20/03/2026
वसंत संपात (Spring Equinox) उत्तरी गोलार्ध में गर्मी की दस्तक
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हमारी धरती एक लट्टू की तरह अपनी धुरी पर घूम रही है, जिसके कारण धरती पर दिन और रात होते हैं। लेकिन यह धरती सूरज की परिक्रमा भी करती है जिसे पूरा करने में एक साल का समय लगता है। लेकिन यहाँ एक दिलचस्प बात और है, धरती जिस रास्ते पर सूरज की फेरे ले रही है उसपर एकदम सीधी खड़ी नहीं है बल्कि एक तरफ झुकी हुई है। जिसके चलते जब धरती का उत्तरी हिस्सा सूरज की तरफ होता है तो वहाँ अधिक खड़ी किरणें पड़ती हैं और दक्षिणी हिस्से पर कुछ तिरछी। इसी वजह से उत्तर में गर्मी का मौसम होता है और दक्षिणी हिस्से में ठंड का। साल के दूसरे हिस्से में ठीक इसका उल्टा हो जाता है।
लेकिन साल में दो बार ऐसा होता है जब यह झुकी हुई पृथ्वी सूरज के सामने इस तरह आ जाती है कि सूरज की ओर न तो उसका उत्तरी हिस्सा झुका होता है न दक्षिण का। इस स्थिति में सूरज भूमध्य रेखा के ठीक ऊपर नजर आता है। यानि इस दिन भूमध्य रेखा पर सूरज की किरणें लम्बवत पड़ती हैं। इस खास दिन को Equinox कहते हैं। उस दिन सूरज की रोशनी धरती पर लगभग बराबर बँटती है, यानि दिन और रात बराबर होते हैं—लगभग 12-12 घंटे के। यह दिन मार्च में 20-21 तारीख को और सितंबर में 22- 23 तारीख को पड़ते हैं।
लेकिन आज 20 मार्च को जहां मैं रहता हूँ वहाँ पर गूगल की घड़ी में सूर्योदय और सूर्यास्त का समय देखें तो दिन और रात की अवधि में लगभग सात मिनट का अंतर दिख रहा है जबकि आज ही equinox भी बताया जा रहा है। यानी equinox के बारे में हम किताबों में जो “बराबर” पढ़ते हैं, और जो घड़ी बताती है, उनमें थोड़ा फर्क होता है।
अब सवाल आता है—यह फर्क क्यों? पहला कारण यह है कि हम दिन की शुरुआत तब मानते हैं जब सूरज का सिर्फ ऊपरी किनारा दिखता है, और अंत तब जब वही किनारा पूरी तरह छिप जाता है। यानी पूरा सूरज निकलने-डूबने का समय भी दिन में जुड़ जाता है जो लगभग 2 से 3 मिनट की अवधि है । दूसरा, हमारे चारों ओर की हवा (वायुमंडल) रोशनी को थोड़ा मोड़ देती है, जिससे सूरज असल से थोड़ा पहले उगता और थोड़ा देर से डूबता हुआ दिखता है, यह समय दो- दो मिनट का अंतर पैदा करता है । और तीसरा, हम भूमध्य रेखा पर नहीं रहते—हमारी जगह भी इस छोटे से अंतर में थोड़ा योगदान देती है। इन सबको मिलाकर दिन, Equinox पर भी, घड़ी में थोड़ा बड़ा ही दिखाई देता है जो लगभग 6 से 8 मिनट तक का हो सकता है।
अब प्रश्न यह भी है कि हम मिलने वाली सूचनाओं को मानने से पहले क्या जाँचने के आदी होते हैं? और सूचना और वास्तविकता के बीच कोई असंगतता नजर आए तो उसकी पड़ताल करते हैं? अंत में यह भी सोचने की बात है कि जब हिमालय में कडक ठंड और बर्फबारी होनी चाहिए थी तब यहाँ सूखे जैसे हालत थे और जब गर्मी की आहट का समय है तो यहाँ ठिठुरने वाली ठंड पड़ रही।