Minor Forest Produce लघु वन उपज

Minor Forest Produce लघु वन उपज This page is made to spred wider information about MFP minor.forest produce of state Always open to pramote tree based livlihood

31/10/2024
15/01/2023

#निर्गुंडी
निर्गुन्डी (वानस्पतिक नाम : Vitex negundo) एक औषधीय गुणों वाली क्षुप (झाड़ी) है।हिन्दी में इसे संभालू/सम्मालू, शिवारी, निसिन्दा शेफाली, तथा संस्कृत में इसे सिन्दुवार के नाम से जाना जाता है। इसके क्षुप १० फीट तक ऊंचे पाए जाते हैं। संस्कृत में इसे इन्द्राणी, नीलपुष्पा, श्वेत सुरसा, सुबाहा भी कहते हैं। राजस्थान में यह निनगंड नाम से जाना जाता है।
इसकी पत्तियों के काढ़े का उपयोग जुकाम, सिरदर्द, आमवात विकारों तथा जोड़ों की सूजन में किया जाता है। यह बुद्धिप्रद, पचने में हल्का, केशों के लिए हितकर, नेत्र ज्योति बढ़ाने वाला तो होता ही है, साथ ही शूल, सूजन, आंव, वायु, पेट के कीड़े नष्ट करने, कोढ़, अरुचि व ज्वर आदि रोगाें की चिकित्सा में भी काम आता है। इसके पत्ते में रक्तशोधन का भी विशेष गुण होता है। निर्गुंडी बैक पेन स्लिप डिस्क की एकल औषधि है ।
साभार Ajit Singh Poonia सा 😊🙏
#खेती_किसानी
#जिंदगी_एक_सफर_है_सुहाना
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मखाना को मिला जीआई टैग!बिहार वासियों को बधाई विशेषकर मिथिला वालों को !बिहार के मिथिला में एक कहावत  है- पग-पग पोखरि, माछ...
21/08/2022

मखाना को मिला जीआई टैग!
बिहार वासियों को बधाई विशेषकर मिथिला वालों को !

बिहार के मिथिला में एक कहावत है- पग-पग पोखरि, माछ-मखान। केंद्र सरकार ने भी मिथिला के इस विशिष्टता पर मोहर लगा दिया हैं।कल मखाना को जियोग्राफिकल इंडिकेशन टैग दे दिया है, और अब मखाना मिथिला मखाना के रूप में जाना जाएगा।
इससे मखाना उत्पादकों को अब उनके उत्पाद का और भी बेहतर दाम मिल पाएगा। मिथिला के मखाने अपने स्वाद, पोषक तत्व और प्राकृतिक रूप से उगाए जाने के लिए प्रख्यात है। भारत के 90% मखानों का उत्पादन यहीं से होता है। इससे पहले बिहार की मधुबनी पेंटिंग, कतरनी चावल, मगही पान, सिलाव का खाजा, मुजफ्फरपुर की शाही लीची और भागलपुर के जरदालू आम को जीआई टैग दिया जा चुका है।
मखाना के सेहतमंद गुण और और इसकी अच्छी कीमत तो जगजाहिर है। किसान भाइयों के लिए सबसे अच्छी बात तो यह है कि इसकी खेती बंजर हो चुकी जमीन या फिर बरसात के समय पानी से भरी हुई भूमि जो हमारे किसी काम की नहीं रहती उसमें भी मखाने की खेती आसानी से की जा सकती हैं।

मखाना उत्पादन में बिहार पूरी दुनिया को रास्ता दिखा रहा है। ग्लोबल प्रोडक्शन का 80 से 90 प्रतिशत मखाना का उत्पादन यही होता है।

बिहार में मखाना की खेती ने न सिर्फ मिथिला के किसानों की तकदीर बदल दी है बल्कि हजारों हेक्टेयर की जलजमाव वाली जमीन को भी उपजाऊ बना दिया है. अब तो निचले स्तर की भूमि मखाना के रूप में सोना उगल रही है. विगत डेढ़ दशक में पूर्णिया, कटिहार और अररिया जिले में मखाना की खेती शुरू की गयी है. किसानों के लिए इसकी खेती वरदान साबित हुई है. मखाना की खेती का स्वरूप और इसके खेती शुरू होने से तैयार होने तक की प्रक्रिया भी अनोखी है. जमीन में पानी रहने के बाद मखाना का बीज बोया जाता है.

मखाना का पौधा पानी के स्तर के साथ ही बढ़ता है. इसके पत्ते पानी के ऊपर फैले रहते हैं और पानी के घटने की प्रक्रिया शुरू होते ही पानी से लबालब भरे खेत की जमीन पर पसर जाते हैं. इसके बाद कुशल और प्रशिक्षित मजदूर द्वारा विशेष प्रक्रिया अपना कर फसल को एकत्रित करके पानी से बाहर निकाला जाता है. इस प्रक्रिया में पानी के नीचे ही बुहारन का इस्तेमाल किया जाता है.

मखाना की खेती की शुरुआत बिहार के दरभंगा जिला से हुई. अब इसका विस्तार क्षेत्र सहरसा, पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज होते हुए पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के हरिश्रंद्रपुर तक फैल गया है. पिछले एक दशक से पूर्णिया जिले में मखाना की खेती व्यापक रूप से हो रही है. साल भर जलजमाव वाली जमीन मखाना की खेती के लिए उपयुक्त साबित हो रही है. बड़ी जोत वाले किसान अपनी जमीन को मखाना की खेती के लिए लीज पर दे रहे हैं. इसकी खेती से बेकार पड़ी जमीन से अच्छी वार्षिक आय हो रही है.

दरभंगा से पहुंचते हैं मजदूर
मखाना की खेती से तैयार कच्चे माल को स्थानीय भाषा में गोरिया कहा जाता है. इस गोरिया से लावा निकालने के लिए बिहार के दरभंगा जिला से प्रशिक्षित मजदूरों को बुलाया जाता है. गोरिया कच्चा माल निकालने के लिए जुलाई में दरभंगा जिला के बेनीपुर, रूपौल, बिरैली प्रखंड से हजारों की संख्या में प्रशिक्षित मजदूर आते हैं. उन मजदूरों में महिला व बच्चे भी शामिल रहते हैं. ये लोग पूरे परिवार के साथ यहां आकर मखाना तैयार करते हैं. उन लोगों के रहने के लिए छोटे-छोटे बांस की टाटी से घर तैयार किया जाता है. जुलाई से लावा निकलना शुरू हो जाता है और यह काम दिसंबर तक चलता है. फिर वे मजदूर वापस दरभंगा चले जाते हैं. प्रशिक्षित मजदूरों के साथ व्यापारियों का समूह भी पहुंता है और गोरिया तैयार माल लावा खरीद कर ले जाते हैं. तीन किलो कच्चा गोरिया में एक किलो मखाना होता है. गोरिया का भाव प्रति क्विंटल लगभग 3500 से 6500 के बीच रहता है.

मखाना की खेती का उत्पादन
मखाना की खेती का उत्पादन प्रति एकड़ 10 से 12 क्विंटल होता है. इसमें प्रति एकड़ 20 से 25 हजार रुपये की लागत आती है जबकि 60 से 80 हजार रुपये की आय होती है. इसकी खेती के लिए कम-से-कम चार फीट पानी की जरूरत होती है. इसमें प्रति एकड़ खाद की खपत 15 से 40 किलोग्राम होती है. मार्च से अगस्त तक का समय मखाना की खेती के लिए उपयुक्त होता है. पूर्णिया जिले के मुख्यत: जानकीनगर, सरसी, श्रीनगर,बैलौरी,लालबालू,कसबा,जलालगढ़ सिटी आदि क्षेत्रों में इसकी खेती की जाती है. इतना ही नहीं मखाना तैयार होने के बाद उसे 200, 500 ग्राम और आठ से दस किलो के पैकेट में पैकिंग कर दूसरे शहरों व महानगरों में भेजा जाता है. मखाने की खेती की विशेषता यह है कि इसकी लागत बहुत कम है. इसकी खेती के लिए तालाब होना चाहिए जिसमें 2 से ढाई फीट तक पानी रहे. पहले सालभर में एक बार ही इसकी खेती होती थी लेकिन अब कुछ नई तकनीकों और नए बीजों के आने से मधुबनी-दरभंगा में कुछ लोग साल में दो बार भी इसकी उपज ले रहे हैं. मखाने की खेती दिसम्बर से जुलाई तक ही होती है. बता दें कि विश्व का 80 से 90 प्रतिशत मखाने का उत्पादन अकेले बिहार में होता है. विदेशी मुद्रा कमाने वाला यह एक अच्छा उत्पाद है. इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि छह साल पहले जहाँ लगभग 1, 000 किसान मखाने की खेती में लगे थे, वहीं आज यह संख्या साढे आठ हजार से ऊपर हो गई है. इससे मखाने का उत्पादन भी बढा है. पहले जहां सिर्फ 5-6 हजार टन मखाने का उत्पादन होता था वहीं आज बिहार में 30 हजार टन से अधिक मखाने का उत्पादन होने लगा है. यहाँ कुछ वर्षों में केवल उत्पादन ही नहीं बढा है बल्कि उत्पादकता भी 250 किलोग्राम प्रति एकड़ की जगह अब 400 किलोग्राम प्रति एकड़ हो गई है.

कई शहरों से भी व्यापारी, तैयार मखाना के लिए आते हैं. पूर्णिया जिले से मखाना कानपुर, दिल्ली, आगरा,ग्वालियर, मुंबई के मंडियों में भेजा जाता है. यहां का मखाना अमृतसर से पाकिस्तान भी भेजा जाता है. मखाना की खपत प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है. मखाना में प्रोटीन, मिनरल और कार्बेाहाइड्रेट प्रचुर मात्रा में पाया जाता है.

अनुपयुक्त जमीन पर मखाना उत्पादन के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने की योजना है, जिससे उनकी समस्या का समाधान संभव होगा और वे आर्थिक रूप से समृद्ध होंगे. मखाना उत्पादन के साथ ही इस प्रस्तावित जगह में मछली उत्पादन भी किया जा सकता है. मखाना उत्पादन से जल कृषक को प्रति हेक्टेयर लगभग 50 से 55 हजार रु पए की लागत आती है. इसे बेचने से 45 से 50 हजार रु पए का मुनाफा होता हैं. इसके अलावा लावा बेचने पर 95 हजार से एक लाख रु पएा प्रति हेक्टेयर का शुद्ध लाभ होता है. मखाना की खेती में एक महत्व पूर्ण बात यह है कि एक बार उत्पादन के बाद वहां दोबारा बीज डालने की जरूरत नहीं होती है.
© लवकुश
आवाज एक पहल

देशी फल कमरख -- इसे दन्तसठ ,कमरक , पर्णमाचाल , पीतफल , शिराल shiral करंबल आदि नामों से भी जाना जाता है.- कमरख के पेड़ बड़े...
13/07/2022

देशी फल कमरख -
- इसे दन्तसठ ,कमरक , पर्णमाचाल , पीतफल , शिराल shiral करंबल आदि नामों से भी जाना जाता है.
- कमरख के पेड़ बड़े और छायादार होते है.
- ये हमेशा हरेभरे और फलों से लदे होते है.
- कमरख का उपयोग अचार , चटनी , मुरब्बा, सलाद आदि में होता है.
- स्वाद में इसके फल काफी खट्टे होते है और ज्यादा पक जाने पर इनमें थोडी मिठास भी आ जाती है।
-आदिवासियों के अनुसार इसका पका हुआ फल शक्तिवर्धक और ताजगी देने वाला होता है।
- गर्मियों में इस फल के सेवन से लू की मार नहीं पडती तथा यह ज्यादा गर्मी की वजह से होने वाले बुखार में भी लाभकारी होता है। अक्सर ग्रामीणजन इसके पके फलों का रस (पन्हा) तैयार कर दोपहर में पीते है, माना जाता है कि शरीर की आंतरिक तासीर को यह ठंडा बनाए रखता है और प्यास को बुझाता भी है।
- भोजन के दौरान कमरख के अधपके फलों की चटनी या अचार को भी खाया जाए तो गर्मियों में काफी फायदा करता है।
- बवासीर के रोगियों को पके हुए कमरख के फलों का सेवन करना चाहिए।
- फलों का रस हैंगओवर से निजात पाने में मदद करता है।
- जिन माताओं को प्रसूति पश्चात दुध स्रावण की समस्याएं रहती है, उन्हें भी पके फलों का रस देना चाहिए।
- ये काटने पर तारे के आकार में सुंदर दिखते है.
- ये काली मिर्च , जीरा और चीनी के साथ खाने पर अच्छे लगते है.
- इनकी प्रकृति गर्म होती है.
- कच्चा फल वात नाशक और पित्त वर्धक होता है.
- पका फल शक्तिवर्धक , पुष्टिकारक और रुचिकारक होता है.
- इसके फलों का शरबत बना कर पिने से बुखार जल्दी उतरता है.
- सुबह शाम इसका शरबत पिने से रक्तपित्त में लाभ होता है.
- कपड़ों पर जंग के दाग लगने पर कमरख के पके या कच्चे फल से ४-५ बार जरा जोरो से रगड़ दें.४-५ मिनट बाद पानी से उस स्थान को धो डालें, दाग गायब हो जायेंगे.
- प्रात:काल ताजे पके कमरख का रस २-३ तोला लेकर उसमें थोड़ी चीनी मिलाकर एवं थोड़ा पानी मिलाकर शर्बत पी लिया करें. ४-५ दिनों में ही आप अनुभव करेंगे कि भूख तेजी से लगने लगी है, भोजन में रूचि बढ़ जाती है.
- यह जिगर और दिल को ताकत देता है.
- बालों से रूसी का सफाया करने के लिए बादाम तेल और कमरख के रस का मिश्रण बनाकर बालों में लगाएं.
- इसकी पत्तियों और डंडियों को दाद और खुजली पर पीसकर कर लगाया जाता है.
- यह ज़हर के असर को कम करते है.
- इसके फूल पेट के कीड़ों को नष्ट करते है.
- इसके फल रेचक होते है और डीसेंट्री को ठीक करते है.
- इसके फल रक्त प्रदर को शांत करते है.
- इसके बीज ज़्यादा मात्रा में लेने पर गर्भपात कर सकते है.
- इसके फलों में भरपूर लौह होता है .
- सूरीनामी देशों में इसे फटी एडियों के इलाज में काम में लाया जाता है.
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' बिना दवा रसायन के दीमक से प्रभावी बचाव'_____________________________________प्रकृति में असंतुलन के दुष्फल स्वरूप दीमक ...
24/05/2022

' बिना दवा रसायन के दीमक से प्रभावी बचाव'
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प्रकृति में असंतुलन के दुष्फल स्वरूप दीमक का आतंक खेतों में ज्यादा ही दिखने लगा है विशेषकर मरुस्थलीय रेतीली भूमि व जलोढ भूमि मे.... एक कृषि शोध के मुताबिक दीमक गेहूं अन्न दाल तिल फल सब्जी की फसल को उत्पादन में 25% की हानि देती है साथ ही दीमक के बचाव में महंगे जहरीले रसायनों के प्रयोग से किसान की जेब भी ढीली हो जाती है... नतीजा खेती घाटे का सौदा। दीमक से बचाव का कोई स्थाई सहज सुलभ समाधान उपलब्ध नहीं था लेकिन जहां चाह होती है वहां राह निकल कर आ जाती है.... दीमक से बचाव की राह निकली राजस्थान के सीकर जिले के दांता गांव निवासी 70 वर्ष से अधिक की महिला किसान भगवती देवी के माध्यम से। खेतों में दीमक से फसलों को बचाने के लिए भगवती देवी द्वारा इजाद किए गए अनूठे प्रयोग के माध्यम से लाखों किसानों को राहत मिली है। दीमक से बचाव के प्रभावी वैज्ञानिक प्रयोग/ तरीके की प्रेरणा भगवती देवी को अपने खेतों में ही मिली। खेतों पर काम करते हुए 1 दिन भगवती देवी ने यह अनुभव किया जब वह जलावन के लिए खेतों से विविध लकड़ियों का ईंधन एकत्रित कर रही थी तो उन्होंने देखा अन्य लकड़ियों की अपेक्षा सफेदा (यूकेलिप्टस) की लकड़ी पर दीमक अधिक लगती है दीपक उसे बड़े चाव से खाती है। भगवती देवी ने विचार किया क्यों ना सफेदी की लकड़ी को वह अपने खेतों में फसल के मध्य निश्चित दूरी पर रख दें जिससे खेत की सारी दीमक सफेदी की लकड़ी पर आ जाए और फसल सुरक्षित रह जाए..... भगवती देवी ने अपने 1 एकड़ खेत में 2 फिट लंबी ढाई इंच मोटी व्यास की सफेदा की 40 लकड़ियों को 100 मीटर जमीन में आधा जमीन के ऊपर आधा नीचे स्थापित कर दिया....। जबरदस्त परिणाम इसके निकल कर आए बिना दवाई कीटनाशकों के प्रयोग के फसल बहुत अच्छी उत्पन्न हुई गेहूं मिर्च मूंग आदि की फसल दीमक से मुक्त रही... प्रयोग की पुष्टि के लिए उन्होंने 3 वर्ष तक इसे दोहराया.... भगवती देवी मानती है दिमक केंचुए की तरह उपजाऊ खाद का भी निर्माण करती है फसल उत्पादन में भी बढता है बशर्ते दीमक को खेत में एक जगह एकत्रित कर दिया जाए सफेदा आदि लकड़ी के माध्यम से। उनके इस प्रयोग की सफलता सटीकता प्रभावशीलता की पुष्टि राजस्थान के अनेक कृषि वैज्ञानिकों कृषि विकास अनुसंधान संस्थानों ने की है राज्य से लेकर केंद्र तक तक उन्हें अनेक पुरस्कारों से नवाजा गया है कृषि में अपने अनूठे प्रयोग के लिए।

भारत की नारी शक्ति किसी भी क्षेत्र में कम नही है। भगवती देवी इसकी जीवंत मिसाल है.... ऐसी अनेकों कृषि की देवियां हमारे देश में है पहाड़ से लेकर मैदानों तक अब उन्हें उचित मान-सम्मान मिल रहा है उनकी प्रतिभा का प्रोत्साहन हो रहा है.... यह ज्ञान विज्ञान अनुप्रयोग किसी विश्वविद्यालय की चौखट से नहीं भगवती देवी जैसी असाधारण महिलाओं के कृषि कौशल से प्रस्फुटित हुआ है.... हम सभी को खुले हृदय से इसका सम्मान करना चाहिए।

जय हो! कृषि की देवी भगवती।

आर्य सागर खारी✍✍✍

आया मौसम जामुन का !आवाज एक पहल -----------------------------++++++++---------------------भारत को जम्बू द्वीप के नाम से भ...
19/05/2022

आया मौसम जामुन का !
आवाज एक पहल
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भारत को जम्बू द्वीप के नाम से भी जाना जाता है और यह नाम जामुन के वजह से है।आश्चर्य की बात तो है कि किसी फल के वजह से किसी देश का नामकरण किया गया !
दरअसल जामुन के कई नाम है और उन्हीं में से एक नाम है जम्बू । भारत में जामुन की बहुतायत रही है । हमारे देश में इसकी पेड़ों की संख्या लाखों-करोड़ों में है और शायद इसी कारण से यह फल हमारे देश का पहचान बन गया।

भारतीय माइथोलॉजी के दो प्रमुख केंद्र रामायण और महाभारत में भी यह विशेष पात्र रहा है।भगवान राम ने अपने 14 वर्ष के वनवास में मुख्य रूप से जामुन का ही सेवन किया था वहीं श्री कृष्णा के शरीर के रंग को ही जामुनी कहा गया है। संस्कृत के श्लोकों में अक्सर इस नाम का उच्चारण आता है।

जामुन विशुद्ध रूप से भारतीय फल है।भारत का हर गली - मोहल्ला ईसके स्वाद से परीचित हैं। जामुन एक मौसमी फल है। खाने में स्वादिष्ट होने के साथ ही इसके कई औषधीय गुण भी हैं। जामुन अम्लीय प्रकृति का फल है पर यह स्वाद में मीठा होता है। जामुन में भरपूर मात्रा में ग्लूकोज और फ्रुक्टोज पाया जाता है. जामुन में लगभग वे सभी जरूरी लवण पाए जाते हैं जिनकी शरीर को आवश्यकता होती है।

जामुन खाने के फायदे:
1. पाचन क्रिया के लिए जामुन बहुत फायदेमंद होता है. जामुन खाने से पेट से जुड़ी कई तरह की समस्याएं दूर हो जाती हैं.

2. मधुमेह के रोगियों के लिए जामुन एक रामबाण उपाय है. जामुन के बीज सुखाकर पीस लें. इस पाउडर को खाने से मधुमेह में काफी फायदा होता है.

3. मधुमेह के अलावा इसमें कई ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो कैंसर से बचाव में कारगर होते हैं. इसके अलावा पथरी की रोकथाम में भी जामुन खाना फायदेमंद होता है. इसके बीज को बारीक पीसकर पानी या दही के साथ लेना चाहिए.

4. अगर किसी को दस्त हो रहे जामुन को सेंधा नमक के साथ खाना फायदेमंद रहता है. खूनी दस्त होने पर भी जामुन के बीज बहुत फायदेमंद साबित होते हैं.

5. दांत और मसूड़ों से जुड़ी कई समस्याओं के समाधान में जामुन विशेषतौर पर फायदेमंद होता है. इसके बीज को पीस लीजिए. इससे मंजन करने से दांत और मसूड़े स्वस्थ रहते हैं.
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जामुन मधुमेह के रोगियों के लिए रामबाण है। यह पाचनतंत्र को तंदुरुस्त रखता हैं । साथ ही दांत और मसूड़े के लिए बेहद फायदेमंद है ।
जामुन में कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, कैल्शियम, आयरन और पोटैशियम होता है।आयुर्वेद में जामुन को खाने के बाद खाने की सलाह दी जाती है।

जामुन के लकड़ी का भी कोई जबाव नहीं है। एक बेहतरीन इमारती लकड़ी होने के साथ ईसके पानी मे टिके रहने की बाकमाल शक्ति है‌। अगर जामुन की मोटी लकड़ी का टुकडा पानी की टंकी में रख दे तो टंकी में शैवाल या हरी काई नहीं जमती सो टंकी को लम्बे समय तक साफ़ नहीं करना पड़ता |प्राचीन समय में जल स्रोतों के किनारे जामुन की बहुतायत होने की यही कारण था इसके पत्ते में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं जो कि पानी को हमेशा साफ रखते हैं। कुए के किनारे अक्सर जामुन के पेड़ लगाए जाते थे।

जामुन की एक खासियत है कि इसकी लकड़ी पानी में काफी समय
तक सड़ता नही है। जामुन की इस खुबी के कारण इसका इस्तेमाल नाव बनाने में बड़े पैमाने पर होता है।
जामुन औषधीय गुणों का भण्डार होने के साथ ही किसानो के लिए भी उतना ही अधिक आमदनी देने वाला फल है ।

नदियों और नहरों के किनारे मिट्टी के क्षरण को रोकने के लिए जामुन का पेड़ काफी उपयोगी है। अभी तक व्यवसायिक तौर पर योजनाबद्ध तरीके से जामुन की खेती बहुत कम देखने को मिलती हैं। देश के अधिकांश हिस्से में अनियोजित तरीके से ही किसान इसकी खेती करते हैं।अधिकतर किसान जामुन के लाभदायक फल और बाजार के बारे में बहुत कम जानकारी रखते हैं, शायद इसी कारणवश वो जामुन की व्यवसायिक खेती से दूर हैं।जबकि सच्चाई यह है कि जामुन के फलों को अधिकतर लोग पसंद करते हैं और इसके फल को अच्छी कीमत में बेचा जाता है।

जामुन की खेती में लाभ की असीमित संभावनाएं हैं।इसका प्रयोग दवाओं को तैयार करने में किया जाता है, साथ ही जामुन से जेली, मुरब्बा जैसी खाद्य सामग्री तैयार की जाती है।

सबसे खास बात कि जामुन हम भारतीयों की पहचान रही है अतः इस वृक्ष के संरक्षण और संवर्धन में हम सभी को अपना योगदान देना चाहिए।
©लवकुश
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Desert Greens Desert Greens Mobile Van रीठा के फायदे और औषधीय गुणरीठा (Reetha or Ritha) एक बहुत ही फायदेमंद जड़ी-बूटी है...
12/05/2022

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रीठा के फायदे और औषधीय गुण

रीठा (Reetha or Ritha) एक बहुत ही फायदेमंद जड़ी-बूटी है। महिलाएं अधिकांशतः रीठा का इस्तेमाल करती हैं, क्योंकि बालों से संबंधित समस्याएं जैसे- बालों को झड़ने से रोकने और बालों को बढ़ाने आदि में रीठा के फायदे मिलते हैं। बालों को धोने के लिए भी रीठा के फलों का उपयोग किया जाता है। रीठे के फलों को पानी में भिगोने के बाद जो झाग निकलता है, उसे शरीर में लगाने से शरीर की जलन ठीक होती है। इसके अलावा भी रीठा के फायदे (Reetha ke fayde) और भी हैं।
आयुर्वेद में रीठा को बहुत ही गुणकारी जड़ी-बूटी बताया गया है। अगर आप रीठा (soapnut) के इस्तेमाल से होने वाले फायदे (Reetha ke fayde) के बारे में नहीं जानते हैं तो आइए जानते हैं।
अनेक भाषाओं में रीठा के नाम
Hindi – रीठा, अरीठा Sanskrit – अरिष्टक, माङ्गल्य, कृष्णवर्ण, अर्थसाधन, रक्तबीज, पीतफेन, फेनिल, गर्भपातन, गुच्छफल English(kunkudukai in english)- सोप नट ट्री ऑफ नार्थ इण्डिया (Soap nut tree of North India), सोपनट ट्री (Soapnut tree), चाइनीज सोपबेरी (Chinese soapberry), Oriya – ईटा (Ita)Gujarati – कुंकुटे कायि Tamil- पोन्नन कोट्टइ Punjabi – दोड़न (Dodan) Marathi – रीठा (Ritha), रिठा (Ritha)
रीठा के फायदे एवं औषधीय गुण
1.रीठा करें एक्ने दूर
2.एक्जिमा के लिए लाभकारी
3.रीठा बालों के लिए लाभकारी- बालों के विकास के लिए सर्वश्रेष्ठ होते हैं। इसलिए, यह कई प्राकृतिक हेयर टॉनिक और बालों की समस्याओं का इलाज करने के लिए उपयोग किये जाते हैं। मोटे और बाउंसी बालों को प्राप्त करने के लिए रीठा पाउडर का उपयोग करें। यह दुनिया भर में बालों और त्वचा की देखभाल करने वाले कई उत्पादों में एक अद्भुत घटक के रूप में उपयोग किये जाता है। रीठे को रात भर भिगो कर रखें और फिर शैंपू बनाने के लिए शिकाकाई पाउडर के साथ मिक्स कर लें। यह शैम्पू, जब नियमित आधार पर इस्तेमाल किया जाता है, तो यह बालों को साफ करता है। इस फल में पाए जानेवाले विटामिनए,विटामिन डी, विटामिन ई और के आपके बालों को चमक देने और मुलायम बनाने के लिए जाने जाते हैं।
4.कपडे धोने के लिए लाभकारी
5.रीठा उपयोगी है पाइल्स दूर करने में
6.इम्युनिटी को मजबूत करें
7.डायबिटीज में उपयोगी-रीठा प्रकृति एंटी डायबिटिक होते हैं। इसलिए, ये आपके रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में सहायक हैं।

अभी समय चल रहा हैं, अन्न में जहर मिलाने का..Desert Greens Desert Greens Mobile Van Minor forest produce ---------------अ...
12/05/2022

अभी समय चल रहा हैं, अन्न में जहर मिलाने का..
Desert Greens Desert Greens Mobile Van
Minor forest produce

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अभी अधिकतर परिवारों में गेंहू की साफ-सफाई हो रही हैं या हो चुकी हैं... मिट्टी-कंकर ,तिनके निकालकर,गेंहू को कोठियों में भरने का काम भी चालू हो गया हैं...।
साथ ही इसमें धनेरिया न पड़े इस हेतु जहरीली #सल्फास की गोलियां कपड़े में बांध कर रख दी जाती हैं...मिट्टी से परहेज करने वाला जब सल्फास से परहेज न करे तो बीमारियां तो अपना मुंह खोलेगी ही...।

इस बार कुछ जैविक प्रयास कीजिये,यदि करते हैं तो साझा भी कीजिये....।।।
नीम की गीली पत्तियां छोटी छोटी कपड़े की पतली थैलियों में भरकर के ड्रम में 3 से 4 थैली प्रति ड्रम नीम की पत्तियां भरकर के रख सकते है थैली का।फोटो नीचे दिया है

ख.....ख... #खरबुजा।============= #खरबूजा बेहद गुणकारी पोषक सुपाच्य शीतल फल है..... वनस्पति वैज्ञानिक तौर पर यह पेठा, कद्...
02/05/2022

ख.....ख... #खरबुजा।
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#खरबूजा बेहद गुणकारी पोषक सुपाच्य शीतल फल है..... वनस्पति वैज्ञानिक तौर पर यह पेठा, कद्दू, कचरिया के कुकुरबिटेसी कुल/परिवार का ही फल है। खरबूजे में 90 फ़ीसदी जल ही होता है शेष 10 फीसदी खरबूजे में होता है ढेर सारा फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन ए बीटा कैरोटीन ,पोटेशियम जैसे खनिज। खरबूजा शरीर को हाइड्रेटिंड रखता है... इसमें शुगर की कम मात्रा होने फाइबर की अधिकता के कारण यह मधुमेह के रोगियों के लिए अत्यंत गुणकारी है जिनके गुर्दों को मधुमेह से क्षति (डायबीटिक नेफ्रोपैथी) पहुंचनी शुरू हो जाती है यह गुर्दे के फंक्शन को स्वस्थ रखता है। मोटापा घटाने के मामले में यह पपीता से भी अधिक लाभदायक है। इसमें मौजूद विटामिन ए ,बीटा कैरोटीन आंखों को स्वस्थ रखते हैं विटामिन सी का भी यह मुख्य स्रोत है। कुछ लोग लू से बचने के लिए प्याज का सेवन करते हैं लेकिन प्याज उत्तेजक रक्त को दूषित करती है मुख्य में दुर्गंध उत्पन्न करती है लेकिन खरबूजा शीतल लू से बचाने में भी बेहद कारगर है यह रक्त को शुद्ध करता है। खरबूजे में मौजूद पोटेशियम दिल को स्वस्थ रखता है सोडियम की मात्रा को नियंत्रित रखता है फल स्वरूप रक्तचाप सामान्य रहता है। आयुर्वेद में खरबूजे की प्रकृति वात नाशक मानी गई है। गर्मी की ऋतु में शरीर में वाद का प्रकोप होता है। आयुर्वेद में अनिद्रा तनाव और अवसाद वात व्याधि मानी गयी हैं ऐसे में खरबूजा इन रोगों में भी अत्यंत अत्यंत लाभकारी है। जिनको पेशाब खुलकर ना आता हो या पेशाब में जलन रहती हो या पेशाब के पथ में संक्रमण (यूरिनरी ट्रैक्ट इनफेक्शन) हो उसमें भी खरबूजा बहुत लाभकारी है... पेट रोगों का तो यह बेल पत्थर की तरह शत्रु है.... खरबूजे के सेवन में कुछ एक सावधानियां बरती जाती है। खाली पेट खरबूजे का सेवन नहीं करना चाहिए खरबूजे के सेवन के पश्चात पानी नहीं पीना चाहिए.... वगैरा-वगैरा। खरबूजा चुनिंदा ऐसा फल है जिसे सलाद के तौर पर भी भोजन के साथ सेवन किया जा सकता है... खरबूजा ईश्वर द्वारा निर्मित गर्मी के प्रकोप से मनुष्य को बचाने के लिए प्रकृति के माध्यम से मनुष्य को प्रदत अनुपम भेट है। खरबूजा हरा हो या केसरिया नारंगी पका हुआ हो फीका हो या मीठा प्रत्येक स्थिति में रामबाण गुणकारक फल है।
भगवान ने यजुर्वेद के मंत्र जिसे महामृत्युंजय मंत्र भी कहते हैं।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्
इस मंत्र में भगवान ने खरबूजे की उमपमा दी है मनुष्य को शिक्षा देते हुए संस्कृत में खरबूजे को उर्वाकि कहते जैसे खरबूजा पक्का डाली को छोड़ देता है ऐसे ही जीव आयु क र्ण कर मोक्षको प्राप्त क रें।

खरबूजा खाओ, खुश रहो।
आर्य सागर खारी ✍✍✍

इस वर्ष तेंदुपत्ता की संग्रहण दर 105 रुपया प्रति 100 बंडल है
01/05/2022

इस वर्ष तेंदुपत्ता की संग्रहण दर 105 रुपया प्रति 100 बंडल है

New seeds of Spiny gourd are available.Contact for seeds 7983708248ककोड़ा,खेख्शी (कंटोला) का नया बीज उपलब्ध है।बीज के लिए...
18/04/2022

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👉कंटोला (ककोड़ा) “Spine Gourd” की खेती कैसे करे जानिए। Mo number 7983708248

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👉कंटोला (ककोड़ा) “Spine Gourd” की खेती कैसे करे जानिए। Mo number 7983708248

कंटोला एक लोकप्रिय पौष्टिक सब्जी है, जिसकी खेती पूरे भारत में प्राचीन समय से की जाती है। ककोड़ा फल को ककोरा, कंटोला, कर्कोटकी,ककोड़े आदि नाम से भी जाना जाता है। कंटोला को इंग्लिश में “Spine Gourd” नाम से जाना जाता है।

👉जलवायु: कंटोला गर्म और कम सर्द मौसम की फसल है।

👉कंटोला सब्जी दो प्रकार की होती है
बाजार में, दो प्रकार के छोटे आकार और बड़े आकार के कंटोला उपलब्ध है। ध्यान रखें कि वे विभिन्न प्रजातियां नहीं हैं। ये दिखने में एक जैसे होते हैं लेकिन अलग-अलग आकार के होते हैं। आमतौर पर, छोटे आकार के कंटोला की बड़े आकार की तुलना में अधिक मांग होती है। इसलिए, यदि आप एक लाभदायक कंकोड़ा की खेती शुरू करना चाहते हैं, तो छोटे आकार के कंटोला की खेती करें। ज्यादा जानकारी के लिए संपर्क करें। contact WhatsApp number 7983708248

हमारे पास सभी प्रकार के औषधि खेत के बीज और पौधे उपलब्ध हैं जैसे सतावर, अकर्करा, सफेद मूसली, स्टीविया, रामा तुलसी, श्यामा तुलसी, कलौंजी, कालमेघ, सर्पगंधा, अश्वगंधा, लेमन ग्रास, खस, काली हल्दी, मोरिंगा, मिल्क थिसल, ब्राह्मणी, आदि उपलब्ध है जिस किसान भाई को चाहिए वह हमारे पास संपर्क करें भारी मात्रा में उपलब्ध हैं सबसे कम रेट में देंगे मैं प्रेमपाल मौर्य कांटेक्ट व्हाट्सएप नंबर 7983708248
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