03/12/2022
आप शास्त्रों को पढ़ लेंगे , रट लेंगे , कंठस्थ कर लेंगे , बड़े बड़े आयोजन करवा लेंगे उसका पाठ करवाकर , 24 घण्टे में रामचरितमानस और एक सप्ताह में श्रीमद भागवद का पाठ तक करवा लेंगे , शट शास्त्री बन जायेंगे , वेदपाठी बन जाएँगे
लेकिन ............
शास्त्रों को समझने की बुद्धि कहाँ से लायेंगे ?
शास्त्रों के शब्दों के अंदर व्याप्त कल्याणपरक अर्थों , गूढ़ रहस्यों, छिपे ज्ञान और सार को समझने और आत्मसात करने हेतु वह बुद्धि , विवेक और समझ कहाँ से लायेंगे ???
प्रधानमंत्री की कुर्सी घर पर बनवा लेंगे, प्रधानमंत्री की तरह भाषण और अभिनय तो कर लेंगे , परन्तु प्रधानमंत्री की शक्तियाँ , Power और authority कहाँ से लायेंगे ???
आद्य जगद्गुरु मूल "आचार्य शंकर" की तरह वस्त्र धारण कर दंड लेकर उन्हीं का नाम "शंकराचार्य" पीछे लगाकर उन्हीं की तरह दिखने तो लग जायेंगे परन्तु आचार्य शंकर की तरह अपरिमित ज्ञान , ब्रह्मतेज , वैराग्य और समस्त शास्त्रों के एकीकरण कर उसके मूल अर्थ को प्रतिपादित करने का ज्ञान और सामर्थ्य कहाँ से लायेंगे ???
पौंड्रक की तरह श्रीकृष्ण का वेश धारण तो कर लेंगे पर श्रीकृष्ण की तरह अनुपम रूप लावण्य माधुरी , परमहंसों के चित्त को बरबस चुरा लेने वाला गुण , सुदर्शन चक्र धारण करने की शक्ति , समस्त विश्व को नचा देने वाली शक्ति , वह ऐश्वर्य , वह ज्ञान , वह पराक्रम कहाँ से लायेंगे ???
भागवत कथा कहने के लिए व्यासनन्दन परमहंस शुकदेव जैसे पुस्तकों से कथा वाचन कर लेंगे और परीक्षित बनकर कथा सुन भी लेंगे , परन्तु परमहंस शुकदेव जैसा ज्ञान , रस का आस्वादन कर परीक्षित बने श्रोताओं का उद्धार भला कैसे कर पायेंगे ?
और परीक्षित की तरह श्रोता उस स्थिति पर पहुँचकर उन सब गूढ बातों को कैसे समझ पायेंगे ?? बस कहानी किस्सा सुनना भागवद ग्रहण करना नहीं होता ।
24 घण्टे की सीमा लगाकर बड़े बड़े लाउडस्पीकर पर रामचरितमानस के शब्दों को जोर जोर जल्दी जल्दी गाकर पूरा तो कर लेंगे , पर गोस्वामी जी ने जीव कल्याणार्थ जिस ग्रंथ की रचना की है , उसके भाव और सारज्ञान को कैसे आत्मसात कर पायेंगे ???
वेदमन्त्रों को रटते हुए हाथ ऊपर नीचे कर उदात्त अनुदात्त के अनुसार उच्च स्वर से पाठ तो कर सकते हैं लेकिन वेदमन्त्रों के कल्याण करने हेतु जो उद्देश्य है उसे कैसे प्राप्त कर पायेंगे ???
एक एक घण्टे बड़ी बड़ी लाइन में लगकर एक गोल से पत्थर पर एक लोटा जल डाल कर या दूध तो चढ़ा कर उसको अभिषेक का नाम तो दे देंगे , पर वह गोलाकार पत्थर क्या है , उस पर दूध क्यों डाल जाता है , उसका आकार ऐसा क्यों है , उसकी समझ आप कहाँ से ला पायेंगे ???
बड़ी सी थाली में बड़े से कटोरे में घी डालकर उसको जलाकर मूर्ति को ऊपर नीचे घुमाकर उसे आरती नाम देकर इतिश्री तो कर लेंगे , परन्तु यह क्यों किया जाता है , इसका उद्देश्य क्या है , इसकी समझ कहाँ से ला पायेंगे ???
बड़े बड़े जटा धारण कर , भस्म रमाकर , त्रिपुंड लगाकर , नग्न रहकर , न नहाकर , अपने आप को साधु तो दिखा सकते हैं , लेकिन परमहंसिय और अवधूत अवस्था , वह तप , वह निरन्तर भगवान में निमग्न होने के कारण बाह्य आवरण और परिवेश भुला देने वाली स्थिति , मान अपमान से परे , जगत को भ्रम और स्वप्न समझ लेने वाली स्थिति कहाँ से लायेंगे ???
बस इसीलिए इन सब तत्वों को समझाने हेतु और इनके निहितार्थ मूल तत्व को समझाने हेतु किसी तत्ववेत्ता महापुरुष की आवश्यकता पड़ती है जो इन कथा कथानकों , शास्त्रों के शब्दों के अंदर छिपे गूढ़ अर्थों और भावार्थों को सही सही आपको समझा सके जिसको समझ कर आप निवृत्ति मार्ग पर आरूढ़ होकर अपना कल्याण कर सकें !!!
- Shwetabh Pathak ( श्वेताभ पाठक )