Bharatiya YUVA

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एक युवा वैज्ञानिक रात देर तक अपनी प्रयोगशाला में बैठा है।उसने महीनों तक एक ही प्रयोग दोहराया, लेकिन परिणाम पुराने सिद्धा...
25/09/2025

एक युवा वैज्ञानिक रात देर तक अपनी प्रयोगशाला में बैठा है।उसने महीनों तक एक ही प्रयोग दोहराया, लेकिन परिणाम पुराने सिद्धांत से मेल नहीं खा रहे।वह उलझन में है,“क्या मेरी तकनीक गलत है?
क्या डेटा ठीक नहीं?
या फिर…क्या खुद सिद्धांत ही गलत है?”

यहीं से एक बड़ा सवाल जन्म लेता है,
विज्ञान आखिर बढ़ता कैसे है?

कुह्न से पहले ज़्यादातर लोग मानते थे,विज्ञान एक धीमी, रैखिक (लीनियर ) प्रक्रिया है।वैज्ञानिक छोटे-छोटे तथ्य इकट्ठा करते हैं।समय के साथ हम सच्चाई के और करीब पहुँचते हैं। जैसे खगोलशास्त्र धीरे-धीरे ग्रहों की स्थिति सुधारता गया।चिकित्सा धीरे-धीरे शरीर के रहस्य खोलती गई।ऐसा लगता था मानो विज्ञान सीढ़ी पर चढ़ता हुआ एक सफर है।हर पायदान हमें ऊपर ले जाता है।

1962 में थॉमस एस. कुह्न ने कहा,
क्या विज्ञान सचमुच सीधी सीढ़ी पर चलता है? या यह किसी और तरह बढ़ता है?

उन्होंने इतिहास का अध्ययन किया।कोपरनिकस की खगोल क्रांति (सूर्य-केंद्रित ब्रह्मांड)।न्यूटन की भौतिकी।आइंस्टीन की आपेक्षिकता।

कुह्न को एहसास हुआ कि विज्ञान हमेशा धीरे-धीरे नहीं बढ़ता।बल्कि यह अचानक, झटकों और क्रांतियों (रिवोल्यूशंस ) के ज़रिए आगे बढ़ता है।

कुह्न ने यह देखा कि कई बार वैज्ञानिक सैकड़ों साल तक एक ही ढाँचे में काम करते हैं। वे छोटे-छोटे “पज़ल” हल करते हैं। लेकिन जब ढाँचा टूटता है, तो सबकुछ एकदम बदल जाता है।जैसे कोई बच्चा जिगसॉ पज़ल सुलझा रहा हो।वह टुकड़े जोड़ रहा है।अचानक उसे अहसास होता है,अरे, यह तो गलत तस्वीर है! वह पज़ल को तोड़कर नई तस्वीर बनाता है।यही होता है विज्ञान में….क्रांति।

इस किताब ने दिखाया कि विज्ञान सिर्फ़ तथ्य जुटाने का काम नहीं, बल्कि मानव गतिविधि है।इसमें संस्कृति, इतिहास, समाज और यहाँ तक कि वैज्ञानिकों की मानसिकता भी शामिल है।कुह्न ने एक नया शब्द दिया….पैराडाइम (प्रतिमान / ढाँचा),जो आगे चलकर विज्ञान, राजनीति और बिज़नेस में भी मशहूर हो गया।

एक समय था जब डॉक्टर मानते थे कि शरीर में चार रस (ह्यूमर्स) होते हैं…खून, बलगम, पित्त और काला पित्त।अगर कोई बीमार हो जाए, तो इलाज यही था कि इन रसों का संतुलन बिगड़ गया है।
इसीलिए खून निकालना (ब्लडलेटिंग ) आम प्रथा थी।सदियों तक यह “सत्य” माना गया।
हर डॉक्टर, हर मेडिकल छात्र यही पढ़ता और मानता था।यह था उनका पैराडाइम ।

लेकिन जब आधुनिक जीवविज्ञान और सूक्ष्मदर्शी (माइक्रोस्कोप ) आए, तो पता चला,बीमारी बैक्टीरिया और वायरस से होती है।इससे पूरा पुराना ढाँचा (पैराडाइम ) ढह गया और नया ढाँचा बना।

थॉमस कुह्न के अनुसार, पैराडाइम का अर्थ है वह ढाँचा जिसमें वैज्ञानिक सोचते और काम करते हैं।

इस ढाँचे में शामिल हैं,कौन से सवाल पूछे जाएँगे।कौन-सी विधि (मेथड ) सही मानी जाएगी।कौन-से परिणाम स्वीकार्य होंगे।कौन-सी मान्यताएँ स्वाभाविक मानी जाती हैं।यानी पैराडाइम सिर्फ़ एक सिद्धांत नहीं, बल्कि पूरी सोच की दुनिया है जिसमें वैज्ञानिक रहते हैं।

जैसे खगोलशास्त्र में प्राचीन काल में पृथ्वी केंद्रित मॉडल (टॉलमी ) था,धरती स्थिर है, सूर्य और ग्रह उसके चारों ओर घूमते हैं।गणनाएँ इसी आधार पर होती थीं।कोपरनिकस ने सूर्य केंद्रित मॉडल दिया ,धरती घूमती है और सूर्य केंद्र है।इस बदलाव ने पूरा खगोलशास्त्र बदल दिया।दोनों के पास डेटा था। पर फर्क यह था कि वे अलग-अलग पैराडाइम में सोच रहे थे।

कुह्न ने कहा कि एक बार पैराडाइम स्थापित हो जाए, तो वैज्ञानिक उसी के भीतर पज़ल सॉल्विंग करते हैं।वे छोटे-छोटे सवाल हल करते हैं।बड़े ढाँचे को चुनौती नहीं देते।

न्यूटनियन भौतिकी के ढाँचे में वैज्ञानिक 200 साल तक गणना करते रहे।उन्होंने ग्रहों की कक्षाएँ, गति, बल की समस्याएँ हल कीं।पर उन्होंने यह नहीं सोचा कि शायद पूरा ढाँचा ही गलत हो।

पैराडाइम हमें दुनिया को समझने का साधन देता है।लेकिन यही हमें सीमित भी कर देता है।

जैसे कोई चश्मा पहनकर दुनिया देखे,अगर चश्मा सही है तो सब साफ़ दिखेगा।अगर गलत है तो सारी तस्वीर धुंधली हो जाएगी।पर इंसान समझेगा—दुनिया धुंधली है। वैसे ही पैराडाइम गलत हो तो वैज्ञानिक मानते रहते हैं कि दुनिया वैसी ही है, जबकि असल में ढाँचा गड़बड़ है।

जब बार-बार ऐसे तथ्य सामने आएँ जो मौजूदा पैराडाइम में फिट न हों, तो यह ढाँचा कंपकंपाने लगता है।यहाँ से शुरू होती है….क्राइसिस(संकट)।

एक वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में बैठा है।उसके सामने ढेर सारे उपकरण और किताबें हैं।वह जानता है कि उसे किस तरह के प्रयोग करने हैं, कौन-से परिणाम सही माने जाएँगे और कौन-सी विधि मान्य है।वह नए सवाल नहीं पूछ रहा।
बल्कि वही सवाल हल कर रहा है जो पहले से तय ढाँचे (पैराडाइम ) में फिट बैठते हैं।यही है नार्मल साइंस …..जहाँ वैज्ञानिक अपने पैराडाइम के भीतर “पज़ल सॉल्विंग” करते हैं।

कुह्न के अनुसार नार्मल साइंस है ,एक पैराडाइम के भीतर किया गया वैज्ञानिक काम।इसमें बड़े सवाल या ढाँचे पर सवाल नहीं उठते।वैज्ञानिक मानते हैं कि उनका पैराडाइम सही है, बस उसमें और “पज़ल” हल करने हैं।जैसे शतरंज में नियम तय हैं,वैसे ही नार्मल साइंस में ढाँचा तय है।खेल उसी ढाँचे के भीतर चलता है।

पज़ल सॉल्विंग की खासियत है कि सवाल सीमित होते हैं,वैज्ञानिक वही प्रश्न उठाते हैं जिनका जवाब पैराडाइम दे सकता है।बाहर के सवाल अनदेखा कर दिए जाते हैं।

जवाब पहले से अनुमानित होते हैं,वैज्ञानिक को पता होता है कि उत्तर किस तरह का होना चाहिए। काम यह है कि उसे सटीक बनाना है।

कड़ी मेहनत ,यह आसान नहीं है। लेकिन यह क्रांतिकारी भी नहीं है….यह विस्तार है, न कि बदलाव।

न्यूटन के नियमों के बाद वैज्ञानिकों ने लगभग 200 साल तक “नार्मल साइंस ” किया।उन्होंने ग्रहों की स्थिति और गति की जटिल समस्याएँ हल कीं।पर उन्होंने यह सवाल नहीं उठाया कि शायद प्रकाश या गुरुत्वाकर्षण न्यूटन के नियमों से परे भी हो सकता है।

यह सवाल तब उठा जब आइंस्टीन आए और पूरा ढाँचा बदल गया।

आपके पास दुनिया का नक्शा है।उसमें सब देश और सीमाएँ बनी हुई हैं।अब आप उस नक्शे में केवल छोटे-छोटे विवरण जोड़ते हैं,नई सड़कें, नदियाँ, कस्बे।आप नक्शे की संरचना को नहीं बदलते।आप बस उसी के भीतर “पज़ल” सुलझाते हैं।वैसे ही नार्मल साइंस पुराने पैराडाइम के नक्शे में छोटे-छोटे टुकड़े जोड़ती है।

नार्मल साइंस की ताक़त और सीमा है ।ताक़त है कि यह बहुत सारी समस्याएँ हल कर देता है, तकनीकी प्रगति लाता है। और सीमा है कि यह पैराडाइम को कभी चुनौती नहीं देता।अगर कोई तथ्य पैराडाइम से मेल न खाए, तो वैज्ञानिक पहले उसे “गलती” मानते हैं।पैराडाइम को बचाने की कोशिश करते हैं।लेकिन…जब ऐसे तथ्य बहुत बढ़ जाते हैं जिन्हें पैराडाइम समेट नहीं पाता, तो विज्ञान में आता है—क्राइसिस(संकट)।

17वीं सदी में खगोलशास्त्री टॉलेमी का “पृथ्वी-केंद्रित मॉडल” सबसे बड़ा सच माना जाता था।
हर ग्रह, हर तारा उसी ढाँचे के भीतर समझा जाता था।
लेकिन धीरे-धीरे समस्या आने लगी।ग्रह कभी-कभी उल्टी दिशा में चलते दिखाई देते।टॉलेमी का मॉडल उसे ठीक से नहीं समझा पा रहा था।वैज्ञानिकों ने मॉडल को बचाने की कोशिश की। नए-नए चक्कर, नए-नए गणित जोड़ते रहे।पर समस्या बढ़ती गई।लोगों ने सोचना शुरू किया—
“क्या हमारा पूरा ढाँचा ही गलत है?”

यही है क्राइसिस(संकट)।

कुह्न के अनुसार, क्राइसिस तब आती है जब पैराडाइम बार-बार असफल हो। प्रयोग या तथ्य बार-बार “मेल न खाएँ।”वैज्ञानिकों का भरोसा डगमगाने लगे।क्राइसिस विज्ञान का सबसे नाटकीय दौर है। यह बताता है कि नार्मल साइंस अब अपने ढाँचे की सीमा तक पहुँच चुकी है।

क्राइसिस की प्रक्रिया
1. एनोमालिज़(असंगतियाँ):कुछ तथ्य पैराडाइम से मेल नहीं खाते।वैज्ञानिक पहले इन्हें “छोटी समस्याएँ” मानते हैं।
2. प्रोलिफरेशन(जोड़-तोड़):वैज्ञानिक पैराडाइम को बचाने के लिए अस्थायी समाधान जोड़ते हैं।जैसे टॉलेमी मॉडल में “एपिसाइकल्स ” (छोटे चक्कर) जोड़ना।
3. डीप डाउट(गहरी शंका):जब समस्याएँ बहुत बढ़ जाती हैं, तो वैज्ञानिकों का विश्वास कमजोर होने लगता है।
4. सर्च फॉर अल्टरनेटिव्स(नए रास्तों की खोज):अब वैज्ञानिक नए विचारों की तलाश करने लगते हैं।पुराने पैराडाइम पर भरोसा खत्म होने लगता है।

19वीं सदी में न्यूटनियन भौतिकी पूरी दुनिया की व्याख्या कर रही थी।लेकिन कुछ समस्याएँ आईं।“प्रकाश की गति” न्यूटन के मॉडल से मेल नहीं खाती थी।मर्क्यूरी ग्रह की कक्षा (ऑर्बिट ) न्यूटन के समीकरण से थोड़ी अलग निकलती थी।वैज्ञानिकों ने कई सुधार करने की कोशिश की, लेकिन समस्या बनी रही।यह संकट अंततः आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी से हल हुआ—एक नया पैराडाइम !

एक बच्चा जिगसॉ पज़ल हल कर रहा है।वह टुकड़े जोड़ता है।कुछ टुकड़े बार-बार फिट नहीं बैठते।वह उन्हें घुमा-फिरा कर जबरन फिट करने की कोशिश करता है।लेकिन जितनी कोशिश करता है, पज़ल और बिगड़ता है।आख़िरकार बच्चा समझता है।गलती टुकड़ों में नहीं, मेरी तस्वीर ही गलत है।यही क्राइसिस है।

कुह्न के अनुसार,क्राइसिस विज्ञान की असफलता नहीं, बल्कि उसकी ऊर्जा है।क्राइसिस बताती है कि अब एक नई क्रांति आने वाली है।यह वैज्ञानिकों को मजबूर करती है कि वे नए पैराडाइम की ओर देखें।

एक खगोलशास्त्री सदियों से मान रहा है कि पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र है।हर ग्रह, हर तारा उसी ढाँचे में घूम रहा है।लेकिन कोपरनिकस कहता है। नहीं, सूर्य केंद्र है और पृथ्वी घूम रही है।पहले तो सब हँसते हैं।पुराने वैज्ञानिक उसे नकारते हैं।कई लोग कहते हैं कि यह पागलपन है।
लेकिन धीरे-धीरे नए डेटा और अवलोकन साबित करते हैं कि कोपरनिकस सही है।
और अचानक संपूर्ण ब्रह्मांड का नक्शा बदल जाता है।

यही है साइंटिफिक रेवोलुशन…एक पैराडाइम शिफ्ट ।

कुह्न के अनुसार ,पैराडाइम शिफ्ट है पुराने ढाँचे (पैराडाइम ) का पूरी तरह टूटना और नए ढाँचे का स्थापित होना।यह केवल “नया सिद्धांत” नहीं होता।यह पूरी सोच, भाषा, सवाल और उत्तर को बदल देता है।

पैराडाइम शिफ्ट की विशेषता है अचानक बदलाव ।यह धीरे-धीरे नहीं होता।यह एक “क्रांति” की तरह होता है।

नई दुनिया की दृष्टि,नया पैराडाइम केवल पुराने सवालों के जवाब नहीं देता, बल्कि नई ही दुनिया दिखाता है।

पुराने और नए का संघर्ष,पुराने वैज्ञानिक इसे अक्सर नकारते हैं।नई पीढ़ी इसे अपनाती है। धीरे-धीरे पुराना पैराडाइम इतिहास बन जाता है।
कोपरनिकस की क्रांति। टॉलेमी का पृथ्वी-केंद्रित ब्रह्मांड से कोपरनिकस का सूर्य-केंद्रित ब्रह्मांड।
न्यूटन की क्रांति ,अरस्तू का “स्वाभाविक गति” का सिद्धांत से न्यूटन का गति और गुरुत्वाकर्षण का गणितीय नियम।
आइंस्टीन की क्रांति,न्यूटन का पूर्ण स्थान और समय से आइंस्टीन का आपेक्षिकता (रिलेटिविटी ), जहाँ समय और स्थान लचीले हैं।

आपके पास एक चश्मा है।पुराने चश्मे से आप दुनिया धुंधली देखते हैं।लेकिन आप मानते हैं कि दुनिया ही धुंधली है।फिर कोई नया चश्मा देता है, और अचानक सब साफ़ दिखने लगता है।पैराडाइम शिफ्ट ऐसा ही है।यह सिर्फ़ “उत्तर” नहीं बदलता, बल्कि पूरी दुनिया देखने का तरीका बदल देता है।

पैराडाइम शिफ्ट हमेशा “डेटा” से नहीं होता।यह तब होता है जब वैज्ञानिक समुदाय खुद मान ले कि नया ढाँचा पुराने से बेहतर है।इसलिए यह सिर्फ़ “तथ्य” नहीं, बल्कि मानव विश्वास और दृष्टिकोण की भी क्रांति है।

एक बार एक छात्र ने अपने गुरु से पूछा, गुरुजी, विज्ञान तो बस सच की खोज है न? फिर इसमें राजनीति, समाज और इतिहास का क्या काम?

गुरुजी ने मुस्कुराकर कहा,सच की खोज ज़रूर है, पर यह मनुष्यों की खोज है। और मनुष्य कभी तटस्थ नहीं होते….उनके पास भाषा, संस्कृति और विश्वास भी होते हैं।

यही संदेश देता है कुह्न की यह किताब।

कुह्न से पहले लोग मानते थे कि विज्ञान का मतलब है निरंतर प्रगति, हर दिन सच के और क़रीब। और वैज्ञानिक लोग पूरी तरह वस्तुनिष्ठ, निष्पक्ष लोग होते हैं ।

कुह्न ने दिखाया कि विज्ञान भी मानवीय गतिविधि है।इसमें बहस, असहमति, राजनीति और पीढ़ियों का संघर्ष शामिल होता है। पैराडाइम केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि पूरी वैज्ञानिक “संस्कृति” है।

कुह्न की किताब बहुत लोकप्रिय हुई, पर उस पर आलोचनाएँ भी हुईं जैसे (सापेक्षवाद) का आरोप,कुछ दार्शनिकों ने कहा कि अगर हर पैराडाइम बदल सकता है, तो क्या कोई “सत्य” है ही नहीं?

अत्यधिक सामाजिक दृष्टि,आलोचकों ने कहा कि कुह्न ने विज्ञान को बहुत “समाजशास्त्रीय” बना दिया।मानो तथ्य महत्वहीन हों और बस सामाजिक सहमति मायने रखती हो।लेकिन कुह्न ने कहा,सत्य पूरी तरह सापेक्ष नहीं है।सिर्फ़ इतना है कि सत्य तक पहुँचने का रास्ता सीधी सीढ़ी नहीं, बल्कि छलाँगों और क्रांतियों से भरा है।

बिज़नेस, राजनीति और समाजशास्त्र में भी “पैराडाइम शिफ्ट ” शब्द अब आम हो गया है। डिजिटल क्रांति सें पूरी अर्थव्यवस्था का पैराडाइम शिफ्ट ।सोशल मीडिया से समाज और राजनीति का पैराडाइम शिफ्ट ।

कुह्न की यह किताब विज्ञान-दर्शन की सबसे प्रभावशाली कृतियों में से एक है।“पैराडाइम ” और “पैराडाइम शिफ्ट ” अब सार्वभौमिक शब्द बन गए हैं।इस किताब ने हमें यह सिखाया कि विज्ञान सिर्फ़ तथ्य नहीं, बल्कि समुदाय और संस्कृति की प्रक्रिया है।प्रगति ,सीधी रेखा नहीं, बल्कि क्रांतियों का सिलसिला है।

एक छात्र 1960 के दशक में यह किताब पढ़ रहा है।उसके लिए “पैराडाइम शिफ्ट ” एक बिल्कुल नया और चौंकाने वाला विचार है।वह सोचता है,“ओह! तो विज्ञान सीधे-सीधे नहीं बढ़ता, बल्कि छलाँग लगाकर बढ़ता है।”

अब वही किताब 50 साल बाद एक नए संस्करण में आती है।आज का छात्र इसे पढ़ता है। पर अब उसके सामने और भी नए सवाल हैं: क्या यह विचार क्वांटम कंप्यूटिंग पर लागू होता है? क्या आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस भी एक नया पैराडाइम शिफ्ट है? क्या “क्लाइमेट साइंस ” पुराने ढाँचों को तोड़ रहा है?

यही है इस 50वीं वर्षगाँठ संस्करण की ताक़त,यह पुरानी किताब को आज की दुनिया से जोड़ता है।नये संस्करण में दार्शनिक इयान हैकिंग का लंबा परिचय शामिल है।उन्होंने तीन बातें खास तौर पर जोड़ीं।

पैराडाइम की पुनर्व्याख्या,हैकिंग बताते हैं कि पैराडाइम सिर्फ़ सिद्धांत नहीं, बल्कि “सोचने का पूरा तरीका” है।
यह हमारे सवाल, प्रयोग और उत्तर सबको ढाल देता है

Incommensurability (अतुलनीयता) हैकिंग बताते हैं कि दो अलग पैराडाइम को आप सीधे तुलना नहीं कर सकते।जैसे न्यूटन और आइंस्टीन की भाषा अलग है—एक को दूसरे में पूरी तरह अनुवाद नहीं किया जा सकता।आज की प्रासंगिकता हैकिंग ने एआई , बायोटेक्नोलॉजी और डिजिटल विज्ञान जैसे नए क्षेत्रों से जोड़कर बताया कि कुह्न की सोच अब भी कितनी जीवंत है।

हैकिंग ने कुह्न के विचारों को आधुनिक विज्ञान से जोड़कर समझाया।
क्वांटम कंप्यूटिंग से क्लासिकल कंप्यूटिंग से एक संभावित पैराडाइम शिफ्ट।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से क्या यह केवल तकनीक है या मानव सोच का नया ढाँचा?
क्लाइमेट साइंस से यह सिर्फ़ मौसम का अध्ययन नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के रिश्ते का नया Paradigm है।

एक नदी पर पचास साल पुराना पुल है।वह अब भी मज़बूत है, लेकिन उस पर गाड़ियाँ पहले जैसी नहीं।अब नए समय की गाड़ियाँ…बड़ी, तेज़ और भारी आ चुकी हैं।इसलिए नया पुल बनाया जाता है पर उसकी नींव पुरानी है।कुह्न की किताब भी वैसी ही है।50th एनिवर्सरी एडिशन….पुरानी नींव के साथ नए जमाने का पुल।

यानी कुह्न के विचार आज भी उतने ही शक्तिशाली हैं,बस अब उनकी ज़मीन और व्यापक हो गई है।

-- Dr Satyajit Sahu

साल 1932, काशी में भीषण अकाल पड़ा। तब यदुवंशी समाज ने संकल्प किया कि सावन के पहले सोमवार को बाबा विश्वनाथ का पहला सामूहि...
11/07/2025

साल 1932, काशी में भीषण अकाल पड़ा। तब यदुवंशी समाज ने संकल्प किया कि सावन के पहले सोमवार को बाबा विश्वनाथ का पहला सामूहिक गंगा जलाभिषेक किया जाए। कहते हैं, अभिषेक के कुछ ही दिनों में ही काशी में वर्षा हुई और तभी से यह परंपरा अमर हो गई, हर सावन, पहला जलाभिषेक यादवों द्वारा होगा। इस परंपरा के पीछे कोई मिथक नहीं है, कोई कथा नहीं है, यह इतिहास है।

सावन की पहली सुबह, यादवों के हाथों में गंगाजल से भरे कलश और शिव का पहला जलाभिषेक। यह सिर्फ एक रस्म नहीं है, यह ऐलान है कि धर्म ही कृष्ण वंशजो की सामूहिक चेतना थी। यह उद्घोष था कि यादव कृष्ण के वंशज हैं। यह आकाशवाणी थी कि शिव ने तुमको चुना है क्योंकि तुम उन कृष्ण के वंशज हो, जिन्होंने धर्म स्थापना के लिए अवतार लिया था। कृष्ण सामाजिक भेदभाव मिटाने आये थे, लेकिन धर्म धारण करने के साथ।

कृष्ण ने सत्ता नही चुनी, धर्म चुना। कृष्ण ने पृथ्वी पर पहले लोकतंत्र की स्थापना की, तुम अपनी पार्टी में ही लोकतंत्र स्थापित नही कर पाए। कृष्ण ने धर्म स्थापना के लिए सत्ताएं ठुकराई, तुमने सत्ता के लिए अधर्मियों को गले लगाया। तुमने धर्म ठुकराया ताकि तुम्हारी जाति का एक व्यक्ति सत्ता पर बैठ सके। तुम्हे बताया गया कि तुम्हारी सबसे बड़ी पहचान जाति है, धर्म नहीं।

तुम्हें बताया गया कि ब्राह्मणवाद ने धर्म को हथिया लिया है। सामाजिक अन्याय था, इसे मिटाना भी जरूरी था, लेकिन इसके लिए धर्म त्यागना आवश्यक नहीं था, अधर्म के पक्ष में खड़े होना आवश्यक नहीं था। तुम्हे बार बार बताया गया कि धर्म एक दिखावा है, असली ताकत सत्ता है ताकि वो सत्ता पर काबिज हो सकें। तुम्हे बताया गया कि हम क्यों मंदिर की परंपरा निभाएं? ये सब तो पिछड़ेपन का प्रतीक हैं।

नतीजा यह हुआ कि जो समाज हर सावन में पहली आहुति देता था, उसने कावंड़ियों के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया। काशी विश्वनाथ मंदिर के ट्रस्ट के रिकॉर्ड में साफ़ लिखा है, यदुवंशी समाज हर साल पहला जलाभिषेक करता है। आज भी बड़े बुज़ुर्ग वहां जाते हैं,
लेकिन उनके पीछे यादव युवाओं की भीड़ छोटी होती गई है। अखिलेश यादव की समाजवादी विचारधारा मानती है कि मंदिरों में जाना ब्राह्मण वर्चस्व की स्वीकृति है।

यही कारण है कि अब वह सांस्कृतिक गौरव जो काशी में सावन के पहले अभिषेक में यदुवंशियों की पहचान था, अब सिमटता जा रहा है। क्या कमाल की विडंबना है कि जो समाज कभी शिवलिंग पर पहला जल चढ़ाकर कुल की मर्यादा जताता था, वही आज जाति का झंडा लेकर धर्म आए जुड़ी हर उस चीज़ का मजाक उड़ाता है जिससे उसकी पहचान बनी थी। दुर्भाग्य है कि जिनकी नसों में कृष्ण का खून बहता है, उनकी सोच में बस एक परिवार की गुलामी बस गई है।

काशी की गंगा अब भी बह रही है। शिवलिंग पर जल अब भी चढ़ता है। काशी के आस पास के यादव अभी भी कांवड़ लेकर जाते है लेकिन शिव जानते है कि ये अभिषेक अब आस्था का नहीं, बस परंपरा का दिखावा भर है। काशी विश्वनाथ के शिव आज चुप हैं, लेकिन उन्हें तुमसे कोई शिकायत नही है क्योंकि वो जानते है तुम एक दिन फिर उनके पास ही लौटोगे। जाति चुनाव के साथ ही खत्म हो जाती है लेकिन धर्म श्मशान तक साथ जाता है, शिव तक...
....इसलिए तो शिव ने तुम्हें चुना था, कृष्ण ने तुम्हें चुना था, धर्म ने तुम्हें चुना था।

-- Joya Mansuri

Excited to Announce!My SWAYAM course titled "Geospatial Practices in Ancient Indian Knowledge Systems" is now open for e...
25/05/2025

Excited to Announce!

My SWAYAM course titled "Geospatial Practices in Ancient Indian Knowledge Systems" is now open for enrollment!

This course explores how ancient Indian thinkers used celestial navigation, sacred geography, traditional mapping, and environmental wisdom—long before modern GIS. It bridges time-honored knowledge with today’s geospatial techniques.

Who should join?
Students, researchers, educators, and anyone curious about the intersection of geography, culture, and indigenous science.

Enroll now and rediscover the spatial brilliance of India's past!

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टाल्सटाय ने एक कहानी लिखी है। लिखा है कि एक आदमी का बेटा बहुत दिन से घर के बाहर चला गया। बाप ही क्रोधित हुआ था, इसलिए चल...
19/04/2025

टाल्सटाय ने एक कहानी लिखी है। लिखा है कि एक आदमी का बेटा बहुत दिन से घर के बाहर चला गया। बाप ही क्रोधित हुआ था, इसलिए चला गया था। फिर बाप बूढ़ा होने लगा। बहुत परेशान था। अखबारों में खबर निकाली, संदेशवाहक भेजे। फिर उस बेटे का पत्र आ गया कि मैं आ रहा हूं। आपने बुलाया, तो मैं आता हूं। मैं फलां-फलां दिन, फलां-फलां ट्रेन से आ जाऊंगा।

स्टेशन दूर है, देहात में रहता है बाप। अपनी बग्घी कसकर वह उसे लेने आया। मालगुजार है, जमींदार है। लेकिन उसके आने पर पता चला कि ट्रेन आ चुकी है। वह सोचता था चार बजे आएगी, वह दो बजे आ गई। तो धर्मशाला में ठहरा जाकर। अब अपने बेटे की तलाश करे कि वह कहां गया!

धर्मशाला में कोई जगह खाली नहीं है। धर्मशाला के मैनेजर को उसने कहा कि कोई भी जगह तो खाली करवाओ ही। वह जमींदार है। तो उसने कहा कि अभी एक कोई भिखमंगा-सा आदमी आकर ठहरा है इस कमरे में–उसको निकाल बाहर कर दें? उसने कहा कि निकाल बाहर करो। उसे पता नहीं कि वह उसका बेटा है। उसे निकाल बाहर कर दिया गया। वह अपने कमरे में आराम से…। उसने आदमी भेजे कि गांव में खोजो।

वह बेटा बाहर सीढ़ियों पर बैठा है। सर्द रात उतरने लगी। उस गरीब लड़के ने बार-बार कहा कि मुझे भीतर आ जाने दें, बर्फ पड़ रही है और मुझे बहुत दर्द है पेट में। पर उसने कहा कि यहां गड़बड़ मत करो; भाग जाओ यहां से; रात मेरी नींद हराम मत कर देना। फिर रात पेट की तकलीफ से वह लड़का चीखने लगा। तो उसने नौकरों से उसे उठवाकर सड़क पर फिंकवा दिया।

फिर सुबह वह मर गया। सुबह जब वह जमींदार उठा, तो वह लड़का मरा हुआ पड़ा था। लोगों की भीड़ इकट्ठी थी। लोग कह रहे थे, कौन है, क्या है, कुछ पता लगाओ। किसी ने उसके खीसे में खोज-बीन की तो चिट्ठी मिल गई। तब तो उन्होंने कहा कि अरे, वह जमींदार जिसको खोज रहा है, यह वही है। यह जमींदार को लिखी गई चिट्ठी-पत्री, यह अखबारों की कटिंग! यह उसका लड़का है।

वह जमींदार बाहर बैठकर अपना हुक्का पी रहा है। जैसे ही उसने सुना कि मेरा लड़का है, एकदम भावना आ गई। अब वह छाती पीट रहा है, अब वह रो रहा है। अब उस लड़के को–मरे को–कमरे के अंदर ले गया है। जिंदा को रात नहीं ले गया। मरे को दिन में कमरे के अंदर ले गया। अब उसकी सफाई की जा रही है–मरे पर। मरे को नए कपड़े पहनाए जा रहे हैं!

वह जमींदार का बेटा है। अब उसको घर ले जाने की तैयारी चल रही है। और रात उसने कई बार प्रार्थना की, मुझे भीतर आने दो, तो उसको नौकरों से सड़क पर फिंकवा दिया। यह भावना है? यह कैसी भावना थी? यह भावना नहीं थी। यह मेरे के लिए भावना का मिथ्या भ्रम था। मेरा नहीं, तो बात समाप्त हो गई।

नहीं, यह भावना का धोखा है। भावना मेरेत्तेरे से बंधी नहीं होती, भावना भीतर का सहज भाव है। अगर भावना होती, तो उसे कमरे के बाहर निकालना मुश्किल होता। अगर भावना होती, तो रात उसके पेट में दर्द है, सर्द रात है, बर्फ पड़ती है, उसे बाहर बिठाना मुश्किल होता। यह सवाल नहीं है कि वह कौन है। सवाल यह है कि भाव है भीतर!

ध्यान रहे, भावना स्वयं की स्फुरणा है। दूसरे का सवाल नहीं कि वह कौन है। मर रहा है एक आदमी, नौकरों से फिंकवा दिया उसको उठवाकर!

टाल्सटाय ने जब यह कहानी लिखी, तो उसने अपने संस्मरणों में लिखा है कि यह कहानी मेरी एक अर्थों में आटोबायोग्राफी भी है। यह मेरा आत्मस्मरण भी है। क्योंकि खुद टाल्सटाय शाही परिवार का था।

उसने लिखा है, मेरी मां मैं समझता था बहुत भावनाशील है। लेकिन यह तो मुझे बाद में उदघाटन हुआ कि उसमें भावना जैसी कोई चीज ही नहीं है। क्यों समझता था कि भावना थी? क्योंकि थिएटर में उसके चार-चार रूमाल भीग जाते थे आंसुओं से। जब नाटक चलता और कोई दुख, ट्रेजेडी होती, तो वह ऐसी धुआंधार रोती थी कि नौकर रूमाल लिए खड़े रहते–शाही घर की लड़की थी–तत्काल रूमाल बदलने पड़ते थे।

चार-चार, छह-छह, आठ-आठ रूमाल एक नाटक, एक थिएटर में भीग जाते। तो टाल्सटाय ने लिखा है कि मैं उसके बगल में बैठकर देखा करता था, मेरी मां कितनी भावनाशील!

लेकिन जब मैं बड़ा हुआ तब मुझे पता चला कि उसकी बग्घी बाहर छह घोड़ों में जुती खड़ी रहती थी और आज्ञा थी कि कोचवान बग्घी पर ही बैठा रहे। क्योंकि कब उसका मन हो जाए थिएटर से जाने का, तो ऐसा न हो कि एक क्षण को भी कोचवान ढूंढ़ना पड़े। बाहर बर्फ पड़ती रहती और अक्सर ऐसा होता कि वह थिएटर में नाटक देखती, तब तक एक-दो कोचवान मर जाते।

उनको फेंक दिया जाता, दूसरा कोचवान तत्काल बिठाकर बग्घी चला दी जाती। वह औरत बाहर आकर देखती कि मुरदे कोचवान को हटाया जा रहा है और जिंदा आदमी को बिठाया जा रहा है। और वह थिएटर के लिए रोती रहती, वह थिएटर में जो ट्रेजेडी हो गई!

तो टाल्सटाय ने लिखा है कि एक अर्थ में यह कहानी मेरी आटोबायोग्राफिकल भी है, आत्म-कथ्यात्मक भी है। ऐसा मैंने अपनी आंख से देखा है। तब मुझे पता चला कि भावना कोई और चीज होगी। फिर यह चीज भावना नहीं है। भावना उठती ही उस व्यक्ति में है, जो अपने से संयुक्त है, वियुक्त सदा दूसरों से जुड़ा रहता है। उसके सब लिंक दूसरों से होते हैं। वह किसी का पिता है, किसी का पति है, किसी का मित्र है, किसी का शत्रु है, किसी का बेटा है, किसी का भाई है, किसी की बहन है, किसी की पत्नी है। लेकिन खुद कौन है, इसका उसे कोई पता नहीं होता।

जो दूसरों से जुड़ा होता है, उसमें भावना कभी पैदा नहीं होती। क्योंकि भावना तभी पैदा होती है, जब कोई अपने से जुड़ता है। जब अपने भीतर के झरनों से कोई जुड़ता है, तब भावना का स्फुरण होता है।

गीता दर्शन 🌳🌸🌺🌻🌼
ओशो🌳🌸🌺🌻🌼🌳🌸🌻

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