Shri Guru Ravidass International Youth Organization-SGRIYO

Shri Guru Ravidass International Youth Organization-SGRIYO कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै ।

तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै ।।

गुरु सन्त रविदास (रैदास) का जन्म एक चर्मकार परिवार में माघ पूर्णिमा को काशी के निकट माण्डूर नामक स्थान पर सन् 1398 में हुआ था । उनके पिता का नाम संतो़ख दास (रग्घु), माता का नाम कर्मा देवी तथा पत्नी का नाम लोना बताया जाता है । आज से लगभग छ: सौ पचास वर्ष पहले भारतीय समाज अनेक बुराइयों से ग्रस्त था । उसी समय रैदास जैसे समाज-सुधारक संत का जन्‍म इस धरती पर हुआ । रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्

त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था ।
” मन चंगा तो कठौती में गंगा । ”
रैदास की वाणी भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हित की कामना तथा मानव प्रेम से ओत-प्रोत होती थी । इसलिए उसका श्रोताओं के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता था । उनके भजनों तथा उपदेशों से लोगों को ऐसी शिक्षा मिलती थी जिससे उनकी शंकाओं का सन्तोषजनक समाधान हो जाता था और लोग स्वत: उनके अनुयायी बन जाते थे । उनकी वाणी का इतना व्यापक प्रभाव पड़ा कि समाज के सभी वर्गों के लोग उनके प्रति श्रद्धालु बन गये । कहा जाता है कि मीराबाई उनकी भक्ति-भावना से बहुत प्रभावित हुईं और उनकी शिष्या बन गयी थीं ।
रैदास ने ऊँच-नीच की भावना तथा ईश्वर-भक्ति के नाम पर किये जाने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बताया और सबको परस्पर मिलजुल कर प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया । आज भी सन्त रैदास के उपदेश समाज के कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं । उन्होंने अपने आचरण तथा व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया है कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है । विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना से प्रेरित कार्य तथा सद्व्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाने में सहायक होते हैं ।
ऐसे महान गुरु को शत् शत् नमन !

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