Sangharsh Vidyarthi

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मजहब के विपरीत प्रत्येक मानव के लिए प्रेरणा श्रोत गीत!!!अविकसित हृदयस्थ मूल्यों और अहम् के लक्षणों को सांकेतिक रूप से बह...
04/01/2026

मजहब के विपरीत प्रत्येक मानव के लिए प्रेरणा श्रोत गीत!!!
अविकसित हृदयस्थ मूल्यों और अहम् के लक्षणों को सांकेतिक रूप से बहुत ही व्यवस्थित, सरल और हृदयस्पर्शी तरह से इस गीत के माध्यम से हमारे समक्ष परोसा गया है। सहज ही समझ आ जाने के लिए इससे सर्वोत्कृष्ट पथ नहीं हो सकता जहां मनोरंजन भी है और प्रेरणा भी। ऐसे गीत को सुनने से व्यक्ति में आत्मचिंतन का विकास होता है और धीरे धीरे स्वतः ही ये प्रक्रिया आत्मसंश्लेषण में परिवर्तित हो जाती है जिससे सकारात्मक विकास होने की पूर्ण संभावना होती है।

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वास्तविक ऋषि कौन?मैं अपने प्रत्येक लेख में हर वक्त भारतीय ऋषियों ने यह कहा ,भारतीय ऋषियों का यह चिंतन जैसे वाक्यों का अत...
16/08/2025

वास्तविक ऋषि कौन?
मैं अपने प्रत्येक लेख में हर वक्त भारतीय ऋषियों ने यह कहा ,भारतीय ऋषियों का यह चिंतन जैसे वाक्यों का अत्यधिक प्रयोग करता हूंँ। परन्तु कई बार मित्रों से चर्चा के दौरान मैं बारम्बार यह महसूस करता हूंँ कि वे अपने अहंकार, निजी आवश्यकताओं की पूर्ति, और अपने शरारत को छुपाने या स्थापित करने के लिए ऋषियों का नाम लेते रहते हैं जिससे सामान्य मस्तिष्क में यह आजीवन स्थित धारणा बन जाती है कि यह ऋषियों की वाणी है और इसी आधार पर आजीवन अहेतुक तर्क के सहारे एवम् मानसिक भ्रांति के कारण भटकता रहता है। इसीलिए मैं यहांँ वास्तविक ऋषि और अवास्तविक या यूँ कह लें कि बहुरूपिया ऋषि और तत्वदर्शी ऋषि को अपने मानसिक स्तर पर सार्वभौमिक रूप में परिभाषित करने की कोशिश कर रहा हूंँ।
एक सामान्य मस्तिष्क का ऋषि और ब्रह्म जिज्ञासुओं का ऋषि दोनों ही भिन्न है । सामान्य मस्तिष्क के व्यक्ति का ऋषि एक सुनियोजित बहुरूपिया, एक आरोपित तत्वदर्शी होता है जिसका तत्व से दूर-दूर तक किसी तरह का कोई भी संबंध नहीं होता है परन्तु सामान्य व्यक्ति में अपने वाक्पटुता के कारण वह बहुरूपिया येन-केन-प्रकारेण वर्चस्व बनाने में दक्ष होता है। उसको ठीक पता होता है कि सामान्य मस्तिष्क सिर्फ भोग , भोजन और मनोरंजन के लिए ही जीवन जीता है, और उसको दिशांतरित करने का सबसे आसान जरिया उसके अंदर मौजूद प्राकृति कमजोरी भय और लालच है, जिसके आधार पर ये बहरूपिया जी, जो संस्कृत और हिंदी में पारंगत होते हैं और जिन लोगों ने न तो शास्त्र को देखा है और न ही भगवत् राह के अन्योक्तिपूर्ण भाषा को समझा है उनके समक्ष ऋषियों की वाणी, ऋषियों की वाणी, सनातन शिक्षा के नाम पर मनगढ़ंत, अहेतुक, कुतर्क, मनोनुकूल, आकर्षक बातों को व्यक्त कर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं । ऐसे बहुरूपिया जी, जो सामान्य व्यक्ति की पहुंच से दूर एक गुलाम के अलावा कुछ भी नहीं होते और पर्दे और मंच के पीछे नग्न मजाक के पात्र होते हैं। वो बेचारा गले में पट्टे बंधे मदारी के बंदर की भांति होते है जिसको जितना आदेश हो उतना ही नाटक करना है उससे विपरीत कार्य उसकी मृत्यु का कारण भी बन सकता है।
परन्तु ब्रह्मवेताओं या ब्रह्म जिज्ञासुओं का ऋषि एक ऐसा मंत्र द्रष्टा होता है जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड का नियम द्रष्टा होता है और अपने तपस्या और साधना के सतत् प्रयोग से प्रकृति के गहराई में उतर कर उसके संपूर्ण नियमों और तत्वों से ओत-प्रोत एवम् द्रवित हुआ होता है। समाज में व्याप्त सद् एवम् असद् विषय को तत्वज्ञ होने के कारण अलग-अलग कर के देखता है और सद् के स्थापनार्थ असीमित षडयंत्र और कूटनीति के मध्य से सहजीवन के राह के सूत्रों को न मर जाने तक बांटता रहता है। वह उन संपूर्ण नियमों को तत्व से आत्मसात कर परिणामदर्शी होने के कारण सामान्य व्यक्ति को दिशांतरित करने वाले बहुरूपियों और प्राकृतिक अज्ञानता से ऊपर उठाने के लिए सूत्रात्मक रूप से बचाव के विषय परोस कर जाता है । ताकि सामान्य मस्तिष्क भटकाव एवम् भ्रांति से ऊपर उठ कर सरल एवं सर्वहितकारी जीवन जी सके। जिन्होंने उन सूत्रात्मक नियमों को जानने का प्रयत्न किया उन्होंने उन सूत्रों से संयोजित एवं संग्रहित ग्रन्थ को शास्त्र कहा । अगर हम सरल भाषा में शास्त्र को परिभाषित करें तो " शास्त्र शुद्ध हेतुवादी और न्यायपूर्ण जीवन जीने के सूत्रों के संग्रहण का नाम है"। और उन सूत्रों के द्रष्टा और खोजी वे ऋषि हैं।
अपवाद हर स्थल पर संभव है। यह अंतिम परिणति नहीं है। आपको पूर्ण अधिकार है इसको संशोधित करने का । कृपया त्रुटियों की उपेक्षा करते हुए विषय की वास्तविकता पर ध्यान दें। आपने इस लेख को ध्यान से पढ़ा इसके लिए मैं अनुग्रहित हूँ। धन्यवाद!
मानवत्व के हित में,
संघर्ष

यह वीडियो सिर्फ संकेतात्मक है, परन्तु समय की अपर्याप्तता और मंच की गरिमा के कारण वहांँ विस्तृत रूप दे पाना संभव नहीं हो ...
14/08/2025

यह वीडियो सिर्फ संकेतात्मक है, परन्तु समय की अपर्याप्तता और मंच की गरिमा के कारण वहांँ विस्तृत रूप दे पाना संभव नहीं हो पाया। मैंने इस वीडियो में शिक्षक, शिक्षा और शिक्षालय पर एक टिप्पणी की है कि वर्तमान समय में ये तीनों ही स्तंभ जो मानव प्रकृति के लिए अनिवार्य चिंतन थे, वे अपने स्थान से भटक चुके हैं, जिसका परिणाम आज के समय में एक चिंतनशील, संवेदनशील, सजग और जीवित व्यक्ति के लिए समझना बिल्कुल भी कठिन नहीं है। मैं सोचता था कि आज तक के इतिहास में इस धरा पर इतने चिंतनशील लोकहितैशी, करुणानिधि लोग आए जिन्होंने मानव के स्तरीय विकास के विषय में अगणित पथ दिए परन्तु समस्त पथ पथभ्रमित साबित हुए इसका मूल कारण क्या है? । परन्तु आज यह समझना बिल्कुल कठिन नहीं है कि शिक्षा जो व्यक्ति के अन्तःकरण में मौजूद मानवीय गुणों के विकास हेतु चिंतनशील व्यक्तियों द्वारा स्थापित किया गया था, वह शिक्षा आज के समय में अपने औचित्य से भटक चुकी है या स्पष्ट कहें कि शरारती तत्वों द्वारा उसका दिशांतरण कर दिया गया है, जिसके परिणाम स्वरूप मानव पशुवृत्ति बाहुल्य होने के कारण वह सिर्फ पशु ही रह गया । लेकिन, बड़े स्तर पर यह एक शुद्ध साजिश है कि सामान्य मानव प्राणी मानव (विवेकशील और संवेदनशील) न बन जाए इसके लिए भाड़े के नीतिज्ञों द्वारा पूरा जाल बिछाया गया है और कुछ भाड़े के अदृश्य व्यक्ति ऐसे भी छोड़े गए हैं जो यह निगरानी करते रहते हैं कि कहीं कोई सरफिरा ऐसा न हो जाए जो उनके कूटनीतिज्ञों के प्रति बगावत कर जाए और सामान्य प्राणियों को सत्यार्थी बना कर उनके षडयंत्र का पर्दाफाश कर दे। शिक्षा का मौलिक अर्थ है कि

"एक ऐसा सशक्त माध्यम जो मानव मस्तिष्क के धनात्मक गुणों का विकास करके मनुष्य को मानवीयता (संवेदना, करुणा) हेतुवादीय के सापेक्ष में अपतनीय तथा प्रगतिशील स्तर में पहुंचाने में सहायक हो , ही " शिक्षा" है अन्यथा शिक्षा नहीं है।"
- स्वामी मानवतावादी

शिक्षा के इस परिभाषा के आधार पर ऐसा लगता है कि अभी तक शिक्षा को लेकर कोई जिम्मेवारीपूर्ण कदम नहीं उठाया गया और न ही अभी उठाने की किसी तरह की भी कोई कोशिश की जा रही है। जिस चिंतन में जहां एक मात्र शिक्षा ही एक माध्यम हो जो मानवप्राणी को एक सामाजिक और सुसंस्कृत बनाती हो वहां की शिक्षा सिर्फ व्यापारिक बन जाए तो वहां अनुकूल वातावरण और सामाजिकता की कल्पना सिर्फ मूर्ख और मंदमानसिक व्यक्ति ही कर सकते हैं ।

शिक्षालय - शिक्षालय उस स्थान को सूचित करता है जहांँ शिक्षा के मूल तात्पर्य को बाल मन में स्थापित किया जाता है। परन्तु आज ऊपर दिए शिक्षा के परिभाषा के अनुकूल शिक्षा अपने मूल अस्तित्व और तात्पर्य, पूर्णरूपेण दिशांतरित होकर सिर्फ साक्षरतार्थ और प्रशिक्षणार्थ रह गया है जिससे निकलने वाले बच्चे सिर्फ किसी विधा में दक्ष, भाषाविद्, भाषणविद्, कमाऊ, दिखने में बहुरूपी शिष्टाचारी तो होते हैं परन्तु शिक्षित नहीं । जिसका परिणाम आज समाज में दृष्टव्य है। ' अपवाद हर स्थल पर संभव है।'
शिक्षक - मानवीय और सामाजिक जीवन में शिक्षक की भूमिका प्राचीन समय से बहुत ही अनिवार्य मानी गई है। जो व्यक्ति शिक्षित और ज्ञानी इन दोनों को पृथक कर के देखते हैं उनमें शिक्षक और गुरु इन दोनों शब्दों में पृथक भाव हो सकता है परन्तु ये दोनों शब्द गुणों और लक्ष्य के आधार पर एक ही आशय को पूर्ण करते हैं। हां इतना जरूर है कि की गुरु की तुलना में यह शब्द नवीन है और सामान्य भी परन्तु दोनों में भिन्नता को दर्शाना यह विषय के प्रति अपूर्णता को प्रदर्शित करता है। गुरु दो शब्दों की संधि अर्थात् संयोजन है गु+रु =गुरु । गु का अर्थ अंधकार होता है और रु का अर्थ प्रकाश होता है । भारतीय चिंतन में सांकेतिक रूप से यह स्पष्ट समझाया गया है कि प्रकाश ज्ञान का द्योतक है और अंधकार अज्ञान का । और गुरु वह होता है जो मानवीय मस्तिष्क में मौजूद अज्ञान रूपी अंधकार को अपने सत्य प्रयोगों और अनुशासित जीवन से प्रकाश की ओर अभिमुख कर एवम् प्रकाशित कर एक ऐसे स्तर पर लाकर छोड़ देता है जहाँ वह सामाजिक और कल्याणकारी जीवन जी सके। परन्तु आज के समय में गुरु को पहचानना बहुत मुश्किल हो गया है क्योंकि वर्तमान समय में प्रत्येक पग पर सैकड़ों की संख्या में गुरु है,‌‌ और प्रत्येक गुरु अपने आप को अवतरित या अवतारी महामानव मनवाता है । इतने गुरुओं के ज्ञान और प्रकाश से आज के समय में समाज और मानव जीवन का आलोकित हो जाना सामान्य सा लक्षण होना चाहिए था; परन्तु दिखता बिल्कुल उसके विपरीत है, और इसका मूल कारण हमारी भ्रांति अर्थात् स्वयं के प्रति भटकाव या यों कहें अज्ञानता। भटकाव और अज्ञानता लगभग प्राकृतिक लक्षण है परन्तु सच्चे गुरु का सानिध्य और सतत् ज्ञानवर्धन के साथ यह प्राकृतिक लक्षण धीरे-धीरे धूमिल होकर एक सत्कारी वृत्ति में परिलक्षित होना प्रारंभ हो जाता है।

शिष्य - "अदम्य ज्ञान लिप्सु अंतःवृत्ति का नाम "शिष्य" है। शिष्य का दुसरा नाम जिज्ञासु भी है । जिज्ञासा एक ऐसी अंतःवृत्ति है जो मानव को निरन्तर संकीर्ण स्वार्थ से परमार्थ की ओर सदा ही प्रेरित करती रहती है। जिज्ञासु सदा ही अपनी पात्रता पर आशंकित रहता है। पात्रता में त्रुटि की संभावना ही जिज्ञासु की पात्रता में सतत् विकास करती रहती है। जिज्ञासा अतःवृत्ति जन्य होने के कारण, जिज्ञासु लौकिक स्वार्थ से विमुख रहता है। अतः उसका प्रत्येक प्रश्न उसके अंतःआलोङ़न का परिणाम मात्र होता है। यही कारण है कि जिज्ञासु की जिज्ञासा कभी भी अपनी पात्रता की सीमा का उल्लंघन नहीं करती है।
जिज्ञासु सदा ही सरल व निश्छल ग्राहक होता है । हंस व सूर्य की भांति वह सार का ग्राहक होता है और असार से उसका कोई संबंध नहीं होता है। उस का उद्देश्य, पारमार्थिक अंतःआलोङ़न को शांति, उपलब्ध उपाय का प्रयोग, तत्त्वाभीज्ञ स्रोत के प्रति चिर कृतज्ञ भाव और जगत के प्रति सद्भाव होता है।"
- स्वामी मानवतावादी

इस परिभाषा के आधार पर आज कल के शिष्य, गधों की तरह संकीर्ण स्वार्थ की गठड़ी ढोते नजर आ रहे हैं। ऐसे अकल के अंधों और पिछलग्गूओं से आखिर कैसे संस्कृति की रक्षा और सनातन सभ्यता का संरक्षण हम सोच सकते हैं? यही कारण है जो ऋषियों ने इन्हें भेड़ों और गधों की उपमा से प्रतिभाषित किया है। क्योंकि विवेकहीन व्यक्ति के लिए स्पष्ट रूप से ऋषियों ने कहा है " ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः" अर्थात् ज्ञानहीन व्यक्ति पशु के समान है। और ज्ञान का आधार जिज्ञासा एवम् विवेक है।
इतिहास गवाह है कि इस जगत में कुछ ऐसे भी उदाहरण है जिन्होंने अपनी कोशिशों से स्वस्व का विकास किया और जीवन और जगत को समझते हुए आगामी पीढ़ी के विकास के लिए निरूपित विषय परोस विदा हो गए। हमें ऐसे महापुरुषों को शिनाख्त करने की आवश्यकता है । ताकि विश्व का कल्याण हो सके।

यह लेख कोई अंतिम परिणति नहीं है। अपवाद और त्रुटि हर स्थल पर संभव है। कृपया त्रुटिओं की उपेक्षा करते हुए विषय की सापेक्षता और इसकी अनिवार्यता पर दिशानिर्देश करें।
समय की अपर्याप्तता के कारण बहुत कम लिख पाया हूँ। अग्रिम रूप चर्चा परिचर्चा का है।
मानवता के हित में,
संघर्ष

उद्बोधन के माध्यम से जो शिक्षा, शिक्षक और शिष्य की विशेषता बताई गई है यह पूर्णता को परिभाषित नहीं करती परन्तु स्पर.....

https://youtu.be/ux-Zb8nTLog?si=axDj3yZfCPFEHmTn
26/02/2025

https://youtu.be/ux-Zb8nTLog?si=axDj3yZfCPFEHmTn

वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवम् अन्वेषणात्मक वृत्ति का विकास कैसे करें विषय पर एक परिचर्चा।

https://youtu.be/9vhpsdHa7DI?si=Y9W9cnIfRIbm_-ve
27/01/2025

https://youtu.be/9vhpsdHa7DI?si=Y9W9cnIfRIbm_-ve

पेरियार इंस्टीट्यूट, त्रिची, तमिलनाडु के सहयोग से FIRA (FEDERATION OF INDIAN RATIONALIST ASSOCIATIONS) के तेरहवें राष्ट्रीय आयोजन में मानवतावादी ....

Albert Einstein (Essay in Humanism, 1950)
27/01/2025

Albert Einstein (Essay in Humanism, 1950)

25/01/2025
DR. G. KOHLI :       A triple Doctorate Indian Philosopher and Psychiatrist born in Rawalpindi, now in Pakistan on Novem...
25/01/2025

DR. G. KOHLI :
A triple Doctorate Indian Philosopher and Psychiatrist born in Rawalpindi, now in Pakistan on November 15, 1915. He served the Royal British-Indian Army from 1935 to 1946 as a VCO in the RASC. He was settled in Ranchi in 1946 and worked there alone for educating the ADIVASIS (Aboriginals), developing their reasoning to rescue them from superstition and by providing them medical aid without seeking any social assistance and fully sparing his earnings and savings as a physician till his death on October 23, 1986. Dr. E. N. Komarov & Dr. S. Roghov of Russia, Dr. Anton Miles of Australia, Dr. Kitbatke of Japan, Dr. C. H. Yeang of China, Erl Bertand Russel and Prince Omlind were his best friends. He was the member of World University Round Table, Temple of Understanding, World Cultural Council etc.

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The International School Of Humanitarian Thoughts And Practice Rajghat Kurukshetra
Thanesar
136118

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