Institute For Sustainable Development and Research

Institute For Sustainable Development and Research This organisation is ment for Sustainable development, keeping the poor in the centre..

इधर कई दिनों से लुप्त नदी सरस्वती' के बारे में बहुत खबर चल रही है, अतः आज इसी पर चर्चा करेंगे। संप्रति उत्तर-पश्चिमी भार...
15/05/2026

इधर कई दिनों से लुप्त नदी सरस्वती' के बारे में बहुत खबर चल रही है, अतः आज इसी पर चर्चा करेंगे। संप्रति उत्तर-पश्चिमी भारत में स्थित 'लुप्त सरस्वती नदी' वैदिक काल (8000-5000 ईसा पूर्व) की सबसे पवित्र और शक्तिशाली नदी रही है। सरस्वती नदी के किनारे हड़प्पा सभ्यता के स्थलों की खोज इसकी शक्ति और विशालता का प्रमाण है। वैदिक सरस्वती नदी हिमालय से निकलती थी और पश्चिम में सिंधु नदी और पूर्व में गंगा नदी के बीच से होते हुए पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी राजस्थान और गुजरात से गुजरती थी। अंत में यह अरब सागर में कच्छ की खाड़ी में गिरती थी। जलवायु और भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण लगभग 5000 ईसा पूर्व वैदिक सरस्वती नदी विलुप्त हो गई। पर ऐसा माना जाता है कि सरस्वती नदी आज भी थार रेगिस्तान के नीचे बह रही है और हिमालय से इसका जुड़ाव अभी भी कायम है। इस लुप्त नदी के अवशेष वायुजनित रेत/जलोढ़ मिट्टी के आवरण के नीचे प्राचीन जलमार्गों के रूप में संरक्षित हैं। कई विद्वानों ने इस नदी की पहचान वर्तमान घग्गर-हाकरा नदी या उसके सूखे हुए भाग से की है, जो आधुनिक उत्तर-पश्चिमी भारत और पाकिस्तान में स्थित है। प्राचीन साहित्य यथा वेदों, मनुस्मृति, महाभारत और पुराणों जैसे अधिकांश प्राचीन साहित्यों में 'सरस्वती' नाम का प्रयोग किया गया है। वैदिक साहित्य में सरस्वती नदी का बार-बार उल्लेख मिलता है (गंगा नदी की तुलना में 80 गुना अधिक)। किसी अन्य नदी को सरस्वती जितना महत्व और सम्मान नहीं मिला है। वैदिक भजनों की रचना विभिन्न ऋषियों (विद्वानों) ने सरस्वती नदी की महिमा में की है। ऋग्वेद में तो वैदिक सरस्वती को 'माताओं में श्रेष्ठ, नदियों में श्रेष्ठ, देवियों में श्रेष्ठ' बताया गया है। यजुर्वेद में सरस्वती की पाँच महत्वपूर्ण सहायक नदियाँ- द्रिषद्वती, सतलुज, चंद्रबाग, व्यास और रावती बताई गई हैं। ये सभी नदियाँ सरस्वती में मिलकर सिंधु सागर में मिल जाती हैं। अथर्ववेद में ईश्वर ने सरस्वती नदी के किनारे रहने वाले लोगों को मीठे रसीले जौ से परिपूर्ण भूमि प्रदान की, जहाँ उदार मरुत किसान बने और इंद्र कृषि के स्वामी बने। यह मंत्र बताता है कि वैदिक काल में सरस्वती की उपजाऊ भूमि पर अनाज की खेती की जाती थी। मनुस्मृति में सरस्वती और दृषद्वती के बीच की भूमि ईश्वर द्वारा सृजित है; इस भूमि को ब्रह्मवर्त कहा जाता है। महाभारत में सरस्वती नदी के मार्ग पर फैले कई तीर्थ स्थलों का स्पष्ट भौगोलिक विवरण दिया गया है। भगवान बलराम कई पवित्र स्थानों की यात्रा करने के बाद विनाशना पहुँचते हैं, जहाँ सरस्वती नदी विलीन हो जाती है। महाभारत काल में सरस्वती नदी का जल प्रवाह अत्यंत कम हो गया था। परिणामस्वरूप, नदी अपने नियमित मार्ग पर एक स्थान पर, अर्थात् विनाशना में, रेगिस्तानी रेत में विलीन हो गई। अतः नदी का मार्ग सूखा प्रतीत होता था। पुराण में ऋषि मार्कंडेय ने उस स्थान के निकट जहाँ वे ध्यान और यज्ञ करते थे, प्लक्ष वृक्ष (पीपल वृक्ष) से ​​सरस्वती नदी को निकलते हुए देखा। ऋषि ने प्रार्थना की और निकलती हुई नदी की पूजा की। आज वैज्ञानिक युग में रिमोट सेंसिंग तकनीकों के माध्यम से 'लुप्त नदी सरस्वती' की खोज जारी है। पर उचित वैज्ञानिक डेटाबेस के अभाव के कारण वैदिक सरस्वती नदी के सटीक मार्ग और उसके बारहमासी स्रोत का पता लगाना शोधकर्ताओं के लिए एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इस रहस्य को रिमोट सेंसिंग और जीआईएस जैसे आधुनिक उपकरणों के माध्यम से, ऑप्टिकल और माइक्रोवेव डेटा की बहु-स्पेक्ट्रल और बहु-रिज़ॉल्यूशन उपग्रह छवियों का उपयोग करके सुलझाया जा रहा है। इसरो केंद्र वैदिक सरस्वती नदी के अधिकांश प्राचीन जलमार्गों और वर्तमान हिमालयी नदियों के साथ इसके जुड़ाव को स्पष्ट करने में सक्षम रहे हैं। हिमालयी नदियों के साथ वैदिक सरस्वती के जुड़ाव कुछ इस प्रकार हैं:
(क) आदि बद्री में सरस्वती नदी का सोम नदी से जुड़ाव
(ख) सरस्वती नदी का यमुना नदी से जुड़ाव
(ग) सरस्वती नदी का वैदिक सरस्वती से जुड़ाव
(घ) सतलुज प्राचीन जलमार्ग का वैदिक सरस्वती से जुड़ाव
(ङ) मानसरोवर से द्वारका तक वैदिक सरस्वती का जुड़ाव।
इस हेतु:
1. प्राचीन जलमार्ग मानचित्रों का उपयोग किया जा रहा है।
2. सांस्कृतिक विरासत को ध्यान में रख कर:
(क) ऐतिहासिक स्थलों का जीर्णोद्धार और (ख) नए पुरातात्विक स्थलों की खुदाई की जा रही है।
3 भूजल:
(क) भूजल अन्वेषण और (ख) भूजल पुनर्भरण पर कार्य हो रहा है, और,
4. पर्यटन क्षेत्र:
(क) मंदिरों का जीर्णोद्धार और (ख) सरस्वती नदी के किनारे अनुष्ठान स्थलों का पुनर्निर्माण किया जा रहा है।
एक और थ्योरी इसे गंगा और यमुना बीच बहता हुआ मानती है। भूगर्भी बदलाव की वजह से सरस्वती नदी का पानी गंगा में चला गया, कई विद्वान मानते हैं कि इसी वजह से गंगा के पानी की महिमा हुई, भूचाल आने के कारण जब जमीन ऊपर उठी तो सरस्वती का पानी यमुना में गिर गया। इसलिए यमुना में सरस्वती का जल भी प्रवाहित होने लगा। हाल में ही वैज्ञानिकों को प्रयागराज संगम के नीचे लुप्त ‘सरस्वती’ नदी की प्राचीन धारा के संकेत मिले हैं। NGRI वैज्ञानिकों ने ड्रिलिंग के द्वारा इसके प्रमाण एकत्रित किये हैं, जिसके अनुसार प्रयाग- राज संगम में गंगा-यमुना के बीच जमीन के 10-15 मीटर नीचे 4-5 KM चौड़ी प्राचीन नदी प्राप्त हुई है। प्रयागराज से आई इस खबर ने विज्ञान और आस्था, दोनों को आमने सामने ला दिया है। वैज्ञानिकों ने गंगा और यमुना के बीच जमीन के 10-15 मीटर नीचे एक विशाल “पैलियो नदी चैनल” खोजा है। बताया जा रहा है कि यह प्राचीन नदी करीब 200 KM लंबी और 4-5 KM चौड़ी हो सकती है। इसके सबूत के तौर पर कुछ तथ्य:
▪️ नदी के बहाव के निशान गंगा-यमुना जैसे
▪️ आधुनिक जियोफिजिकल सर्वे और ड्रिलिंग से पुष्टि
▪️ जमीन के नीचे आज भी कुछ जगह पानी मौजूद
▪️ वैज्ञानिकों ने इसे “तीसरी नदी” के मजबूत संकेत माना है। जबकि सदियों से प्रयागराज को गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम कहा जाता रहा है। अब इस खोज ने उस मान्यता को नया वैज्ञानिक आधार दे दिया है। हालांकि वैज्ञानिक अभी इसे सीधे “सरस्वती नदी” नहीं कह रहे, लेकिन इतना जरूर मान रहे हैं कि कभी यहां एक विशाल नदी बहती थी, जो समय के साथ धरती के नीचे दब गई। इस पर अभी और नतीजे आना बाकी हैं। पर जो भी हैं, उत्साहवर्धक हैं और आशा है कि जल्द ही इसकी और विस्तृत पुष्टि रिपोर्ट पढ़ने को मिलेगी।

आज मैं पर्यावरण से जुड़े एक बहुत ही जवळन्त समस्या पर बात करूंगा। अभी कुछ दिन पहले मैंने भारत के खाद्य सचिव, संजीव चोपड़ा ...
13/05/2026

आज मैं पर्यावरण से जुड़े एक बहुत ही जवळन्त समस्या पर बात करूंगा। अभी कुछ दिन पहले मैंने भारत के खाद्य सचिव, संजीव चोपड़ा जी का बयान पढ़ा, जिसमें कहा गया था कि, इथेनॉल के चक्कर में लोग प्यासे मरेंगे? क्यों कि चावल से एक लीटर इथेनॉल बनाने में करीब 10,790 लीटर पानी की जरूरत होती है। जिसमें खेती के दौरान सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला पानी भी शामिल है। तुलनात्मक रूप से, मक्के को प्रति लीटर इथेनॉल के लिए लगभग 4,670 लीटर और गन्ने को लगभग 3,630 लीटर की आवश्यकता होती है। रूपांतरण अनुपात इस स्थिति को और भी बदतर बना देता है। एक किलोग्राम चावल उगाने के लिए लगभग 3,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जबकि एक टन चावल से केवल लगभग 470 लीटर इथेनॉल प्राप्त होता है, जिससे चावल सबसे अधिक पानी की खपत करने वाले ईंधन स्रोतों में से एक बन जाता है। उन्होंने 2024 में दिल्ली में आयोजित एक वैश्विक सम्मेलन में ये आंकड़े साझा किए थे। इस पर बहस अवश्य होनी चाहिए। क्यों कि भारत की कुल इथेनॉल उत्पादन क्षमता 1,822 करोड़ लीटर है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा पहले से ही जल संकट से जूझ रहे राज्यों में केंद्रित है। इंडिया टुडे साइंस डेस्क की रिपोर्ट भी कहती है कि, भारत का ईंधन उत्पादन बढ़ाने का अभियान जल संकट को और बढ़ाएगा, जबकि भारत द्वारा पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने का प्रयास, स्वच्छ ऊर्जा समाधान के रूप में पेश किया जा रहा है। जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति 2018 (संशोधित 2022) इथेनॉल उत्पादन पर जोर देती है। इस समस्या की जड़ में वे फसलें हैं जो भारत में उगाई जाने वाली लगभग किसी भी अन्य फसल की तुलना में अधिक पानी की खपत करती हैं, जैसे मक्का, गन्ना और चावल और मुख्य रूप से अधिकांश कच्चा माल, गन्ना, मक्का और चावल ही होता है। सरकार एथेनॉल ब्लेंडिंग यानि पेट्रोल में एथेनॉल नामक एक पादप-आधारित अल्कोहल को मिलाकर, भारत की आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता को कम कर रही है। देश इस कार्यक्रम को तेजी से आगे बढ़ा रहा है और चावल एक प्रमुख कच्चा माल बन रहा है। सरकार ने 2024-25 में इथेनॉल उत्पादन के लिए 52 लाख टन चावल आवंटित किया था और अब 2025-26 में 90 लाख टन का लक्ष्य रखा है। जबकि अभी भारत में इथेनॉल मिश्रण में चावल का उपयोग अभी प्रारंभिक अवस्था में है, देश मुख्य रूप से गन्ने और मक्के पर निर्भर है। गन्ना भी पानी की खपत बढ़ाता है, एक लीटर इथेनॉल के लिए 3,636 लीटर पानी की खपत होती है। ऊर्जा अर्थशास्त्र और वित्तीय विश्लेषण संस्थान (आईईईएफए) की ऊर्जा विशेषज्ञ स्वाति शेषाद्री के अनुसार, ईथेनॉल के कई संयंत्र गन्ने की खेती वाले क्षेत्रों में स्थित हैं क्योंकि वहां कच्चे माल की उपलब्धता आसान है। वर्षों से गन्ने की खेती के कारण इन क्षेत्रों में जलस्तर पहले से ही कम हो गया है और इथेनॉल संयंत्रों ने स्थिति को और भी बदतर बना दिया है। गन्ने की खेती मुख्य रूप से महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में की जाती है, जहां भूजल संकट पहले से ही गंभीर है, जिससे यह चिंता बढ़ रही है कि गन्ने से बने इथेनॉल के उत्पादन को बढ़ाने से पानी की कमी और भी बढ़ सकती है। उदाहरण के तौर पर, महाराष्ट्र में 396 करोड़ लीटर की संयुक्त क्षमता वाले संयंत्र हैं, जबकि विदर्भ और मराठवाड़ा के किसान पीने के पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में स्थित इथेनॉल संयंत्र भी उन्हीं भूजल भंडारों का उपयोग कर रहे हैं जिन्हें गंभीर रूप से समाप्त घोषित किया गया है। पहले वर्षों तक पंजाब और हरियाणा के किसानों को भूजल स्तर में कमी लाने के लिए दोषी ठहराया जाता रहा है। अब उन्हीं फसलों का उपयोग औद्योगिक पैमाने पर ईंधन बनाने के लिए किया जा रहा है और इसे हरित ऊर्जा कहा जा रहा है। इस विरोधाभास को नजरअंदाज करना मुश्किल है। इससे भी ज्यादा मुश्किल है भारत के शहरों में पानी की भारी कमी की आशंका को नजरअंदाज करना, जिससे लाखों लोग प्रभावित होंगे। नीति आयोग के समग्र जल प्रबंधन सूचकांक (सीडब्ल्यूएमआई) ने चेतावनी दी है कि 2030 तक दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई सहित 21 प्रमुख शहरों में भूजल का स्तर शून्य तक पहुंच सकता है। एक और प्रमुख नुकसान है, इथेनॉल मिलें बड़ी मात्रा में अपशिष्ट जल (विनास) भी उत्पन्न करती हैं, जिसका अगर ठीक से उपचार न किया जाए तो यह सतही और भूजल को प्रदूषित कर सकता है। वर्तमान में, देश में E20 का मिश्रण अनिवार्य है, जिसके लिए 1,050 करोड़ लीटर इथेनॉल की आवश्यकता है। हालांकि, सरकार के 100% इथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उत्पादन को पांच गुना बढ़ाना होगा, जिसके लिए नीतिगत बदलावों की आवश्यकता है। ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (AIDA) के अध्यक्ष विजेंद्र सिंह के अनुसार, मक्का मुख्य कच्चा माल बनकर उभरा है, जो कुल इथेनॉल उत्पादन का लगभग 48% हिस्सा है। मक्का और चावल सहित अनाज आधारित कच्चे माल से कुल 718 करोड़ लीटर इथेनॉल का उत्पादन किया गया है, जबकि गन्ने आधारित कच्चे माल से 321 करोड़ लीटर इथेनॉल की आपूर्ति की गई है। गुजरात स्टेट फेडरेशन ऑफ को-ऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड के प्रबंध निदेशक जितेंद्र ठक्कर के अनुसार, गन्ने से इथेनॉल की सीमित मात्रा ही प्राप्त होती है, और चावल, मक्का और अन्य कच्चे माल से अधिक मात्रा में इथेनॉल उत्पादन के प्रयास जारी हैं। एक ओर कच्चे माल की आपूर्ति चिंता का विषय है तो दूसरी तरफ ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के लिए भारत को 100% एथेनॉल मिश्रण प्राप्त करने का लक्ष्य रखना पड़ेगा। 2014 में, देश में इथेनॉल का उत्पादन केवल 200 करोड़ लीटर था और पेट्रोल में इसकी मिलावट 1.55% थी। यह 2022 में बढ़कर 10% और 2025 में 20% हो गई। इसका मतलब है कि इस स्तर की मिलावट के लिए 1,039 करोड़ लीटर इथेनॉल की आवश्यकता होगी। हालांकि, यदि मिलावट E85 या E100 तक बढ़ जाती है, तो लगभग 10,000 करोड़ लीटर इथेनॉल उत्पादन की आवश्यकता होगी। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देश में इथेनॉल का उत्पादन अब 1,950 करोड़ लीटर तक पहुंच गया है। मतलब अभी हम बहुत पीछे हैं। यदि लक्ष्य प्राप्त किया गया तो पानी की किल्लत और बढ़ेगी। केंद्रीय जल आयोग की अप्रैल की रिपोर्ट के अनुसार, पूरे भारत में जलाशयों का जलस्तर गिर गया है, जिससे जल भंडारण 40 प्रतिशत से नीचे आ गया है। कई राज्य पहले से ही जल संकट से जूझ रहे हैं। भारतीय जल प्रबंधन विभाग (आईएमडी) और केंद्रीय भूजल बोर्ड के 2025 के आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र में सामान्य से 40% कम वर्षा हुई, पंजाब के 19 जिलों में भूजल का अत्यधिक दोहन हुआ है, और कर्नाटक शहरी जल संकट का सामना कर रहा है। इन परिस्थितियों में, स्पष्ट रूप से केंद्र को इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक सुविचारित नीति योजना बनानी होगी। इथेनॉल को ‘ग्रीन फ्यूल’ बताकर बढ़ावा देने की नीति अब गंभीर सवालों के घेरे में है। विशेषज्ञ इसे ऊर्जा सुरक्षा नहीं, बल्कि जल और खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा मान रहे हैं।

आज विश्व प्रवासी पक्षी दिवस (World Migratory Bird Day-WMBD) है, जो कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा समर्थित एक आधिकारिक कार्यक्...
09/05/2026

आज विश्व प्रवासी पक्षी दिवस (World Migratory Bird Day-WMBD) है, जो कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा समर्थित एक आधिकारिक कार्यक्रम है। यह प्रतिवर्ष कनाडा और अमेरिका में मई के दूसरे शनिवार (09/05/2026) और मेक्सिको, मध्य-दक्षिण अमेरिका तथा कैरिबियाई व अन्य देशों में अक्टूबर के दूसरे शनिवार को आधिकारिक तौर पर मनाया जाता है। यह दिन प्रवासी पक्षियों के सामने आने वाली समस्याओं के बारे में जागरूकता बढ़ाता है व इनकी और इनके आवासों की सुरक्षा की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है। साथ ही इन पक्षियों के प्रजनन स्थलों के संरक्षण में मदद करता है। मूल उद्देश्य पक्षियों के संरक्षण की आवश्यकता की ओर दुनिया का ध्यान आकर्षित करना है। हर साल मई के दूसरे सप्ताहांत में, दुनिया भर के लोग पक्षी उत्सव, शैक्षिक कार्यक्रम और पक्षी-दर्शन, भ्रमण जैसे सार्वजनिक कार्यक्रमों का आयोजन करके विश्व प्रवासी पक्षी दिवस मनाते हैं। भारत में भी यह दिन अक्टूबर में मनाया जाता है। इस दिन की शुरुआत 2006 में संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा की गई थी। वैसे तो यह आयोजन आमतौर पर मई के दूसरे सप्ताहांत में होता है, लेकिन पहला विश्व प्रवासी पक्षी दिवस 8-9 अप्रैल, 2006 के सप्ताहांत में शुरू किया गया था। हर वर्ष की भांति इस वर्ष
(2026) का विषय "पक्षी-अनुकूल शहर और समुदाय बनाना" चुना गया है। यह विषय प्रवासी पक्षियों के शहर में संरक्षण के लिए सामुदायिक विज्ञान (नागरिक विज्ञान) के महत्व पर प्रकाश डालता है। आज हम इन पक्षियों, इनकी आबादी और इन्हें खतरे में डालने वाले कारकों के बारे में बात करेंगे, ताकि इन्हें और इनके आवासों की रक्षा करने की क्षमता में सुधार हो सके। संप्रति प्रवासी पक्षियों के लिए संभावित खतरे, शिकार, जाल बिछाना और उत्पीड़न है। दुनिया के कुछ हिस्सों में, प्रवासी पक्षियों को भोजन, प्रत्यक्ष लाभ, फसलों की सुरक्षा या यहां तक ​​कि खेल के लिए प्रत्यक्ष उत्पीड़न का खतरा रहता है। गोली मारना, जाल बिछाना और जहर देना, ये सभी तरीके पक्षियों पर बुरा असर डालते हैं क्योंकि ये अपने प्रजनन और शीतकालीन प्रवास स्थलों के बीच प्रवास करते हैं। पक्षियों के लिए बड़े खतरे में पर्यावास का नुकसान है। प्रवासी पक्षियों के महत्वपूर्ण आवासों का नुकसान, क्षरण और विखंडन, इन के लिए संभावित रूप से सबसे बड़ा व्यक्तिगत खतरा माना गया है। इसका अधिकांश कारण मानव विकास है। पक्षियों को प्रजनन, भोजन, आश्रय और जीवित रहने के लिए आवश्यक संसाधनों की आवश्यकता होती है, जिनमें भोजन, पानी और घोंसले बनाने के स्थान शामिल हैं। आवास का आकार और उसकी संसंबद्धता (जैसे कि वह बड़ा और अक्षुण्ण है या खंडित और पृथक) यह निर्धारित कर सकती है कि वह आवास कुछ पक्षियों की आवश्यकताओं को पूरा करेगा या नहीं। किसी पक्षी के वार्षिक जीवन चक्र के दौरान, आवास का उपयोग भिन्न हो सकता है। उदाहरण के लिए, कई पक्षी सर्दियों के लिए दक्षिण की ओर अन्य देशों में प्रवास करते हैं। ये अपनी लंबी यात्रा पूरी करने के लिए रास्ते में रुककर ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं। वहीं, कुछ पक्षी पूरे वर्ष एक ही आवास में रहते हैं, या ऋतुओं के परिवर्तन के साथ ऊंचाई या देशांतर में थोड़ा उत्तर या दक्षिण की ओर गति करते हैं। प्रजनन के मौसम में गुणवत्तापूर्ण पर्यावास अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इस दौरान कई पक्षी पेड़ों, झाड़ियों, ज़मीन या चट्टानों पर घोंसला बनाते हैं और स्वस्थ बच्चों के पालन-पोषण के लिए आसपास के संसाधनों पर निर्भर रहते हैं। यदि प्रजनन के मौसम में यह पर्यावास नष्ट हो जाता है या उसमें गड़बड़ी होती है, तो घोंसले नष्ट हो सकते हैं या उन्हें छोड़ दिया जा सकता है, जिससे उत्पादकता कम हो सकती है। गुणवत्तापूर्ण पक्षी पर्यावासों के नष्ट होने और उनके क्षरण से स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर पक्षियों की आबादी में गिरावट आ सकती है। अतः महत्वपूर्ण पक्षी पर्यावासों की पहचान करना, इनका संरक्षण करना और इन्हें सुरक्षित रखना अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। पक्षियों द्वारा अपने वार्षिक चक्र के दौरान उपयोग किए जाने वाले पर्यावासों की रक्षा करना और उन पर्यावासों के भीतर खतरों को कम करना, समग्र रूप से स्वस्थ और टिकाऊ पक्षी आबादी सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है। जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप पर्यावासों में होने वाले बदलाव मानव विकास के प्रभावों को और भी गंभीर बना रहे हैं। ये प्रभाव, संसाधनों की उपलब्धता को बदल सकते हैं, जिससे पहले से ही सीमित संसाधनों पर दबाव और बढ़ सकता है। अतः जलवायु परिवर्तन अनुसंधान और पर्यावास परिवर्तन की भविष्य- वाणियां महत्वपूर्ण हैं। यह एक शक्तिशाली संरक्षण उपकरण है, और सेवा अनुदान कार्यक्रमों, प्रवासी पक्षी प्रबंधन योजनाओं और विभिन्न साझेदारी पहलों के माध्यम से कई भागीदारों के साथ काम करती है। यह सेवा निम्नलिखित जैसी सहयोगात्मक पहलों पर अंतर्राष्ट्रीय भागीदारों के साथ समन्वय करती है, यथा: त्रिपक्षीय समिति (अमेरिका – मेक्सिको – कनाडा), रामसर आर्द्रभूमि सम्मेलन, अमेरिका-रूस पर्यावरण समझौता, कनाडा- मेक्सिको- जापान और रूस के साथ प्रवासी पक्षी सम्मेलन (संधियाँ), अमेरिका-चीन संरक्षण प्रोटोकॉल, पश्चिमी गोलार्ध प्रवासी प्रजाति पहल आदि। कभी- कभी किसी गतिविधि के दौरान महत्वपूर्ण पर्यावासों का नुकसान अपरिहार्य हो जाता है। ऐसे में, एक विकल्प यह है कि प्रभावित प्रजातियों के लिए लाभकारी पर्यावास कहीं और बनाया जाए, जिससे खोए हुए पर्यावास के प्रभाव को कम किया जा सके। पर्यावास पर पड़ने वाले प्रभावों को कम करने हेतु कुछ बहुत ही सरल वनस्पति प्रबंधन उपाय भी हैं, जिनका पालन विकासकर्ता, भूनिर्माणकर्ता और अन्य लोग प्रजनन के मौसम के दौरान महत्वपूर्ण घोंसला बनाने वाले पर्यावास को संरक्षित करने और कई पक्षियों द्वारा उपयोग की जाने वाली और उन पर निर्भर देशी वनस्पति को बहाल करने के लिए कर सकते हैं। देखा जाये तो प्रवासी पक्षी; लोगों, पारिस्थितिकी तंत्रों, संस्कृतियों, विकास और राष्ट्रों को आपस में जोड़ते हैं, और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए एक असाधारण अवसर प्रदान करते हैं। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के अनुसार, ये शांति और एक परस्पर जुड़े ग्रह के प्रतीक हैं। विश्व में पाई जाने वाली 9,856 पक्षी प्रजातियों में से अनुमानित 19% प्रवासी हैं, जिनमें लगभग 1,600 स्थलीय और जलीय पक्षी प्रजातियां शामिल हैं। प्रवासी पक्षी पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र और सूर्य, स्थलचिह्न और तारों जैसे विभिन्न दिशासूचक संकेतों का उपयोग करके सही दिशा का पता लगाते हैं। दिन के दौरान ये पहाड़ों, नदियों और तटरेखाओं जैसे स्थलचिह्नों का उपयोग करके मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं और हर साल उन्हीं स्थानों पर लौटते हैं। आकाश में प्रवासी पक्षी मनुष्य की समझ से परे दूरी तय करते हैं; लगातार उड़ान भरते हुए इनका आगमन और प्रस्थान एक रोचक घटना है। ये साल में दो बार लगातार आठ दिनों तक सैकड़ों-हजारों किलोमीटर की दूरी तय करते हैं, कुछ तो 16,000 किलोमीटर तक भी पहुँच जाते हैं। कुछ पक्षी अपने शरीर में वसा की परतें बढ़ा लेते हैं, जबकि अन्य उड़ान की तैयारी में अपने पेट और अन्य अंगों को सिकोड़ लेते हैं, मानो अतिरिक्त भार को त्याग रहे हों। हवा के पैटर्न का फायदा उठाते हुए, कुछ पक्षी उड़ते समय 12 सेकंड के अंतराल में लगातार अपने पंख फड़फड़ाते हैं; कुछ आंशिक मस्तिष्क गतिविधि के साथ सोते हैं; जबकि अन्य लगातार उड़ते रहते हैं। आमतौर पर ये दिन में उड़ते हैं, जबकि कई पक्षी निशाचर होते हैं और ध्रुवीकृत प्रकाश का पता लगाने में सक्षम होते हैं, जिसका उपयोग कई पक्षी रात में दिशा जानने के लिए करते हैं। भोजन, प्रजनन और अपने बच्चों के पालन- पोषण के लिए उपलब्ध सर्वोत्तम आवासों को खोजने के लिए, इनकी यात्राएँ लंबी और छोटी दोनों तरह की होती हैं। कुछ पक्षी भले ही कम दूरी तक ही उड़ते हैं, लेकिन अति प्रवासी पक्षी घोंसला बनाने के स्थानों और मौसमी भोजन स्रोतों तक पहुँचने के लिए कई महासागरों और महाद्वीपों को पार कर सकते हैं। इनके उड़ान मार्ग आम तौर पर पर्वत श्रृंखलाओं या तटरेखाओं का अनुसरण करते हैं, और ये ऊपर की ओर उठने वाली हवाओं और अन्य पवन पैटर्न का लाभ उठाते हुए भौगोलिक बाधाओं से बचते हैं, जैसे कि (स्थलीय पक्षियों के मामले में) खुले पानी के बड़े-बड़े हिस्से। इनके उड़ान मार्ग ऐतिहासिक, सुस्थापित मार्गों पर होते हैं, जो भौगोलिक, पारिस्थितिक और यहाँ तक कि मौसम संबंधी कारकों द्वारा आकारित होते हैं। दूरी की परवाह किए बिना, पक्षी अपने अस्तित्व को खतरे में डालने वाली परिस्थितियों से बचने के लिए प्रवास करते हैं और अपनी जोखिम भरी यात्राएँ करते हैं जिनमें कई प्रकार के खतरे शामिल होते हैं। इनमें कृषि विकास और मानव निर्मित तटीय और अवसंरचनात्मक विकास के कारण, आवास का नुकसान और क्षरण शामिल है, जो इनके प्रवासी मार्गों में बाधा उत्पन्न करते हैं। वैज्ञानिकों को पता चल रहा है कि जलवायु परिवर्तन प्रवासी पक्षियों की प्राचीन यात्राओं में बाधा उत्पन्न कर रहा है, जिससे इनके जीवन चक्र के विभिन्न पहलुओं यथा प्रवास, प्रजनन और घोंसला बनाने का समय प्रभावित हो रहा है। इसके चलते पृथ्वी पर लगभग दस लाख पक्षी प्रजातियाँ विलुप्त होने के खतरे में हैं। पक्षियों के अपने प्रजनन क्षेत्रों में पहुँचने की तिथि और पौधों के खिलने, कीड़ों के निकलने, मकड़ियों, बीजों और अन्य संसाधनों के उपलब्ध होने की चरम तिथियों के बीच अंतर बढ़ता जा रहा है, जिन पर प्रजनन करने वाले पक्षी और इनके बच्चे निर्भर करते हैं। ये परिवर्तन वैश्विक तापमान में असमानताओं, अनियमितताओं और उतार-चढ़ावों के परिणाम हैं। मानव क्षतिकृषि संबंधी गतिविधियों के कारण गैर-प्रजनन क्षेत्रों में उपलब्ध आवासों की मात्रा और गुणवत्ता सीमित हो जाती है। अत्यधिक कटाई और विनाश, विशेष रूप से प्रमुख प्रवासी स्थलों पर, सीधे तौर पर आवासों के नुकसान और गिरावट का कारण बनते हैं। प्रजनन क्षेत्रों में वनों का विखंडन और गैर-प्रजनन क्षेत्रों में वनों की कटाई ने प्रवासी पक्षियों की संख्या में गिरावट में योगदान दिया है। प्रवासी और गैर-प्रवासी पक्षियों के बीच भूमि क्षेत्र के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ने की संभावना बढ़ रही है। कटाई और भूमि क्षरण, घोंसलों का विनाश, जल प्रदूषण, विषैले कीटनाशक और भूमि प्रदूषण मानव निर्मित खतरे हैं। प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण पड़ाव स्थलों का क्षरण और पर्यावास का नुकसान उनके जीवित रहने की संभावनाओं पर विनाशकारी प्रभाव डाल सकता है और विखंडन का कारण बन सकता है, जिससे इनकी आबादी कम हो सकती है। वैश्विक स्तर पर मानव निर्मित बुनियादी ढांचे के विकास और पवन टर्बाइन, केबल, टावर और मस्तूल जैसी कृत्रिम संरचनाओं के बढ़ते दबाव पवन वाली टर्बाइनके कारण प्रवासी पक्षियों की टक्कर और मृत्यु हो जाती है, जिससे 350 से अधिक प्रजातियों के प्रवासी पक्षियों, विशेष रूप से रात्रि में उड़ने वाले पक्षियों के लिए खतरा पैदा हो गया है। उड़ान मार्गों और आर्द्रभूमि के पास पवन टर्बाइनों का बढ़ता निर्माण और पक्षियों के एकत्रीकरण स्थलों के पास बिजली लाइनों का विस्तार भी पक्षियों की उच्च मृत्यु दर का कारण बना है। वायु प्रदूषण, प्राकृतिक प्रणालियों में परिवर्तन, जैसे बांध और आर्द्रभूमि का जल निकासी, आवासीय और व्यावसायिक विकास, नई बीमारियाँ, शिकार, गोलीबारी, जाल बिछाना, जहर देना, बिजली की तारों से करंट लगना, जानबूझकर विनाश और प्रजनन काल के दौरान व्यवधान ने इनके पूरे चक्र को बाधित कर दिया है। शहर की रोशनी रात्रिचर्या में उड़ने वाले पक्षियों को भ्रमित करती है। प्रवासी पक्षी हमारे पर्यावरण की स्थिति के उत्कृष्ट संकेतक हैं और ये महत्वपूर्ण पारिस्थितिक नियामक सेवाएं प्रदान करते हैं। ये भूदृश्यों में बीजों के फैलाव और फूलों के परागण के साथ-साथ मानव और पशुधन उपभोग के लिए फसलों के बीजों के फैलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पक्षी कीटों के प्राकृतिक नियंत्रक हैं और इल्लियों, घुन, कटवर्म, भृंग और मक्खियों जैसे पौधों के लिए हानिकारक कीटों की संख्या को कम करते हैं। इससे किसानों को कीटनाशकों और फसल सुरक्षा उपायों पर होने वाले खर्च की बचत होती है। समुद्री पक्षी गुआनो भी उत्पन्न कर सकते हैं, जिसे प्रकृति के सर्वोत्तम उर्वरकों में से एक माना जाता है। गुआनो का अर्थ है "समुद्री पक्षियों की बीट"। यह एक जटिल प्रक्रिया का परिणाम है जो जीवित पौधों से शुरू होती है जिन्हें कीड़े खाते हैं, फिर मछलियाँ उन्हें खाती हैं और अंत में पक्षी उन्हें पचा लेते हैं। गुआनो पक्षियों के छत्ते के आसपास गुफाओं, चट्टानों या जमीन पर बड़ी मात्रा में जमा हो जाता है। प्रवासी पक्षी पर्यटन को भी बढ़ाते हैं। प्रवासी पक्षियों की यात्रा विश्वभर की संस्कृतियों के लिए गौरव का स्रोत है। पर्यावरण पर्यटन फ्लेमिंगो महत्वपूर्ण पर्यावासों के संरक्षण में सहायक है। पक्षी अवलोकन साहित्य की विशाल विविधता पक्षी प्रेमियों और आम लोगों को प्रवासी पक्षियों की आकर्षक दुनिया का अन्वेषण करने में मदद करती है। इससे लोगों को प्रवासी पक्षियों और पारिस्थितिकी तंत्र के महत्व के बारे में जानकारी मिलती है। प्रवासी पक्षियों के इर्द-गिर्द एक उद्योग विकसित हो चुका है। हजारों पक्षी प्रेमी दुर्लभ प्रजातियों को देखने की उम्मीद में दुनिया भर के विभिन्न स्थानों की यात्रा करते हैं। यात्रा, आवास और प्रवेश शुल्क के लिए धन वितरित करने से काफी आर्थिक लाभ प्राप्त होता है। साथ ही, दूरबीन और कैमरे जैसे पक्षी अवलोकन उपकरणों का उत्पादन एक महत्वपूर्ण बहु-करोड़ डॉलर का उद्योग है। प्रवासी पक्षी राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर और बाहर जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा की आवश्यकता के सबसे सशक्त प्रतीकों में से एक हैं। इनकी वार्षिक यात्राएँ, जो पहले से ही व्यापक हैं, हर साल और भी कठिन होती जा रही हैं क्योंकि दुनिया के हर क्षेत्र में जैव विविधता में गिरावट आ रही है, पारिस्थितिक तंत्र नष्ट हो रहे हैं और भूमि का क्षरण हो रहा है। अंत में, आप कहीं भी हों, 9 मई को बाहर निकलें, विश्व प्रवासी पक्षी दिवस मनाने में सहयोग करें और अपने द्वारा देखे गए पक्षियों की तस्वीरें सोशल मिडिया पर साझा करें। आपको पक्षी विशेषज्ञ होने या दिनभर बाहर रहने की ज़रूरत नहीं है, घर से 10 मिनट का समय भी मायने रखता है।

जलवायु परिवर्तन का भारत के श्रम बल पर भारी असर पड़ रहा है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की एक रिपोर्ट में कहा गया ह...
02/05/2026

जलवायु परिवर्तन का भारत के श्रम बल पर भारी असर पड़ रहा है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भीषण गर्मी के कारण श्रमिकों की शारीरिक कार्य क्षमता में कमी आएगी और 2030 तक भारत में कुल कार्य घंटे 5.4% तक कम हो जाएंगे, जिससे 3.5 करोड़ पूर्ण- कालिक नौकरियों सहित कुल रोजगार के अवसर समाप्त हो जाएंगे। इसलिए, इन परिवर्तनों को देखते हुए, देश के कर्मचारियों पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को कम करने और सतत बाजार विकास को बढ़ावा देने के लिए निवारक उपाय और प्रभावी कार्यप्रणाली अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे। बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के राज कुमार सिन्हा के 2025 के एक आंकलन के अनुसार भारत में 60 करोड़ से अधिक लोग भूमि, जल, जंगल और समुद्र जैसे प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर हैं। देश में 14.6 करोड़ छोटे और सीमांत किसान, 14.4 करोड़ खेतिहर मजदूर ( बड़ी संख्या में दलित हैं), 27.5 करोड़ वन निवासी, 2.8 करोड़ मछुआरे, 1.3 करोड़ पशुपालक और 1.7 करोड़ कारीगर हैं जो सीधे तौर पर प्रकृति के साथ और प्रकृति के भरोसे काम कर रहे हैं। लगभग 6 करोड़ मौसमी मजदूर हैं जो काम के सिलसिले में लगातार अपने गांव से बाहर जाते हैं और लौटते हैं। प्रकृति निर्भर समुदायों की आर्थिक गतिविधियां जो बड़े पैमाने पर जीवन निर्वाह और छोटी आय के लिए है। वर्तमान आर्थिक नीतियों के कारण, जो कॉर्पोरेट्स और बड़े व्यवसायों का समर्थन करती है, प्रकृति निर्भर समुदाय के लिए अव्यवहारिक होती जा रही है। विकास के पूंजीवादी तरीके और राज्य की आर्थिक नीतियां, जो पर्यावरण के खिलाफ और जन विरोधी है, जिसके कारण प्रकृति निर्भर समुदाय हाशिये पर चले जाते हैं और गरीबी के चंगुल में फंस जाते हैं। इन समुदायों में किसान, मछुआरा, वन निवासी और पशु पालकों की एक समान जरूरत है जैसे भूमि, पानी (नदी, झील, आर्द्रभूमि, समुद्री जल निकाय) और जंगलों तक सुगम पहुंच सुनिश्चित करना और राज्य के समर्थन से इन संसाधनों का अंतहीन दोहन करने वालों से रक्षा करने की जरूरत है। ये सभी स्व-रोजगारी मजदूर प्राथमिक उत्पादक हैं और जैविक जीवित संसाधनों पर निर्भर हैं। ये समुदाय मुख्य रूप से अपनी आजीविका के लिए काम करते हैं न कि पूंजी संचय के उद्देश्य से। पूंजीवादी प्रणाली में उत्पादन और वितरण समाजिक समानता, न्याय और पर्यावरण की सुरक्षा की बजाय निजी मुनाफे से संचालित होती है और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और विनाश पर अधारित विकास के कारण उन समुदायों को विस्थापित होना पड़ता है जो इन संसाधनों पर निर्भर हैं। यह प्राकृतिक संसाधन न सिर्फ पारिस्थितिकी को संतुलित रखता है, बल्कि ग्रामीण आजीविका, जैव विविधता, और जलवायु अनुकूलन के लिए भी महत्वपूर्ण है। जलवायु संकट की वैश्विक घटना पूंजीवाद के कारण पैदा हुई है, और अब यह भारत में भी साफ तौर पर दिखाई देने लगी है, जिसका खामियाजा प्रकृति निर्भर मजदूर सूखा, गर्मी, अनियमित वर्षा, बाढ़ और समुद्र के स्तर में वृद्धि के रूप में भुगत रहे हैं। जबकि इस संकट के लिए प्रकृति निर्भर मजदूरों का योगदान नगण्य है। इन संसाधनों के संरक्षण और संवर्धन के लिए दीर्घकालिक योजना पर कार्य करने की आवश्यकता है। जिससे एक बेहतर, समान और टिकाऊ भविष्य का निर्माण हो सके। संसद की कृषि सम्बंधी ‘स्टैंडिंग कमिटी’ (2024) के अनुसार भारत का 51 प्रतिशत खेती योग्य क्षेत्र, वर्षा पर निर्भर है, जो जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील है। देश के विभिन्न हिस्सों में बार-बार ‘चरम मौसम’ की घटनाओं के कारण फसल उत्पादन और आमदनी में गिरावट आई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष औसतन 15,168 किसान आत्महत्या को मजबूर हो रहे हैं। इनमें से लगभग 72 प्रतिशत ऐसे छोटे किसान हैं, जिनके पास 2 हेक्टेयर से भी कम जमीन है। उद्योगों द्वारा छोड़े जाने वाले रसायन और भारी धातु जल के प्रदूषण का कारण बन रहे हैं। इससे मछलियों की सेहत खराब हो रही है और उनकी संख्या कम हो रही है। जल प्रदूषण के कारण मछलियों की खाद्य श्रृंखला प्रभावित होती है, जिससे उनकी संख्या कम होती जा रही है। मछुआरा समुदाय का पानी तक पहुंच और उनके अधिकारों की रक्षा करना आवश्यक है ताकि वे अपनी आजीविका चला सकें। जेएनपीटी बंदरगाह नवी मुंबई के अतिक्रमण ने खाड़ी के मुहाने को 1600 मीटर से घटाकर 50 मीटर कर दिया है, जिससे मछुआरों के लिए मछली पकड़ने के अवसर कम हो गए हैं। तटीय क्षेत्र के छोटे मछुआरों की आजीविका पूरी तरह से खाड़ी पर निर्भर है और बंदरगाह के अतिक्रमण ने उनकी जीवनरेखा को खतरे में डाल दिया है। बंदरगाह के अतिक्रमण ने न केवल मछुआरों की आजीविका को प्रभावित किया है, बल्कि पर्यावरण पर भी नकारात्मक प्रभाव डाला है। यह मुद्दे न केवल मछुआरों के लिए बल्कि पूरे समुदाय के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। इन मुद्दों का समाधान निकालने के लिए सरकार, स्थानीय प्रशासन और मछुआरों को मिलकर काम करना होगा। पिछले 10 वर्षों में पर्यावरण, वन नीतियों और कानूनों में कई परिवर्तन और संशोधन किये गए हैं। जिसके कारण वन भूमि के बड़े क्षेत्रों को गैर वनीकरण के लिए देने से लेकर अन्य नीतियों जैसे ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम, क्षतिपूर्ति वनीकरण और अन्य हस्तक्षेपों को लागू करना था। इन्हीं नीतियों के कारण वन निवासियों को जंगलों से निकाला जा रहा है। देश के 53 टाइगर रिजर्व से 848 गांव के 89,808 परिवारों को कोर क्षेत्र से निकाले जाने की कार्यवाही जारी है। अभी तक 257 गांव के 25,007 परिवारों को बाहर किया जा चुका है। 2016 में जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा जारी की गई वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 1950 से 1990 के बीच देश में 87 लाख आदिवासी विस्थापित हुए थे जो कुल विस्थापितों का 40 प्रतिशत है। वर्धा जिले के आदिवासी समुदाय और गवली (पशुपालन समुदाय) लोगों को वन विभाग परेशान करता है। जबकि वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत पशुपालन समुदायों के अधिकारों को मान्यता देने के प्रावधान हैं। यह अधिनियम समुदायिक वन संसाधन अधिकारों को परिभाषित करता है, जिसमें पारंपरिक या परम्परागत सीमाओं के भीतर वन भूमि और पशुपालन समुदायों के लिए मौसमी उपयोग के परिदृश्य भी शामिल हैं। इसलिए प्रकृति निर्भर मजदूरों की आजिविका सुरक्षित करने के लिए सरकार और समाज को आवश्यक हस्तक्षेप करना चाहिए। मछुआरों की आजीविका स्वच्छ नदियों पर निर्भर है इसलिए नदियों के प्रवाह को निर्बाध बहने दिया जाए, उन्हें प्रदूषण से मुक्त रखा जाए, उनके कुदरती प्रवाह को नहीं रोका जाए और आद्रभूमि को बचाया जाए। वन निवासियों और वन पर निर्भर लोगों के अधिकारों को पूर्ण मान्यता देकर वनों और उनके सभी संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन और प्रबंधन उनके हाथों में सौंप दिया जाए ताक़ि समुदाय-आधारित विकेंद्रीकृत शासन प्रणालियों को लागू किया जा सके। आदिवासी कल्याण मंत्रालय दिल्ली द्वारा 12 जुलाई 2012 को जारी दिशा निर्देश में लिखा है कि की राज्यों में लघु वन उपजों, विशेष तौर पर कीमती उपजों जैसे तेंदूपत्ता के व्यापार में वन निगमों का एकाधिकार, वन अधिकार अधिनियम 2006 की प्रवृत्ति के विरुद्ध है और इसे दूर किया जाए। राज्य सरकारें न केवल, वनों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति व अन्य वन निवासियों को लघु वन उपजों पर निर्बाध अधिकारों को प्रदान करने में सहयोगकर्ता की भूमिका निभाएं, वरन् लघु वन उपजों के पारिभाषिक मूल्य दिलाने में मदद करें। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले प्रकृति निर्भर मजदूरों की समाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच नहीं होती है। महिलाओं को अक्सर पुरुष मजदूरों की तुलना में कम मजदूरी दिया जाता है और उन्हें समाजिक रुप से कमजोर माना जाता है। इन मजदूरों की समाजिक, आर्थिक स्थिति उन चुनौतियों का एक जटिल स्वरूप को दर्शाती है, जिनके लिए बहुयामी समाधान की आवश्यकता है। इससे पता चलता है कि पूंजी की तुलना में श्रम बढ़ते तापमान के प्रति अधिक संवेदनशील है। सरल शब्दों में कहें तो, मशीनों, बुनियादी ढांचे या प्रौद्योगिकी की तुलना में मानवीय कार्य गर्मी से अधिक प्रभावित होता है। इसका कारण यह हो सकता है कि लोग सीधे पर्यावरणीय परिस्थितियों के संपर्क में आते हैं और अत्यधिक गर्मी में उनका प्रदर्शन गिर जाता है। आगे आप सोचें, बिगड़ता पर्यावरण किस तरह से मजदूरों को प्रभावित कर रहा है। ये सच्चाई आपके इर्द गिर्द ही है पर आप देखना नहीं चाहते हैं और यदि देख भी लें तो कुछ करना नहीं चाहते हैं..

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