17/08/2026
आज का समय ऐसा हो चला है कि अनेक संबंध भावनाओं से नहीं, बल्कि स्वार्थ से बंधे दिखाई देते हैं. जब तक किसी को आपकी आवश्यकता होती है, तब तक वह आपके आसपास रहता है—अपनापन जताता है, मुस्कुराता है और आपके सुख-दुःख का साथी होने का आभास देता है. लेकिन जैसे ही उसका उद्देश्य पूरा हो जाता है, वही व्यक्ति इस तरह मुड़ जाता है, मानो कभी कोई रिश्ता था ही नहीं.
सबसे अधिक पीड़ा उस व्यक्ति को होती है जिसने संबंध को पूरे मन से निभाया हो.
जिसने बिना किसी अपेक्षा के अपना समय, विश्वास और स्नेह दिया हो.
जब वही व्यक्ति स्वयं को ठगा हुआ पाता है, तो उसके मन में एक ही प्रश्न उठता है—“क्या मेरा अपनापन इतना सस्ता था?” उत्तर मिलता है—“नहीं, तुम्हारा अपनापन सच्चा था; बस सामने वाला उसे समझने की क्षमता नहीं रखता था.”
स्वार्थ केवल संबंध नहीं तोड़ता, वह विश्वास भी तोड़ देता है.
और जब विश्वास टूटता है, तो इंसान केवल दूसरों से ही नहीं, कई बार स्वयं से भी दूर होने लगता है.
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हमें भी स्वार्थी बन जाना चाहिए.
यदि संसार में छल है, तो निस्वार्थ प्रेम भी है.
यदि कुछ लोग उपयोग करके छोड़ देते हैं, तो कुछ लोग जीवन भर बिना किसी स्वार्थ के साथ निभाते भी हैं.
इसलिए किसी एक अनुभव के कारण पूरी दुनिया को दोष देना उचित नहीं.
हाँ, इतना अवश्य सीख लेना चाहिए कि प्रेम करो, पर विवेक के साथ.
विश्वास करो, पर आँखें बंद करके नहीं.
किसी के लिए अच्छा करो, लेकिन प्रतिफल की अपेक्षा मत रखो.
क्योंकि अपेक्षाएँ टूटती हैं, जबकि निस्वार्थ कर्म आत्मा को संतोष देता है.
हर मुस्कुराहट के पीछे स्वार्थ नहीं होता और हर मधुर व्यवहार छल नहीं होता.
जीवन हमें कटु अनुभव इसलिए नहीं देता कि हम कठोर बन जाएँ, बल्कि इसलिए देता है कि हम परिपक्व बन सकें. सच्चाई छोड़ना समाधान नहीं, सच्चाई के साथ विवेक जोड़ लेना ही जीवन की कला है.
कभी-कभी कुछ लोग हमारे जीवन में साथ निभाने नहीं, बल्कि जीवन का सबसे कठिन पाठ पढ़ाने आते हैं. वे हमें सिखा जाते हैं कि संबंधों में प्रेम जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है सही पहचान.
सच्चे लोग परिस्थितियों से नहीं बदलते, वे केवल लोगों को पहचानना सीख जाते हैं और यही पहचान जीवन की सबसे बड़ी नमस्कार प्रातः वंदन सुप्रभात🙏