क्षत्रिय मौनस परिवार"महाराज कुश के वंशज"

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क्षत्रिय मौनस परिवार"महाराज कुश के वंशज" Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from क्षत्रिय मौनस परिवार"महाराज कुश के वंशज", Non-Governmental Organization (NGO), देवतायन, सुरभी नगर कॉलोनी, कंदवा, Varanasi.

“कछवाह वंश के मूल क्षत्रिय मौनस परिवार ने समाज के पिछड़े वर्गों को उनकी वास्तविक पहचान दिलाने और उन्हें एकजुट करने के लिए इस संस्था और विशाल संगठन की स्थापना की है। यह संगठन समाज में जागरूकता, सम्मान और एकता को बढ़ावा देने का कार्य कर रहा है।”

🏵️जय मौनस राजवंश🏵️🙏सादर जय श्रीराम एवं सप्रेम प्रणाम।🙏🌹 पूर्वजों की गौरवगाथा, समाज की अमूल्य धरोहर 🌹समस्त आदरणीय मौनस क्...
21/10/2026

🏵️जय मौनस राजवंश🏵️

🙏सादर जय श्रीराम एवं सप्रेम प्रणाम।🙏

🌹 पूर्वजों की गौरवगाथा, समाज की अमूल्य धरोहर 🌹

समस्त आदरणीय मौनस क्षत्रिय बंधुओं एवं इतिहास-प्रेमियों के लिए अत्यंत हर्ष और गौरव का विषय है कि आगामी प्रकाशित होने वाले ऐतिहासिक ग्रंथ ‘भदोही का मौनस राजवंश’ की पाण्डुलिपि पर एक सार्थक एवं आत्मीय विचार-गोष्ठी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक आदरणीय डॉ. संतोष कुमार सिंह जी के वाराणसी स्थित आवास पर संपन्न हुई।
इस अवसर पर अपना अमूल्य समय देकर प्रयागराज से महाराजा जोधराज सामाजिक कल्याण एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री वीरेंद्र बहादुर सिंह जी, व वाराणसी से डॉ. रामसुधार सिंह जी, डॉ. संतोष कुमार सिंह जी, श्री रोहित सिंह जी एवं अन्य आत्मीय स्वजनों ने ग्रंथ की ऐतिहासिक विषयवस्तु पर गहन विमर्श कर अपने बहुमूल्य सुझाव, मार्गदर्शन एवं शुभाशीष प्रदान किए।
यह ग्रंथ केवल इतिहास का संकलन नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों की स्मृतियों, संघर्षों, गौरवगाथाओं और भावी पीढ़ियों के लिए अपनी जड़ों से जुड़ने का एक विनम्र प्रयास है।

हमारा संकल्प है कि उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों के आलोक में इस धरोहर को यथासंभव प्रामाणिक, निष्पक्ष एवं शोधपरक स्वरूप प्रदान किया जाए तथा नए प्रमाणों के आधार पर इसका निरंतर परिमार्जन होता रहे।

इस पुनीत प्रयास में स्नेह, सहयोग और मार्गदर्शन प्रदान करने वाले सभी आदरणीय जनों के प्रति हृदय की गहराइयों से कोटिशः आभार एवं सादर कृतज्ञता।

आइए, हम सब मिलकर अपने अतीत की गौरवगाथा को संजोएँ और आने वाली पीढ़ियों तक अपनी ऐतिहासिक विरासत पहुँचाएँ।

🙏पूर्वजों का सम्मान, इतिहास का संरक्षण और समाज की एकता ही हमारा ध्येय है।🙏

विनीत एवं कृतज्ञ
रवीन्द्र कुमार सिंह
(मौनस परिवार, वाराणसी)
📞 8840709296

अगियाबीर कोट: संक्षिप्त ऐतिहासिक परिचय​भर आधिपत्य का अभेद्य केंद्र: १६वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भदोही क्षेत्र पर भर...
14/10/2026

अगियाबीर कोट: संक्षिप्त ऐतिहासिक परिचय

​भर आधिपत्य का अभेद्य केंद्र: १६वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भदोही क्षेत्र पर भर (भारशिव) शासकों का आधिपत्य था। गंगा के कछार में बीहड़ों से घिरा 'अगियाबीर कोट' उनका सबसे सुरक्षित, सुदृढ़ और दुर्भेद्य सामरिक दुर्ग था।
​राजा राम सिंह जी का अभियान व 'नौमठा' संकल्प: भदोही में धर्म-संस्थापन एवं अपनी संप्रभुता स्थापित करने हेतु मौनस वंश के संस्थापक राजा राम सिंह जी ने अगियाबीर पर चढ़ाई से पूर्व गिर्द बड़गांव में नौ देव-शक्तियों की स्थापना कर 'विजय संकल्प' लिया (जिसकी स्मृति में नौमठा मंदिर बना)।

​निर्णायक विजय व मौनस सत्ता का अभ्युदय: इस आध्यात्मिक संबल और मौनस वीरों के रण-कौशल के आगे अगियाबीर कोट की प्राचीरें ढह गईं। इस विजय के साथ ही भरों के शासन का अंत हुआ और भदोही में स्वतंत्र मौनस राजवंश की नींव पड़ी।

​पुरातात्विक साक्ष्य: वर्तमान में भदोही के द्वारिकापुर-अगियाबीर टीले पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) के पुरातत्व विभाग द्वारा किए गए उत्खनन में प्राचीन सभ्यताओं और रक्षा-अवशेषों के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, जो इसके ऐतिहासिक और सामरिक महत्व को प्रमाणित करते हैं।

​— आर० के० सिंह
(मौनस परिवार, वाराणसी)

सराय जगदीश छावनी एवं रेलवे स्टेशन: संक्षिप्त ऐतिहासिक परिचय​संस्थापक एवं पृष्ठभूमि: राजा सागर राय जी के संतोषी एवं प्रता...
13/10/2026

सराय जगदीश छावनी एवं रेलवे स्टेशन: संक्षिप्त ऐतिहासिक परिचय

​संस्थापक एवं पृष्ठभूमि: राजा सागर राय जी के संतोषी एवं प्रतापी पुत्र जगदीश राय जी (कोट बनकट) ने जंगीगंज के समीप अपनी ३२ मौजों की जागीर के राजस्व प्रबंधन और प्रशासनिक नियंत्रण हेतु 'सराय जगदीश' छावनी की स्थापना की थी।

​ऐतिहासिक व सामरिक महत्व:
​यह स्थल मुग़ल सैन्य दस्तों के प्रमुख पड़ाव के रूप में प्रयुक्त होता था।

​राजा हरिवंश राय जी के विस्थापित परिवार (नागराय व मलूक शाह) को यहीं से जगदीश राय जी द्वारा कोट बनकट में आश्रय व ३५० बीघे भूमि देकर पुनर्जीवित किया गया।

​सन १७१२ ईस्वी में नवाब मोहम्मद ख़ान बंगश की सेना को मौनस शासकों ने इसी सराय के पास रोककर पीछे हटने पर विवश किया था।

​इसी वर्ष भावी मुग़ल सम्राट शहज़ादे फ़र्रुख़सियर का सराय जगदीश में भव्य राजसी आतिथ्य सत्कार किया गया।

​वर्तमान पहचान: कवि तीर्थराज दीक्षित जी के कवित्त में उल्लिखित यह ऐतिहासिक केंद्र आज धनीपुर से सटे 'सराय जगदीश' गाँव तथा पूर्वांचल के 'सराय जगदीश रेलवे स्टेशन' के रूप में मौनस राजवंश के प्रशासनिक वैभव का अमर साक्ष्य बना हुआ है।

​— आर० के० सिंह
(मौनस परिवार, वाराणसी)

माधो सिंह बाज़ार एवं रेलवे स्टेशन: संक्षिप्त ऐतिहासिक परिचय​ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: मौनस राजवंश के दूरदर्शी शासक राजा मदन मह...
13/10/2026

माधो सिंह बाज़ार एवं रेलवे स्टेशन: संक्षिप्त ऐतिहासिक परिचय

​ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: मौनस राजवंश के दूरदर्शी शासक राजा मदन महीप सिंह जी के ज्येष्ठ पुत्र राजा माधो सिंह जी (लगभग १७०० – १७१० ई.) ने भदोही के आर्थिक स्वावलंबन और व्यावसायिक विकास की सुदृढ़ नींव रखी थी।
​व्यापारिक केंद्रों की स्थापना: उन्होंने स्थानीय व्यापार और उपज को संगठित करने हेतु अपने नाम पर 'माधो सिंह बाज़ार' तथा वस्त्र, शिल्प और बुनकर उद्योग को बढ़ावा देने के लिए ऐतिहासिक 'घोसिया बाज़ार' की स्थापना की।
​माधोसिंह रेलवे स्टेशन: बाद के कालखंड में जब इस क्षेत्र में रेल नेटवर्क का विस्तार हुआ, तो राजा माधो सिंह जी द्वारा स्थापित इस प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र के सम्मान में ही इस महत्वपूर्ण जंक्शन का नामकरण 'माधोसिंह रेलवे स्टेशन' किया गया।
​विरासत: आज भी यह बाज़ार और रेलवे स्टेशन राजा माधो सिंह जी की विकासपरक सोच और मौनस राजवंश के लोक-कल्याणकारी इतिहास का जीवंत साक्ष्य हैं।
​— आर० के० सिंह
(मौनस परिवार, वाराणसी)

माटी की वंदना: गड़ौरा के 'सती चौरा' पर एक भावुक पड़ाव​शौर्य, सतीत्व और अमर प्रेम की पावन धरोहर—गड़ौरा का 'सती चौरा'।​सन ...
09/10/2026

माटी की वंदना: गड़ौरा के 'सती चौरा' पर एक भावुक पड़ाव

​शौर्य, सतीत्व और अमर प्रेम की पावन धरोहर—गड़ौरा का 'सती चौरा'।
​सन १७१२ ईस्वी में बेरवा के ऐतिहासिक रणक्षेत्र में नवाब मोहम्मद ख़ान की सेना से लोहा लेते हुए मौनस वीर बख्तावर सिंह जी ने वीरगति का वरण किया था। उनके महाप्रयाण के पश्चात उनकी सहधर्मिणी माता पनकुँवरि देवी जी ने पति-धर्म निभाते हुए स्वयं को पति की पावन चिता को समर्पित कर दिया। गड़ौरा की धरती पर स्थापित यह 'सती चौरा' आज भी उस युगांतरकारी त्याग की अमर गवाही है, जहाँ हर मांगलिक अवसर पर श्रद्धा से शीश झुकते हैं।

​शोध-यात्रा के क्रम में जब गड़ौरा गाँव की पावन रज को मस्तक से लगाने का सुअवसर मिला, तो वहाँ आदरणीय डॉ. मनराज सिंह जी, राजेश सिंह जी, प्रभात सिंह जी एवं मौनस परिवार के सभी सदस्यों से भेंट हुई। स्वजनों ने अत्यंत स्नेह और आत्मीय भाव से स्वागत करते हुए अपने पूर्वजों के इतिहास को जानने की गहरी जिज्ञासा प्रकट की तथा माता सती के विषय में अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रामाणिक संस्मरण साझा किए।
​अपने कुल के इतिहास और बंधु-बांधवों के इस अगाध प्रेम ने इस शोध-यात्रा को कृतार्थ कर दिया। समस्त गड़ौरा परिवार के प्रति अंतःकरण से आभार।
​— आर० के० सिंह
(मौनस परिवार, वाराणसी)

पूर्वजों का स्मरण, हमारी शक्ति और पहचान :-​माता-पिता और पूर्वज केवल हमारे जन्मदाता नहीं, हमारी समृद्ध वंश-परंपरा की आधार...
08/10/2026

पूर्वजों का स्मरण, हमारी शक्ति और पहचान :-

​माता-पिता और पूर्वज केवल हमारे जन्मदाता नहीं, हमारी समृद्ध वंश-परंपरा की आधारशिला हैं। हमारे संस्कार, ऊर्जा और सामर्थ्य उन्हीं की पावन देन हैं। उनके स्मरण मात्र से हमारे भीतर नवचेतना और आत्मबल का संचार होता है।
​अपनी जड़ों से जुड़ने और गौरवशाली इतिहास को सहेजने के लिए मौनस परिवार की वेबसाइट पर अवश्य पंजीकरण करें:
🌐 maunas.in
​वेबसाइट पर जुड़ने या पंजीकरण में कोई भी कठिनाई आने पर संकोच न करें। सहायता हेतु अपना:
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​संपर्क सूत्र:
आर० के० सिंह
मौनस परिवार, वाराणसी
📲 8840 709 296

मौनस राजवंश का स्वर्णिम इतिहास: राजा जोध राय और गोस्वामी तुलसीदास जी का ऐतिहासिक यज्ञ​भदोही की पावन धरा पर मौनस क्षत्रिय...
08/10/2026

मौनस राजवंश का स्वर्णिम इतिहास: राजा जोध राय और गोस्वामी तुलसीदास जी का ऐतिहासिक यज्ञ
​भदोही की पावन धरा पर मौनस क्षत्रिय राजवंश का इतिहास त्याग, धर्म और जनकल्याण की गौरवशाली गाथाओं से भरा रहा है। इसी समृद्ध परंपरा में मौनस राजा जोधराय का नाम बड़े आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है।
​राजा जोध राय ने जनहित और जल-संरक्षण के पावन उद्देश्य से सुरियावां गढ़ के निकट इस विशाल सरोवर (तालाब) का निर्माण करवाया था। इसी सरोवर के तट पर धर्म और आध्यात्म की एक अनुपम मिसाल स्थापित हुई, जब वहाँ एक विराट एवं ऐतिहासिक महायज्ञ का आयोजन किया गया। इस पावन यज्ञ की अध्यक्षता स्वयं रामचरितमानस के रचयिता, परम पूज्य गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने की थी। तुलसीदास जी के पावन सानिध्य ने उस आयोजन को आध्यात्मिक दिव्यता प्रदान की।
​यज्ञ की पूर्णाहुति पर राजा जोध राय ने अपनी अपार दानवीरता का परिचय देते हुए ब्राह्मणों को सहस्रों गायें दान (गोदान) में दीं। गायों की संख्या इतनी अधिक थी कि दूर-दराज से आए विप्रजनों के लिए उन सभी को अपने साथ ले जाना कठिन हो गया। ऐसे में ब्राह्मणों ने उन गायों को स्थानीय जुलाहों को भेंट अथवा विक्रय कर दिया।
​इस अभूतपूर्व और अकल्पनीय घटनाक्रम ने जनमानस के मानस-पटल पर गहरी छाप छोड़ी और कालांतर में यह लोक-स्मृति एक प्रसिद्ध कहावत के रूप में अमर हो गई:

​जोध राय की ठकुरी, जोलहन जाउर खाएं।
जाके घर मुर्गी नहीं, ताके बांधी गाय।

​यह लोक-कहावत राजा जोध राय की अतुल्य दानशीलता, तत्कालीन सामाजिक समरसता और मौनस क्षत्रिय कुल के उस ऐतिहासिक वैभव का जीवंत प्रमाण है, जो आज भी स्थानीय जनमानस में श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है।
​
आर० के० सिंह
मौनस परिवार, वाराणसी

"कभी मौनस वंश के वैभव और गौरव का साक्षी रहा सुरियावां गढ़ व रंगमहल आज अपनी ही बदहाली पर आँसू बहा रहा है। शासन, समाज और स्...
07/10/2026

"कभी मौनस वंश के वैभव और गौरव का साक्षी रहा सुरियावां गढ़ व रंगमहल आज अपनी ही बदहाली पर आँसू बहा रहा है। शासन, समाज और स्वयं अपनों की उपेक्षा के चलते यह पावन धरोहर अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुकी है—यहाँ तक कि पूज्य ठाकुर अचल सिंह जी के मंदिर तक जाने का मार्ग भी नहीं बचा। समाज के कर्णधार मौन हैं और पुरखों की स्वर्णिम विरासत हमारी ही आँखों के सामने मिटती जा रही है, यह टीस मन को गहरे तक व्यथित कर देती है।
— आर०के० सिंह (मौनस परिवार, वाराणसी)"

"ग्राम तुलापुर बहादुरान (सुरियावां, भदोही) की माटी में दो जाँबाज वीरों—बहादुर और लल्ला की अमर गाथा रची-बसी है। राजा अचल ...
07/10/2026

"ग्राम तुलापुर बहादुरान (सुरियावां, भदोही) की माटी में दो जाँबाज वीरों—बहादुर और लल्ला की अमर गाथा रची-बसी है। राजा अचल सिंह के शासनकाल में 52 बीघे के अथाह तालाब के सीने पर भारी पत्थर का लाट गाड़कर अपने पराक्रम का लोहा मनवाने वाले उन वीरों को नमन। समय बीत गया, पर उनकी निष्ठा और शौर्य की गूंज आज भी इस धरती पर स्पंदित होती है।

— आर०के० सिंह, मौनस परिवार, वाराणसी"

"6 अक्टूबर 2026 को अनुज श्री आशीष सिंह जी के साथ भरों की सत्ता के मुख्य केंद्र 'चौथार कोट' को देखने का अवसर मिला। कभी जह...
07/10/2026

"6 अक्टूबर 2026 को अनुज श्री आशीष सिंह जी के साथ भरों की सत्ता के मुख्य केंद्र 'चौथार कोट' को देखने का अवसर मिला। कभी जहाँ प्रमुख भर सरदार का विशाल और अभेद्य दुर्ग शान से खड़ा था, आज वह समतल होकर खेतों में तब्दील हो चुका है। नाममात्र बचे अवशेषों को देखकर मन व्यथित हो उठा कि इतिहास का इतना बड़ा गवाह आज अपनी पहचान खोकर विलुप्ति की कगार पर खड़ा है।
— आर०के० सिंह (मौनस परिवार, वाराणसी)"

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