिक बधाइ: पार्वती तिर्की]

साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार 2025

हिन्दी कविता संग्रह : फिर उगना

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