14/08/2026
एक लीला, दो युग… रामलीला की दुर्लभ स्मृतियाँ
‘वशिष्ठ सभा’, चित्रकूट में ‘जनकागमन’ तथा ‘सभा’ लीला — जहाँ श्रीराम, भरत और जनक जी के मिलन में प्रेम, त्याग, कर्तव्य और आत्मीयता का ऐसा भाव दिखाई देता है, जो आज भी हृदय को स्पर्श करता है।
मुनि वशिष्ठ भरत को समझाते हैं—व्यर्थ की ग्लानि से कुछ प्राप्त नहीं होता। श्रीराम का स्नेह तुम्हारे साथ है। श्रीराम तो सबके हृदय में निवास करते हैं। भ्राता भरत की व्याकुलता और श्रीराम के प्रति उनका निर्मल प्रेम देखकर स्वयं देवगण भी उनके प्रेम की महिमा स्वीकार करते हैं।
इसी बीच विदेहराज जनक के आगमन का समाचार मिलता है। श्रीराम पूरे समाज के साथ आगे बढ़कर जनक जी का आदरपूर्वक स्वागत करते हैं। पिता और पुत्री का मिलन, जनक जी का सीता के प्रति स्नेह और उनके मुख से निकले आशीर्वचन—लीला के वातावरण को अत्यंत भावपूर्ण बना देते हैं।
फिर आता है वह क्षण, जब भरत की व्याकुलता देखकर श्रीराम स्वयं अधीर हो उठते हैं। दोनों भाइयों का यह स्नेहमय मिलन केवल दो भाइयों का मिलन नहीं, बल्कि त्याग, प्रेम और धर्म की उस मर्यादा का दर्शन है, जिसे रामकथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे हृदयों में जीवित रखती आई है।
इन्हीं भावों को अपने भीतर समेटे ये दो दुर्लभ तस्वीरें समय की दो अलग-अलग झलकियाँ हमारे सामने रखती हैं।
पहली तस्वीर 1925 की है और दूसरी 1978 की। दोनों तस्वीरें छायाचित्रकार Richard Schechner ने ली थीं। एक ही लीला के ये दो चित्र हमें बताते हैं कि समय आगे बढ़ता रहा, पीढ़ियाँ बदलती रहीं, पर रामलीला के प्रति श्रद्धा, प्रेम और भाव वही बना रहा।
एक लीला…
दो समय…
और एक ऐसी परंपरा, जो आज भी हृदयों में जीवित है।
ये तस्वीरें केवल बीते समय की स्मृतियाँ नहीं, बल्कि काशी की जीवित सांस्कृतिक परंपरा और रामलीला के प्रति जनमानस की अटूट श्रद्धा की अनमोल झलकियाँ हैं।
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