Institute For Sustainable Development and Research

Institute For Sustainable Development and Research This organisation is ment for Sustainable development, keeping the poor in the centre..

16/06/2026

इस हरामखोर को जूता मारना चाहिए....

आज मैं भूरे भालू की चर्चा करूंगा। भूरे भालू के उत्पत्ति की बात करें तो माना जाता है कि भूरा भालू प्रारंभिक प्लियोसीन काल...
16/06/2026

आज मैं भूरे भालू की चर्चा करूंगा। भूरे भालू के उत्पत्ति की बात करें तो माना जाता है कि भूरा भालू प्रारंभिक प्लियोसीन काल के दौरान एशिया में एट्रस्कन भालू (उर्सस एट्रस्कस) से विकसित हुआ था । एक आनुवंशिक विश्लेषण से पता चला कि भूरे भालू की वंशज गुफा भालू प्रजाति समूह से लगभग 1.2-1.4 मिलियन वर्ष पहले अलग हुई थी, लेकिन यह स्पष्ट नहीं हुआ कि क्या यह उसी प्रजाति से संबंधित है। भूरे भालू (उर्सस आर्कटोस), जिन्हें ग्रिजली भालू के नाम से भी जाना जाता है, अलास्का के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में फ्रेडरिक साउंड के दक्षिण में स्थित द्वीपों, एल्यूशियन द्वीपसमूह में यूनिमैक के पश्चिम में स्थित द्वीपों और बेरिंग सागर के द्वीपों को छोड़कर पूरे अलास्का में पाए जाते हैं। भूरे भालू दो पैरों पर खड़े हो सकते हैं, अपने पैरों के तलवों पर चल सकते हैं, अपनी "उंगलियों" से चीजें उठा सकते हैं और अक्सर वही खाते हैं जो इंसान खाते हैं। इनकी पेड़ों पर छोड़े गए खरोंच के निशानों, गंधों और ध्वनियों के माध्यम से एक-दूसरे से संवाद करने की अद्भुत क्षमता, मानव के जीवन जीने के तरीके से समानता स्थापित करती है। इनका कम होना चिंता का विषय है। वर्तमान में पूरी दुनियां में इनकी जनसंख्या 110,000 के आसपास है। यहीं से हिमालयन भूरा भालू विकसित हुआ है। इनका वज़न 1,500 पाउंड तक, लंबाई 6.5 फीट, कंधों तक की ऊंचाई 3.35 फीट है। इनका मूल निवास टुंड्रा वन हैं। हालांकि भूरे भालुओं की आबादी फिलहाल स्थिर है, फिर भी संरक्षण में इन्हें उच्च प्राथमिकता दी जाती है। विशाल प्राकृतिक क्षेत्रों पर इनकी निर्भरता को देखते हुए, भूरे भालू कई अन्य वन्यजीव प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण प्रबंधन संकेतक हैं। भूरे भालू शिकारी के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो अन्य जानवरों की आबादी को नियंत्रण में रखते हैं। इसके अलावा, वे बीज फैलाने का काम करते हैं, जिससे उनके अपने पर्यावरण को बनाए रखने में मदद मिलती है। हिमालय भूरा भालू (Himalayan brown bear), जिसका वैज्ञानिक नाम उरसस आर्कटोस इज़ाबेलिनस (Ursus thibetanus isabellinus) है, जो भूरे भालू की एक उपजाति है। यह उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान, उत्तरी पाकिस्तान, उत्तरी भारत, पश्चिमी चीन और नेपाल में मिलती है। हिमालयी भूरा भालू भारत में भारतीय हिमालयी क्षेत्र (IHR) के भीतर, लद्दाख और जम्मू और कश्मीर, और हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और ऊपरी सिक्किम के कुछ हिस्सों में वितरित हैं। लद्दाख में, ये ज्यादातर पश्चिमी क्षेत्र में पाए जाते हैं, जैसे कि ऊपरी सुरु घाटी, शारगोल और ज़ांस्कर घाटी आदि। हिमालयी भूरे भालू बहुत ही शर्मीले और एकांतप्रिय होते हैं और ये ज्यादातर रात में सक्रिय रहते हैं। इनकी संख्या भी बहुत कम है, जिस कारण इन्हें सीधे तौर पर देख पाना दुर्लभ होता है। प्रागैतिहासिक काल से ही भालुओं का शिकार उनके मांस और फर के लिए किया जाता रहा है। भूरे भालुओं का इनके आकार, मूल्यवान खाल और मांस के कारण बड़े पैमाने पर शिकार किया गया। अब इन भूरे भालुओं की आबादी अपने पूर्व क्षेत्र के केवल 2% हिस्से में ही बची है। कहा जाता है कि एशियाई बाज़ार में पारंपरिक औषधियों के रूप में भालू के पित्ताशय की थैली की ऊँची कीमत मिलती है, हालाँकि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि भालू के अंगों से बने उत्पादों का कोई औषधीय महत्व है। यही नहीं प्राकृतवास नुकसान ने भी इनकी आबादी को खत्म किया है। भालुओं के प्राकृतिक आवास में मानव विस्तार, साथ ही भूरे भालुओं को उपद्रवी माने जाने के उदाहरण, भालुओं और मनुष्यों के बीच मौजूद तनाव को दर्शाते हैं। लकड़ी काटना, खनन, सड़क निर्माण और अन्य विकास कार्य, साथ ही पशुधन, फसलों, जल स्रोतों और कूड़ेदानों जैसी चीजों में भूरे भालुओं के हस्तक्षेप को रोकने के मानव प्रयास, ये सभी इस पशु आबादी को प्रभावित करते हैं। भारत में अब इसकी संख्या तेजी से गिर रही है। इसीलिए अभी हाल में लद्दाख के ट्रांस- हिमालयी क्षेत्र में मैक्सएंट द्वारा किए गए एक सर्वे में भूरे भालुओं के रहने की जगहों और उनके अनुकूल आवासों की मैपिंग की गई। यह रिपोर्ट मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा पहली बार 9 जनवरी 2026 को प्रकाशित हुई थी, और इसकी गंभीरता को देखते हुये, अभी हाल में स्नेहा महले ने इसे कुछ दिन पहले प्रकाशित किया था। इसमें पश्चिमी लद्दाख की घाटियां, जैसे द्रास, सुरु, शरगोल और ज़ंस्कार, इन भालुओं के लिए सबसे उपयुक्त आवास के रूप में सामने आई हैं, क्योंकि यहां इन्हें पर्याप्त वनस्पति, पानी और मध्यम ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाके मिल जाते हैं। हालाँकि, भालुओं के सबसे बेहतरीन आवास ‘संरक्षित क्षेत्रों’ से बाहर स्थित हैं और उन क्षेत्रों में आते हैं, जहां मानव अपनी सुविधा के लिए बुनियादी ढांचे का विकास तेजी से कर रहा है। ऐसे में वन्यजीव गलियारों के संरक्षण की मांग जायज है। मानव गतिविधियों के कारण, जानवर यहां मौजूद तो हो सकते हैं, लेकिन नज़र नहीं आते हैं। इस सर्वे में मैक्सएंट ने भालू के आवासों को निर्धारित करने में, जलवायु संबंधी कारकों के मजबूत प्रभाव को उजागर किया है। इससे भविष्य के पर्यावरणीय बदलावों के बीच उन सुरक्षित ठिकानों की पहचान करने में मदद मिलेगी, जो भालुओं के जीवित रहने के लिए महत्वपूर्ण बने रहेंगे। चुंकि हिमालयी भूरे भालू मुख्यरूप से घाटी के चारागाहों पर निर्भर हैं। इसीलिए द्रास, सुरु और ज़ंस्कार जैसी घाटियों में भालुओं के पाए जाने की संभावना सबसे अधिक पाई गई। ये घाटियां इन्हें मौसमी वनस्पति, छोटे स्तनधारी जीव (जैसे मारमॉट) और पानी का नियमित स्रोत उपलब्ध कराती हैं। इस दुर्गम और संसाधनों की कमी वाले वातावरण में ये चीजें, भालुओं के जीवित रहने के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इस सर्वे में, भालुओं की आबादी के फैलाव पर ज़मीन की बनावट का भी गहरा असर देखा गया। ये भालू समुद्र तल से 3,000 से 4,500 मीटर की ऊंचाई वाले, मध्यम ऊबड़-खाबड़ इलाकों को पसंद करते हैं। ऐसी मध्यम ऊंचाई वाली जगहें भालुओं को मांद बनाने, भोजन तलाशने और इंसानी बस्तियों से दूर रहने के लिए आदर्श वातावरण प्रदान करती हैं। खासतौर पर मादा भालुओं के लिए, जिनके शावक साथ होते हैं, ये ऊबड़-खाबड़ ढलान और दुर्गम रास्ते बहुत महत्वपूर्ण हैं। सर्दियों में, ये जगहें शीत- निद्रा के दौरान इन्हें सुरक्षित मांद के स्थान उपलब्ध कराती हैं। क्यों कि इन इलाकों में इंसानी हस्तक्षेप न के बराबर हैं, और आमतौर पर सड़कें कम हैं, यातायात भी कम है। इंसानी गतिविधियों में थोड़ी सी भी बढ़ोतरी इन आवासों की उपयुक्तता को काफी कम कर देती है, जो इस बात की पुष्टि करता है कि यह प्रजाति मानवीय दखल के प्रति कितनी संवेदनशील है। आवास की उपयुक्तता में तापमान से जुड़े कारक भी महत्वपूर्ण हैं। जिन इलाकों में मौसमी तापमान में भारी बदलाव होता है, वो इलाके, भालुओं के लिए सबसे अनुकूल स्थिति पैदा करते हैं; क्योंकि तापमान में यही अंतर वनस्पतियों के विकास, शिकार (छोटे जीवों) की आवाजाही और मांद बनाने के लिए जरूरी माहौल बनाते हैं। भालू ऐसे क्षेत्रों में भी रहना पसंद करते हैं जहां दैनिक तापमान में उतार- चढ़ाव कम हो, यानि सूक्ष्म जलवायु की स्थिरता, इन्हें ऊंचाई वाले वातावरण में भोजन खोजने और सुरक्षित मांद में रहने के बीच संतुलन बनाने में मदद करती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, तापमान में बदलाव, भालुओं के आवासों को गहराई से प्रभावित करता है। जलवायु गर्म होने के साथ, तापमान पर निर्भर रहने वाली ये अनुकूल स्थितियां धीरे-धीरे और ऊंचे इलाकों की तरफ खिसक सकती हैं, जिससे भालुओं के लिए उपलब्ध जगहें और भी सीमित और बिखरी हुई हो जाएंगी। यह भी उभर कर आया कि इनके बसावट और संरक्षण में,
स्थानीय समुदायों को साथ लेकर चलना भी जरूरी है। पश्चिमी लद्दाख इस प्रजाति का तो मुख्य गढ़ है, पर नुब्रा घाटी में भी भालुओं की मौजूदगी देखी गई है। लेकिन अध्ययन से संकेत मिलता है कि विभिन्न समूहों के बीच आपस में जुड़ाव पहले ही कमजोर हो चुका है, जिससे भविष्य में इनके और अधिक अलग-थलग पड़ने का खतरा बढ़ गया है। अतः द्रास, सुरु, शरगोल और ज़ंस्कार जैसी प्रमुख घाटी प्रणालियों का संरक्षण होनी चाहिए। मौजूदा समय में, ये क्षेत्र भालुओं के लिए सबसे उच्च- गुणवत्ता वाला आवास हैं, लेकिन ये काफी हद तक संरक्षित क्षेत्रों से बाहर स्थित हैं। इन इलाकों पर सड़कों के विस्तार, सैन्य निर्माण, खनन और अनियंत्रित पर्यटन का दबाव लगातार बढ़ रहा है। आवासों का यह विखंडन भूरे भालुओं के लिए भोजन की उपलब्धता और सुरक्षित मांद तक पहुंच को बाधित कर सकता है, क्योंकि इन भालूओं को जीवित रहने के लिए बड़े भू-भाग की जरूरत होती है और ये भोजन की तलाश में घाटियों में दूर-दूर तक घूमते हैं। इसके अलावा स्थानीय समुदायों को साथ लेकर चलना भी उतना ही जरूरी है। लद्दाख के पशुपालकों को अक्सर पालतू जानवरों के शिकार का नुकसान उठाना पड़ता है और क्षेत्र में बढ़ते मानव-भालू संघर्ष ने संरक्षण की चुनौतियों को और बढ़ा दिया हैं। लेकिन भालू-रोधी बाड़े बनाना, बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए सख्त नियम बनाना, कचरा प्रबंधन में सुधार करना, चराई को नियंत्रित करना और सोच-समझकर बनाई गई इको-टूरिज्म नीतियां, संघर्ष को कम करने के साथ-साथ भालुओं के आवासों को बचाने में मददगार साबित हो सकती हैं। भालुओं की आबादी के सटीक अनुमान और घाटियों के बीच उनके आवासों के आपसी जुड़ाव की जानकारी की भी आवश्यकता है, जिसमें संभावित गलियारों की पहचान करना भी शामिल है। भविष्य में लंबे समय तक निगरानी, आनुवंशिक अध्ययन और जलवायु को ध्यान में रखकर किए गए मॉडलिंग के जरिए इन कमियों को दूर करना, ट्रांस-हिमालय में हिमालयी भूरे भालुओं के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सबसे जरूरी कदम होगा।

कल अमेरिका में राष्ट्रीय कौगर दिवस (National Couger Day) मनाया गया जो प्रतिवर्ष 12 जून को मनाया जाता है। यह दिन उत्तरी अ...
13/06/2026

कल अमेरिका में राष्ट्रीय कौगर दिवस (National Couger Day) मनाया गया जो प्रतिवर्ष 12 जून को मनाया जाता है। यह दिन उत्तरी अमेरिका की सबसे अनुकूलनीय जंगली बिल्लियों में से एक कौगर के संरक्षण का समर्थन करता है और एक प्रमुख प्रजाति के रूप में इनकी भूमिका को उजागर करता है, साथ ही लोगों को भय और लोककथाओं के तथ्यों से परे हट कर सोचने हेतु प्रोत्साहित करता है। संप्रति कौगर का वहां की परिस्थिकी तंत्र में वही स्थान है जो हमारे यहां बिल्ली प्रजाति की शीर्ष शिकारियों की है। तभी तो यह दिन, पशु की पारिस्थितिक भूमिका की समझ को बढ़ावा देता है और मनुष्यों और बड़ी बिल्लियों के बीच शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को प्रोत्साहित करता है। इतिहास की बात करें तो, राष्ट्रीय कौगर दिवस की शुरुआत लगभग 2019 में कौगर संरक्षण के लिए एक विशेष दिवस के रूप में हुई, जिसे वन्यजीव संगठनों ने बढ़ावा दिया था जो लंबे समय से इन जानवरों के प्रति जनता की सोच को बदलने के लिए काम कर रहे थे। इसकी नींव काफी हद तक द कौगर फंड जैसे समूहों द्वारा रखी गई थी, जिसकी स्थापना 2001 में लेखिका कारा ब्लेसली लोवे और प्रशंसित वन्यजीव फोटोग्राफर थॉमस डी. मैंगेलसन ने की थी। इस संस्था की शुरुआत एक असाधारण शीतकाल के दौरान हुई। 1999 में, लोवे और मैंगेलसन ने जैक्सन, व्योमिंग के पास राष्ट्रीय एल्क अभयारण्य में एक मादा कौगर और उसके तीन शावकों को देखा। यह खबर फैल गई और अनुमानतः 10,000 से 15,000 लोग उस मौसम में इस परिवार को देखने की उम्मीद में उस क्षेत्र में पहुंचे। इस अनुभव ने कौगर के प्रति जनता के आकर्षण और उनके दुर्लभ रूप से देखे जाने की बात को रेखांकित किया और इसने संस्था के संस्थापकों को इस जानवर के संरक्षण के लिए खुद को समर्पित करने के लिए प्रेरित किया। तब से, संयुक्त राज्य अमेरिका भर में अभयारण्यों, संरक्षित क्षेत्रों और संरक्षण संस्थाओं द्वारा राष्ट्रीय कौगर दिवस को हर जून में एक एकजुटता के प्रतीक के रूप में अपनाया गया है। कौगर के नाम अंग्रेजी में सबसे अधिक नामों वाले जानवर होने का गिनीज रिकॉर्ड है, जिसके 40 से अधिक नाम उपयोग में हैं, जिनमें प्यूमा, माउंटेन लायन, पैंथर और कैटामोंट शामिल हैं। कौगर अमेरिका में सबसे व्यापक रूप से पाई जाने वाली जंगली बिल्ली है, जो कनाडा के युकोन से लेकर दक्षिण में पैटागोनिया के दक्षिणी एंडीज तक पाई जाती है। कौगर संवेदनशील प्राणी होते हैं जो चंचल, भावुक, बुद्धिमान और जिज्ञासु होते हैं, जो पुमा उत्तरी कनाडा से लेकर दक्षिणी एंडीज तक, पूरे अमेरिका में जंगलों, पहाड़ों और रेगिस्तानों में पाए जाते हैं। नर कौगर का वजन 53 से 72 किलोग्राम के बीच होता है और इनकी लंबाई नाक से पूंछ तक लगभग 2.4 मीटर होती है। हालांकि, इनका आकार इनके निवास स्थान पर निर्भर करता है, क्योंकि भूमध्य रेखा के निकट रहने वाले कौगर आमतौर पर उत्तर या दक्षिण में रहने वालों की तुलना में छोटे होते हैं। कौगर आमतौर पर हिरण, बारहसिंगा, बकरी और भेड़ जैसे बड़े स्तनधारियों को खाते हैं, हालांकि वे खरगोश और कृंतक जैसे छोटे शिकार भी खाते हैं। कौगर बेहतरीन जम्पर होते हैं और लगभग 5.5 मीटर लंबवत और लगभग 13 मीटर क्षैतिज रूप से छलांग लगा सकते हैं, जिससे यह ग्रह पर सबसे फुर्तीली बिल्लियों में से एक बन जाते हैं। अपने विशाल आकार के बावजूद, कौगर दहाड़ नहीं सकते। ये गुर्राते हैं, फुफकारते हैं और एक भयानक चीख निकालते हैं, जिससे लोग भय से डर जाते हैं। एक प्रमुख प्रजाति के रूप में, कौगर सैकड़ों अन्य प्रजातियों के साथ परस्पर क्रिया करता है, और शोध ने इसे शिकार, मृतजीव भोजन और प्रतिस्पर्धा के माध्यम से उनमें से लगभग 485 प्रजातियों से जोड़ा है। जिन शाकाहारी जानवरों का ये शिकार करते हैं, उनकी आंतों में पाए जाने वाले बीजों को फैलाकर, कौगर अप्रत्यक्ष रूप से विशाल भूभागों में वनस्पति जीवन के पुनर्जनन में मदद करते हैं। शीर्ष शिकारी होने के नाते, ये हिरण और बारहसिंगा की आबादी को नियंत्रण में रखते हैं, जिससे अत्यधिक चराई को रोका जा सकता है जो पर्यावासों को नष्ट करती है और अन्य प्रजातियों को भूखा मार देती है। जिन क्षेत्रों से कौगर गायब हो गए हैं, वहां शोधकर्ताओं ने ऐसे परिदृश्य देखे हैं जो शाकाहारी जानवरों से भर गए हैं और जहां से युवा पेड़ और झाड़ियाँ पूरी तरह से नष्ट हो गई हैं। आज अमेरिका में अनुमानित 20,000 से 30,000 पहाड़ी शेर बचे हैं, जो मुख्य रूप से 15 पश्चिमी राज्यों तक ही सीमित हैं, जबकि आनुवंशिक रूप से अलग-थलग फ्लोरिडा पैंथर पूर्वी राज्यों में किसी तरह जीवित है। कौगर कभी पश्चिमी गोलार्ध में सबसे व्यापक रूप से पाया जाने वाला स्थलीय स्तनपायी था, लेकिन बीसवीं शताब्दी के आरंभ में इनाम के लिए शिकार और निरंतर उत्पीड़न ने इसे देश के अधिकांश हिस्सों से विलुप्त कर दिया। यह दिवस भय फैलाने के बजाय शिक्षा के माध्यम से इस गिरावट को रोकने के व्यापक प्रयास को दर्शाता है। आज कौगर संकट में है, शिकारियों द्वारा इनको खाल के लिए, मार डाला जाता है। यह एक ऐसी प्रथा है जो पशु कल्याण को नुकसान पहुंचाती है, जैव विविधता को खतरे में डालती है और संरक्षण और सतत विकास प्रयासों को कमजोर करती है। ये मानव-वन्यजीव संघर्ष और पालतू जानवरों पर हमला करने पर प्रतिशोधात्मक हत्याओं के भी शिकार होते हैं। कौगरों को लाभ के लिए पकड़ा और पाला जाता है। इनका उपयोग पर्यटन स्थलों में किया जाता है और वन्यजीव केंद्रों और सड़क किनारे के चिड़ियाघरों में इन्हें क्रूर परिस्थितियों में रखा जाता है। जलवायु परिवर्तन यानि तापमान में बदलाव और सूखे के कारण इनके लिए, शिकार की उपलब्धता प्रभावित हो रही है, जिससे कौगर को भोजन की तलाश में दूर-दूर तक यात्रा करनी पड़ रही है और ये मनुष्यों के साथ निकट संपर्क (और संघर्ष) में आ रहे हैं। अधिक बार लगने वाली जंगल की आग भी कौगर के आवास को नष्ट कर रही है। दक्षिण अमेरिका में, फैक्ट्री फार्मिंग के लिए जमीन साफ ​​करने के लिए आग का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे कौगर के आवास और जीवन को खतरा होता है। साथ ही इसे होने वाले अन्य खतरों यथा आवास का नुकसान, वाहनों से टक्कर और प्रति- शोधात्मक हत्याएं आदि के कारण इनकी संख्या तेजी से घटी है। अतः इस दिवस के माध्यम से इनके संरक्षण हेतु जागरूकता फैलाना अति महत्वपूर्ण कार्य है। आप भी यह कर सकते हैं। इस दिन को मनाने हेतु कुछ व्यावहारिक तरीके निम्न हैं। कौगर के जीव विज्ञान, व्यवहार और क्षेत्र के बारे में पढ़ने में समय बिताएं। किसी संरक्षण संस्था का समर्थन करें व द कौगर फंड या माउंटेन लायन फाउंडेशन जैसी संस्थाओं को दान दें या उनके साथ स्वयंसेवा करें, ये दोनों संस्थाएं कौगर की आबादी और उनके आवास की रक्षा के लिए काम करती हैं। किसी वन्यजीव अभयारण्य या का दौरा करें और कौगरों को देखें। और हैशटैग का उपयोग करके, ऑनलाइन सटीक जानकारी, यथा कोई तथ्य, फोटो या लेख पोस्ट साझा करें। प्रचार कीजिये, अपने दोस्तों, परिवार और फॉलोअर्स के साथ इस दिन को साझा करके कौगरों का ध्यान रखने में मदद करें। जितने अधिक लोग इन बिल्लियों को समझेंगे, उनका भविष्य उतना ही सुरक्षित होगा। उन गलत धारणाओं को विनम्रतापूर्वक दूर करें जो कौगर को शर्मीली, एकांतप्रिय बिल्लियों के बजाय खून के प्यासे शिकारी के रूप में चित्रित करती हैं। जंगली स्थानों में पैदल यात्रा पर निकलें और जिम्मेदारी से सह-अस्तित्व के सिद्धांतों को सीखें। इन बड़ी बिल्लियों पर सबके साथ एक वृत्तचित्र देखें। यह मित्रों और परिवार को इस विषय से अवगत कराने का एक आसान तरीका है। वन्यजीव गलियारों का समर्थन करें, सुरक्षित पारगमन और जुड़े हुए पर्यावास के समर्थन में स्थानीय प्रतिनिधियों को पत्र लिखें। इन सभी में बच्चों को शामिल करें, जिससे अगली पीढ़ी जीव रक्षा हेतु तैयार हो सके।

कल विश्व भूगर्भ जल दिवस था, जो हर वर्ष 10 जून को  मनाया जाता है। इस दिन लोगों को इस अदृश्य संसाधन के महत्व, आवश्यकता और ...
11/06/2026

कल विश्व भूगर्भ जल दिवस था, जो हर वर्ष 10 जून को मनाया जाता है। इस दिन लोगों को इस अदृश्य संसाधन के महत्व, आवश्यकता और संरक्षण के प्रति जागरूक किया जाता है, क्यों कि भूगर्भ जल केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। करोड़ों लोगों के लिए पीने योग्य जल का मुख्य साधन यही है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में सिंचाई का बड़ा हिस्सा भी भूगर्भ जल पर निर्भर है, लेकिन विडंबना यह है कि जिस संसाधन पर हमारा वर्तमान टिका है, उसके भविष्य को लेकर हम सबसे अधिक असंवेदनशील दिखाई देते हैं। अनियोजित औद्योगीकरण, बढ़ता प्रदूषण, अंधाधुंध शहरीकरण, नदियों के जलस्तर में गिरावट, पर्यावरणीय असंतुलन और प्राकृतिक संसाधनों के लगातार दोहन ने भूगर्भ जल के भंडार को तेजी से घटाया है। जरा कल्पना कीजिए कि एक सुबह, जब आप नल खोलें और उसमें से पानी की एक बूंद भी न निकले और फिर आपको पता चले कि छत पर लगी टंकी में नहीं, आपके बोरवेल में ही पानी खत्म हो गया है। इसे वैज्ञानिक भाषा में "डे जीरो" कहते हैं। यह दिन उस वास्तविकता की आहट है जिसकी तरफ हम तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। इस पर फिर कभी पोस्ट करूंगा। विश्व भू गर्भ जल दिवस हमें सिखाता है कि, पानी को संसाधन नहीं, विरासत माने और इसका उपयोग जिम्मेदारी की तरह करें। भूजल (भूमिगत) जल वह जल है जो भूमि की सतह के नीचे संतृप्त क्षेत्रों में मौजूद होता है। संतृप्त क्षेत्र की ऊपरी सतह को जलस्तर कहा जाता है। भूजल से भूमिगत नदियाँ नहीं बनतीं हैं। यह रेत, बजरी और अन्य चट्टानों जैसी भूमिगत सामग्रियों में मौजूद छिद्रों और दरारों को भरता है, ठीक उसी तरह जैसे पानी स्पंज को भरता है। यदि भूजल चट्टानों से प्राकृतिक रूप से बहता है या पंप द्वारा (उपयोगी मात्रा में) निकाला जा सकता है, तो इन चट्टानों को जलभंडार कहा जाता है। भूमिगत जल का प्रवाह धीमा होता है, आमतौर पर जलभंडार में यह 7-60 सेंटीमीटर (3-25 इंच) प्रति दिन की दर से बढ़ता है। परिणामस्वरूप, जलभंडार में पानी सैकड़ों या हजारों वर्षों तक रह सकता है। धरती के गर्भ में सदियों से संचित यह अमूल्य जल, जिसने मानव सभ्यता को जीवन दिया, आज हमारे अनियंत्रित दोहन और लापरवाह विकास की कीमत चुका रहा है। जल संकट के दुष्परिणाम हमारे आसपास अब दिखाई देने लगे हैं। जल बंटवारे को लेकर विभिन्न राज्यों के बीच विवाद बढ़ रहे हैं। कई पड़ोसी देशों के संबंधों में भी पानी एक संवेदनशील मुद्दा बन चुका है। आशंका यह भी जताई जा रही है कि अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए हो सकता है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या केवल सरकारी योजनाएं और औपचारिक आयोजन इस संकट का समाधान कर पाएंगे? शायद नहीं। यही कारण है कि पूरा विश्व 10 जून को विश्व भूगर्भ जल दिवस मनाकर लोगों को इस अदृश्य संसाधन के महत्व, आवश्यकता और संरक्षण के प्रति जागरूक करता है। आज जल संरक्षण को व्यक्तिगत जिम्मेदारी और सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बनाये जाने की आवश्यकता है। वर्षा जल संचयन को अपनाना, पानी के अनावश्यक उपयोग को रोकना, पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण करना और स्थानीय स्तर पर जल प्रबंधन की पहल करना, समय की मांग है। हमारे पूर्वज प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने की कला जानते थे। भारत के गांवों और कस्बों में कभी तालाब, कुएं, बावड़ियां और जोहड़ केवल जल स्रोत नहीं थे, बल्कि सामुदायिक जीवन का अभिन्न हिस्सा थे। आज यह जरूरी है कि आधुनिक तकनीक के साथ-साथ जल संरक्षण के इस पारंपरिक ज्ञान को भी पुनर्जीवित किया जाए। गांधी जी ने कहा था कि धरती हर व्यक्ति की आवश्यकता की पूर्ति कर सकती है, लेकिन किसी एक के भी लोभ की नहीं। यह कथन आज अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। यदि हम अपने स्वार्थ और सुविधा के लिए प्रकृति का अंधाधुंध दोहन करते रहेंगे तो आने वाली पीढ़ियों के लिए संकट और गहरा होगा। पर, आज के समय में बोतलबंद और पैकेटबंद पानी हमारी आधुनिक जीवनशैली के प्रतीक बन गये हैं। यह केवल बाजार का विस्तार नहीं, बल्कि हमारे जल संसाधनों के प्रति बढ़ती लापरवाही का भी संकेत है। ध्यान देने वाली बात यह है कि हम अपनी मूलभूत आवश्यकता को धीरे-धीरे बाजारवाद और पूंजीपतियों के हवाले कर रहे हैं। दरअसल, विश्व भूगर्भ जल दिवस आत्ममंथन का अवसर है कि हम विकास और संरक्षण के बीच संतुलन कैसे स्थापित करें। यह संकल्प लेने का दिन है कि हम पानी का उपयोग जिम्मेदारी की तरह करेंगे, क्योंकि जब धरती के गर्भ में जल की अंतिम बूंद समाप्त हो जाएगी, तब हमारे पास पछताने के अलावा और कुछ नहीं होगा। इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम जागें, समझें और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए इस अमूल्य धरोहर को बचाने में अपना योगदान दें।

आज विश्व भू गर्भ जल दिवस है पर इस पर बात न करते हुये मैं कल की पोस्ट को ही आगे बढ़ा रहा हूँ, अतः आज 30x30 पर ही बात करेंग...
10/06/2026

आज विश्व भू गर्भ जल दिवस है पर इस पर बात न करते हुये मैं कल की पोस्ट को ही आगे बढ़ा रहा हूँ, अतः आज 30x30 पर ही बात करेंगे जो कि एक वैश्विक आह्वान है जिसके तहत 2030 तक कम से कम 30% भूमि, जल और महासागर का संरक्षण करना आवश्यक है, जिसे बाद में एक राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में अपनाया गया है, लेकिन इसका अंतिम लक्ष्य 2050 तक 50 प्रतिशत की रक्षा करना है। इसलिए, 30×30 अंतिम लक्ष्य की ओर एक मार्गदर्शक की तरह है। 2050 तक पृथ्वी के पचास प्रतिशत हिस्से की रक्षा करना कुछ लोगों को चुनौतीपूर्ण लग सकता है, लेकिन यदि हम 30×30 के लक्ष्य को प्राप्त कर लेते हैं, तो हम लगभग वहाँ पहुँच चुके होंगे। यानि बाद में हम 50x50 की तरफ ही बढ़ेगे। 30×30 के लिए, 30 प्रतिशत का लक्ष्य स्वच्छ वायु और पेयजल, कार्बन पृथक्करण और जैव विविधता सहित महत्वपूर्ण पर्यावरणीय कार्यों को बनाए रखने के लिए आवश्यक न्यूनतम संरक्षण है। यह पहल ऐसे संरक्षण उपायों की मांग करती है जो पर्याप्त रूप से वित्तपोषित हों और उन विविध क्षेत्रों को कवर करें जिन्हें सबसे अधिक आवश्यकता है। इस पहल का उद्देश्य उन क्षेत्रों को सुरक्षा प्रदान करना है जो विविध पारिस्थितिक तंत्रों के सर्वोत्तम संरक्षण के लिए उपयुक्त हों और जिन्हें भविष्य में वित्तीय सहायता भी मिले। यह वास्तव में स्वदेशी लोगों और स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर काम करते हुए, समुदाय-नेतृत्व वाले संरक्षण समाधानों पर बल देती है। इसमें आज हम महासागर के संरक्षण की बात कर रहे हैं जो कि इसका सबसे बड़ा लक्ष्य है.. इसे पाने के लिए 5 बड़े कार्य आवश्यक हैं..
1. वैश्विक 30×30 समुद्री लक्ष्य को पूरा करने में मदद करने के लिए, राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीतियों और कार्य योजनाओं (एनबीएसएपी) में महत्वाकांक्षी और प्रभावी समुद्री जैव विविधता संरक्षण लक्ष्यों और कार्यों को शामिल करें।
2. स्वदेशी लोगों और स्थानीय समुदायों के नेतृत्व वाली पहलों के साथ मिलकर, महासागर में 30×30 का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए, उच्च पारिस्थितिक अखंडता वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता देते हुए, नए समुद्री संरक्षित क्षेत्रों और अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपायों (ओईसीएम) की स्थापना के पैमाने और गति को तत्काल बढ़ाएं।
3. जैव विविधता पर राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से परे (बीबीएनजे) सीओपी1 में पक्षों की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए उच्च सागर संधि के वैश्विक अनुसमर्थन (अभिग्रहण) में तेजी लाएं, और अन्य क्षेत्रीय समझौतों के तहत पहले से ही प्रस्तावित स्थलों सहित, 2030 तक सभी उच्च सागर एमपीए उम्मीदवार स्थलों के पदनाम और प्रभावी कार्यान्वयन का समर्थन करें।
4. नए और मौजूदा संरक्षित क्षेत्रों के प्रभावी प्रबंधन और अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपायों में सुधार करें, यह सुनिश्चित करते हुए कि राष्ट्रीय जलक्षेत्र और खुले समुद्र दोनों में तल पर मछली पकड़ने जैसी हानिकारक और विनाशकारी गतिविधियों को रोका जाए।
5. यह सुनिश्चित किया जाए कि समुद्री संरक्षण और संवर्धन के लिए पर्याप्त और टिकाऊ वित्तपोषण को सभी दाता देशों, बहुपक्षीय संस्थानों और अन्य वित्तीय भागीदारों द्वारा शामिल किया जाए, जब वे 2030 तक सालाना 30 अरब डॉलर का योगदान देने, 2030 तक सालाना 200 अरब डॉलर जुटाने और स्वदेशी लोगों और स्थानीय समुदायों के लिए समावेशी वित्तपोषण तक सीधी पहुंच सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धताओं को पूरा कर रहे हों।
सुरक्षा उपायों को लागू करने के लिए जिन कारकों पर विचार किया जाता है उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:
1. लुप्तप्राय प्रजातियाँ और पारिस्थितिकी तंत्र
2. दुर्लभ प्रजातियाँ और पारिस्थितिकी तंत्र
3. प्रतिनिधित्वशीलता (पृथ्वी पर प्रत्येक जीवित प्राणी के उदाहरण)
4. मछली प्रजनन स्थलों जैसे अद्वितीय समूह
5. अक्षुण्ण वन्य क्षेत्र
इस हेतु कई देशों ने 'एक्वेरियम' भी बनाये हुये हैं। संप्रति
एक्वेरियम, कई संगठनों से मिलकर बने एक कार्य समूह का हिस्सा है, जिसमें कई चिड़ियाघर, विज्ञान संस्थान, संग्रहालय, गैर सरकारी संगठन, कंपनियां और नागरिक शामिल हैं, जो सभी मिलकर अपने सामूहिक ज्ञान को साझा करने और व्यापक समुदाय के लिए ऐसे उपकरण और संसाधन बनाने के लिए सहयोगात्मक रूप से काम कर रहे हैं जिससे 30×30 दिशानिर्देशों का पालन करके ग्रह की रक्षा की जा सके। ये एक्वेरियम उस क्षेत्र की जैव विविधता के संरक्षण में मदद कर रहे हैं। इसके अलावा, वैज्ञानिक विभिन्न स्थानों पर और विभिन्न प्रजातियों पर व्यापक शोध कर रहे हैं, जिससे अंततः महत्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्रों, प्रजनन स्थलों या समुद्री जीवों की पहचान करने और उनके संरक्षण संबंधी कार्यों को दिशा देने में मदद मिल सकती है। इसमें जनता अपने समुदायों में हो रही गतिविधियों, संरक्षण के लिए विचाराधीन क्षेत्रों और स्थानों के बारे में जानकारी प्राप्त करके और अपनी सुविधानुसार समर्थन देकर इसमें योगदान दे सकती है। लोग कानून बनाने में सहयोग कर सकते हैं, इन संरक्षित स्थानों की वकालत करने वाले संगठनों से जुड़ सकते हैं, अपने प्रतिनिधि को वोट दे सकते हैं या पत्र लिख सकते हैं और अपने मित्रों और परिवार के साथ जानकारी साझा कर सकते हैं। इसके लिए, सबसे पहले, 30×30 के बारे में और इसके उद्देश्यों के बारे में जानकारी प्राप्त करना सहायक होता है। उदाहरण के लिए, कई लोगों को शायद यह पता न हो कि समुद्री संरक्षित क्षेत्र क्या होता है या समुद्री अभयारण्य क्या होता है और इनकी स्थापना कैसे होती है। इन चीजों के महत्व को समझना एक महत्वपूर्ण पहला कदम है। आप सभी को इन शब्दों के बारे में पता होना चाहिए:
समुद्री संरक्षित क्षेत्र (एमपीए): समुद्र, महासागर, नदी के मुहाने या ग्रेट लेक्स के वे हिस्से जहाँ मानवीय गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाए गए हैं। संरक्षित क्षेत्र के प्रकार और स्थान के आधार पर, विभिन्न संगठन या सरकारें संरक्षण नियमों को लागू करने के लिए जिम्मेदार होती हैं। कई एमपीए लोगों को ऐसे तरीकों से उस स्थान का उपयोग करने की अनुमति देते हैं जिनसे पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे। उदाहरार्थ न्यू इंग्लैंड एक्वेरियम में, उच्च संरक्षित एमपीए (एचएमपीए) का ही समर्थन किया जाता है, जिसका अर्थ है कि केवल तैराकी, कयाकिंग और स्कूबा डाइविंग जैसी गैर-हानिकारक गतिविधियाँ ही अनुमत हैं, जबकि मछली पकड़ना, निर्माण कार्य और खुदाई जैसी गतिविधियाँ निषिद्ध हैं। एचएमपीए समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों के संरक्षण और पुनर्स्थापन में सहायक होते हैं और जैव विविधता के संरक्षण के लिए एक व्यावहारिक विकल्प हैं। न्यू इंग्लैंड एक्वेरियम लगभग 5,000 वर्ग मील में फैला अभयारण्य केप कॉड से 130 मील दक्षिण-पूर्व में स्थित है। यह एक हजार से अधिक समुद्री जीवों की प्रजातियों वाले जीवंत गहरे समुद्र के पारिस्थितिक तंत्र का घर है, जिनमें दुर्लभ व्हेल, डॉल्फ़िन के विशाल समूह, लुप्तप्राय समुद्री पक्षी, कछुए और हजारों साल पुराने 70 अत्यंत संकटग्रस्त प्रवाल प्रजातियां शामिल हैं। इसी प्रकार स्टेलवागेन बैंक राष्ट्रीय समुद्री अभयारण्य, 842 वर्ग मील (682 वर्ग समुद्री मील) का एक संरक्षित समुद्री क्षेत्र है। अभयारण्य का पश्चिमी किनारा बोस्टन से लगभग 21 मील दूर है। इस क्षेत्र में उपजाऊ, पोषक तत्वों से भरपूर जल है जहाँ कई समुद्री स्तनधारी प्रजातियाँ भोजन के लिए आती हैं। इसे "व्हेल देखने का एक प्रमुख स्थान" बताया गया है। अंत में नवीनतम आंकड़ों और विश्लेषणों के आधार पर तैयार की गई 30x30 कार्य योजना, सरकारों और हितधारकों के लिए एक आह्वान है कि वे अपने प्रयासों को एकजुट करें, संरक्षण को बढ़ाएं और जलवायु परिवर्तन से निपटने, खाद्य सुरक्षा और सामुदायिक आजीविका के लिए महत्वपूर्ण समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समझौतों द्वारा प्रस्तुत अवसरों का लाभ उठाएं। यह कार्य योजना उन लोगों की अंतर्दृष्टि को संक्षेप में प्रस्तुत करती है जो पहले से ही हमारे नीले ग्रह की रक्षा के लिए जल क्षेत्र में कार्रवाई कर रहे हैं। इसकी रिपोर्ट वर्तमान संरक्षण का स्पष्ट मूल्यांकन प्रस्तुत करती है, प्रगति में तेजी लाने के प्रमुख अवसरों की पहचान करती है और राजनीतिक इच्छाशक्ति को बढ़ावा देने, वित्त जुटाने और समुदायों और संस्थानों को सशक्त बनाने के लिए रणनीतिक कार्यों की रूपरेखा तैयार करती है। हमारे पास इसे सही करने के लिए चार साल हैं। कार्य योजना का उद्देश्य इसे साकार करने के लिए गति प्रदान करना है। अब तत्काल समुद्री कार्रवाई का समय है। क्यों कि जून 2025 तक, महासागर का केवल 8.6% भाग समुद्री संरक्षित क्षेत्रों (एमपीए) के रूप में नामित है, और केवल 2.7% भाग पूर्णतः या उच्च स्तर पर संरक्षित है।
निर्माणाधीन समुद्री संरक्षित क्षेत्रों (एमपीए) से 4% की वृद्धि हो सकती है, जो अभी भी 30x30 के लक्ष्य से कम है। खुले समुद्र विश्व के महासागर का 61% भाग बनाते हैं, लेकिन वे अभी भी असुरक्षित हैं। यदि इन्हें साकार किया जाता है, तो वर्तमान में विचाराधीन खुले समुद्र क्षेत्र वर्तमान महासागर संरक्षण में लगभग 2.2% की वृद्धि कर सकते हैं। ईईजेड महासागर का लगभग 39% भाग बनाते हैं, फिर भी केवल 12 देशों ने अपने क्षेत्रों के 30% या उससे अधिक भाग को संरक्षित किया है। यदि 30 सबसे बड़े ईईजेड धारक देश अपने जलक्षेत्र के 30% भाग को संरक्षित कर लें, तो इससे वैश्विक महासागर क्षेत्र में 4.4% की और वृद्धि हो सकती है। पर तत्काल और समन्वित कार्रवाई के बिना, दुनिया 30x30 महासागर संरक्षण लक्ष्य को पूरा करने की राह पर नहीं है। पूर्व में जारी एक रिपोर्ट - "महासागर संरक्षण अंतर: 30x30 लक्ष्य की ओर प्रगति का आकलन" - में यह खुलासा हुआ है कि वर्तमान में महासागर संरक्षण प्रयासों पर प्रति वर्ष केवल 1.2 अरब डॉलर ही खर्च किए जा रहे हैं - जो 30x30 लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आवश्यक 15.8 अरब डॉलर का एक छोटा सा हिस्सा है। रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि महासागर के 30% हिस्से की रक्षा करने से केवल तीन प्रमुख लाभों से ही 2050 तक प्रति वर्ष लगभग 85 अरब डॉलर की बचत हो सकती है, जिसमें लागत में कमी और वार्षिक प्रतिफल शामिल हैं: प्राकृतिक तटीय सुरक्षा का संरक्षण, समुद्री घास के नुकसान से कार्बन उत्सर्जन को रोकना और अत्यधिक दोहन वाली मत्स्य पालन को बहाल करना। विश्व आर्थिक मंच के महासागर विभाग के प्रमुख अल्फ्रेडो गिरोन कहते हैं: “सरल शब्दों में कहें तो, प्रकृति और हमारे महासागर द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं के बिना हमारी अर्थव्यवस्थाएं और समाज कार्य नहीं कर सकते। इसलिए, व्यवसायों को अनुपालन से आगे बढ़कर सह-नेतृत्व की भूमिका निभानी होगी। नुकसान को कम करने से लेकर सकारात्मक प्रभाव को अधिकतम करने तक। ऊर्जा, बंदरगाह, जहाजरानी, ​​पर्यटन, प्रौद्योगिकी और समुद्री भोजन जैसे महासागरीय उद्योगों को केवल महासागर के उपयोगकर्ता नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके भविष्य के सबसे सक्रिय संरक्षकों में से एक होना चाहिए। यह महत्वपूर्ण है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारे महासागर की सुरक्षा के मामले में महासागरीय उद्योगों की भी भागीदारी हो। सहयोग के अवसरों को अधिकतम करके, हम अपने महासागर के लिए कहीं अधिक व्यापक और तीव्र गति से कार्य कर सकते हैं।”
कार्य योजना प्रासंगिक तंत्रों की समीक्षा करती है और संभावित विचाराधीन बड़े समुद्री संरक्षित क्षेत्रों (एमपीए) के एक समूह का मूल्यांकन करती है। यदि ये योजनाबद्ध एमपीए पूरी तरह से लागू हो जाते हैं, तो वैश्विक समुद्री संरक्षण में अतिरिक्त 4.0% की वृद्धि हो सकती है, जिससे कुल वैश्विक समुद्री संरक्षण 12.3% तक पहुंच जाएगा। यह अभी भी 2030 तक 30% के लक्ष्य को पूरा करने से बहुत कम है; कार्य योजना परिणामों में तेजी लाने के लिए एक सामूहिक आंदोलन बनाने का आह्वान करती है, और जैव विविधता बियॉन्ड नेशनल ज्यूरिस्डिक्शन (बीबीएनजे) समझौते को ऐसा करने के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में संदर्भित करती है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के पारिस्थितिकी तंत्र प्रभाग की निदेशक सुसान गार्डनर कहती हैं: “रिपोर्ट स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि हमें संरक्षण के दायरे को बढ़ाने के लिए तत्काल प्रयास करने की आवश्यकता है, जिसमें यह सुनिश्चित करना शामिल है कि संरक्षित क्षेत्रों का प्रभावी, समावेशी शासन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी के साथ अच्छी तरह से प्रबंधन किया जाए। क्षेत्रीय समुद्री सम्मेलन यहां महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे, जमीनी हकीकतों, क्षेत्रीय सहयोग और सीबीडी के वैश्विक जैव विविधता ढांचे और बीबीएनजे समझौते सहित वैश्विक ढांचों के बीच सेतु का काम करेंगे।” रिपोर्ट में प्रगति में बाधा डालने वाले प्रणालीगत अवरोधों की पहचान की गई है, जिनमें खंडित डेटा, राजनीतिक निष्क्रियता, स्वदेशी लोगों और स्थानीय समुदायों को शामिल न करना, वित्तपोषण, अपर्याप्त कार्यान्वयन और उपलब्ध विज्ञान और उपकरणों का प्रभावी उपयोग शामिल हैं। रिपोर्ट में प्रगति को गति देने के लिए दो-सूत्रीय कार्य योजना की रूपरेखा भी प्रस्तुत की गई है।
1. सफलता के लिए वैश्विक परिस्थितियाँ सक्षम करना: बीबीएनजे समझौते का अनुसमर्थन और संचालन करना, राष्ट्रीय रणनीतियों को वैश्विक प्रतिबद्धताओं के अनुरूप बनाना, दीर्घकालिक वित्तपोषण सुरक्षित करना और अंतर्राष्ट्रीय समन्वय, निगरानी और डेटा प्रणालियों को मजबूत करना।
2. प्रमुख भौगोलिक क्षेत्रों में संरक्षण को गति देना: देशों को राष्ट्रीय जलक्षेत्रों में संरक्षण का विस्तार करने, बीबीएनजे प्रावधानों के अनुरूप खुले समुद्रों में समुद्री संरक्षित क्षेत्रों (एमपीए) का विकास करने और समावेशी शासन, कानूनी मान्यता और संसाधन उपलब्ध कराकर आईपीएलसी को सशक्त बनाने में सहायता करना। हालांकि, यह सरकारी कार्रवाई से परे है; पर कार्य योजना यह भी बताती है कि अन्य लोग 2030 तक प्रभावी और न्यायसंगत समुद्री संरक्षण को लागू करने के लिए सरकारों का समर्थन और उन्हें और अधिक सक्षम बनाकर राष्ट्रीय प्रयासों में शामिल हो सकते हैं।

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