Aranyak

Aranyak यह मंच जीवन के निविड़ वन में जीने की कला सीखने हेतु मित्रों के लिए अवसर है।

आरण्यक शब्द का अर्थ होता है, ‘जो वन में घटित हो!’

‘आरण्यक’ नाम से यह मंच जीवन के निविड़ वन में साथ चलने हेतु ऐसे मित्रों के लिए आमंत्रण है, जो जहाँ एक तरफ़ जीवन के रहस्य को बस खेल खेल में उघाड़ने में उत्सुक हों, वहीं दूसरी तरफ़ वे प्रचंड गम्भीरता से जो सुख-दुःख से रचा पचा जीवन है, उसको उसकी परिपूर्णता में देखने समझने की प्यास से भी भरे हुए हों।

यह साथ साथ चलना अंत में कुछ पाने या कुछ खोजने की मंशा से नहीं है, वरन ऐसे है, जैसे अनायास ही मित्र साथ साथ भ्रमण के लिए किसी अज्ञात वन में निकले हों और बाहर जो वन है, उसकी अनिश्चितता को बड़ी ही सावधानी से देखते हुए भीतर भी क्षण क्षण बदलता ‘जो है’ उसे भी जस का तस निहारते चलते हों।

भीतर के सोच विचार, भाव, उन सब के इकट्ठा चलने का ढंग साथ ही इन सब के बीच का वह ‘मैं’ जिसके इर्द गिर्द यह सब बुना जाता है, सबको एक साथ देखते जाते हों।

उत्तर अज्ञात रूप से इस दर्शन अवलोकन से जीवन के आमूल रूपांतरण के रूप में स्वयं ही जीवन में घटित होता जाएगा।

इस मंच पर न कोई गुरु है, न कोई शिष्य है। न ही कोई तय विधान है। हर व्यक्ति समान रूप से संवाद का उत्तरदायी है।

21/09/2026

संबंधों के दर्पण में ख़ुद को देखना, ख़ुद का पता चलना.

🙏🏻🪷

19/09/2026

अहंकार के भ्रम से पार, स्व का अंत ही बोध है ~ THE ENDING OF PERSONAL - ENLIGHTENMENT
Dimple Desai

14/09/2026

मेरा साधु कहना ~ मिटते पदचिह्नों के गीत
- धर्मराज जी

14/09/2026

अधीनता का अंत

09/09/2026

जब तक उसे तलाश न लिया जाये, पाँव टिकते नहीं हैं ~ Until it is found, one cannot rest.

08/09/2026

सम्यक संवाद में बातें दोहराती नहीं हैं - In right communication, things are not repeated.

07/09/2026

हँसता हुआ अमृत
~~~~~~~~~~~~~~~-

पाथर होती मैं
तो इतनी चोटों पर मूरत हो जाती
आँखों से इतनी रिसी हूँ कि
पानी होती तो सागर हो जाती
इतनी जली हूँ कि
काठ होती तो
जहाँ से तिमिर
सदा के लिए बुझा पाती

खोकर आपा इतनी घिसी हूँ कि
चंदन होती तो
फ़िज़ाओं में घुल गगन हो जाती
थपेड़ों में इतनी बही हूँ कि
हवा होती तो
दिशाओं के पार निकल जाती

क्या ख़ूब उघाड़ा
प्रिय तुमने होना मेरा
हँसूँ कि उघड़कर मैं पाई नहीं गई
रोऊँ कि मैं ढँपकर क्यूँ बनी पड़ी थी

आह! होकर भी मैं कुछ न थी
भले न होकर भी मैं ख़ूब नज़र आती थी
होकर मैं बिरहन परछाई थी
न होकर खुद प्रियतम हूँ
सोई तो त्यक्ता थी
जागी तो पाई सदा सुहागिन हूँ
क्या ख़ूब उघाड़ा
प्रिय तुमने होना मेरा
पाकर खुद को दुखियारी मरती थी
खोकर खुद को हँसता हुआ अमृत हूँ

!!सुरोमिता जी को उनके जन्मदिन पर भेंट!!

धर्मराज

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Village Adiannamalai, Taluka Adiannamalai
Tiruvannamalai
606604

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