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Hardik badhai🇮🇳Himan rights cell- राष्ट्रीय महिला जागृति मंच की वरिष्ठ पदाधिकारी एवं अधिवक्ता, उदयपुर (राजस्थान) की गौरव...
24/07/2026

Hardik badhai🇮🇳
Himan rights cell- राष्ट्रीय महिला जागृति मंच की वरिष्ठ पदाधिकारी एवं अधिवक्ता, उदयपुर (राजस्थान) की गौरवशाली बेटी, आदरणीय सुरभि मेनारिया धींग जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ। 💐⚖️

विधि विभाग, राज्य सरकार द्वारा स्थायी लोक अदालत की तीन-सदस्यीय न्यायिक पीठ में सदस्य के रूप में आपकी नियुक्ति हम सभी के लिए गर्व और हर्ष का विषय है।

एक कुशल अधिवक्ता, समर्पित समाजसेवी एवं राष्ट्रीय महिला जागृति मंच की वरिष्ठ पदाधिकारी के रूप में आपने सदैव न्याय, सेवा और सामाजिक सरोकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का परिचय दिया है। पूर्ण विश्वास है कि आप अपने इस नवीन दायित्व का भी पूर्ण निष्ठा, निष्पक्षता एवं उत्कृष्टता के साथ निर्वहन करेंगी।

महादेव जी की असीम कृपा आप पर सदैव बनी रहे। आपके सफल, गौरवपूर्ण एवं जनहितकारी कार्यकाल के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ।

स्नेह एवं शुभाशीष सहित,
डॉ. अंबिका वशिष्ठ
संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष
राष्ट्रीय महिला जागृति मंच 🌹

माननीय सर्वोच्च न्यायालय, भारतपीठ: माननीय न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं माननीय न्यायमूर्ति संदीप मेहता जी द्वारा वैवाहिक वि...
02/05/2026

माननीय सर्वोच्च न्यायालय, भारत
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं माननीय न्यायमूर्ति संदीप मेहता जी द्वारा वैवाहिक विवाद को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय दिया है जो काफी लाभकारी होगा.....
यह निर्णय वैवाहिक विवादों में न्यायालयों द्वारा अपनाए जाने वाले दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

विवाह प्रतिशोध का मंच नहीं है,
न्यायालय उत्पीड़न का माध्यम नहीं बन सकता,
वैवाहिक मुकदमेबाजी को हथियार नहीं बनाया जा सकता,
और जहाँ विवाह वास्तविक रूप से समाप्त हो चुका हो, वहाँ न्यायालय को “पूर्ण न्याय” (complete justice) सुनिश्चित करना चाहिए।
यह निर्णय वैवाहिक मुकदमों में मल्टीपल लिटिगेशन, प्रतिशोधपूर्ण कार्यवाही, भरण-पोषण, Article 142, एवं abuse of process के मामलों में अत्यंत महत्वपूर्ण नज़ीर (precedent) है।

यह निर्णय पति-पत्नी के बीच लगभग 10 वर्षों से चल रहे अत्यंत कटु, प्रतिशोधपूर्ण एवं बहुस्तरीय वैवाहिक विवाद से संबंधित है, जिसमें पति-पत्नी के मध्य वैवाहिक संबंध पूर्णतः समाप्त हो चुके थे, किन्तु उनके बीच विभिन्न न्यायालयों में 80 से अधिक दीवानी, फौजदारी, पारिवारिक एवं सहायक वाद/मुकदमे लंबित थे।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रकरण को एक सामान्य वैवाहिक विवाद न मानते हुए, इसे “Matrimonial Battle of Mahabharata” (महाभारत सदृश वैवाहिक युद्ध) की संज्ञा दी और यह माना कि पक्षकारों के मध्य विवाह संबंध व्यवहारिक, सामाजिक एवं भावनात्मक दृष्टि से पूर्णतः समाप्त हो चुका है।
न्यायालय ने यह स्पष्ट रूप से कहा कि ऐसा विवाह, जो केवल विधिक अभिलेखों में जीवित हो परंतु व्यवहार में पूर्णतः मृत हो चुका हो, उसे कृत्रिम रूप से बनाए रखना न्याय के हित में नहीं है।
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पति-पत्नी के मध्य वैवाहिक संबंध लंबे समय से अत्यंत तनावपूर्ण थे।

दोनों पक्ष लगभग 10 वर्षों से पृथक रह रहे थे।

पति द्वारा पत्नी, उसके परिवारजनों तथा उसके अधिवक्ताओं तक के विरुद्ध अनेक मुकदमे/कार्यवाहियां प्रारंभ की गईं।

दोनों पक्षों के मध्य 80 से अधिक वाद/मुकदमे विभिन्न मंचों पर लंबित हो गए।

वैवाहिक विवाद ने सामान्य पारिवारिक विवाद का स्वरूप छोड़कर प्रतिशोधपूर्ण मुकदमेबाजी (vindictive litigation) का रूप ले लिया।

न्यायालय के समक्ष यह स्पष्ट हुआ कि वैवाहिक संबंधों के पुनर्स्थापन (restitution) अथवा पुनर्मिलन (reconciliation) की कोई वास्तविक संभावना शेष नहीं है।

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1. विवाह “व्यवहारिक रूप से पूर्णतः मृत” हो चुका था
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि पक्षकारों के मध्य वैवाहिक संबंध:
“Dead for all practical purposes”
अर्थात् “सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए यह विवाह पूर्णतः समाप्त/मृत हो चुका है।”
न्यायालय ने कहा कि जब पति-पत्नी वर्षों से अलग रह रहे हों, संबंधों में पूर्ण विघटन हो चुका हो, और पुनर्मिलन की कोई संभावना न हो, तब केवल विधिक औपचारिकता के नाम पर विवाह को जीवित मानना न्यायोचित नहीं है।

2. वैवाहिक मुकदमेबाजी को प्रतिशोध का हथियार नहीं बनाया जा सकता
माननीय न्यायालय ने पाया कि पति द्वारा वैधानिक प्रक्रिया का उपयोग न्याय प्राप्ति हेतु नहीं, बल्कि पत्नी को प्रताड़ित करने, मानसिक दबाव बनाने तथा प्रतिशोध लेने के साधन के रूप में किया जा रहा था।
न्यायालय ने ऐसी कार्यवाहियों को:

Vexatious Litigation (उत्पीड़क / निरर्थक मुकदमेबाजी)
Vindictive Litigation (प्रतिशोधपूर्ण मुकदमेबाजी)
करार दिया।
न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का उपयोग वैवाहिक प्रतिशोध (matrimonial vendetta) हेतु नहीं किया जा सकता।

3. 80+ मुकदमों की बहुलता न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पति-पत्नी विवाद में:
बार-बार मुकदमे दायर करना,
परस्पर अनेक कार्यवाहियां प्रारंभ करना,
सहायक/संबद्ध व्यक्तियों (परिजन, अधिवक्ता आदि) को भी मुकदमेबाजी में घसीटना,
न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग (abuse of process of law) है।
न्यायालय ने माना कि जब मुकदमे न्याय पाने के बजाय प्रताड़ना का माध्यम बन जाएं, तब न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।

4. पत्नी के अधिवक्ताओं को भी मुकदमे में घसीटना विधि का दुरुपयोग
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष रूप से यह गंभीर टिप्पणी की कि पति द्वारा पत्नी के अधिवक्ताओं तक के विरुद्ध कार्यवाही करना न्यायिक प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग है।
न्यायालय ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि:
कोई भी पक्ष केवल इसलिए प्रतिपक्ष के अधिवक्ता को लक्ष्य नहीं बना सकता कि वह उसके विरुद्ध न्यायालय में पेश हो रहा है।
यह न्यायिक व्यवस्था की स्वतंत्रता और निष्पक्षता के विरुद्ध है।

5. पत्नी शिक्षित होने मात्र से भरण-पोषण से वंचित नहीं की जा सकती
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किया कि:
केवल इस आधार पर कि पत्नी शिक्षित, योग्य अथवा पेशेवर रूप से सक्षम है, पति अपने वैवाहिक, नैतिक, पितृत्वगत एवं विधिक दायित्वों से मुक्त नहीं हो जाता।
अर्थात् पत्नी का शिक्षित होना या नौकरी करने की क्षमता, पति को भरण-पोषण / स्थायी निर्वाह राशि (maintenance / permanent alimony) से स्वतः मुक्त नहीं करता।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित अंतिम आदेश (Final Relief Granted)
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए:
पक्षकारों के मध्य विवाह संबंध समाप्त (dissolve) कर दिया;
लंबित 80+ समस्त मुकदमे/कार्यवाहियां समाप्त (quash) कर दीं;
दोनों पक्षों के मध्य समस्त विवादों को अंतिम रूप से समाप्त किया;
पत्नी एवं बच्चों के हित में ₹5 करोड़ (पांच करोड़ रुपये) की एकमुश्त स्थायी समेकित राशि (one-time permanent consolidated settlement) प्रदान की;
अभिरक्षा (custody), मुलाकात (visitation) एवं भविष्यगत विवादों पर अंतिम व्यवस्था की;
संपूर्ण मुकदमेबाजी को स्थायी विराम (complete quietus) प्रदान किया।
विधिक सिद्धांत (Legal Principles Evolved)

यह निर्णय निम्न महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत स्थापित करता है:

(i) Irretrievable Breakdown of Marriage
यदि विवाह व्यवहारिक रूप से पूर्णतः समाप्त हो चुका हो, तो सर्वोच्च न्यायालय उसे समाप्त कर सकता है।
(ii) Multiplicity of Proceedings = Abuse of Process
एक ही वैवाहिक विवाद से जुड़े अनेक मुकदमे न्यायिक दुरुपयोग माने जा सकते हैं।
(iii) Vindictive Matrimonial Litigation is Impermissible
प्रतिशोधपूर्ण वैवाहिक मुकदमेबाजी विधि सम्मत नहीं है।
(iv) Article 142 Ensures Complete Justice
सर्वोच्च न्यायालय संपूर्ण न्याय हेतु सभी कार्यवाहियों को एक साथ समाप्त कर सकता है।
(v) Education of Wife ≠ No Maintenance
पत्नी का शिक्षित होना भरण-पोषण से इनकार का आधार नहीं है।

यह समाज का सबसे बड़ा अन्याय है कि हम 'विक्टिम-ब्लेमिंग' (पीड़ित को ही दोषी ठहराना) को एक रिवाज बना चुके हैं। जब तक हम अप...
21/04/2026

यह समाज का सबसे बड़ा अन्याय है कि हम 'विक्टिम-ब्लेमिंग' (पीड़ित को ही दोषी ठहराना) को एक रिवाज बना चुके हैं। जब तक हम अपराधी के चेहरे से नकाब हटाकर उसे बहिष्कृत नहीं करेंगे, तब तक न्याय सिर्फ कागजों तक सीमित रहेगा।
समाज की "स्वीकृति" चरित्र का प्रमाण नहीं होती। हिम्मत मत हारिएगा।
जय हिन्द🇮🇳

*घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला न्याय की उम्मीद  लेकर पहुंची ह्यूमन राइट्स सेल -राष्ट्रीय महिला जागृति मंच*राष्ट्रीय महिला ...
20/04/2026

*घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला न्याय की उम्मीद लेकर पहुंची ह्यूमन राइट्स सेल -राष्ट्रीय महिला जागृति मंच*

राष्ट्रीय महिला जागृति मंच,ह्यूमन राइट्स सेल उदयपुर (राजस्थान) में एक महिला जो ससुराल पक्ष के द्वारा मार पीट एवं घरेलू हिंसा से परेशान होकर मंच से न्याय की उम्मीद में पहुंची ।
महिला ने बताया पति और ससुराल वालों ने गर्भावस्था से ही मारपीट कर शारीरिक और मानसिक रूप से परेशान किया जा रहा था । महिला की एक बेटा 9 माह का एवं एक बेटी ढाई साल की है! बेटी को ससुराल वालो ने पीड़िता से छिनकर मारपीट कर पीड़िता को ससुराल से निकाल दिया है एक 9 माह का दुधमूहा बेटा जो पीड़िता के पास है बेटी अपनी मां से मिलने के लिए तरस रही है ।
महिला ने हर तरफ से मदद की गुहार लगा चुकी है परंतु उस से निराशा हाथ लगी ।
अब वह महिला राष्ट्रीय महिला जागृति मंच , ह्यूमन राइट्स सेल के पास एक उम्मीद लेकर आई है ।

पैनल अधिवक्ता नरेंद्र गर्ग ने पीड़िता की परेशानी सुनी और और अब उसकी पूरी विधिक लड़ाई पूर्णतया नि शुल्क मंच के माध्यम से करी जाएगी।
राष्ट्रीय अध्यक्षा श्रीमती सुरभि मेनारिया धींग जी ने पीड़िता की परेशानी को सुनी और कहा कि एक मां को जल्द से जल्द अपनी बेटी से मिलाने तथा न्याय दिलाने का मंच पूरा प्रयास करेगा ।
अंतरराष्ट्रीय अध्यक्षा एवं संस्थापिका श्रीमती अंबिका शर्मा को भी पूरी जानकारी दी गई ।
पीड़िता की प्रार्थना पत्र राष्ट्रीय कार्यालय में ले लिया गया है ।राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर भावेश भट्ट ने कहा कि पीड़िता के परिजनों एवं उसके ससुराल वालों से भी बात करी जाएगी
इसकी पूरी जानकारी मंच की मिडिया प्रभारी निकिता जांगिड़ जी द्वारा दी गई।
JAI HIND🇮🇳

14/04/2026
11/04/2026

झूठा दहेज का केस साबित होने पर क्या कार्रवाई संभव है?

धारा 498ए अब BNS 85 का उद्देश्य महिलाओं को दहेज उत्पीड़न और क्रूरता से संरक्षण देना है। लेकिन यदि अदालत में यह साबित हो जाए कि मामला झूठा, मनगढ़ंत या दुर्भावना से दर्ज कराया गया था, तो कानून ऐसे मामलों को भी हल्के में नहीं लेता।

1-झूठी शिकायत पर आपराधिक कार्रवाई
यदि यह सिद्ध हो जाए कि शिकायत जानबूझकर झूठी थी, तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ झूठी सूचना देने या न्यायालय को गुमराह करने के आधार पर कार्रवाई हो सकती है। अदालत की अनुमति से अभियोजन भी चल सकता है।

2-मानहानि का दावा
झूठे आरोपों से प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा हो तो पीड़ित व्यक्ति मानहानि का आपराधिक या दीवानी दावा कर सकता है।

3-हर्जाना (Compensation) की मांग
यदि झूठे मुकदमे के कारण आर्थिक और मानसिक क्षति हुई हो, तो उचित मंच पर हर्जाने की मांग की जा सकती है।

4-तलाक का आधार
कई मामलों में अदालतों ने माना है कि झूठे आपराधिक आरोप लगाना वैवाहिक क्रूरता की श्रेणी में आ सकता है, जो तलाक का आधार बन सकता है।

5-अदालत की टिप्पणी का महत्व
सिर्फ बरी होना पर्याप्त नहीं है। यह महत्वपूर्ण है कि अदालत अपने आदेश में स्पष्ट रूप से आरोपों को झूठा या दुर्भावनापूर्ण बताए।

कानून का उद्देश्य संरक्षण है, प्रतिशोध नहीं। यदि कोई प्रावधान का दुरुपयोग करता है, तो न्यायालय संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाने से पीछे नहीं हटता।
#झूठामुकदमा #कानूनीजानकारी #दहेजउत्पीड़न #परिवारिकविवाद #कानूनकीबात

आज (6 अप्रैल, 2026) तमिलनाडु की एक अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 9 पुलिसकर्मियों को मृत्युदंड (Death Penalty) की...
06/04/2026

आज (6 अप्रैल, 2026) तमिलनाडु की एक अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 9 पुलिसकर्मियों को मृत्युदंड (Death Penalty) की सजा दी है। यह मामला 2020 के बहुचर्चित साथानकुलम (Sathankulam) हिरासत में मौत के मामले से जुड़ा है, जिसमें एक व्यापारी जयराज और उनके बेटे बेनिक्स की पुलिस टॉर्चर के कारण मौत हो गई थी।
इस अदालती आदेश की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
कोर्ट का आदेश और विवरण
• न्यायालय: मदुरै की प्रथम अतिरिक्त जिला एवं सत्र अदालत (First Additional District and Sessions Court)।
• न्यायाधीश: न्यायाधीश जी. मुथुकुमारन (Judge G. Muthukumaran)।
• सजा: अदालत ने सभी 9 दोषी पुलिसकर्मियों को धारा 302 (हत्या) के तहत फांसी की सजा सुनाई। इसके साथ ही, मुख्य आरोपी इंस्पेक्टर श्रीधर पर 15 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।
• कुल मुआवजा: कोर्ट ने दोषियों द्वारा पीड़ित परिवार को कुल 1.40 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का भी आदेश दिया है।
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
न्यायाधीश ने सजा सुनाते समय इस मामले को "रैरेस्ट ऑफ रेयर" (Rarest of Rare) श्रेणी में रखा और कहा:
1. कानून के रखवाले ही भक्षक: कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह एक गंभीर मामला है जहाँ पुलिस अधिकारियों ने, जिनका कर्तव्य कानून व्यवस्था बनाए रखना था, स्वयं कानून के विरुद्ध जाकर क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं।
2. क्रूरता का स्तर: अदालत ने पाया कि पिता-पुत्र को पूरी रात बेरहमी से टॉर्चर किया गया था। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में शरीर पर गंभीर चोटों के निशान और अत्यधिक रक्तस्राव की पुष्टि हुई थी।
3. जवाबदेही: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि आम नागरिक ऐसा करते तो स्थिति अलग होती, लेकिन वर्दी में मौजूद रक्षकों द्वारा किया गया यह कृत्य समाज के लिए गहरा कलंक है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह घटना जून 2020 की है, जब लॉकडाउन के दौरान कथित तौर पर दुकान समय से ज्यादा देर तक खुली रखने के आरोप में पी. जयराज (58) और उनके बेटे जे. बेनिक्स (31) को गिरफ्तार किया गया था। साथानकुलम पुलिस स्टेशन में उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया, जिसके कुछ दिनों बाद अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई। इस मामले की जाँच CBI द्वारा की गई थी।
दोषी पाए गए पुलिसकर्मी:
सजा पाने वालों में तत्कालीन इंस्पेक्टर एस. श्रीधर, सब-इंस्पेक्टर रघु गणेश और बालकृष्णन, साथ ही अन्य हेड कांस्टेबल और कांस्टेबल शामिल हैं। (एक आरोपी स्पेशल सब-इंस्पेक्टर पालदुरई की ट्रायल के दौरान ही मृत्यु हो गई थी)



Fight for RIGHTS ✍️🗒️JAI HIND🇮🇳
23/03/2026

Fight for RIGHTS ✍️🗒️
JAI HIND🇮🇳

अहमदाबाद के एक मामले में फैमिली कोर्ट ने कहा कि यदि पत्नी व्यभिचार में लिप्त पाई जाती है तो उसे भरण-पोषण का अधिकार नहीं ...
21/03/2026

अहमदाबाद के एक मामले में फैमिली कोर्ट ने कहा कि यदि पत्नी व्यभिचार में लिप्त पाई जाती है तो उसे भरण-पोषण का अधिकार नहीं मिलेगा। मामले में पति द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला और गुजारा भत्ता देने से इनकार ✖️कर दिया।

✍️यह फैसला केवल एक केस तक सीमित नहीं है, बल्कि वैवाहिक संबंधों में विश्वास और जिम्मेदारी की अहमियत को भी सामने लाता है। विवाह एक सामाजिक और कानूनी संबंध है, जिसमें दोनों पक्षों से निष्ठा और ईमानदारी की अपेक्षा की जाती है। जब यह भरोसा टूटता है, तो उसका असर केवल रिश्ते पर ही नहीं, बल्कि कानूनी अधिकारों पर भी पड़ता है।

🗒️हालांकि, ऐसे मामलों में हर परिस्थिति अलग होती है और अदालत साक्ष्यों व परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेती है। इसलिए किसी एक फैसले को सभी मामलों पर लागू नहीं माना जा सकता।

✍️यह मामला यह भी सिखाता है कि रिश्तों में पारदर्शिता और विश्वास बनाए रखना ही सबसे बड़ा समाधान है, क्योंकि कानून भी उसी संतुलन को ध्यान में रखकर निर्णय देता है।
JAI HIND🇮🇳
JAI SAVIDHAN ✍️




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