09/08/2026
प्रश्न : गुरुजी, मेरा प्रश्न भरोसे के संकट पर आकर टिकता है। मुझे यदि मानवता की अब तक की गई यात्रा को जानना है ताकि मैं स्वयं भी इस यात्रा को वर्तमान समय के लिए और भी सरल बनाकर पूरी कर सकूँ और फिर आगे आने वाली पीढ़ी को सौंप दूँ तो मुझे यह सब रहस्यमय ज्ञान किससे जानना चाहिए ? मैं कैसे आश्वस्त होऊँ और भरोसा करूँ कि जिससे मैं जानना चुन रही हूँ अव्वल तो केवल और केवल वही व्यक्ति मात्र ही वर्तमान समय में प्रथ्वी पर सर्वथा इसके लिए सुयोग्य अधिकारी हैं, नहीं तो कम से कम वह व्यक्ति भी परम् ज्ञान प्रदान करने का सुयोग्य अधिकारी है ?
उत्तर : ये कठिन प्रश्न है। क्योंकि यह प्रश्न कालातीत है। वेद-उपनिषद्- दर्शन कालीन समय में यह पहचान सहज रही है। कालांतर में यह पहचानना कठिन होता आया है।शास्त्र परम्परा कहती है कि ऋषि वाल्मीकि आदि के चित्त में भी यही प्रश्न उठा था इसका उत्तर मिलने के कारण/उपरांत ही रामायण की रचना हुई। हरेक काल में चिंतन-शील प्रज्ञावान मनीषियों के मन में यह प्रश्न उठता ही है। वर्तमान में इसके समाधान को निम्न उदाहरण से समझने की कोशिश कीजिए।
आप किसी न किसी को चुनाव में वोट देतीं हैं तो किस आधार पर देती /चुनतीं हैं ? हालांकि वर्तमान समय की चुनावी प्रक्रिया में “इनमें से कोई नहीं “ भी एक वैकल्पिक प्रावधान है पर यथार्थ में ऐसा कोई विकल्प नहीं है क्योंकि यदि सबने ‘नोटा’ (अर्थात् इनमें से कोई नहीं ) चुना तो चुनाव दुबारा करवाने पड़ेंगे। अर्थात् किसी न किसी को तो चुनना ही होता है।और, हरेक को स्वयं ही चुनना होता है तभी वह हरेक का अपना किया चुनाव कहलायेगा अन्यथा नहीं। चुनाव करने का अधिकार स्वायत्त है वह खरीदा बेचा या डेलीगेट नहीं किया जाता। इसलिए, जिसे आप चुनें उसकी सुयोग्यता और अधिकार को जान पहचान कर ही चुनें किसी की मानकर नहीं। चुनने का अधिकार आपका (सबका )जन्म सिद्ध अधिकार है। जीवन में कुछ भी चुनने में आपका अपना विवेक ही आपका सबसे बड़ा साथी है।
अपने चुनने की अर्हता,योग्यता और पात्रता पर भरोसा होने पर आपकी आत्मिक शक्ति चुनाव की आश्वस्ति का अधिकार आपको स्वयं ही दे देती है क्योंकि, जिसका परिचय आप मुझ से पूछ रहीं हैं उस व्यक्ति को पहचानने की अधिकारी केवल आपकी (हरेक की) आत्मा ही है अन्य किसी को यह अधिकार ही नहीं है।‘फ्री-विल’ की अस्मिता या सत्ता या अस्तित्व को जो स्वीकारते हैं उनके लिए तो यह चुनाव आत्म परीक्षा का स्वर्णिम अवसर ही है। इसमें द्वैत आश्रित मानवी मर्यादा की रक्षा/पालना और अद्वैत आध्यात्मिक रहस्य का मान रखते हुए कोई एक नाम नहीं बताया जाता भले ही कोई वह नाम जानता भी हो तब भी।
Guruji Shri Nandkishore Tiwari's weekly column in Dakshin Bharat Rashtramat | The Hindi Daily
https://epaper.dakshinbharat.com/news/228888/6a77f0df53d24 (Bengaluru)