16/06/2026
आज मैं भूरे भालू की चर्चा करूंगा। भूरे भालू के उत्पत्ति की बात करें तो माना जाता है कि भूरा भालू प्रारंभिक प्लियोसीन काल के दौरान एशिया में एट्रस्कन भालू (उर्सस एट्रस्कस) से विकसित हुआ था । एक आनुवंशिक विश्लेषण से पता चला कि भूरे भालू की वंशज गुफा भालू प्रजाति समूह से लगभग 1.2-1.4 मिलियन वर्ष पहले अलग हुई थी, लेकिन यह स्पष्ट नहीं हुआ कि क्या यह उसी प्रजाति से संबंधित है। भूरे भालू (उर्सस आर्कटोस), जिन्हें ग्रिजली भालू के नाम से भी जाना जाता है, अलास्का के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में फ्रेडरिक साउंड के दक्षिण में स्थित द्वीपों, एल्यूशियन द्वीपसमूह में यूनिमैक के पश्चिम में स्थित द्वीपों और बेरिंग सागर के द्वीपों को छोड़कर पूरे अलास्का में पाए जाते हैं। भूरे भालू दो पैरों पर खड़े हो सकते हैं, अपने पैरों के तलवों पर चल सकते हैं, अपनी "उंगलियों" से चीजें उठा सकते हैं और अक्सर वही खाते हैं जो इंसान खाते हैं। इनकी पेड़ों पर छोड़े गए खरोंच के निशानों, गंधों और ध्वनियों के माध्यम से एक-दूसरे से संवाद करने की अद्भुत क्षमता, मानव के जीवन जीने के तरीके से समानता स्थापित करती है। इनका कम होना चिंता का विषय है। वर्तमान में पूरी दुनियां में इनकी जनसंख्या 110,000 के आसपास है। यहीं से हिमालयन भूरा भालू विकसित हुआ है। इनका वज़न 1,500 पाउंड तक, लंबाई 6.5 फीट, कंधों तक की ऊंचाई 3.35 फीट है। इनका मूल निवास टुंड्रा वन हैं। हालांकि भूरे भालुओं की आबादी फिलहाल स्थिर है, फिर भी संरक्षण में इन्हें उच्च प्राथमिकता दी जाती है। विशाल प्राकृतिक क्षेत्रों पर इनकी निर्भरता को देखते हुए, भूरे भालू कई अन्य वन्यजीव प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण प्रबंधन संकेतक हैं। भूरे भालू शिकारी के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो अन्य जानवरों की आबादी को नियंत्रण में रखते हैं। इसके अलावा, वे बीज फैलाने का काम करते हैं, जिससे उनके अपने पर्यावरण को बनाए रखने में मदद मिलती है। हिमालय भूरा भालू (Himalayan brown bear), जिसका वैज्ञानिक नाम उरसस आर्कटोस इज़ाबेलिनस (Ursus thibetanus isabellinus) है, जो भूरे भालू की एक उपजाति है। यह उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान, उत्तरी पाकिस्तान, उत्तरी भारत, पश्चिमी चीन और नेपाल में मिलती है। हिमालयी भूरा भालू भारत में भारतीय हिमालयी क्षेत्र (IHR) के भीतर, लद्दाख और जम्मू और कश्मीर, और हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और ऊपरी सिक्किम के कुछ हिस्सों में वितरित हैं। लद्दाख में, ये ज्यादातर पश्चिमी क्षेत्र में पाए जाते हैं, जैसे कि ऊपरी सुरु घाटी, शारगोल और ज़ांस्कर घाटी आदि। हिमालयी भूरे भालू बहुत ही शर्मीले और एकांतप्रिय होते हैं और ये ज्यादातर रात में सक्रिय रहते हैं। इनकी संख्या भी बहुत कम है, जिस कारण इन्हें सीधे तौर पर देख पाना दुर्लभ होता है। प्रागैतिहासिक काल से ही भालुओं का शिकार उनके मांस और फर के लिए किया जाता रहा है। भूरे भालुओं का इनके आकार, मूल्यवान खाल और मांस के कारण बड़े पैमाने पर शिकार किया गया। अब इन भूरे भालुओं की आबादी अपने पूर्व क्षेत्र के केवल 2% हिस्से में ही बची है। कहा जाता है कि एशियाई बाज़ार में पारंपरिक औषधियों के रूप में भालू के पित्ताशय की थैली की ऊँची कीमत मिलती है, हालाँकि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि भालू के अंगों से बने उत्पादों का कोई औषधीय महत्व है। यही नहीं प्राकृतवास नुकसान ने भी इनकी आबादी को खत्म किया है। भालुओं के प्राकृतिक आवास में मानव विस्तार, साथ ही भूरे भालुओं को उपद्रवी माने जाने के उदाहरण, भालुओं और मनुष्यों के बीच मौजूद तनाव को दर्शाते हैं। लकड़ी काटना, खनन, सड़क निर्माण और अन्य विकास कार्य, साथ ही पशुधन, फसलों, जल स्रोतों और कूड़ेदानों जैसी चीजों में भूरे भालुओं के हस्तक्षेप को रोकने के मानव प्रयास, ये सभी इस पशु आबादी को प्रभावित करते हैं। भारत में अब इसकी संख्या तेजी से गिर रही है। इसीलिए अभी हाल में लद्दाख के ट्रांस- हिमालयी क्षेत्र में मैक्सएंट द्वारा किए गए एक सर्वे में भूरे भालुओं के रहने की जगहों और उनके अनुकूल आवासों की मैपिंग की गई। यह रिपोर्ट मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा पहली बार 9 जनवरी 2026 को प्रकाशित हुई थी, और इसकी गंभीरता को देखते हुये, अभी हाल में स्नेहा महले ने इसे कुछ दिन पहले प्रकाशित किया था। इसमें पश्चिमी लद्दाख की घाटियां, जैसे द्रास, सुरु, शरगोल और ज़ंस्कार, इन भालुओं के लिए सबसे उपयुक्त आवास के रूप में सामने आई हैं, क्योंकि यहां इन्हें पर्याप्त वनस्पति, पानी और मध्यम ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाके मिल जाते हैं। हालाँकि, भालुओं के सबसे बेहतरीन आवास ‘संरक्षित क्षेत्रों’ से बाहर स्थित हैं और उन क्षेत्रों में आते हैं, जहां मानव अपनी सुविधा के लिए बुनियादी ढांचे का विकास तेजी से कर रहा है। ऐसे में वन्यजीव गलियारों के संरक्षण की मांग जायज है। मानव गतिविधियों के कारण, जानवर यहां मौजूद तो हो सकते हैं, लेकिन नज़र नहीं आते हैं। इस सर्वे में मैक्सएंट ने भालू के आवासों को निर्धारित करने में, जलवायु संबंधी कारकों के मजबूत प्रभाव को उजागर किया है। इससे भविष्य के पर्यावरणीय बदलावों के बीच उन सुरक्षित ठिकानों की पहचान करने में मदद मिलेगी, जो भालुओं के जीवित रहने के लिए महत्वपूर्ण बने रहेंगे। चुंकि हिमालयी भूरे भालू मुख्यरूप से घाटी के चारागाहों पर निर्भर हैं। इसीलिए द्रास, सुरु और ज़ंस्कार जैसी घाटियों में भालुओं के पाए जाने की संभावना सबसे अधिक पाई गई। ये घाटियां इन्हें मौसमी वनस्पति, छोटे स्तनधारी जीव (जैसे मारमॉट) और पानी का नियमित स्रोत उपलब्ध कराती हैं। इस दुर्गम और संसाधनों की कमी वाले वातावरण में ये चीजें, भालुओं के जीवित रहने के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इस सर्वे में, भालुओं की आबादी के फैलाव पर ज़मीन की बनावट का भी गहरा असर देखा गया। ये भालू समुद्र तल से 3,000 से 4,500 मीटर की ऊंचाई वाले, मध्यम ऊबड़-खाबड़ इलाकों को पसंद करते हैं। ऐसी मध्यम ऊंचाई वाली जगहें भालुओं को मांद बनाने, भोजन तलाशने और इंसानी बस्तियों से दूर रहने के लिए आदर्श वातावरण प्रदान करती हैं। खासतौर पर मादा भालुओं के लिए, जिनके शावक साथ होते हैं, ये ऊबड़-खाबड़ ढलान और दुर्गम रास्ते बहुत महत्वपूर्ण हैं। सर्दियों में, ये जगहें शीत- निद्रा के दौरान इन्हें सुरक्षित मांद के स्थान उपलब्ध कराती हैं। क्यों कि इन इलाकों में इंसानी हस्तक्षेप न के बराबर हैं, और आमतौर पर सड़कें कम हैं, यातायात भी कम है। इंसानी गतिविधियों में थोड़ी सी भी बढ़ोतरी इन आवासों की उपयुक्तता को काफी कम कर देती है, जो इस बात की पुष्टि करता है कि यह प्रजाति मानवीय दखल के प्रति कितनी संवेदनशील है। आवास की उपयुक्तता में तापमान से जुड़े कारक भी महत्वपूर्ण हैं। जिन इलाकों में मौसमी तापमान में भारी बदलाव होता है, वो इलाके, भालुओं के लिए सबसे अनुकूल स्थिति पैदा करते हैं; क्योंकि तापमान में यही अंतर वनस्पतियों के विकास, शिकार (छोटे जीवों) की आवाजाही और मांद बनाने के लिए जरूरी माहौल बनाते हैं। भालू ऐसे क्षेत्रों में भी रहना पसंद करते हैं जहां दैनिक तापमान में उतार- चढ़ाव कम हो, यानि सूक्ष्म जलवायु की स्थिरता, इन्हें ऊंचाई वाले वातावरण में भोजन खोजने और सुरक्षित मांद में रहने के बीच संतुलन बनाने में मदद करती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, तापमान में बदलाव, भालुओं के आवासों को गहराई से प्रभावित करता है। जलवायु गर्म होने के साथ, तापमान पर निर्भर रहने वाली ये अनुकूल स्थितियां धीरे-धीरे और ऊंचे इलाकों की तरफ खिसक सकती हैं, जिससे भालुओं के लिए उपलब्ध जगहें और भी सीमित और बिखरी हुई हो जाएंगी। यह भी उभर कर आया कि इनके बसावट और संरक्षण में,
स्थानीय समुदायों को साथ लेकर चलना भी जरूरी है। पश्चिमी लद्दाख इस प्रजाति का तो मुख्य गढ़ है, पर नुब्रा घाटी में भी भालुओं की मौजूदगी देखी गई है। लेकिन अध्ययन से संकेत मिलता है कि विभिन्न समूहों के बीच आपस में जुड़ाव पहले ही कमजोर हो चुका है, जिससे भविष्य में इनके और अधिक अलग-थलग पड़ने का खतरा बढ़ गया है। अतः द्रास, सुरु, शरगोल और ज़ंस्कार जैसी प्रमुख घाटी प्रणालियों का संरक्षण होनी चाहिए। मौजूदा समय में, ये क्षेत्र भालुओं के लिए सबसे उच्च- गुणवत्ता वाला आवास हैं, लेकिन ये काफी हद तक संरक्षित क्षेत्रों से बाहर स्थित हैं। इन इलाकों पर सड़कों के विस्तार, सैन्य निर्माण, खनन और अनियंत्रित पर्यटन का दबाव लगातार बढ़ रहा है। आवासों का यह विखंडन भूरे भालुओं के लिए भोजन की उपलब्धता और सुरक्षित मांद तक पहुंच को बाधित कर सकता है, क्योंकि इन भालूओं को जीवित रहने के लिए बड़े भू-भाग की जरूरत होती है और ये भोजन की तलाश में घाटियों में दूर-दूर तक घूमते हैं। इसके अलावा स्थानीय समुदायों को साथ लेकर चलना भी उतना ही जरूरी है। लद्दाख के पशुपालकों को अक्सर पालतू जानवरों के शिकार का नुकसान उठाना पड़ता है और क्षेत्र में बढ़ते मानव-भालू संघर्ष ने संरक्षण की चुनौतियों को और बढ़ा दिया हैं। लेकिन भालू-रोधी बाड़े बनाना, बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए सख्त नियम बनाना, कचरा प्रबंधन में सुधार करना, चराई को नियंत्रित करना और सोच-समझकर बनाई गई इको-टूरिज्म नीतियां, संघर्ष को कम करने के साथ-साथ भालुओं के आवासों को बचाने में मददगार साबित हो सकती हैं। भालुओं की आबादी के सटीक अनुमान और घाटियों के बीच उनके आवासों के आपसी जुड़ाव की जानकारी की भी आवश्यकता है, जिसमें संभावित गलियारों की पहचान करना भी शामिल है। भविष्य में लंबे समय तक निगरानी, आनुवंशिक अध्ययन और जलवायु को ध्यान में रखकर किए गए मॉडलिंग के जरिए इन कमियों को दूर करना, ट्रांस-हिमालय में हिमालयी भूरे भालुओं के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सबसे जरूरी कदम होगा।