03/10/2024
अभी हाल ही आस्था के कूप में से नई घटना सामने आई है. दरअसल यह सब होना ही था, लेकिन समस्या यह रही कि यह कूप उच्च वर्गीय और तथा कथित पढ़े लिखों का घर था, जहां अंग्रेजी का बोलबाला रहा, जहां से निकले चटनी के पेकेट भी सैकड़ों के दाम के होते हैं, जहां का मालिक ब्रटेन के प्रधअन मंन्त्रि के साथ बैठा है, जिसके राजनैतिक सम्बन्ध बहुत गाड़ हैं, चाहे अमेरिका हो या यूरोप हो।ं
सबसे हले ढ़े लिखे की परभाषा ही समझ लें, बात हम दर्शन की करें और शान मारे विझ्ञान की पढ़ाई की। दरअसल असली पढ़ाई लिखाई खत्म सी है, जो है वह डिग्री और नौकरी से सम्बन्धित है ज्ञान से नहीं, जानकारी तक दूर भाग रही है। एक बार प्रदीप जी के मित्र जो अच्छे राकेट इंजीनियर रहे हैं ने मुझ से कहा कि मैं आपको एक व्यक्ति से मिलवाना चाहता हूं, से जो विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं, अब वेद वेदान्त सब जानते हैं। मुझे मालूम है कि दर्शन दो तरह से पढ़ा जाता है, एक तो जानकारी सूचक, यानी किसने क्या कहा, दूसरा स्वयं चिन्तन मनन करके नई राह समझना। दूसरा कठिन होता है।मैंने उन से कहा कि मैं राकेट सम्बन्धी दो किताबे पढ़ कर कितना जान सकती हूं। जैसे आप लोग शोध करते हैं वैसे तो नहीं कर सकती न? वे समझदार थे। कहने लगे, मैं समझ गया, आप क्या कहना चाहती हैं।
इसी तरहके कूपों में जाने वाले लोग विदेशी दर्शन छोड़ बारतीय दर्शन को न समझ पाते हैं न चिन्तन कर पाते हैं। वे दूसरों के चिन्त के उगालदान से कुछ चख लेते हैं। इसलिए वे जब दर्थन के कूप में जाते है तो मंडूक ही होते हैं।
मैंने पहली बार इसा के उस महालय में नकली चट्टाने, नकली हमालय नकली गुफाएं देखीं जहां पर सफेद पीले चरधारी जन ध्यान में गे थे, उसका खोखला पन समझ में आ गया।
स्वाध्याय से बढ़ कर कुछ नहीं होता यह समजने कीजरूरत भी नहीं ।
अब कुछ पर्दे खुल रहे हैं, चलिए अच्छा है, अब सोचने की बात है कि लोग इस तरह की आस्था कके पंजे में कैसे आ जाते हैं. लेकिन आश्चर्य की भी नही. केरल मे एक युवा ने अपने डाक्टर मातापिता के साथ अन्य सदस्यों को मार दिया था, क्यों कि वह जादू टौना सिद्ध करना चाहता था। मेरा बहुत सामान्य अनुभव हुआ। जयपुर में काम करने वाली बाई कभी कभी तेल भी लगा देती थी। यह तेल केरल के धन्वन्तरी का ते था। सामान्य , लेकिन कुछ जड़ी बूटी थी, लेकिन ऐसा चमत्कारिक भी नहीं कि छूते ही दर्द खत्म हो जाए। वह महिला तेल लगाने के बाद अपने हाथ पैर में भी तेल चुपेड़ लेती थी।मैंने कभि मना किया नहीं। जब मैं वहां से आ गई तो उसे तेल की याद आई। मुझ से कहने लगी अम्मा, तेल नहीं था तो मेरे पाथ पैरों में बहुत दर्द हुआ। मैने कहा,तुम रोजाना तो लगाती नहीं थी। और जरा से तेल से क्या होोता?लेकिन वह उसे चमत्कारिक तेल ही मन रही थी।
यह उसकी आस्था थी, जिसका आधार कुछ नहीं सिर्फ उसका विश्वास था। कूपों में जाने वाले लोग किसी न किसी दर्द को हटाने के लिए किसी विश्वास को कर थाम लेती है।
बाद में उस कूप से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। लेकिन ८० प्रतिशत महिलाएं ६० प्रतिशत पुरुष इस के मार हैं।
Rati Saxena