22/09/2024
कई हिंदुत्व संगठनों ने जम्मू के हाईवे को विरोध प्रदर्शन के दौरान ब्लॉक कर दिया था, जिससे पूरे देश के संपर्क को बाधित किया गया था। इसके बावजूद, किसी ने उन्हें अलगाववादी या देश विरोधी नहीं कहा, न ही उन पर देश तोड़ने का आरोप लगाया। वहीं, शरजील इमाम ने कभी ऐसी बात कही भी नहीं, उसने सिर्फ चक्का जाम करने का आह्वान किया था, शरजील ने तो सड़क जाम की बात की थी सड़क पर उतरे भी नहीं थे जो किसी भी लोकतांत्रिक देश में विरोध प्रदर्शन का एक वैध तरीका माना जाता है। लेकिन इसके बावजूद, उसे देशद्रोह के आरोप में जेल में डाल दिया गया।
यहाँ एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है: विरोध प्रदर्शन का अधिकार जब सभी नागरिकों को समान रूप से संविधान द्वारा प्रदान किया गया है, तो फिर एक ही तरह की कार्रवाई पर अलग-अलग मापदंड क्यों?
उदाहरण के तौर पर, जब किसान आंदोलन के दौरान 26 जनवरी 2021 को दिल्ली में ट्रैक्टर रैली निकाली गई और उसके दौरान हिंसा हुई, तो भी प्रदर्शनकारियों पर राष्ट्रविरोधी होने का ठप्पा नहीं लगाया गया। पुलिस ने अपनी कार्रवाई की, और जांच हुई, लेकिन किसी एक व्यक्ति को इस हद तक निशाना नहीं बनाया गया, जैसा शरजील इमाम के मामले में देखा गया।
इसी तरह, महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन के दौरान कई बार सड़कें और हाईवे ब्लॉक किए गए, लेकिन इसे अलगाववाद या देशद्रोह से नहीं जोड़ा गया। विरोध का स्वरूप और उसका तरीका किसी भी लोकतंत्र में मौलिक अधिकार है, फिर चाहे वो सड़क जाम करना हो या सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाना।
लेकिन शरजील इमाम के मामले में, बिना किसी ठोस सबूत के, उसकी बयानबाजी को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया और उसे एक राष्ट्रविरोधी के रूप में दिखाया गया। यह दर्शाता है कि कैसे कुछ मामलों में दोहरा मापदंड अपनाया जाता है, जहाँ एक पक्ष के विरोध को लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में देखा जाता है, जबकि दूसरे पक्ष के विरोध को देशद्रोह करार दिया जाता है।