Bihar Overseas Welfare Association

Bihar Overseas Welfare Association Give today, make tomorrow better.

13/01/2026

08/01/2026

14 करोड़ की आबादी वाला राज्य बिहार आज भी डायरेक्ट इंटरनेशनल फ्लाइट जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित है, तो यह केवल इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी नहीं बल्कि सोच की कमी को भी दर्शाता है। रोज़गार, इलाज, परिवार, आपात स्थिति और समय—इन सबका सीधा संबंध हवाई कनेक्टिविटी से है। अगर सरकार करोड़ों लोगों के लिए एक ऐसा एयरपोर्ट और डायरेक्ट इंटरनेशनल फ्लाइट की व्यवस्था नहीं कर पा रही है, तो सवाल उठना ज़रूरी है। लोकतंत्र में सवाल करना गुनाह नहीं, ज़िम्मेदारी है। इंसान की ज़िंदगी और उसकी ज़रूरतें सरकार की टॉप प्रायोरिटी होनी चाहिए, न कि सिर्फ़ फाइलों में बंद योजनाएँ।





Narendra Modi Rahul Gandhi Delhi Airport

यह सिर्फ़ एक पेटिशन नहीं है, यह बिहार की आवाज़ है।जब करोड़ों बिहारी देश-विदेश में मेहनत करके भारत की अर्थव्यवस्था को मज़...
08/01/2026

यह सिर्फ़ एक पेटिशन नहीं है, यह बिहार की आवाज़ है।
जब करोड़ों बिहारी देश-विदेश में मेहनत करके भारत की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करते हैं, तो क्या वे डायरेक्ट इंटरनेशनल फ्लाइट जैसी बुनियादी सुविधा के हक़दार नहीं हैं? आज भी बिहार से गल्फ देशों के लिए एक भी सीधी उड़ान नहीं है, जिसकी वजह से परिवारों को 15–20 घंटे अतिरिक्त सफ़र, ज़्यादा खर्च और मानसिक-शारीरिक परेशानी झेलनी पड़ती है।

अगर आप मानते हैं कि बिहार को बराबरी का हक़ मिलना चाहिए, कि हमारी ज़िंदगी, हमारा समय और हमारा सम्मान मायने रखता है—तो इस पेटिशन को साइन करें और शेयर करें। आपकी एक सिग्नेचर किसी का सफ़र आसान बना सकती है, किसी परिवार को राहत दे सकती है। चुप रहना भी एक विकल्प है, लेकिन आज बोलना ज़रूरी है।


इस लिंक को ओपन करें और इस मांग को लेकर पेटिशन को अपना समर्थन दीजिए



https://c.org/By5J44stvz

08/10/2025
कई हिंदुत्व संगठनों ने जम्मू के हाईवे को विरोध प्रदर्शन के दौरान ब्लॉक कर दिया था, जिससे पूरे देश के संपर्क को बाधित किय...
22/09/2024

कई हिंदुत्व संगठनों ने जम्मू के हाईवे को विरोध प्रदर्शन के दौरान ब्लॉक कर दिया था, जिससे पूरे देश के संपर्क को बाधित किया गया था। इसके बावजूद, किसी ने उन्हें अलगाववादी या देश विरोधी नहीं कहा, न ही उन पर देश तोड़ने का आरोप लगाया। वहीं, शरजील इमाम ने कभी ऐसी बात कही भी नहीं, उसने सिर्फ चक्का जाम करने का आह्वान किया था, शरजील ने तो सड़क जाम की बात की थी सड़क पर उतरे भी नहीं थे जो किसी भी लोकतांत्रिक देश में विरोध प्रदर्शन का एक वैध तरीका माना जाता है। लेकिन इसके बावजूद, उसे देशद्रोह के आरोप में जेल में डाल दिया गया।

यहाँ एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है: विरोध प्रदर्शन का अधिकार जब सभी नागरिकों को समान रूप से संविधान द्वारा प्रदान किया गया है, तो फिर एक ही तरह की कार्रवाई पर अलग-अलग मापदंड क्यों?

उदाहरण के तौर पर, जब किसान आंदोलन के दौरान 26 जनवरी 2021 को दिल्ली में ट्रैक्टर रैली निकाली गई और उसके दौरान हिंसा हुई, तो भी प्रदर्शनकारियों पर राष्ट्रविरोधी होने का ठप्पा नहीं लगाया गया। पुलिस ने अपनी कार्रवाई की, और जांच हुई, लेकिन किसी एक व्यक्ति को इस हद तक निशाना नहीं बनाया गया, जैसा शरजील इमाम के मामले में देखा गया।

इसी तरह, महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन के दौरान कई बार सड़कें और हाईवे ब्लॉक किए गए, लेकिन इसे अलगाववाद या देशद्रोह से नहीं जोड़ा गया। विरोध का स्वरूप और उसका तरीका किसी भी लोकतंत्र में मौलिक अधिकार है, फिर चाहे वो सड़क जाम करना हो या सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाना।

लेकिन शरजील इमाम के मामले में, बिना किसी ठोस सबूत के, उसकी बयानबाजी को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया और उसे एक राष्ट्रविरोधी के रूप में दिखाया गया। यह दर्शाता है कि कैसे कुछ मामलों में दोहरा मापदंड अपनाया जाता है, जहाँ एक पक्ष के विरोध को लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में देखा जाता है, जबकि दूसरे पक्ष के विरोध को देशद्रोह करार दिया जाता है।

आज डॉ मोहम्मद शहाबुद्दीन साहब के बारे में क्या ये बात आप जानते थे? शिक्षा को लेकर शहाबुद्दीन साहब का विज़न कितना शानदार थ...
25/08/2024

आज डॉ मोहम्मद शहाबुद्दीन साहब के बारे में क्या ये बात आप जानते थे?
शिक्षा को लेकर शहाबुद्दीन साहब का विज़न कितना शानदार था इस बात से पता चलता है
भारत ही क्या पुरे विश्व के लिए अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने शिक्षा के क्षेत्र में जो योगदान दिया है उसका गवाह हर भारत की जनता है
शहाबुद्दीन साहब उसी यूनिवर्सिटी के "Member, Court of the Aligarh Muslim University, 1998-99" रहे हैं

अब इसका क्या मतलब हुआ ? मतलब कि
"Member, Court of the Aligarh Muslim University, 1998-९९ के दौरान अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) की कोर्ट के सदस्य थे।

AMU की कोर्ट क्या है ?

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की कोर्ट विश्वविद्यालय की सर्वोच्च निकाय (Governing Body) होती है। इसमें विभिन्न श्रेणियों के सदस्य शामिल होते हैं, जिनमें विश्वविद्यालय के पदाधिकारी, फैकल्टी सदस्य, प्रतिष्ठित विद्वान, और सरकार द्वारा नामित लोग होते हैं।
कोर्ट का कार्य विश्वविद्यालय की प्रमुख नीतियों, बजट, और अन्य महत्वपूर्ण मामलों पर निर्णय लेना होता है। यह विश्वविद्यालय की प्रशासनिक, शैक्षणिक और वित्तीय मामलों में सबसे ऊंची प्राधिकरण होती है।
1998-99 के दौरान इन्होने AMU की कोर्ट में सदस्य के रूप में सेवा दी, जिसका अर्थ है कि वे उस समय विश्वविद्यालय के प्रशासनिक और शैक्षणिक निर्णयों में भागीदार थे।
और ये रिकॉर्ड हमारे संसद भवन के किताबो में दर्ज है
अगर ये इस दुनिया में होते तो शायद AMU का ब्रांच भी सिवान में खुल सकता था
अगले पोस्ट में एक और शानदार पहलु .......

25/08/2024

सिवान की जनता जितनी जागरूक है, एक से एक शिक्षित लोग यहाँ से निकले हैं , विदेश घूमने वाली जनता है, देश के अलग अलग कोनो में हैं सिवान की जनता, बिहार के बाकी जिलों से कहीं ज़्यादा उन्नत पर हैं सिवान की जनता
बस एक दमदार लीडर की तलाश है जो शिक्षित हो, दमदार हों और सबको लेकर साथ चलने वाला हो.
बस उसी दिन का इंतज़ार है

21/08/2024

पहले घरों के सामने मिलाद, जलसा, और इस्लामिक इज्तेमा होते थे, जिससे बच्चे और युवा बहुत कुछ सीखते थे। जैसे-जैसे ये आयोजन कम होते गए, वैसे-वैसे युवा नशे, अश्लील हरकतों और बिगड़ने के रास्तों पर चलने लगे। इसे फिर से शुरू कीजिए, अच्छे मौलाना, कारी, और आलिम को अपने दरवाजे पर बुलाकर अच्छी बातों का ज़िक्र कराएं और बिगड़ती नस्लों को सुधारें। मैं नहीं कहता कि यही एकमात्र रास्ता है, लेकिन यह बच्चों और युवाओं को सही मार्ग पर लाने का बेहतरीन तरीका है।

जब ऐसी धार्मिक मीटिंग्स में लोग आमने-सामने होते हैं, तो इसका मनोवैज्ञानिक असर यह होता है कि बच्चे, युवा, बूढ़े सभी एक-दूसरे के नजर में रहते हैं और गलत कदम उठाने से पहले कई बार सोचते हैं।

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