जहा एक और पूरा देश विकास की और बढना चाहता है वही दूसरी और हम सब अपनी संस्कृति और संस्कारो से पीछे हटते जा रहे है! देश की युवा पीढ़ी को विकास के नाम पर अपनी सनातन परम्पराओं को पीछे छोड़ना सही नहीं है! आज देश को न सिर्फ आर्थिक विकास की जरुरत है बल्कि उससे कही ज्यादा मानसिक और बोद्धिक विकास की आवश्यकता है!
इस समूह की आवश्यकता केवल और केवल इस ऑनलाइन ज़िन्दगी से बाहर आकर एक साथ एक समूह के रूप में अपनी
संस्कृति के साथ देश, धर्म और व्यक्तिगत विकास को उचित रूप देना है!
प्रत्यंचा का मूल आधार सनातन परंपरा में अविचल श्रद्धा है, ये श्रद्धा प्रत्येक भारतवासी के जीवन में फलीभूत हो और माँ भारती की संतान के रूप में अपने जीवन का सर्वस्व अर्पित करने के लिए सदैव प्रस्तुत रहे |
सनातन परम्परा का अर्थ आदि अनादी काल से पुण्य भूमि भारत में धर्माधारित विचार, संस्कार है, जो मानव मात्र के भौतिक, अधिभौतिक, दैविक, अध्यात्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक आदि पक्षों के सर्वांगीण उत्थान का सामूहिक मार्ग प्रशस्त करता है और एक राष्ट्र - एक संतति के भाव को सबल प्रबल बना कर आने वाली पीढ़ी को समर्थ, स्वाभिमानी और शक्तिशाली मातृभूमि के लिए उत्सर्ग का तप प्रदान करे |
इस संस्कार परंपरा का प्रकटीकरण विभिन्न मत संप्रदाय आदि के माध्यम से देश काल परिस्थिति के अनुरूप महापुरुषों ने किया है| ऐसे सभी मत सम्प्रदायों महापुरुषों को हम सम्मान देते है|
उपरोक्त विचारो को स्वीकार करने वालों के मध्य विवाद का स्थान नहीं है, किन्तु विवाद की स्थिति में लोक मत, संत मत और सर्वोच्च स्थान शास्त्र मत दिया जायगा| शास्त्र में सर्वोच्च स्थान प्रस्थान-त्रयी को दिया जाएगा|
प्रत्यंचा परिवार इस की अवहेलना करने वाले को स्वीकार नहीं करेगा |
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर भारत भूमि के ग्रंथो, महापुरुषों का अपमान स्वीकार्य नहीं है |
वन्दे माँ भारती