09/19/2026
हिंदी दिवस उत्सव — एक अविस्मरणीय संध्या ।
पिछले शनिवार नैशविल स्थित श्री गणेश मंदिर में हिंदी दिवस के अवसर पर आयोजित हिंदी उत्सव ने भाषा, साहित्य, कला, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का ऐसा सुंदर संगम प्रस्तुत किया, जिसकी मधुर स्मृतियाँ लंबे समय तक हमारे साथ रहेंगी।
हमारी नई सदस्य और इस कार्यक्रम की सशक्त संचालिका रिचा भाकुनी रायिकवाल के आत्मीय स्वागत संदेश के साथ संध्या की शुरुआत हुई। उनके स्वागत के पश्चात दीप प्रज्वलन किया गया, जिसने पूरे वातावरण को शुभता और सकारात्मक ऊर्जा से भर दिया।
इसके बाद नए अतिथियों और दर्शकों को International Hindi Association (IHA) के उद्देश्यों एवं कार्यों से परिचित कराया गया। भारत और अमेरिका—हमारे दो प्रिय घरों—के सम्मान में दोनों देशों के राष्ट्रगान के साथ संध्या का विधिवत शुभारंभ हुआ।
कार्यक्रम काव्य पाठ, हास्य कविता, नाट्य प्रस्तुतियों, समूह नृत्य और समूह गीत जैसी विविध प्रस्तुतियों से सजा था। हर प्रस्तुति अपने अलग रंग और अंदाज़ में दर्शकों के दिलों तक पहुँची।
पुष्पम वैद्य जी की प्रस्तुति ‘रेत पर नाम’ ने पूरे सभागार को वाहवाही से गूँजा दिया। उनकी प्रस्तुति में जितनी संजीदगी थी, उतनी ही भावुकता और मुस्कुराहट भी। शब्दों और भावनाओं का यह सुंदर मेल देर तक मन में बना रहा।
वहीं श्री तुषार वहाल द्वारा प्रस्तुत हास्य कविता ने भी खूब वाहवाही बटोरी। विशेष बात यह रही कि यह उनकी स्वयं की रचना थी और उनका यह पहला मंचीय प्रस्तुतीकरण था। फिर भी उनका आत्मविश्वास और सहजता ऐसी थी कि कहीं से भी यह पहली बार मंच पर आने जैसा नहीं लगा।
श्रीमती सिंह की कविता हमें जैसे सीधे अपने स्कूल के दिनों में ले गई—बचपन की सरलता, पुरानी यादें और उन दिनों की मीठी अनुभूतियाँ मानो एक बार फिर आँखों के सामने जीवंत हो उठीं।
वहीं श्री दिलीप कुमार पांडे जी की महाभारत के एक खंड पर आधारित कविता ने वातावरण को गंभीर और चिंतनशील बना दिया। उनकी प्रस्तुति केवल कविता नहीं थी, बल्कि आत्ममंथन का एक अवसर थी—ऐसी रचना, जो समाप्त होने के बाद भी देर तक मन में चलती रही।
एडम क्रिस्टोफर जी की कविता ‘जिस जिस पथ पर’ प्रेरणादायक होने के साथ-साथ बेहद सरल और भावनात्मक थी। उनकी प्रस्तुति ने अपनी सहजता से सभी के मन को छुआ।
नाट्य प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में हास्य, उत्साह और जीवंतता के रंग भर दिए।
इनमें ‘मंगलयान यात्रा’ ने बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी का मन मोह लिया। मनोरंजन के साथ ज्ञान, कल्पना और बच्चों की रचनात्मकता का सुंदर समावेश इस प्रस्तुति की विशेषता रहा।
दूसरी नाट्य प्रस्तुति ‘माँ — हिंदी’ ने भी दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया और शाम को एक अलग रंग प्रदान किया।
दो नन्ही बालिकाओं द्वारा प्रस्तुत भरतनाट्यम ने सभी का मन मोह लिया। उनकी प्रस्तुति इतनी मनमोहक और प्रभावशाली थी कि पूरे सभागार में कुछ क्षणों के लिए मानो pin-drop silence छा गया। हर कोई मंत्रमुग्ध होकर उन्हें देखता रहा।
नृत्य प्रस्तुतियों में वैष्णवी बहनों—अंतरा और गार्गी द्वारा प्रस्तुत ‘नमामि नमामि’ ने अपनी सुंदर कोरियोग्राफी, भाव-भंगिमा और सधे हुए प्रदर्शन से सभी का मन मोह लिया।
वहीं जब हमारे टीम मेंबर्स ने मिलकर ‘आरंभ है प्रचंड’ प्रस्तुत किया, तो दर्शकों में भी जोश भर गया और देखते ही देखते पूरा सभागार उनके साथ गाने लगा।
आख़िर किसी भी सांस्कृतिक उत्सव की असली खूबसूरती यही तो है—जब मंच पर कुछ लोग प्रस्तुति देते हैं, लेकिन उनके साथ पूरा समुदाय दिल से जुड़ जाता है।
लोक-संस्कृति की एक विशेष प्रस्तुति तप्पे की रही, जिसे सीमा वर्मा, रमन वर्मा, मिशा शर्मा और शार्दुल राणे ने प्रस्तुत किया। लोकगीत की इस सुंदर परंपरा को इतने आत्मीय और सजीव रूप में सुनना कार्यक्रम के विशेष अनुभवों में से एक रहा और दर्शकों के लिए हमारी लोक-सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का एक यादगार अवसर बना।
संगीतमय प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में एक अलग ही भावपूर्ण रंग भर दिया। हमारे प्रिय टीम सदस्य उमेश कुमार जी द्वारा प्रस्तुत ‘जब जिद पर आ गई पार्वती’ उस शाम का विशेष आकर्षण रहा।
शाम का एक बेहद विशेष और भावुक क्षण था Tennessee की प्रिय Dolly Parton को समर्पित श्रद्धांजलि, जिसे मान्या जोशी ने प्रस्तुत किया।
यह केवल एक महान गायिका और कलाकार को श्रद्धांजलि नहीं थी, बल्कि उस इंसानियत, करुणा और परोपकार की भावना को सम्मान देना था, जिसके लिए Dolly Parton जानी जाती हैं।
जिस राज्य और समुदाय को हम आज अपना घर कहते हैं, उसकी इस महान हस्ती को हिंदी के माध्यम से सम्मानित करना अपने आप में एक बेहद खूबसूरत और भावपूर्ण अनुभव था।
इस शाम का शायद सबसे भावपूर्ण पक्ष था नेपाल में आई विनाशकारी आपदा के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए नेपाल एसोसिएशन को सहयोग देना।
हमने नेपाल एसोसिएशन के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष जी
का स्वागत किया और राहत कार्यों के लिए अपना छोटा-सा योगदान प्रदान किया।
हमारी इस पहल से वे भावुक हुए और उन्होंने विशेष रूप से इस भावना की सराहना की कि कठिन समय में जिस प्रकार भारत ने नेपाल की सहायता के लिए हाथ बढ़ाया, उसी मानवीय भावना को आगे बढ़ाते हुए हमारी जैसी एक सामुदायिक संस्था भी नेपाल के साथ खड़ी हुई।
और शायद यही तो है भारतीयता।
भारतीयता केवल अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं से प्रेम करने का नाम नहीं है।
भारतीयता वह भावना है, जिसमें दूसरे के दुःख को अपना समझकर मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाया जाता है।
हिंदी ने हमें जोड़ा, संस्कृति ने हमें हमारी जड़ों से जोड़े रखा,
और मानवता ने हमें एक-दूसरे के और करीब ला दिया।
इसके बाद हुआ एक ऐसा रंगारंग कार्यक्रम, जिसने कुछ ही पलों में हम सभी को हमारे बचपन की गलियों में पहुँचा दिया।
हमारे नन्हे कलाकारों ने मिलकर वाद्य यंत्रों के माध्यम से बचपन की एक बेहद प्यारी और यादगार धुन को फिर से जीवंत कर दिया—‘मिले सुर मेरा तुम्हारा…’
पियानो, बाँसुरी और वायलिन पर बच्चों ने जब इस धुन को छेड़ा, तो ऐसा लगा मानो समय कुछ पल के लिए ठहर गया हो।
वही धुन, वही अपनापन और वही भाव—बस फर्क इतना था कि जिस गीत ने हमारे बचपन को सजाया था, आज हमारी नई पीढ़ी उसे अपनी उँगलियों और अपने सुरों से जीवंत कर रही थी।
संगीत की यही तो खूबसूरती है—वह पीढ़ियों के बीच की दूरी मिटाकर यादों को वर्तमान से जोड़ देता है।
और उस पल सच में लगा—
“मिले सुर मेरा तुम्हारा,
तो सुर बने हमारा…”
यह हिंदी दिवस केवल हिंदी भाषा का उत्सव नहीं था।
हिंदी हमारी पहचान है, संस्कृति हमारी शान है और मानवता हमारी सबसे बड़ी पहचान।
ऐसी ही शामें हमें याद दिलाती हैं कि हम जहाँ भी रहें, अपनी जड़ों से जुड़े रहना और दूसरों के लिए दिल खोलकर खड़े होना ही हमारी सबसे खूबसूरत विरासत है।
इस खूबसूरत शाम को सफल बनाने वाले IHA के सभी सदस्यों, हमारी President सीमा वर्मा जी, Vice President प्रेरणा शर्मा जी, सभी volunteers, सह-लाकर पूजा श्रीवास्तव जी, हमारी संचालिका रिचा भाकुनी रायिकवाल, हमारे senior members, श्री गणेश मंदिर की पूरी टीम, सभी कलाकारों, प्रतिभागियों और उपस्थित सभी दर्शकों का तहे दिल से शुक्रिया।
आप सभी के सहयोग, समय, मेहनत और उत्साह ने इस शाम को केवल एक कार्यक्रम नहीं रहने दिया—इसे एक खूबसूरत सामुदायिक स्मृति बना दिया।
हर उस व्यक्ति को धन्यवाद, जिसने मंच पर अपनी प्रतिभा दी, पर्दे के पीछे अपना समय दिया, तालियों से कलाकारों का उत्साह बढ़ाया और अपनी उपस्थिति से इस शाम को पूरा किया।
यह उत्सव हम सबका था।
यह मंच हम सबका था।
और यह खूबसूरत याद भी हम सबकी है।