23/02/2026
साल 1857 के पवित्र रमज़ान 🌙 माह के 16वें रोज़े के दिन, मुग़ल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र लाल क़िले 🏰 के एक झरोखे में बैठे क़ुरान 📖 की तिलावत कर रहे थे,
तभी ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ⚔️ के भारतीय सिपाही 🇮🇳 उनके पास पहुँचे और उनसे अंग्रेज़ हुकूमत के ख़िलाफ़ बग़ावत 🔥 की क़ियादत करने की गुज़ारिश की।
उन सैनिकों की सबसे बड़ी शिकायत नई एनफ़ील्ड राइफल 🔫 के कारतूस थे। कारतूसों के कागज़ी खोल को मज़बूत बनाने के लिए उन पर चर्बी 🧴 का लेप लगाया जाता था,
ताकि सफ़र 🚶♂️ के दौरान वे फटें नहीं। मगर इस्तेमाल से पहले उन्हें दाँतों 😬 से काटना पड़ता था। कहा जाता है कि इन कारतूसों पर गाय 🐄 और सूअर 🐖 की चर्बी लगी होती थी, जो हिंदू 🕉️ और मुसलमान ☪️—दोनों के लिए बेहद अपमानजनक ❗ और उनके धार्मिक विश्वास 🙏 के ख़िलाफ़ थी।
सिपाहियों ने गुहार लगाई 🗣️:
"हे बादशाह सलामत 👑, मेहरबानी करके अपना हाथ 🤲 हमारे सर पर रखिए और हमारे साथ इंसाफ़ ⚖️ कीजिए। अंग्रेज़ हुकूमत ने हमें गाय 🐄 और सूअर 🐖 की चर्बी लगे कारतूस दाँतों 😬 से काटने का हुक्म दिया है। उन्होंने हमारे हिंदू 🕉️ और मुसलमान ☪️ दोनों के ईमान 💖 और आस्था 🙌 को ठेस पहुँचाई है।"
इनमें से अधिकतर सैनिक हिंदू 🕉️ धर्म के थे और मेरठ छावनी 📍 से कूच कर दिल्ली 🕌 पहुँचे थे। वे पहले ही बहादुर शाह ज़फ़र 👑 को हिंदुस्तान 🇮🇳 का बादशाह और इस क्रांति 🔥 का प्रतीक घोषित कर चुके थे। इसके बाद 1857 का संग्राम ⚔️, जिसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम
🇮🇳 भी कहा जाता है, पूरे उत्तर भारत 📜 में फैल गया।
गदर 🔥 के बाद बहादुर शाह ज़फ़र 👑 को गिरफ़्तार ⛓️ कर रंगून (वर्तमान यंगून, म्यांमार 🇲🇲) निर्वासित किया गया,
जहाँ 1862 📅 में उनका इंतक़ाल हुआ। इतिहास 📚 में यह भी उल्लेख मिलता है कि उनके बेटों को अंग्रेज़ अधिकारियों ⚔️ ने मौत के घाट उतार दिया था। आज उनकी क़ब्र ⚰️ रंगून में मौजूद है।
तस्वीर 🖼️ में भारत 🇮🇳 के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बहादुर शाह ज़फ़र 👑 की मज़ार पर ख़िराज-ए-अक़ीदत 🌹 पेश करते हुए दिखाई देते हैं।
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