अजेय्यांच विश्वस्य .

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अजेय्यांच विश्वस्य . RSS was founded in 1925 by Dr. Keshav Baliram Hedgewar, who was a doctor in the central Indian city of Nagpur.

National Volunteer Organization or National Patriotism Organization , also known the SANGH, is a right-wing Hindu nationalist, paramilitary, volunteer, and paramilitary organization in india. Hedgewar as a medical student in Kolkata had been a part of the revolutionary activities of the Anushilan Samiti and Jugantar striving to free India from British rule. He had been charged with sedition in 1921 by the British Administration and was imprisoned for a year. After returning to Nagpur, he was briefly a member of Indian National Congress before he left it in 1925, to form the Rashtriya Swayamsevak Sangh. After the formation of the RSS, Hedgewar kept the organization from having any direct affiliation with any of the political organisations then fighting British rule. But Hedgewar and teams of volunteers, took part in the Indian National Congress, led movements against the British rule. Hedgewar was arrested in the Jungle Satyagraha agitation in 1931 and served a second term in prison.

25/08/2026

भारतीय ज्ञान परंपरा - 1

"भारतीय ज्ञान परंपरा वैश्विक पटल पर प्राचीनतम, सर्वसंवर्धित एवं वैज्ञानिक ज्ञान पद्धतियों में मूर्धन्य है। इसका परम ध्येय मात्र ग्रंथीय ज्ञान अथवा सूचनाओं का संकलन नहीं था, अपितु मानव का आध्यात्मिक, मानसिक एवं व्यावहारिक उत्कर्ष सुनिश्चित कर उसे समस्त बंधनों से मुक्त करना था; जिसे शास्त्रों में 'सा विद्या या विमुक्तये' के रूप में प्रतिपादित किया गया है। यह अनुपम परंपरा सहस्राब्दियों से गुरु-शिष्य परिपाटी के माध्यम से वाचिक रूप में तथा कालजयी ग्रंथों के अवलंबन से अद्यतन जीवंत है।"

1. श्रुति — अपरिवर्तनीय एवं शाश्वत ज्ञान की परिचायक है। 'श्रुति' का शाब्दिक अर्थ 'श्रवण किया हुआ' है। ऐसी पारंपरिक मान्यता है कि यह वांग्मय मानव-रचित न होकर ' अपौरुषेय ' है; अपितु मनीषियों ने गहन ध्यान्यावस्था में ब्रह्मांडीय सत्य की ध्वनियों को साक्षात्कृत कर आत्मसात किया था। इस सनातन ज्ञान को बिना किसी विकार या विपर्यय के, पीढ़ी-दर-पीढ़ी वाचिक परंपरा द्वारा अनवरत अग्रसारित किया गया।
श्रुति साहित्य के मुख्य रूप से चार भाग होते हैं, जिन्हें वैदिक वांग्मय कहा जाता है : -

• संहिता : यह वेदों का मूल मंत्र भाग है। इसमें देवताओं की स्तुति, प्रार्थनाएं और यज्ञ के मंत्र शामिल हैं।
• ब्राह्मण ग्रंथ : यह गद्य भाग है, जो संहिता के मंत्रों का अर्थ, उनके उपयोग और यज्ञों की वैज्ञानिक विधियों को समझाता है।
• आरण्यक : 'अरण्य' का अर्थ है जंगल। इन ग्रंथों को ऋषियों द्वारा वनों के एकांत में लिखा गया। इनमें कर्मकांड के पीछे के दार्शनिक और रहस्यमयी अर्थों की व्याख्या है।
• उपनिषद : इन्हें 'वेदांत' (वेदों का अंतिम भाग) भी कहते हैं। यह पूरी तरह से ज्ञानमार्ग और दर्शन पर आधारित है। इनमें आत्मा, परमात्मा, सृष्टि की उत्पत्ति और मोक्ष पर गंभीर चर्चाएं हैं। (मुख्य उपनिषदों की संख्या 108 मानी गई है, जिनमें 11 मुख्य हैं जैसे- ईश, केन, कठ, मुंडक आदि)।

2. स्मृति — व्यावहारिक एवं युगानुकूल ज्ञान की संवाहिका है। 'स्मृति' का शाब्दिक अर्थ 'स्मरण किया हुआ' है। यह मनीषियों एवं उद्भट विद्वानों द्वारा मानव समाज के दिग्दर्शन हेतु प्रणीत व्यावहारिक ज्ञान है। श्रुति के सर्वथा विपरीत, स्मृति ग्रंथों में काल, परिस्थिति एवं सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप परिमार्जन अथवा परिवर्तन सर्वदा ग्राह्य हैं। स्मृति साहित्य अत्यंत विपुल एवं विस्तृत है, जिसका वर्गीकरण निम्नलिखित श्रेणियों में किया गया है :

क) वेदांग (वेदों के छह अंग) वेदों को ठीक से समझने, उनका उच्चारण करने और व्यावहारिक जीवन में लागू करने के लिए छह सहायक विद्याएँ विकसित की गईं : -

1. शिक्षा : ध्वन्यात्मकता और शुद्ध उच्चारण का विज्ञान (Phonetics)।
2. कल्प : अनुष्ठान, घरेलू नियम और सामाजिक कर्तव्यों का विज्ञान (Rituals)。
3. व्याकरण : भाषा को शुद्ध रखने का नियम (जैसे पाणिनी की अष्टाध्यायी)।
4. निरुक्त : शब्दों की उत्पत्ति और उनका अर्थ (Etymology)।
5. छंद : मंत्रों की रचना का काव्यमीमांसा और माप (Metrics)
6. ज्योतिष : खगोल विज्ञान और समय की गणना (Astronomy)।

ख) इतिहास और महाकाव्य - ये ग्रंथ वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं और कथाओं के माध्यम से धर्म, कर्तव्य और आदर्श जीवन की सीख देते हैं:
• रामायण (महर्षि वाल्मीकि): मर्यादा, पारिवारिक आदर्श, और आदर्श राजा के कर्तव्यों को सिखाता है।
• महाभारत (महर्षि वेदव्यास): जीवन के जटिल नैतिक संकटों, राजनीति, कूटनीति का वर्णन करता है। इसी का एक भाग श्रीमद्भगवद्गीता है, जो कर्मयोग का सर्वोच्च ग्रंथ है।

ग) पुराण - इनकी संख्या 18 है (जैसे विष्णु पुराण, शिव पुराण, भागवत पुराण)। पुराणों में प्रतीकात्मक कहानियों, राजाओं की वंशावलियों और ब्रह्मांड विज्ञान के माध्यम से आम जनता के लिए जटिल दार्शनिक बातों को सरल भाषा में समझाया गया है।

घ) धर्मशास्त्र और स्मृतियाँ - ये प्राचीन काल के कानून और सामाजिक नियम थे, जो राजा, प्रजा, परिवार और नागरिक के अधिकारों और कर्तव्यों को तय करते थे। जैसे- मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, पराशर स्मृति आदि।

ङ) षड्-दर्शन - मानव जीवन और सत्य को समझने के लिए भारतीय विचारकों ने 6 दृष्टिकोण दिए:
• सांख्य : प्रकृति और पुरुष (चेतना) का द्वैत।
• योग : मन और शरीर का नियंत्रण (अष्टांग योग)।
• न्याय : तर्कशास्त्र और प्रमाणों के आधार पर सत्य की खोज।
• वैशेषिक : परमाणुवाद और भौतिक जगत का विश्लेषण (महर्षि कणाद)।
• मीमांसा (पूर्व मीमांसा): वेदों के कर्मकांडों की व्याख्या।
• वेदांत (उत्तर मीमांसा): ब्रह्म और आत्मा की एकता का प्रतिपादन।









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22/08/2026

प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा : संक्षिप्त ऐतिहासिक, वैज्ञानिक एवं दार्शनिक विश्लेषण
हरिदत्त शर्मा

अक्सर यह माना जाता है कि प्राचीन भारत का योगदान केवल अध्यात्म, पूजा-पाठ या रहस्यवाद तक सीमित था। मेरा यह लघु अध्ययन सार प्राथमिक साक्ष्यों और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर इस संकीर्ण धारणा का खंडन करता है। इस विश्लेषण का मुख्य उद्देश्य यह सिद्ध करना है कि प्राचीन भारत में एक अत्यंत परिष्कृत, तर्कसंगत और प्रयोगधर्मी (Empirical) विज्ञान की परंपरा फल-फूल रही थी, जिसका मूल मंत्र था—
‘ सा विद्या या विमुक्तये ’
अर्थात् ज्ञान वह है जो मनुष्य को संकीर्णताओं से मुक्त करे।"

दार्शनिक और तार्किक अधिष्ठान
किसी भी वैज्ञानिक खोज के लिए एक तार्किक तंत्र की आवश्यकता होती है। भारत ने इसे ' षड्दर्शन' और ' प्रमाण शास्त्र' के माध्यम से विकसित किया।
• उदाहरण के लिए, महर्षि गौतम का न्याय दर्शन शुद्ध रूप से तर्कशास्त्र (Logic) और वैज्ञानिक कार्यप्रणाली (Research Methodology) पर आधारित है, जहाँ प्रत्यक्ष और अनुमान के बिना किसी तथ्य को स्वीकार नहीं किया जाता।
• वहीं, ईसा पूर्व छठी शताब्दी में महर्षि कणाद ने वैशेषिक सूत्र में जॉन डाल्टन से सदियों पहले ' परमाणु सिद्धांत' (Atomic Theory) का प्रतिपादन किया और यह समझाया कि दो परमाणुओं के मिलने से 'द्वयणुक' यानी मॉलिक्यूल कैसे बनते हैं।"

गणित और खगोल विज्ञान में क्रांति (Exact Sciences):
अब बात करते हैं गणित और खगोलशास्त्र की, जो इस अध्ययन सार का एक अत्यंत मजबूत स्तंभ है।
• बौधायन शुल्बसूत्र (ईसा पूर्व 8वीं सदी):
इसमें पाइथागोरस से बहुत पहले उस प्रमेय को स्पष्ट रूप से संहिताबद्ध किया गया था, जिसे आज हम पाइथागोरस थ्योरम कहते हैं।
• आर्यभट्ट (476 ईस्वी):
कॉपरनिकस और गैलीलियो से एक हजार वर्ष पूर्व आर्यभट्ट ने अपने ग्रंथ ' आर्यभटीय' में पृथ्वी के अक्षीय घूर्णन (Axial Rotation) को नाव के उदाहरण से वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया।
• इसके अलावा, एस अध्ययन में यह भी रेखांकित किया गया है कि 14वीं शताब्दी में केरल के गणित संप्रदाय के माधव ने न्यूटन और लाइबनिज से 300 वर्ष पूर्व ही कैलकुलस के मूल सिद्धांतों (Infinite Series) की खोज कर ली थी।"

व्यावहारिक विज्ञान: आयुर्वेद और धातुकर्म
"व्यावहारिक विज्ञान के क्षेत्र में भारत का लोहा पूरी दुनिया ने माना है।
• शल्य चिकित्सा:
*महर्षि सुश्रुत* को आज वैश्विक स्तर पर 'फादर ऑफ प्लास्टिक सर्जरी' माना जाता है। ईसा पूर्व छठी शताब्दी में उनके द्वारा खोजी गई 'पेडिकल फ्लैप राइनोप्लास्टी' आज भी आधुनिक प्लास्टिक सर्जरी का आधार है।
• धातु विज्ञान:
चौथी शताब्दी का मेहरौली लौह स्तंभइसका जीवंत प्रमाण है। हमारे प्राचीन धातुविज्ञानियों ने लोहे में फास्फोरस की ऐसी कोटिंग (मिसावाइट) की, जिसके कारण 1600 वर्षों से खुले आसमान के नीचे रहने के बाद भी उसमें आज तक जंग नहीं लगा है। राजस्थान के जावर में ईसा पूर्व छठी शताब्दी में ही जस्ता निष्कर्षण (Zinc Distillation) की उन्नत तकनीक मौजूद थी।"

आधुनिक प्रासंगिकता
"अंत में, यह अध्ययन सार केवल अतीत के गौरवगान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इसकी वर्तमान प्रासंगिकता को भी रेखांकित करता है।
आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के संकट से जूझ रही है, तब अथर्ववेद का भूमि सूक्त कहता है—
' माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः'
(भूमि मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूँ)।
यह प्रकृति के दोहन की जगह उसके साथ सह-अस्तित्व का मार्ग दिखाता है।

नोबेल पुरस्कार विजेता भौतिक विज्ञानी एरविन श्रोडिंगर ने स्वयं स्वीकार किया था कि क्वांटम मैकेनिक्स* के मूलभूत विचार उपनिषदों के ' अद्वैत वेदांत* ' से मेल खाते हैं। भारत की वर्तमान राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ( NEP 2020 ) इसी समृद्ध ज्ञान को आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ जोड़कर एक संतुलित और नैतिक वैश्विक नागरिक (Global Citizen) के निर्माण का प्रयास कर रही है।"

"संक्षेप में कहें तो, प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा अतीत का कोई मृत अवशेष नहीं, बल्कि भविष्य का एक जीवंत मार्गदर्शक है। जो समग्र मानवता के सन्देश देता है—
सर्वे भवन्तु सुखिनः (सभी सुखी हों)



14/08/2026

विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस: भारत की लहूलुहान आत्मा और सांस्कृतिक विखंडन की महात्रासदी

"कलम रोती है लिखने को, लहू रोता है बहने को,
वो मंज़र याद आता है, तो दिल रोता है सहने को।"

14 अगस्त का सूर्य इतिहास के क्षितिज पर केवल एक नई सुबह लेकर नहीं आया था, बल्कि वह अपने साथ लेकर आया था एक ऐसा घना, स्याह और त्रासद अंधेरा, जिसने हमारी चेतना को सदियों के लिए झकझोर दिया। सन 1947 का वह विभाजन केवल सरहदों का कृत्रिम रेखांकन नहीं था, राजनीति की मेज पर खींची गई वह कोई मामूली लकीर नहीं थी; वह तो भारत की शाश्वत, सनातन आत्मा की छाती पर चलाया गया एक क्रूर आरा था।

वह हमारी उस सहस्राब्दियों पुरानी सांस्कृतिक थाती को समूल नष्ट करने का एक आत्मघाती प्रयास था, जिसे इस देवभूमि ने अपने ऋषियों के तप, सूफियों के कलाम, संतों की वाणी और 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के विराट आदर्शों से सींचा था।

भारत विभाजन (1947) एक अत्यंत जटिल और संवेदनशील ऐतिहासिक घटना थी, जिसके लिए किसी एक व्यक्ति या दल को पूरी तरह ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इतिहासकार इस त्रासदी के लिए ब्रिटिश हुकूमत की नीतियों, मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक राजनीति और कांग्रेस के कुछ निर्णयों को सामूहिक रूप से ज़िम्मेदार मानते हैं।

यहाँ विभाजन के मुख्य कारकों और उसमें भूमिका निभाने वाले प्रमुख लोगों का संक्षिप्त संदर्भ दिया गया है:

ब्रिटिश हुकूमत और लॉर्ड माउंटबेटन
लॉर्ड माउंटबेटन: भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने विभाजन की प्रक्रिया को बहुत जल्दबाज़ी में अंजाम दिया। रेडक्लिफ लाइन (सीमा निर्धारण) को विभाजन के बाद सार्वजनिक किया गया, जिससे भड़की सांप्रदायिक हिंसा में लाखों लोग मारे गए।

॰ फूट डालो और राज करो' की नीति:
ब्रिटिश सरकार ने भारत पर शासन करने के लिए दशकों तक हिंदुओं और मुसलमानों के बीच धार्मिक मतभेदों को बढ़ावा दिया, जिसने अंततः विभाजन की नींव रखी।

मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग
* मोहम्मद अली जिन्ना: जिन्ना को विभाजन का मुख्य सूत्रधार माना जाता है। उन्होंने 'द्वि-राष्ट्र सिद्धांत' (Two-Nation Theory) को आक्रामक रूप से बढ़ावा दिया, जिसके तहत हिंदू और मुसलमान दो अलग राष्ट्र घोषित किए गए।

सीधी कार्रवाई दिवस (Direct Action Day):
16 अगस्त 1946 को जिन्ना के आह्वान पर मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग के लिए हिंसक रास्ते का सहारा लिया, जिससे कलकत्ता और देश के अन्य हिस्सों में भीषण दंगे भड़के।

कांग्रेस नेतृत्व की परिस्थितिजन्य सहमति
जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल: शुरुआत में कांग्रेस विभाजन के सख्त खिलाफ थी। हालांकि, अंतरिम सरकार में मुस्लिम लीग के साथ पैदा हुए गतिरोध, देश में बढ़ते हुए गृहयुद्ध के हालात और प्रशासनिक अपंगता को देखते हुए उन्होंने देश को पूरी तरह तबाह होने से बचाने के लिए विभाजन को एक कड़वी सच्चाई के रूप में स्वीकार कर लिया।

महात्मा गांधी की बेबसी:
गांधी जी अंत तक विभाजन के खिलाफ थे और उन्होंने कहा था कि विभाजन उनकी लाश पर होगा। लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों और बढ़ते सांप्रदायिक दंगों के सामने वे भी इसे रोकने में असहाय हो गए।

15 अगस्त 1947 को जहाँ एक ओर आधुनिक भारत का जन्म हो रहा था, वहीं दूसरी ओर हज़ारों वर्षों से जीवंत सांस्कृतिक भारत (सांस्कृतिक चेतना) लहुलुहान खड़ी थी। भारत का विभाजन केवल ज़मीन के एक टुकड़े का बंटवारा या दो नए देशों का मानचित्र पर उभरना नहीं था; यह उस 'भारत की आत्मा' पर एक प्राणघातक प्रहार था, जिसने सदियों से "वसुधैव कुटुंबकम्" (पूरी धरती ही परिवार है) और "एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति" (सत्य एक है, विद्वान उसे अलग नामों से बुलाते हैं) के सिद्धांतों को जिया था।

14 अगस्त के अन्तर्हित सन्दर्भ ~

'भारत की आत्मा' पर आघात:
अखंडता का विखंडन
भारतीय मनीषा में भारत केवल एक भौगोलिक भूभाग नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक महापुरुष (भारत माता) के रूप में पूजनीय रहा है। ऋग्वेद से लेकर पुराणों तक में हिमालय से समुद्र तक फैली इस भूमि को एक अखंड आध्यात्मिक इकाई माना गया है।

भूगोलीय नहीं, आध्यात्मिक विभाजन:
विभाजन ने इस पावन भूमि को कृत्रिम सीमाओं में बांध दिया। यह उस दार्शनिक सोच पर चोट थी जो हर जीव में एक ही चेतना देखती थी।

सांस्कृतिक धरोहर और इतिहास का अपहरण
सांस्कृतिक रूप से भारत का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता से शुरू होता है। विभाजन ने भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ों को भौतिक रूप से देश से अलग कर दिया।

सभ्यता के उद्गम स्थलों का छूटना:
हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे महान भारतीय सभ्यता के शुरुआती केंद्र भारत की भौगोलिक सीमा से बाहर चले गए।

वैदिक ऋचाओं की भूमि का बंटवारा:
जिस सिंधु नदी के तट पर ऋषियों ने वेदों की रचना की, जिसके नाम पर हमारा नाम 'हिंदू' या 'इंडिया' पड़ा, वह मुख्य सिंधु नदी और पंजाब (पांच नदियों की भूमि) का एक बड़ा हिस्सा भारत से काट दिया गया।

आध्यात्मिक और धार्मिक केंद्रों पर वज्रपात :
सांस्कृतिक भारत के कई अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र, जो करोड़ों भारतीयों की आस्था के प्रतीक थे, रातों-रात एक 'दूसरे देश' का हिस्सा बन गए:

नानकाना साहिब और करतारपुर साहिब:
सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी का जन्मस्थान और उनकी कर्मभूमि भारत से अलग हो गई, जिससे सिख समाज में एक कभी न भरने वाला आध्यात्मिक ज़ख्म हुआ।

शक्तिपीठ और प्राचीन मंदिर:
हिंगलाज माता मंदिर (बलूचिस्तान), कटासराज शिव मंदिर (पकिस्तान) और ढाकेश्वरी देवी (अब बांग्लादेश में) जैसे प्राचीन आस्था के केंद्र भौगोलिक रूप से दूर हो गए।

साहित्य, भाषा और संगीत का विस्थापन
सांस्कृतिक भारत की अभिव्यक्ति उसकी भाषाओं, गीतों और साझा उत्सवों में थी। विभाजन ने इस रस को भी विषाक्त कर दिया।

भाषाओं का विभाजन:
रातों-रात भाषाओं को भी मजहब से जोड़ दिया गया—उर्दू को एक तरफ और हिंदी-पंजाबी को दूसरी तरफ धकेल कर उस साझी जुबान (हिंदुस्तानी) की हत्या कर दी गई जो दिलों को जोड़ती थी।

मानवता का महा-विस्थापन: एक सांस्कृतिक त्रासदी

जब राजनेताओं ने कागज़ पर 'रेडक्लिफ रेखा' खींची, तो उन्होंने केवल ज़मीन नहीं काटी, बल्कि परिवारों, स्मृतियों और इंसानी रिश्तों को चीर दिया।

इतिहास के इस सबसे बड़े महा-विस्थापन में 1.5 करोड़ से अधिक लोग अपनी जड़ों से उखड़ गए।

लाखों माताओं-बहनों के साथ हुई बर्बरता और सांप्रदायिक हिंसा ने भारत के उस सांस्कृतिक गौरव को ठेस पहुँचाई, जो नारी को शक्ति का रूप मानता था। अपने ही छद्मवेशी भाइयों के हाथों अपनों का कत्लेआम भारतीय इतिहास का सबसे काला अध्याय बन गया।

स्मृति दिवस:

घायल आत्मा की पुकार और सांस्कृतिक पुनरुत्थानआज 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' के माध्यम से हम केवल उस अमानवीय त्रासदी के आंसू नहीं रो रहे हैं, बल्कि अपनी उस घायल सांस्कृतिक चेतना को पुनः जाग्रत कर रहे हैं।

विभाजनकारी सोच को खुली चुनौती:

यह दिन हमें पुरजोर तरीके से सचेत करता है कि जब-जब हम अपनी मूल सांस्कृतिक पहचान—प्रेम, करुणा, सहिष्णुता और समावेशन—को भूलकर संकीर्णताओं के जाल में फंसेंगे, तब-तब भारत की आत्मा लहूलुहान होगी।

अखंड सांस्कृतिक संकल्प:

शरीर के टुकड़े किए जा सकते हैं, भूगोल को बांटा जा सकता है, लेकिन भारत की सनातन चेतना को कभी विभाजित नहीं किया जा सकता। यह दिवस हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से फिर से गहरे जुड़ने और एक ऐसे अभेद्य सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने की प्रेरणा देता है जिसे कोई भी बाहरी या आंतरिक ताकत दोबारा हिला न सके।

सन 1947 में भारत की देह पर जो गहरे जख्म दिए गए, वे इतिहास के पन्नों पर आज भी टीस रहे हैं। करोड़ों लोगों का विस्थापन, लाखों निर्दोषों का रक्त और देश का वह क्रूर विभाजन आज भी हमसे एक सवाल पूछता है कि क्या हम उस स्वतंत्रता की कीमत को समझते हैं? भारतीय संस्कृति की प्राण-शक्ति इतनी शाश्वत, अगाध और अपराजेय है कि वह हर प्रहार को सहकर भी पुनर्जीवित होने का सामर्थ्य रखती है।

आइए, इस 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' पर हम उन लाखों अनाम बलिदानियों को अपनी अश्रुपूर्ण भावांजलि अर्पित करें, अपनी सांस्कृतिक थाती की रक्षा का संकल्प लें और भारत की आत्मा को फिर से परम वैभवशाली, अखंड और अक्षुण्ण बनाने के लिए स्वयं को समर्पित करें।

09/08/2026

यह कालजयी श्लोक भारतीय मनीषा की वैचारिक संप्रभुता और वैश्विक उदारता का उद्घोषक है।

एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः॥

सामान्य भाव : इस भारत भूमि पर पैदा हुए श्रेष्ठ विद्वानों और महापुरुषों के सानिध्य में आकर (अनुसरण कर) दुनिया के सभी मनुष्यों ने अपने-अपने चरित्र, सदाचार और जीवन जीने के सही ढंग की शिक्षा ली है। अर्थात संपूर्ण पृथ्वी के मानव इस देश के मनीषियों के सम्मुख नतमस्तक होकर जीवन और चरित्र की शिक्षा ग्रहण करते थे।

जब हम श्लोक के मूल क्रियापद 'शिक्षेरन्' (शिक्षा लेनी चाहिए - विधिलिङ् लकार) को 'शिक्षा ली है' (भूतकाल) के रूप में देखते हैं, तो यह भारतीय इतिहास के स्वर्णकाल को रेखांकित करता है।

साहित्यिक और ऐतिहासिक दृष्टि से यह कथन निम्नलिखित तथ्यों को पुष्ट करता है:

• ऐतिहासिक सत्यता: प्राचीन काल में तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे वैश्विक प्रज्ञा-केंद्रों (Universities) में चीन, जापान, तिब्बत, यूनान और मध्य एशिया से जिज्ञासु और यात्री यहाँ आकर सदाचार, दर्शन और जीवन-मूल्यों की शिक्षा ग्रहण करते थे।
• सांस्कृतिक प्रभाव: मेगास्थनीज, ह्वेन सांग, फाह्यान, इब्न बतूता, मार्को पोलो, अब्दुर रज्जाक और अल-बरूनी जैसे विदेशी विद्वानों का भारत आना और यहाँ की जीवन पद्धति को अपनी पुस्तकों में लिखना इस कथन का जीवंत प्रमाण है।

इन सभी विद्वानों के विवरणों में एक साझा सूत्र दिखाई देता है—भारत के प्रति गहरा आदर और विस्मय। चाहे वह यूनान का मेगास्थनीज हो, चीन के बौद्ध भिक्षु हों, या अरब और यूरोप के यात्री; इन सबने स्वीकार किया कि भारत केवल धन-धान्य से समृद्ध देश नहीं था, बल्कि इसकी वास्तविक आत्मा इसके नैतिक मूल्यों, न्यायप्रियता, ज्ञान के प्रति अनुराग और चारित्रिक शुचिता में बसती थी।

प्राचीन काल में भारतवर्ष केवल एक भौगोलिक भू-भाग अथवा राजनीतिक सीमा का नाम नहीं था, अपितु वह एक उद्दाम वैचारिक चेतना और सांस्कृतिक महासागर था। जब संपूर्ण विश्व सैन्य बल, साम्राज्यवादी लिप्सा और औपनिवेशिक क्रूरता से त्रस्त था, तब भारत की ज्ञान-प्रज्ञा, कला-वीथि और आध्यात्मिक रश्मियाँ बिना किसी रक्तपात के संपूर्ण एशिया महाद्वीप को आलोकित कर रही थीं। फ्रांसीसी प्राच्यविद् सिल्वैन लेवी ने सत्य ही कहा था—"भारत ने अपनी संस्कृति का साम्राज्य स्थापित किया, किंतु कभी किसी को दास नहीं बनाया।"

श्लोक का साहित्यिक विवेचन :

• काव्य शैली और छंद : यह श्लोक शास्त्रीय संस्कृत के प्रसिद्ध अनुष्टुप छंद में रचित है। इसमें प्रत्येक चरण में आठ अक्षर होते हैं, जिससे यह अत्यंत गेय (गाए जाने योग्य) और स्मरण रखने में सरल बनता है।
• शब्द विन्यास और व्यापकता : श्लोक में प्रयुक्त शब्द जैसे 'अग्रजन्मनः' और 'सर्वमानवाः' साहित्यिक रूप से बहुत व्यापक अर्थ समेटे हुए हैं। यहाँ भाषा आक्रामक नहीं बल्कि आमंत्रणकारी और मार्गदर्शक है।
• सार्वभौमिक दृष्टिकोण : साहित्यिक दृष्टि से यह किसी संकीर्ण भौगोलिक सीमा की बात नहीं करता। इसमें 'पृथिव्यां सर्वमानवाः' (पृथ्वी के सभी मनुष्य) कहकर संपूर्ण मानवता को संबोधित किया गया है, जो संस्कृत साहित्य की उदात्त परंपरा को दर्शाता है।

श्लोक का सांस्कृतिक विवेचन :

• विश्वगुरु की अवधारणा : यह श्लोक प्रमाणित करता है कि प्राचीन काल में भारत का सांस्कृतिक गौरव सैन्य शक्ति या औपनिवेशिक विस्तार पर नहीं, बल्कि ज्ञान और चरित्र की श्रेष्ठता पर आधारित था। भारत ने कभी तलवार के बल पर संस्कृति नहीं फैलाई, बल्कि ज्ञान के बल पर विश्व को आकर्षित किया।
• चरित्र निर्माण पर बल : भारतीय संस्कृति में 'ज्ञान' से भी ऊपर 'चरित्र' को रखा गया है। श्लोक कहता है कि लोग यहाँ आकर ज्ञान नहीं, बल्कि 'स्वं स्वं चरित्रं' (अपना-अपना चरित्र और सदाचार) सीखें। यह दर्शाता है कि संस्कृति का अंतिम लक्ष्य व्यक्ति को नैतिक रूप से सुदृढ़ बनाना है।
• विविधता का सम्मान : ध्यान देने योग्य बात यह है कि श्लोक 'स्वं स्वं' (अपने-अपने) चरित्र की बात करता है। इसका सांस्कृतिक अर्थ यह है कि _भारत दुनिया पर अपनी संस्कृति थोपना नहीं चाहता था_ । वह चाहता था कि चीनी, यूनानी या हूण, जो भी यहाँ आए, वे अपनी प्रकृति के अनुसार अपने श्रेष्ठतम नैतिक मूल्यों को सीखें।
• वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना : यह श्लोक 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (संसार ही परिवार है) के दर्शन को पुष्ट करता है। भारत स्वयं को पूरी दुनिया का आध्यात्मिक अभिभावक मानता था, जहाँ से नैतिक आचरण की किरणें पूरे विश्व में फैलती थीं।

साहित्यिक और सांस्कृतिक दोनों ही दृष्टियों से यह श्लोक भारत की बौद्धिक संप्रभुता और सांस्कृतिक उदारता का प्रतीक है। यह याद दिलाता है कि भारत की असली ताकत उसकी आध्यात्मिक और नैतिक विरासत है, जो पूरी मानवता के कल्याण के लिए समर्पित रही है।
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16/06/2026

#हल्दीघाटी युद्ध में हुई थी #महाराणा #प्रताप की स्पष्ट विजय, मुगलों को पड़ा था भागना : ओमप्रकाश जी

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का चारित्रिक उत्कर्ष अत्यंत *उज्ज्वल* एवं *अनुकरणीय था, उन्होंने युद्ध की विभीषिका में भी नैतिक मूल्यों और मर्यादित आचरण को सर्वोपरि रखा था। शत्रु पक्ष की महिलाओं के प्रति प्रदर्शित आदर-भाव उनके *उदात्त चरित्र* और भारतीय संस्कृति की *पावन मर्यादा* को उद्भासित करता (छापामार) है। युद्ध कौशल की दृष्टि से वे विलक्षण *गुरिल्ला युद्ध* पद्धति के प्रणेता थे, जिसके चक्रव्यूह में फँसकर शत्रु की विशाल सैन्य वाहिनी भी छिन्न-भिन्न हो जाती थी। उनकी यही *कालजयी युद्ध नीति, भीष्म प्रतिज्ञा और अभेद्य दूरदर्शिता* उन्हें इतिहास के क्षितिज पर सदैव के लिए *अमर और वंदनीय* बनाती है।

यह बात *महाराणा प्रताप* की *486 वीं जयंती* एवं *हल्दी घाटी युद्ध* के *450 वें स्मृति दिवस* की पृष्ठभूमि में राष्ट्रवाद और वैचारिक चेतना को समर्पित अग्रणी संस्था ' *समुत्कर्ष समिति* ' की ऑनलाइन 147 वीं विचार गोष्ठी के मुख्य विषय ' _हल्दीघाटी के अजेय योद्धा : वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप_ ’ पर बोलते हुए *सुप्रसिद्ध मनीषी, प्रखर विचारक एवं ओजस्वी वाग्मी आदरणीय ओमप्रकाश जी* ने कही l जिसमें देश भर से प्रबुद्धजनों, इतिहासकारों और युवाओं ने ऑनलाइन माध्यम से सहभागिता की। विषय पर अपनी विद्वत्तापूर्ण प्रज्ञा से व्यापक प्रकाश डालते हुए उन्होंने महाराणा प्रताप के पावन जीवन-वृत्त से अनुकरणीय एवं प्रेरणास्पद दृष्टांत प्रस्तुत करते हुए उन्हें *अप्रतिम दूरदर्शी, कालजयी जननायक, परम प्रजापालक, अदम्य साहसी एवं सर्वसमावेशी महानायक* के रूप में निरूपित किया।

प्रखर वक्ता ओमजी भाईसाहब के सारगर्भित पाथेय के अनुसार महाराणा प्रताप का संपूर्ण जीवन *असीम शौर्य, अनन्य राष्ट्रभक्ति और अडिग स्वाभिमान की एक अनुपम साक्षात् गाथा* है। वे केवल एक अद्वितीय योद्धा ही नहीं, अपितु एक अत्यंत संवेदनशील प्रजापालक थे, जिन्होंने राजप्रासादों के वैभव का परित्याग कर कंदराओं के कष्टप्रद जीवन को सहर्ष अंगीकार किया, किंतु *राष्ट्र के गौरव* को अक्षुण्ण रखा। समाज के अंतिम सोपान पर स्थित वनवासियों एवं भील सहोदरों को सस्नेह गले लगाकर, उन्हें राष्ट्र-रक्षा की मुख्यधारा में सम्मिलित करना उनके *सर्वसमावेशी एवं समरस नेतृत्व* का अप्रतिम परिचायक है।

*25 से अधिक पुस्तकों के लेखक ओमप्रकाश जी द्वारा रेखांकित महाराणा प्रताप के महान गुण 😗

आदरणीय ओमप्रकाश जी ने अपने सारगर्भित पाथेय में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के बहुआयामी व्यक्तित्व और उनके जीवन के महान शाश्वत आदर्शों की विस्तृत मीमांसा की। उन्होंने _ऐतिहासिक साक्ष्यों के आलोक में प्रताप के चरित्र को केवल एक योद्धा के रूप में नहीं, अपितु एक महामानव_ के रूप में स्थापित करते हुए निम्नलिखित अनूठे बिंदुओं को उजागर किया :

अप्रतिम महापराक्रम एवं शौर्य के जीवंत प्रतीक

महाराणा प्रताप का संपूर्ण जीवन-वृत्त *अदम्य साहस, अप्रतिम पुरुषार्थ और कभी न झुकने वाले स्वाभिमान* की एक अनुपम और जीवंत महागाथा है। ओमप्रकाश जी ने स्पष्ट किया कि उनका पराक्रम किसी सांसारिक वैभव अथवा साम्राज्य विस्तार की लिप्सा से प्रेरित नहीं था, बल्कि वह *मातृभूमि की संप्रभुता की रक्षा के लिए समर्पित एक पवित्र अनुष्ठान* था। जब तत्कालीन भारत के अनेक शासक महाशक्तिशाली सत्ता के सम्मुख नतमस्तक होकर आत्मसमर्पण कर रहे थे, तब प्रताप ने अपनी लघु सैन्य शक्ति के साथ उस प्रचंड साम्राज्यवादी चुनौती को न केवल स्वीकार किया, अपितु उसे धूल धूसरित भी किया। उनका शौर्य इतिहास के क्षितिज पर आत्मसम्मान का एक देदीप्यमान नक्षत्र है।

*विलक्षण जननायक एवं कृपालु प्रजापालक

_प्रताप एक अत्यंत संवेदनशील, प्रजावत्सल और लोक-कल्याणकारी शासक थे_ । उन्होंने राजप्रासादों के सुख, मखमली बिस्तरों और छप्पन भोगों के वैभव का सहर्ष परित्याग कर दिया, किंतु अपनी प्रजा की स्वाधीनता का सौदा कभी नहीं किया। अरावली की कंदराओं और वनों के कष्टप्रद जीवन को आत्मसात करते हुए भी उन्होंने प्रजा के सुख-दुख को सर्वोपरि रखा। सामाजिक समरसता के वे अप्रतिम संवाहक थे; उन्होंने समाज के अंतिम छोर पर जीवन यापन करने वाले भील, वनवासी और जनजातीय सहोदरों को न केवल सस्नेह हृदय से लगाया, बल्कि उन्हें सैन्य संगठन में सर्वोच्च स्थान देकर राष्ट्र-रक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा। यही कारण था कि *संपूर्ण प्रजा उनके एक आह्वान पर सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर रहती थी।*

*उज्ज्वल, निष्कलंक एवं अनुकरणीय चरित्र

युद्ध की विभीषिका और घोर संकट काल में भी *नैतिक मूल्यों, धर्म और मानवीय मर्यादाओं का अक्षुण्ण पालन करना प्रताप के चरित्र की पराकाष्ठा* थी। ओम जी भाई साहब ने उनके उदात्त चरित्र का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हुए बताया कि जब कुंवर अमर सिंह ने शत्रु पक्ष (मुगल सेनापति) के अंतःपुर की महिलाओं को बंदी बना लिया, तब महाराणा प्रताप ने इस कृत्य पर घोर अप्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने अपनी सनातन संस्कृति के आदर्शों के अनुरूप शत्रु पक्ष की बेगमों और महिलाओं को पूर्ण राजकीय सम्मान, आदर और सुरक्षा के साथ *ससम्मान वापस भिजवाया* । उनका यह निष्कलंक और गरिमामायी चरित्र आज के युग के लिए भी एक *वंदनीय आदर्श* है।

*गुरिल्ला (छापामार) युद्ध पद्धति के महान प्रणेता

सीमित सैन्य बल और अत्यंत न्यून संसाधनों के उपरांत भी महाराणा प्रताप ने अपनी *असाधारण कूटनीति और अभेद्य युद्ध कौशल* का परिचय दिया। वे भारत में गुरिल्ला (छापामार) युद्ध पद्धति के आदि-प्रणेताओं में से एक थे। उन्होंने अरावली पर्वतमाला की दुर्गम भौगोलिक संरचना का अत्यंत कुशलता और सूक्ष्मता से सामरिक उपयोग किया। उनकी यह छापामार युद्ध नीति इतनी अचूक, मारक और सटीक थी कि संख्या बल में कई गुना विशाल और आधुनिक अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित मुगल वाहिनी भी उनके इस चक्रव्यूह में दिशाहीन होकर छिन्न-भिन्न हो जाती थी।

*सुदूरगामी एवं अत्यंत दूरदर्शी नेतृत्व

प्रताप केवल तात्कालिक परिस्थितियों से जूझने वाले योद्धा नहीं थे, अपितु वे एक अत्यंत *दूरदर्शी, प्रज्ञावान और भविष्यद्रष्टा* शासक थे। उन्होंने आने वाली भावी चुनौतियों और दीर्घकालिक संकटों को समय से पूर्व ही भांप लिया था। इसी दूरदर्शिता के कारण उन्होंने दुर्गम क्षेत्रों में *आंवरगढ़* जैसी सुदृढ़ रक्षा पंक्तियों का निर्माण किया, छप्पन की पहाड़ियों में *चावंड* जैसी सुरक्षित राजधानी स्थापित की और विषम परिस्थितियों में भी मेवाड़ को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए कृषि, लघु उद्योग और हस्तशिल्प की पुनर्स्थापना की।

*हल्दीघाटी युद्ध पर ऐतिहासिक सत्य

मेवाड़ के इतिहास मर्मज्ञ ओमप्रकाश जी ने ऐतिहासिक तथ्यों के साथ प्रतिपादित किया कि *हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप की स्पष्ट विजय हुई थी* । हल्दीघाटी के मैदान में महाराणा प्रताप और उनके योद्धाओं के भयानक व भीषण आक्रमण के आगे मुगल सेना टिक नहीं सकी और वह पीठ दिखाकर भाग खड़ी हुई थी। इस युद्ध में सम्राट अकबर अपने *किसी भी मनसूबे में कामयाब नहीं हो सका* । _वह न तो महाराणा प्रताप को पराभूत (पराजित) कर सका और न ही उन्हें बंदी बना पाया_ । युद्ध का परिणाम मुगलों के विपरीत आने के कारण अकबर अपने सेनापतियों से इतना नाराज हुआ कि उसने उनकी *ड्योढ़ी (दरबार में आना)* तक बंद कर दी थी। इसके चार महीने बाद अकबर को स्वयं विशाल सेना लेकर मेवाड़ पर चढ़ाई करने आना पड़ा था।

*दिवेर युद्ध और 15 वर्षों का पुनरुत्थान काल

ओमप्रकाश जी ने आगे सन् 1582 में हुए ऐतिहासिक *'दिवेर युद्ध* ' की महाविजय का भी विशेष उल्लेख किया। उन्होंने प्रामाणिक उदाहरणों के साथ स्पष्ट किया कि दिवेर की विजय महाराणा प्रताप की अद्भुत सैन्य रणनीति और अदम्य साहस का चरम उत्कर्ष थी, जिसने मुगलों के हौसले पूरी तरह पस्त कर दिए। इस युद्ध के बाद मेवाड़ में 15 वर्षों का *शांति एवं पुनरुत्थान काल* आया। इस दीर्घ शांतिकाल के दौरान _महाराणा प्रताप ने न केवल मेवाड़ की अर्थव्यवस्था को सुधारा, बल्कि कृषि, जल प्रबंधन, संस्कृति, साहित्य और कला को पुनर्जीवित क_ र स्वावलंबन का एक नया युगांतकारी अध्याय लिखा।

विचार गोष्ठी में *मंगलाचरण* का पाठ शिक्षाविद् पीयूष दशोरा ने किया l *विषय का प्रवर्तन* करते हुए शिक्षाविद और विचारक सत्यप्रिय मैत्री ने प्रताप के जीवन वांग्मय एवं हल्दी घाटी युद्ध विजय का उल्लेख कर कहा कि महाराणा प्रताप के शौर्य और स्वाभिमान का इतिहास आज भी हर भारतीय की रगों में राष्ट्रप्रेम का संचार करता है l विचारक विद्यासागर एवं विदुषी मंजू चौधरी ने भी इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त किए l

समुत्कर्ष पत्रिका के *उप संपादक* गोविन्द शर्मा द्वारा ने मुख्य वक्ता ओमप्रकाश जी और ऑनलाइन जुड़े सभी संभागियों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि गोष्ठी का यह विमर्श समाज को एक नई वैचारिक दिशा देगा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि महाराणा प्रताप का यह जीवन संदेश जन-जन तक फैले। समुत्कर्ष विचार गोष्ठी का *संचालन* शिवशंकर खण्डेलवाल ने किया ।

इस ऑनलाइन विचार गोष्ठी में भागीरथ सिंह,नारायण उपाध्याय, दर्शना व्यास, नवीन झा,नन्दसिंह नरूका, कृष्णा शर्मा, लोकेश जोशी,पृथ्वीराज राठी, गोपाल माली, त्रिभुवन चौबीसा, गोपाल शर्मा, डॉ. परमेन्द्र दशोरा,अशोक पुरोहित, भूपेन्द्र उबाना, शीला काहाल्या, दिग्पाल सिंह, डॉ. मृदुला तिवारी, सुनील विश्नोई, राजेन्द्र पामेचा, पुष्कर माली, उपेन्द्र सिंह,मदन टांक, विनोद चपलोत, मुकेश मंत्री, राजेन्द्र सिंह, विभाष आर्य, तरुण शर्मा, राजेश गोराया, शिवदान सिंह जोलावास, मगन जोशी, लोकेश सोनी, नरेश डांगी, संदीप आमेटा तथा सोनल गांधी सम्मिलित हुए।
#योद्धा #हल्दीघाटी #प्रताप #ओमप्रकाश

16/06/2026

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147 वीं #समुत्कर्ष विचार गोष्ठी
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दिनांक : 16 जून 2026, मंगलवार
समय : सायं 5.45 बजे
विषय : #हल्दीघाटी के #अजेय #योद्धा : वीर #शिरोमणि #महाराणा #प्रताप
प्रबोधन: मान्यवर #ओमप्रकाश जी
लेखक, विचारक, प्रखर वक्ता
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14/06/2026

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ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में #हल्दीघाटी का युद्ध मात्र दो सेनाओं का पारस्परिक संघर्ष नहीं, अपितु साम्राज्यवादी लिप्सा और अदम्य मातृभूमि-अनुराग के मध्य एक युगांतरकारी महासंग्राम था। यद्यपि संख्याबल की दृष्टि से मुगल वाहिनी अत्यंत विशाल और साधन-संपन्न थी, तथापि #महाराणा #प्रताप के वज्र-तुल्य संकल्प और अपराजित राष्ट्र-भक्ति के सम्मुख सम्राट अकबर के साम्राज्यवादी मंसूबे पूर्णतः ध्वस्त हो गए।
हल्दीघाटी का युद्ध इतिहास के पृष्ठों में इस शाश्वत सत्य का उद्घोष करता है कि भौतिक संसाधन और विशाल सैन्य बल कभी भी किसी राष्ट्र की स्वातंत्र्य-चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता को पराभूत नहीं कर सकते।
महाराणा प्रताप न तो पराजित हुए और न ही झुके; वे भारतीय इतिहास के आकाश में शौर्य, त्याग और अखंड स्वाभिमान के दैदीप्यमान नक्षत्र के रूप में सदैव वंदनीय हैं।
#मेवाड़ #सनातन
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*147 वीं #समुत्कर्ष विचार गोष्ठी*
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
दिनांक : *16* जून 2026, *मंगलवार*
समय : सायं *5.45* बजे
विषय : *हल्दीघाटी के अजेय योद्धा : वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप*
प्रबोधन: *मान्यवर ओमप्रकाश जी*
लेखक, विचारक, प्रखर वक्ता
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13/06/2026

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वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की भीष्म प्रतिज्ञा

"जब तक शत्रुओं से मैं अपनी पावन मातृभूमि को मुक्त नहीं करा लेता, तब तक न मैं महलों में रहूँगा और न ही सोने-चाँदी के बर्तनों में भोजन करूँगा।
घास ही मेरा बिछौना होगा और पत्तल-दोने ही मेरे भोजन करने के पात्र होंगे।"
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147 वीं समुत्कर्ष विचार गोष्ठी
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दिनांक : 16 जून 2026, मंगलवार
समय : सायं *5.45* बजे
विषय : हल्दीघाटी के अजेय योद्धा : वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप
प्रबोधन: मान्यवर ओमप्रकाश जी
लेखक, विचारक, प्रखर वक्ता
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#मेवाड़ #सनातन

*गंगा : सनातन चेतना की पावन और मोक्षदायिनी धारा*गंगा भारतीय संस्कृति की आत्मा, सनातन चेतना की जीवनरेखा और मानवीय गरिमा क...
24/05/2026

*गंगा : सनातन चेतना की पावन और मोक्षदायिनी धारा*

गंगा भारतीय संस्कृति की आत्मा, सनातन चेतना की जीवनरेखा और मानवीय गरिमा का परम प्रतीक है। कल-कल निनादिनी गंगा मात्र जल की धारा नहीं, अपितु सनातन संस्कृति के अंतःकरण की पावन चेतना है। भगीरथ के तप की यह जाज्वल्यमान परिणति, स्वर्ग के ऐश्वर्य को समेटे मृत्युलोक को पवित्र करने उतरी देवतुल्य करुणा है। इसके पावन तटों पर ऋषियों का चिंतन अंकुरित हुआ और वेदों की ऋचाएं गूंजीं। ये विचार *समुत्कर्ष समिति* द्वारा भारतीय संस्कृति की अक्षय धरोहर वेदों के सन्दर्भ में *'गंगा नदी : आस्था आध्यात्म एवं मोक्ष की धारा'* विषयक 146 वीं समुत्कर्ष विचार गोष्ठी में बोलते हुए विज्ञ वक्ताओं ने व्यक्त किए l

समुत्कर्ष समिति के समाज जागरण के ऑनलाइन प्रकल्प *समुत्कर्ष विचार गोष्ठी* में वक्ताओ ने 25 मई से राजस्थान में प्रारम्भ हो रहे *वंदे गंगा जल संरक्षण जन-अभियान-2026* का उल्लेख करते हुए एक सुर में कहा कि गंगा का प्रत्येक बिंदु आस्था का महासागर और आध्यात्म का साक्षात आलोक है, जो सांसारिक कलुषता को धोकर आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है। जनजन के दुखों को हरने वाली यह जीवनदायिनी धारा, जीवन के अंतिम पड़ाव पर पतितपावनी बनकर मोक्ष का परम मार्ग प्रशस्त करती है।

*विषय का प्रवर्तन* करते हुए शिक्षाविद और विचारक पीयूष दशोरा ने बताया कि गंगा का इतिहास भारत के उत्थान और पतन का गवाह रहा है। इसके किनारे हमारी ऋषिकालीन परंपराएं विकसित हुईं और आज भी यह नदी करोड़ों लोगों की आस्था का संबल बनी हुई है। गंगा के तट पर भारत के सबसे पवित्र और प्राचीन शहर बसे हैं, जैसे ऋषिकेश, हरिद्वार, वाराणसी (काशी), और प्रयागराज। ये शहर सदियों से आध्यात्मिक चेतना, शिक्षा और दर्शन के मुख्य केंद्र रहे हैं।

*साहित्यकार* तरुण कुमार दाधीच ने युवा पीढ़ी की भूमिका पर विशेष बल देते हुए कहा कि आधुनिकता की दौड़ में हमारी नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होती जा रही है। गंगा जैसी जीवनदायिनी नदियों के प्रति श्रद्धा भाव जगाना और उनके ऐतिहासिक महत्व को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना समय की मांग है। युवाओं को आगे आकर गंगा और उसकी सहायक नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के लिए डिजिटल और ज़मीनी स्तर पर बड़े जन-आंदोलन खड़े करने होंगे।

*समसामयिक परिप्रेक्ष्य और पर्यावरणीय चुनौतियां*
विचार गोष्ठी में *मंगलाचरण* का पाठ करते हुए शिक्षाविद् महेश जोशी ने सनातनी ऋषि मुनियों का उल्लेख कर पर्यावरण और समसामयिक स्थिति पर बोलते हुए कहा कि आज गंगा नदी एक कठिन दौर से गुजर रही है। औद्योगिकीकरण और अनियोजित शहरीकरण के कारण इस पवित्र नदी का अस्तित्व संकट में है। सरकार द्वारा चलाए जा रहे 'नमामि गंगे' जैसे अभियानों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जब तक सरकारी प्रयासों के साथ जन-भागीदारी नहीं जुड़ेगी, तब तक गंगा को पूरी तरह स्वच्छ और अविरल बनाना संभव नहीं होगा। गंगा का संरक्षण केवल एक प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि हर भारतीय का नैतिक और राष्ट्रीय कर्तव्य है।

*पौराणिक परिप्रेक्ष्य: स्वर्ग से अवतरण की पावन गाथा*
गोष्ठी में पौराणिक दृष्टिकोण को विस्तार से रखते हुए सत्यप्रिय आर्य ने कहा कि हमारे शास्त्रों में गंगा को देव नदी माना गया है। राजा भगीरथ की घोर तपस्या के बाद कपिल मुनि के श्राप से भस्म हुए अपने साठ हजार पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था। भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा के वेग को संभालकर पृथ्वी को इसके प्रचंड वेग से बचाया था। यह पौराणिक कथा हमें सिखाती है कि महान उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए भगीरथ प्रयास और समर्पण की आवश्यकता होती है। गंगा का हर बिंदु मोक्षदायिनी शक्ति से परिपूर्ण है।

*आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य: अंतःकरण को शुद्ध करती चेतना की धारा*
विदुषी मंजु चौधरी ने अपने माँ गंगा के साथ अपने अनुभवों का उल्लेख करते हुए गंगा के आध्यात्मिक पक्ष को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि गंगा केवल शरीर के मैल को नहीं धोती, बल्कि यह मनुष्य के अंतःकरण को पवित्र करती है। ऋषिकेश और हरिद्वार से लेकर काशी के घाटों तक, गंगा की आरती और इसके तट पर होने वाला ध्यान मनुष्य को भौतिक संसार से उठाकर परम तत्व से जोड़ता है। भारतीय दर्शन में गंगा को साक्षात ज्ञान की देवी और मोक्ष का मार्ग माना गया है। इसके जल की एक बूंद में भी वह आध्यात्मिक ऊर्जा है जो अशांत मन को असीम शांति प्रदान कर सकती है।

*संस्कृति और सामाजिक समरसता की प्रतीक*
गोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए प्रबुद्ध वक्ता विद्यासागर ने कहा कि गंगा ने कभी भी किसी में भेद नहीं किया। इसके घाटों पर आकर राजा और रंक, जाति और धर्म के सारे बंधन टूट जाते हैं। गंगा भारत की सामासिक संस्कृति की जननी है। भारत की अर्थव्यवस्था, कृषि और करोड़ों लोगों की आजीविका सीधे तौर पर इस नदी पर टिकी हुई है। यदि गंगा समृद्ध रहेगी, तो भारत का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।

विचारक दर्शन सिंह रावत,ख्यात चित्रकार डॉ. जगदीश कुमावत ने भी इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त किए l

*समुत्कर्ष पत्रिका के उप संपादक* गोविन्द शर्मा द्वारा आभार प्रकटीकरण करते हुए कहा कि 146 वीं गोष्ठी का यह विमर्श समाज को एक नई वैचारिक दिशा देगा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि वक्ताओं द्वारा दिए गए सुझावों और विचारों को सोशल मीडिया एवं पत्र-पत्रिका के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाया जाएगा ताकि गंगा संरक्षण का यह संदेश दूर-दूर तक फैले। समुत्कर्ष विचार गोष्ठी का *संचालन* शिवशंकर खण्डेलवाल ने किया ।

इस ऑनलाइन विचार गोष्ठी में अरविंद सिंह सिसोदिया, गोपाल माली, विजय कुमार शर्मा, त्रिभुवन चौबीसा, गोपाल शर्मा, डॉ. अनिल कुमार दशोरा, गरिमा खंडेलवाल, मंगल कुमार जैन, रामेश्वर प्रसाद शर्मा, पुष्कर माली, वीणा जोशी, संदीप आमेटा, पुष्कर गाडरी तथा नर्बदा देवी सम्मिलित हुए।

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