13/10/2023
महामति प्राणनाथ (1618-1694), मध्ययुगीन भारत के अन्तिम अवतारी पुरुष थे। वह केशव ठाकुर और धनबाई के पुत्र थे| अपनी प्रतिभा के कारण अपनी किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते वे आध्यात्मिक ज्ञान में पारंगत हो गए थे| वे प्रणामी सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे जिन्होंने सभी धर्मों के लोगों को सम्मिलित किया । उनकी वाणी का सार 'तारतम सागर' नामक ग्रन्थ में संकलित है। जिसमे 524 प्रकरणों में विभक्त 18,758 चौपाइयो में संयोजित है| यह प्रणामी धर्म का प्रमुख और पवित्रतम ग्रंथ है। वे अक्षरातित श्री कृष्ण के उपासक थे| सतगुरु श्री देवचन्द्र जी ने अपने सस्कारों और शास्त्रों का जो आधार अपने शिष्य श्री मेहेराज को कृष्ण भक्ति प्रदान किया वह एक विराट धर्मचेतना का सुदृढ़ आधार था|
सन 2019 में जारी एक भारतीय डाक टिकट महामति प्राणनाथ जी को भारत सरकार ने सम्मान दिया|
गुजरात में जन्म लेनेवाले महामति प्राणनाथ का पूर्व नाम 'मेहराज ठाकुर' था । निजानन्द सम्प्रदाय के आचार्य देवचन्द्र से दीक्षा प्राप्त मेहराज ने जामनगर राज्य मे वजीर का पद भी सँभाला लेकिन अपनी आन्तरिक प्रेरणा सामाजिक उत्तरदायित्व और जागनी जन-अभियान को दिशा देने के महत् संकल्प ने उन्हे एक विशिष्ट पहचान दी । उन्होने समय और समाज की आकांक्षाओं को प्रभावित और आन्दोलित किया। उनके जागनी अभियान को नयी पहचान मिली। व्यक्ति, समाज, धर्म और विश्व-मंच को जोडकर महामति ने न केवल जन-आन्दोलन आरम्भ किया बल्कि सामाजिक एवं जातीय आवश्यकताओं के अनुरूप समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत किया।
महामति प्राणनाथ जी ने अपनी मानवतावादी दृष्टि से प्रत्येक मानव में निहित आत्म-चेतना को परमात्म चेतना से जोड़ा। विभिन्न धर्मग्रन्थों एव शास्त्रग्रन्थों में निहित विश्वासों को महामति ने व्यावहारिक आधार प्रदान किया और उसे वैश्विक आस्था एवं आदर्श से अनुबन्धित करना चाहा। उनके समन्ययमूलक प्रयासों और उनकी वाणी का सम्यक मूल्यांकन सकीर्ण साम्प्रदायिक परिधि मे असम्भव है। उनके द्वारा प्रवर्तित प्रणामी पन्थ मे वे सभी सम्मिलित थे जो धर्म और सम्प्रदाय की संकीर्ण दीवारों से मुक्त एक व्यापक और बृहत्तर धर्म-समाज बनाने के आग्रही थे।
महामति श्री प्राणनाथ जी के कुछ महत्त्व पूर्ण चौपाइयाँ
1.पेहेले आप पेहेचानो रे साधो, पेहेले आप पेहेचानो
बिना आप चीन्हें पारब्रम्ह को, कौन कहे मैं जानो
2.खोज बड़ी संसार रे तुम खोजो साधो, खोज बड़ी संसार
खोजत खोजत सतगुरु पाइए, सतगुरु संग करतार
3.एक भेष जो विप्र का, दूजा भेष चंडाल
जाके छुए छूत लागे, संग कौन हवाल
4.पर न आवे तोले एकने, मुख श्री कृष्ण कहंत
प्रसिध प्रगट पाधरी, किवता किव करंत
5.साथ जी शोभा देखिये, करें कुरबानी आतम
वार डारो नख सिखालौं, ऊपर धाम धनी खसम यो
6.मैं बिन मैं मरे नहीं, मैं सों मारना मैं
किन विध मैं को मारिए, या विध हुई इनसें
7.उत्तम होए षट कर्म करो, आचार करो विधोगत
ब्रह्म चरन न आवें ब्रह्मसृस्टि विना, जाकी ब्रह्म सों निसवत
सभी को 405वॉ महामति श्री प्राणनाथ प्रागट्य उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं|