14/06/2026
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नमो नमो वरेण्याय वरदायांशुमालिने
ज्योतिर्मय नमस्तुभ्यमनन्तायाजिताय ते।
त्रिलोकचक्षुषे तुभ्यं त्रिगुणायामृताय च
नमो धर्माय हंसाय जगज्जननहेतवे।।
( सौरपुराण१/३१-३२)
अर्थ:-असंख्य किरणों से सुशोभित होने वाले अंशुमालिन! आप वर देने में पूर्ण समर्थ एवं ज्योति: स्वरूप हैं। आपके स्वरूप का कोई अन्त नहीं है, इसलिए आपका नाम अनन्त है। किसी से भी पराजित न होने वाले अजित भगवन्! मैं वरेण्य भगवान् सूर्यदेव को बार - बार प्रणाम करता हूं।
तीनों लोकों के नेत्र - स्वरूप त्रिलोकचक्षु भगवन्! आपका श्रीविग्रहत्रिगुणात्मक है, आप अमृतस्वरूप हैं, धर्म और हंस आपके नाम हैं - आप ही संसार की सृष्टि के कारण हैं। जगत् की सृष्टि करने वाले प्रभो! आपको नमस्कार है।
🌿🌹 मङ्गलं सुप्रभातम्🌹🌿
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