02/05/2026
माननीय सर्वोच्च न्यायालय, भारत
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं माननीय न्यायमूर्ति संदीप मेहता जी द्वारा वैवाहिक विवाद को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय दिया है जो काफी लाभकारी होगा.....
यह निर्णय वैवाहिक विवादों में न्यायालयों द्वारा अपनाए जाने वाले दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
विवाह प्रतिशोध का मंच नहीं है,
न्यायालय उत्पीड़न का माध्यम नहीं बन सकता,
वैवाहिक मुकदमेबाजी को हथियार नहीं बनाया जा सकता,
और जहाँ विवाह वास्तविक रूप से समाप्त हो चुका हो, वहाँ न्यायालय को “पूर्ण न्याय” (complete justice) सुनिश्चित करना चाहिए।
यह निर्णय वैवाहिक मुकदमों में मल्टीपल लिटिगेशन, प्रतिशोधपूर्ण कार्यवाही, भरण-पोषण, Article 142, एवं abuse of process के मामलों में अत्यंत महत्वपूर्ण नज़ीर (precedent) है।
यह निर्णय पति-पत्नी के बीच लगभग 10 वर्षों से चल रहे अत्यंत कटु, प्रतिशोधपूर्ण एवं बहुस्तरीय वैवाहिक विवाद से संबंधित है, जिसमें पति-पत्नी के मध्य वैवाहिक संबंध पूर्णतः समाप्त हो चुके थे, किन्तु उनके बीच विभिन्न न्यायालयों में 80 से अधिक दीवानी, फौजदारी, पारिवारिक एवं सहायक वाद/मुकदमे लंबित थे।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रकरण को एक सामान्य वैवाहिक विवाद न मानते हुए, इसे “Matrimonial Battle of Mahabharata” (महाभारत सदृश वैवाहिक युद्ध) की संज्ञा दी और यह माना कि पक्षकारों के मध्य विवाह संबंध व्यवहारिक, सामाजिक एवं भावनात्मक दृष्टि से पूर्णतः समाप्त हो चुका है।
न्यायालय ने यह स्पष्ट रूप से कहा कि ऐसा विवाह, जो केवल विधिक अभिलेखों में जीवित हो परंतु व्यवहार में पूर्णतः मृत हो चुका हो, उसे कृत्रिम रूप से बनाए रखना न्याय के हित में नहीं है।
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पति-पत्नी के मध्य वैवाहिक संबंध लंबे समय से अत्यंत तनावपूर्ण थे।
दोनों पक्ष लगभग 10 वर्षों से पृथक रह रहे थे।
पति द्वारा पत्नी, उसके परिवारजनों तथा उसके अधिवक्ताओं तक के विरुद्ध अनेक मुकदमे/कार्यवाहियां प्रारंभ की गईं।
दोनों पक्षों के मध्य 80 से अधिक वाद/मुकदमे विभिन्न मंचों पर लंबित हो गए।
वैवाहिक विवाद ने सामान्य पारिवारिक विवाद का स्वरूप छोड़कर प्रतिशोधपूर्ण मुकदमेबाजी (vindictive litigation) का रूप ले लिया।
न्यायालय के समक्ष यह स्पष्ट हुआ कि वैवाहिक संबंधों के पुनर्स्थापन (restitution) अथवा पुनर्मिलन (reconciliation) की कोई वास्तविक संभावना शेष नहीं है।
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1. विवाह “व्यवहारिक रूप से पूर्णतः मृत” हो चुका था
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि पक्षकारों के मध्य वैवाहिक संबंध:
“Dead for all practical purposes”
अर्थात् “सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए यह विवाह पूर्णतः समाप्त/मृत हो चुका है।”
न्यायालय ने कहा कि जब पति-पत्नी वर्षों से अलग रह रहे हों, संबंधों में पूर्ण विघटन हो चुका हो, और पुनर्मिलन की कोई संभावना न हो, तब केवल विधिक औपचारिकता के नाम पर विवाह को जीवित मानना न्यायोचित नहीं है।
2. वैवाहिक मुकदमेबाजी को प्रतिशोध का हथियार नहीं बनाया जा सकता
माननीय न्यायालय ने पाया कि पति द्वारा वैधानिक प्रक्रिया का उपयोग न्याय प्राप्ति हेतु नहीं, बल्कि पत्नी को प्रताड़ित करने, मानसिक दबाव बनाने तथा प्रतिशोध लेने के साधन के रूप में किया जा रहा था।
न्यायालय ने ऐसी कार्यवाहियों को:
Vexatious Litigation (उत्पीड़क / निरर्थक मुकदमेबाजी)
Vindictive Litigation (प्रतिशोधपूर्ण मुकदमेबाजी)
करार दिया।
न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का उपयोग वैवाहिक प्रतिशोध (matrimonial vendetta) हेतु नहीं किया जा सकता।
3. 80+ मुकदमों की बहुलता न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पति-पत्नी विवाद में:
बार-बार मुकदमे दायर करना,
परस्पर अनेक कार्यवाहियां प्रारंभ करना,
सहायक/संबद्ध व्यक्तियों (परिजन, अधिवक्ता आदि) को भी मुकदमेबाजी में घसीटना,
न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग (abuse of process of law) है।
न्यायालय ने माना कि जब मुकदमे न्याय पाने के बजाय प्रताड़ना का माध्यम बन जाएं, तब न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।
4. पत्नी के अधिवक्ताओं को भी मुकदमे में घसीटना विधि का दुरुपयोग
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष रूप से यह गंभीर टिप्पणी की कि पति द्वारा पत्नी के अधिवक्ताओं तक के विरुद्ध कार्यवाही करना न्यायिक प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग है।
न्यायालय ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि:
कोई भी पक्ष केवल इसलिए प्रतिपक्ष के अधिवक्ता को लक्ष्य नहीं बना सकता कि वह उसके विरुद्ध न्यायालय में पेश हो रहा है।
यह न्यायिक व्यवस्था की स्वतंत्रता और निष्पक्षता के विरुद्ध है।
5. पत्नी शिक्षित होने मात्र से भरण-पोषण से वंचित नहीं की जा सकती
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किया कि:
केवल इस आधार पर कि पत्नी शिक्षित, योग्य अथवा पेशेवर रूप से सक्षम है, पति अपने वैवाहिक, नैतिक, पितृत्वगत एवं विधिक दायित्वों से मुक्त नहीं हो जाता।
अर्थात् पत्नी का शिक्षित होना या नौकरी करने की क्षमता, पति को भरण-पोषण / स्थायी निर्वाह राशि (maintenance / permanent alimony) से स्वतः मुक्त नहीं करता।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित अंतिम आदेश (Final Relief Granted)
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए:
पक्षकारों के मध्य विवाह संबंध समाप्त (dissolve) कर दिया;
लंबित 80+ समस्त मुकदमे/कार्यवाहियां समाप्त (quash) कर दीं;
दोनों पक्षों के मध्य समस्त विवादों को अंतिम रूप से समाप्त किया;
पत्नी एवं बच्चों के हित में ₹5 करोड़ (पांच करोड़ रुपये) की एकमुश्त स्थायी समेकित राशि (one-time permanent consolidated settlement) प्रदान की;
अभिरक्षा (custody), मुलाकात (visitation) एवं भविष्यगत विवादों पर अंतिम व्यवस्था की;
संपूर्ण मुकदमेबाजी को स्थायी विराम (complete quietus) प्रदान किया।
विधिक सिद्धांत (Legal Principles Evolved)
यह निर्णय निम्न महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत स्थापित करता है:
(i) Irretrievable Breakdown of Marriage
यदि विवाह व्यवहारिक रूप से पूर्णतः समाप्त हो चुका हो, तो सर्वोच्च न्यायालय उसे समाप्त कर सकता है।
(ii) Multiplicity of Proceedings = Abuse of Process
एक ही वैवाहिक विवाद से जुड़े अनेक मुकदमे न्यायिक दुरुपयोग माने जा सकते हैं।
(iii) Vindictive Matrimonial Litigation is Impermissible
प्रतिशोधपूर्ण वैवाहिक मुकदमेबाजी विधि सम्मत नहीं है।
(iv) Article 142 Ensures Complete Justice
सर्वोच्च न्यायालय संपूर्ण न्याय हेतु सभी कार्यवाहियों को एक साथ समाप्त कर सकता है।
(v) Education of Wife ≠ No Maintenance
पत्नी का शिक्षित होना भरण-पोषण से इनकार का आधार नहीं है।