Work for equality-WE

Work for equality-WE VISION: "To create a society where everyone will get equal opportunity, no one will be discriminate on the basis of caste, class. gender and religion.

Running various programs to protect rights of the marginalized communities.
1) Residential Home for the street girls
2) Prerana community Centers for the holistic development of children
3) Mi Shikati - Girls Leadership program
4) Chuppi Todo - Violence against children and women campaign
5) Jagruti - Reproductive health and awareness program
6) Pratibimb - Lifeskills Training program.

सिर्फ काम नहीं, समझ और मूल्य भी ज़रूरी हैं: मजबूत कार्यकर्ता ही बदलाव की असली ताकत 💡सामाजिक क्षेत्र में काम करते समय हम ...
12/04/2026

सिर्फ काम नहीं, समझ और मूल्य भी ज़रूरी हैं: मजबूत कार्यकर्ता ही बदलाव की असली ताकत 💡

सामाजिक क्षेत्र में काम करते समय हम अक्सर समस्याओं से घिरे रहते हैं —
बाल विवाह, स्कूल से बाहर बच्चे, लैंगिक भेदभाव, अस्वच्छता, गैर-जिम्मेदार व्यवहार…
हम इन पर काम भी करते हैं, प्रयास भी करते हैं…
लेकिन एक सवाल हमेशा रह जाता है 👉 क्या हम इन समस्याओं की जड़ तक पहुंच पा रहे हैं?
इसी सोच के साथ Work for Equality ने अपने कार्यकर्ताओं के लिए 2 दिवसीय गहन प्रशिक्षण आयोजित किया —
ताकि काम केवल “गतिविधि” न रह जाए, बल्कि समझ, दृष्टिकोण और मूल्यों से जुड़ा एक प्रभावी परिवर्तन बन सके।
✨ इस प्रशिक्षण से मिली कुछ गहरी सीख:
🔹 समस्या नहीं, मूल कारण समझना ज़रूरी है
जब तक हम समस्याओं के पीछे छिपे सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारणों को नहीं समझते, तब तक समाधान अस्थायी ही रहेंगे।
🔹 हर समस्या आपस में जुड़ी होती है
बाल विवाह, शिक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता — ये अलग-अलग मुद्दे नहीं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।
🔹 Vision और Mission के साथ Values की भी उतनी ही ज़रूरत है
केवल लक्ष्य तय करना काफी नहीं है,
उसे पाने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
🌱 हमारे काम की आधारशिला — Values:
👉 स्वतंत्रता (Freedom) – हर व्यक्ति को अपने जीवन के निर्णय लेने का अधिकार
👉 समानता (Equality) – बिना किसी भेदभाव के समान अवसर
👉 बंधुत्व (Fraternity) – एक-दूसरे के प्रति सम्मान और सहयोग
👉 सामाजिक न्याय (Social Justice) – हर किसी के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार
👉 धर्मनिरपेक्षता (Secularism) – सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण
👉 वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temper) – तर्क और समझ के आधार पर निर्णय
यह प्रशिक्षण सिर्फ जानकारी देने तक सीमित नहीं था,
बल्कि यह एक आत्म-चिंतन (self-reflection) की प्रक्रिया थी —
जहां कार्यकर्ताओं ने खुद से सवाल किए, अपने अनुभव साझा किए और अपने काम को नए नजरिए से देखने की कोशिश की।
🌟 परिणाम?
हर कार्यकर्ता की आंखों में एक नया आत्मविश्वास,
काम को और गहराई से समझने की क्षमता,
और बदलाव के लिए एक नई ऊर्जा स्पष्ट दिखाई दी।
👉 अब यह सिर्फ “काम” नहीं रहा…
यह एक मूल्य-आधारित आंदोलन (value-driven movement) बनता जा रहा है।
मेरा मानना है कि हर संस्था को अपने कार्यकर्ताओं के लिए ऐसे मंच तैयार करने चाहिए —
क्योंकि सशक्त और संवेदनशील कार्यकर्ता ही स्थायी सामाजिक परिवर्तन की नींव होते हैं।
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सोशल मीडिया: ज्ञान का सागर या अंधेरी खाई? सही उपयोग ही है समाधानआज के समय में सोशल मीडिया और इंटरनेट जानकारी का एक विशाल...
08/04/2026

सोशल मीडिया: ज्ञान का सागर या अंधेरी खाई? सही उपयोग ही है समाधान

आज के समय में सोशल मीडिया और इंटरनेट जानकारी का एक विशाल सागर बन चुके हैं, लेकिन यह उतने ही खतरनाक भी हो सकते हैं। यह एक ऐसी गहरी और अंधेरी खाई की तरह है, जिसमें एक बार व्यक्ति फंस जाए तो उसे यह भी समझ नहीं आता कि वह कितना अंदर तक डूब चुका है।

फिर भी, जानकारी पाने की मानव की स्वाभाविक इच्छा को रोका नहीं जा सकता। इसलिए, सोशल मीडिया और इंटरनेट से दूर रहने के बजाय, उनका सजग और समझदारी से उपयोग करना सीखना ही सबसे बेहतर रास्ता है।
इसी आवश्यकता को समझते हुए Work for Equality ने अपने साथ जुड़े 30 गर्ल्स क्लबों के 200 girls leaders और टीम के लिए सोशल मीडिया और इंटरनेट के प्रभावी एवं सुरक्षित उपयोग पर तीन दिवसीय कार्यशाला आयोजित की।इन 200 लीडर्स और टीम के माध्यम से हम यह महत्वपूर्ण जानकारी लगभग 6000 किशोर और किशोरियों और उनके परिवार तथा समुदाय तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।

कार्यशाला के प्रमुख बिंदु:

• आज हम जो कंटेंट “फ्री” में देखते हैं, वह वास्तव में मुफ्त नहीं होता।
हम खुद एक “प्रोडक्ट” हैं, जिसे कंपनियां विज्ञापनों के जरिए टारगेट करती हैं।
• सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स हमारे व्यवहार का गहराई से अध्ययन करते हैं, ताकि हमें वही कंटेंट बार-बार दिखाया जाए, जिससे हम ज्यादा समय तक जुड़े रहें।
• इंटरनेट एक “छुपा हुआ डिटेक्टिव” है, जो हमारी हर गतिविधि पर नजर रखता है—
हम क्या सोचते हैं, क्या पसंद करते हैं, कहां जाते हैं, किससे बात करते हैं।
• इसलिए, हमें हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए:
👉 जो हम ऑफलाइन दुनिया में नहीं करते, वह ऑनलाइन भी न करें
👉 अपनी निजी जानकारी साझा करने से पहले सोचें—
क्या सामने वाला व्यक्ति सच में विश्वसनीय है?
क्या हम उसे वास्तव में जानते हैं?
साथ ही, हम AltEd संस्था के अनिश मुखर्जी का विशेष धन्यवाद करते हैं, जिन्होंने यह प्रशिक्षण देकर हमारी टीम और लड़कियों को समृद्ध किया।
Work for Equality ने यह संकल्प लिया है कि आने वाले समय में समाज में सोशल मीडिया और इंटरनेट के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग के बारे में व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाया जाएगा।
👉 यदि आप भी इस महत्वपूर्ण पहल का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो हमारे साथ जुड़ें और इस बदलाव की यात्रा में सहयोग दें।

🚻 शौचालय: सिर्फ सुविधा नहीं, आत्मसम्मान का सवाल“मेरे 50 साल की उम्र तक मुझे खुले में शौच के लिए जाना पड़ा। यह मेरी मजबूर...
04/04/2026

🚻 शौचालय: सिर्फ सुविधा नहीं, आत्मसम्मान का सवाल

“मेरे 50 साल की उम्र तक मुझे खुले में शौच के लिए जाना पड़ा। यह मेरी मजबूरी थी… लेकिन अब नहीं। मेरी बहू खुले में नहीं जाएगी—यह मेरा निश्चय है।”

— पोषण कार्यक्रम से जुड़ी एक जागरूक महिला

किचन गार्डन कार्यक्रम के दौरान हमें समझ आया कि महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे केवल पोषण तक सीमित नहीं हैं। पानी की कमी, रास्ते, सार्वजनिक परिवहन और शौचालय की उपलब्धता—ये सभी मुद्दे महिलाओं के जीवन को गहराई से प्रभावित करते हैं।

जब किसी महिला को खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है, तो यह सिर्फ स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का भी सवाल बन जाता है।

जागरूकता बढ़ने के बाद कई सच सामने आए—

कुछ घरों में शौचालय होने के बावजूद गलतफहमियों के कारण उनका उपयोग नहीं हो रहा था, तो कई परिवारों के पास यह सुविधा थी ही नहीं।

लेकिन जैसे ही महिलाओं को यह समझ आया कि शौचालय उनके सम्मान से जुड़ा है, वे जागरूक हुईं और आगे आने लगीं।

सविता ताई का संकल्प इस बदलाव की मिसाल है—

👉 “जो मैंने सहा, वह मेरी बहू नहीं सहेगी।”

यह बदलाव सिर्फ सुविधा का नहीं, बल्कि सम्मान, अधिकार और सोच का बदलाव है।

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🌿 किचन गार्डन से पोषण, बचत और सम्मान की ओर बढ़ती महिलाएं“बचत समूह में हम जो पैसे जमा करते हैं, वे कई बार पति द्वारा दिए ...
02/04/2026

🌿 किचन गार्डन से पोषण, बचत और सम्मान की ओर बढ़ती महिलाएं

“बचत समूह में हम जो पैसे जमा करते हैं, वे कई बार पति द्वारा दिए होते हैं, इसलिए उस पर उनका अधिकार माना जाता है। लेकिन किचन गार्डन से उगाई सब्ज़ियां और फल बेचकर जो पैसे मैं कमाती हूं, उसे मैंने सुरक्षित बचत के रूप में रखा है—और उस पर सिर्फ मेरा अधिकार है।”
— लता गोंटे

महाराष्ट्र के पुणे जिले के मावल ब्लॉक में स्थित सावला गांव जैसे समुदायों में, जहां सब्ज़ी खरीदने के लिए भी 100 रुपये खर्च कर बाजार जाना पड़ता है, वहां पहले महिलाएं केवल बारिश के मौसम में ही किचन गार्डन बना पाती थीं। बाकी समय हरी सब्ज़ियां मिलना मुश्किल था, जिसके कारण कई महिलाओं का हीमोग्लोबिन 6–7 तक गिर गया था।

पिछले 3 वर्षों के निरंतर प्रयासों से अब बदलाव साफ दिख रहा है—
✔️ सालभर किचन गार्डन के जरिए पोषण उपलब्ध
✔️ स्वास्थ्य, बचत और आर्थिक नियोजन की समझ में वृद्धि
✔️ महिलाओं का मजबूत संगठन
✔️ टॉयलेट और पब्लिक ट्रांसपोर्ट जैसे मुद्दों पर महिलाओं की पहल

लता गोंटे जैसी महिलाएं अब आत्मनिर्भर बन रही हैं। सिर्फ सब्ज़ियां ही नहीं उगा रहीं, बल्कि आत्मसम्मान और खुशियां भी सहेज रही हैं।

ऐसी ही 183 महिलाएं और लड़कियां इस गांव में किचन गार्डन के माध्यम से अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रही हैं।

🙏 इस कार्यक्रम के लिए हम प्रज फाउंडेशन के सहयोग के लिए आभारी हैं।

महाराष्ट्र के पुणे जिले के मावल ब्लॉक में स्थित सावला गांव जैसे समुदायों में, जहां सब्ज़ी खरीदने के लिए भी 100 रुपये खर्च कर बाजार जाना पड़ता है, वहां पहले महिलाएं केवल बारिश के मौसम में ही किचन गार्डन बना पाती थीं। बाकी समय हरी सब्ज़ियाँ मिलना मुश्किल था, जिसके कारण कई महिलाओं का हीमोग्लोबिन 6–7 तक गिर गया था।

🌸 डर से आत्मविश्वास तक – एक कार्यकर्ता की कहानी (पोषण कार्यक्रम से जुड़ी)वर्क फॉर इक्वॅलिटी से जुड़ने से पहले मेरे मन मे...
31/03/2026

🌸 डर से आत्मविश्वास तक – एक कार्यकर्ता की कहानी (पोषण कार्यक्रम से जुड़ी)

वर्क फॉर इक्वॅलिटी से जुड़ने से पहले मेरे मन में हमेशा डर रहता था। जब भी मैं गांव में महिलाओं को पोषण के बारे में बताने निकलती, तो यही चिंता सताती थी कि कहीं सास या पति घर के काम को लेकर नाराज़ न हो जाएं।

मैं सुबह-सुबह सारे काम निपटाने की कोशिश करती, लेकिन घर का काम कभी खत्म होता है क्या? मन में हमेशा एक डर बना रहता था।

संस्था से जुड़ने के बाद और अन्य साथियों से बात करने पर समझ आया कि वे भी मेरी तरह ही घरेलू महिलाएं हैं, लेकिन डर के साथ नहीं जीतीं। उन्होंने मुझे सिखाया कि हमारा बाहर जाना भी परिवार के लिए ही योगदान है।

👉 अब मुझे यह समझ आ गया है कि घर के कामों की जिम्मेदारी सिर्फ मेरी अकेले की नहीं है। मैं इसके लिए घर के अन्य सदस्यों से मदद मांग सकती हूं।

धीरे-धीरे मैंने अपने हक के लिए आवाज़ उठाना शुरू किया। अब मैं अपने समय और सुविधा के अनुसार काम करती हूं। सास और पति भी धीरे-धीरे समझ रहे हैं।

अब मुझे डर नहीं लगता। अब मैं आत्मविश्वास के साथ अपने फैसले ले सकती हूं और जरूरत पड़ने पर मदद मांग सकती हूं।

अब मुझे यह भी समझ में आया है कि मेरा बाहर जाना कोई शौक नहीं, बल्कि परिवार के प्रति मेरी जिम्मेदारी है—ठीक मेरे पति की तरह।
जिस सम्मान से वे घर में रहते हैं, उसी सम्मान की हकदार मैं भी हूं।

🙏 धन्यवाद वर्क फॉर इक्वॅलिटी — मुझे यह समझ, हिम्मत और आत्मविश्वास देने के लिए।

30/03/2026

🎭 थिएटर ऑफ द ऑपरेस्ड – जनभागीदारी के माध्यम से समस्याओं का समाधान खोजने वाला नाटक

‘थिएटर ऑफ द ऑपरेस्ड’ (Theatre of the Oppressed) एक प्रभावी नाट्य पद्धति है जो सामाजिक परिवर्तन लाने का कार्य करती है। इस प्रक्रिया में दर्शक केवल देखने वाले नहीं रहते, बल्कि समस्याओं के समाधान खोजने के लिए सीधे नाटक में भाग लेते हैं। समाज में हो रहे अन्याय, भेदभाव और दमन पर चर्चा करवाकर परिवर्तन की दिशा देना इस पद्धति का उद्देश्य है।

यह पद्धति विशेष रूप से वंचित, दबे-कुचले और उपेक्षित समुदायों को अपनी आवाज़ उठाने और लोकतांत्रिक तरीके से बदलाव लाने के लिए सक्षम बनाती है।

लड़कियों को अपने मुद्दे प्रभावी ढंग से रखने में सक्षम बनाने के लिए ‘वर्क फॉर इक्वैलिटी’ के माध्यम से हाल ही में तीन दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। ‘चांगभल’ संस्था के थिएटर ऑफ द ऑपरेस्ड कला में निपुण संकेत और समीर ने बच्चों का मार्गदर्शन किया।

इन तीन दिनों में लड़कियों ने नाटक के लिए आवश्यक विभिन्न तत्वों को अनुभव के माध्यम से सीखा —
• स्वयं का निरीक्षण और आत्म-अभिव्यक्ति
• विभिन्न भावनाओं का प्रभाव
• मूक नाटक (माइम) की शक्ति
• आवाज़ और शरीर की भाषा का महत्व
• शोषितों के मुद्दों को चित्र (इमेज) और शारीरिक संरचना के माध्यम से प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की कला

उन्होंने यह भी सीखा कि नाटक केवल कहानी बताने के लिए नहीं होता, बल्कि यह प्रश्न खड़े करने और सोचने के लिए प्रेरित करने का माध्यम है। नाटक को जानबूझकर बीच में — समस्या के बिंदु पर — रोककर दर्शकों को शामिल करना, उनकी राय सुनना और उन्हीं से समाधान निकलवाना, इस पद्धति की विशेष ताकत है, जिसे लड़कियों ने आत्मसात किया।

बाल विवाह, अंधविश्वास और पर्यावरण जैसे ज्वलंत मुद्दों को लड़कियों ने अपने नाटकों में शामिल किया। शोषण, शोषित और शोषणकर्ता के बीच क्या अंतर होता है, और जिन पर अन्याय होता है, उन्हीं में समस्याओं को हल करने की शक्ति होती है — यह महत्वपूर्ण संदेश इस प्रक्रिया से सामने आया।

कार्यशाला के अंतिम दिन लड़कियों ने एक गाँव में प्रत्यक्ष नाटक प्रस्तुत किया। नाटक को बीच में रोककर उन्होंने गाँव वालों को शामिल किया और समाधान सुझाने के लिए प्रेरित किया। इस जनभागीदारी के माध्यम से न केवल चर्चा हुई, बल्कि “जिनके मुद्दे हैं, उनमें ही उन्हें हल करने की ताकत है” यह आत्मविश्वास भी बढ़ा।

इस अनुभव से लड़कियों का आत्मविश्वास बहुत बढ़ा है। अब वे अपने गाँव के विभिन्न मुद्दों पर निर्भीक होकर आवाज़ उठा सकती हैं और जनभागीदारी के माध्यम से उनके समाधान खोज सकती हैं — ऐसा मजबूत विश्वास उनके मन में बना है।

यह केवल एक नाट्य कार्यशाला नहीं थी, बल्कि नेतृत्व, अभिव्यक्ति और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित सामाजिक परिवर्तन की एक जीवंत पाठशाला थी।









🔥 “ज्योत से ज्योत जलाते चलो” – लड़कियों के नेतृत्व की उज्ज्वल यात्रा“ज्योत से ज्योत जलाते चलो” एक बेहद मार्मिक वाक्य है।...
24/03/2026

🔥 “ज्योत से ज्योत जलाते चलो” – लड़कियों के नेतृत्व की उज्ज्वल यात्रा

“ज्योत से ज्योत जलाते चलो” एक बेहद मार्मिक वाक्य है। जब एक व्यक्ति स्वयं प्रकाशित होकर दूसरों को प्रकाश देता है, वहीं से असली परिवर्तन की शुरुआत होती है। ऐसा ही एक प्रेरणादायक अनुभव हमें स्कूल की लड़कियों के साथ काम करते समय देखने को मिला।

लड़कियों को अपने मुद्दों पर आवाज उठाने और जागरूक बनने के लिए हमने उन्हें एक दूसरे गाँव की लड़कियों की कहानी सुनाई, जिन्होंने अपने स्कूल में शौचालय की समस्या को मिलकर हल किया था। यह सुनकर 12–13 साल की लड़कियों को शुरुआत में विश्वास ही नहीं हुआ कि उनकी ही उम्र की लड़कियाँ अपने अधिकारों के लिए खड़ी हो सकती हैं।

लेकिन जब उन्हें संगठन की ताकत, एकता का महत्व और सामूहिक प्रयास की शक्ति के बारे में समझाया गया, तो उन्होंने भी अपने मुद्दों को उठाने का निर्णय लिया।

शौचालय की स्वच्छता केवल एक सुविधा नहीं है, बल्कि यह सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार है। भारतीय संविधान में दिए गए समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14), शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21A) और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार (अनुच्छेद 21) इसी को सुनिश्चित करते हैं। यह समझना जरूरी है कि सुविधाएँ कोई उपकार नहीं, बल्कि हमारा अधिकार हैं।

लड़कियों ने एकजुट होकर स्कूल के प्राचार्य को अपनी मांगों का पत्र दिया। उनकी मांग को स्वीकार करते हुए प्राचार्य ने तुरंत शौचालय की सफाई के लिए कदम उठाए। केवल 10–15 दिनों में सफाई के लिए कर्मचारी नियुक्त कर दिया गया।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि लड़कियों ने खुद भी शौचालय को स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी को समझा और अपनाया। यह सिर्फ स्वच्छता की जीत नहीं थी, बल्कि लड़कियों के नेतृत्व और लोकतांत्रिक तरीके से समस्याओं को हल करने की क्षमता की जीत थी।

ऐसी छोटी-छोटी सफलताएँ लड़कियों के आत्मविश्वास को बढ़ाती हैं, उन्हें नेतृत्व की पहचान देती हैं और समाज में उनके मुद्दों को महत्व दिलाती हैं। यही है संवैधानिक मूल्यों पर आधारित लड़कियों के नेतृत्व का सशक्त आंदोलन।

आप भी इस परिवर्तन की यात्रा का हिस्सा बन सकते हैं।
अधिक जानकारी के लिए 👉 www.workforequality.org
पर संपर्क करें।


#संवैधानिकमूल्य
#समानताकाअधिकार



🌸 एक साहसी निर्णय — नीता का बाल विवाह के खिलाफ दृढ़ कदमआज गर्ल्स क्लब की बैठक में कई लड़कियाँ परेशान दिख रही थीं। कारण ग...
21/03/2026

🌸 एक साहसी निर्णय — नीता का बाल विवाह के खिलाफ दृढ़ कदम

आज गर्ल्स क्लब की बैठक में कई लड़कियाँ परेशान दिख रही थीं। कारण गंभीर था। 16 वर्ष की नीता ने अपने जीवनसाथी का चुनाव कर लिया था। उसके माता-पिता इस निर्णय से सहमत नहीं थे, फिर भी “कोई और विकल्प नहीं है” ऐसा मानकर वे उसकी शादी कराने को तैयार हो गए थे।

नीता के परिवार में लड़कियों की स्वतंत्रता पर कड़े प्रतिबंध थे। उसके माता-पिता का मानना था कि लड़कियों को स्वतंत्रता देने से वे उसका दुरुपयोग करती हैं। इसी सोच के कारण उसकी बड़ी बहन की शादी 17–18 वर्ष की उम्र में कर दी गई और वह कभी आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं बन पाई। नीता की अपनी पढ़ाई भी 10वीं पूरी होने से पहले ही रुकवा दी गई। मन में दर्द होने के बावजूद वह अपने माता-पिता के फैसले पर सवाल उठाने का साहस नहीं जुटा पाई।

उसे अक्सर गर्ल्स क्लब की बैठकों में आने की अनुमति भी नहीं मिलती थी, जिससे वह सीखने और आगे बढ़ने के अवसरों से वंचित रह जाती थी। लेकिन इस बार वह बैठक में आई।

हमारी संस्था की एक फैसिलिटेटर ने उससे व्यक्तिगत बातचीत की। उन्होंने सीधे उसके निर्णय का विरोध नहीं किया, बल्कि उसकी बहन के जीवन के अनुभवों — कम उम्र में शादी, निर्भरता और सीमित विकल्पों — पर चर्चा की। धीरे-धीरे नीता को अपनी बहन के जीवन में अपना ही भविष्य दिखाई देने लगा।

संवाद के माध्यम से नीता ने एक महत्वपूर्ण बात समझी — अगर प्यार सच्चा है, तो वह इंतज़ार कर सकता है। उसे वैकल्पिक शिक्षा के अवसरों के बारे में जानकारी मिली और उसे एहसास हुआ कि वह बिना अपनी स्वतंत्रता सुनिश्चित किए एक बहुत बड़ा निर्णय लेने जा रही है। अपनी सहेलियों को पढ़ाई जारी रखते देख उसका आत्ममंथन और गहरा हुआ।

उस दिन नीता ने एक साहसी निर्णय लिया। उसने अपने माता-पिता से स्पष्ट कहा,
“मैं पहले अपनी पढ़ाई पूरी करूंगी, उसके बाद ही शादी के बारे में सोचूंगी।”

विरोध के बावजूद वह अपने फैसले पर अडिग रही। उसने बाल विवाह को नकारते हुए कहा,
“अगर वह मुझसे सच में प्यार करता है, तो वह इंतज़ार करेगा।”

यही है गर्ल्स क्लब की ताकत। यह लड़कियों के लिए एक सुरक्षित स्थान बनाते हैं, जहाँ उन्हें मार्गदर्शन मिलता है, वे एक-दूसरे का सहारा बनती हैं और अपने जीवन से जुड़े निर्णय समझदारी से लेती हैं। सामूहिक सीख और संवाद के माध्यम से कई लड़कियाँ बाल विवाह को रोक रही हैं, अपनी पढ़ाई जारी रख रही हैं और आत्मनिर्भर भविष्य की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।

आइए, हम सब मिलकर हर गाँव में ऐसे सुरक्षित स्थान बनाएँ —
ताकि लड़कियाँ बाल विवाह, स्कूल छोड़ने और शोषण से सुरक्षित रहें और अपने भविष्य का निर्माण स्वयं कर सकें।

सहयोग या साझेदारी के लिए:
👉 www.workforequality.org

“हमारे लिए भी कोई निधि होती  है ना?” – गर्ल्स क्लब की लड़कियों की छोटी लेकिन बड़ी जीतजब एक स्थानीय पंचायत ने महिला दिवस ...
18/03/2026

“हमारे लिए भी कोई निधि होती है ना?” – गर्ल्स क्लब की लड़कियों की छोटी लेकिन बड़ी जीत

जब एक स्थानीय पंचायत ने महिला दिवस कार्यक्रम के लिए यह कहकर मना कर दिया कि “अभी कोई निधि उपलब्ध नहीं है”, तब गर्ल्स क्लब की एक लड़की ने धीरे से पूछा – “लेकिन हमारे लिए भी कोई निधि होती है ना?”

इस सरल लेकिन साहसी सवाल ने माहौल बदल दिया। पंचायत सदस्यों ने महिला दिवस कार्यक्रम के लिए कुछ निधि देने की तैयारी दिखाई। यह लड़कियों के लिए उनके प्रयासों और अपने अधिकार के लिए सवाल पूछने की एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण जीत थी।

इस वर्ष Work for Equality के साथ जुड़े 35 गर्ल्स क्लबों ने गांव-गांव में ग्राम पंचायत के सहयोग से महिला दिवस मनाने का संकल्प लिया था। उद्देश्य था कि गांवों में महिलाओं के कार्यक्रमों को महत्व मिले और महिलाएं अपने मुद्दों पर खुलकर बात कर सकें।

26 जनवरी की ग्रामसभा से पहले ही लड़कियों ने तैयारी शुरू कर दी थी, घर घर जाकर महिलाओं को जागरूक करने की। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी पंचायत में जाकर मांग रखना महिलाओं या लड़कियों के लिए आसान नहीं होता। अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाली महिलाओं को समाज में गलत नज़रिए से देखा जाता है।

इसी सोच को बदलने और पंचायत स्तर पर महिलाओं के लिए सकारात्मक कार्यक्रमों की संस्कृति विकसित करने के उद्देश्य से खेड और फलटण तालुका के गांवों में महिला दिवस के कार्यक्रम आयोजित किए गए।

इस पहल के अंतर्गत 30 गांवों में विभिन्न गतिविधियां आयोजित की गईं, जैसे – रैली, पोस्टर प्रदर्शन, आत्मरक्षा प्रशिक्षण, व्यवसाय मार्गदर्शन, हीमोग्लोबिन जांच, स्वास्थ्य जानकारी सत्र, मनोरंजक खेलइनमें से 19 गांवों में ग्राम पंचायत के सहयोग से और 11 स्कूलों में गांव के सहयोग से कार्यक्रम आयोजित हुए।

इस पहल से लड़कियों का आत्मविश्वास बढ़ा और गांव स्तर पर महिलाओं के मुद्दों को गंभीरता से देखने की एक सकारात्मक शुरुआत हुई। यह गर्ल्स क्लब की पंचवर्षीय योजना में शामिल समान अधिकारों की मांग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

ऐसे अनेक लड़कियों के नेतृत्व के सफर में आप भी शामिल हो सकते हैं।

अधिक जानकारी के लिए – www.workforequality.org

Vikas Samvad/विकास संवाद

🌼 निर्णयाची ताकद — नीताची गोष्टआजच्या Girls Club च्या बैठकीत मुली थोड्या अस्वस्थ दिसत होत्या. कारण गंभीर होते. १६ वर्षां...
15/03/2026

🌼 निर्णयाची ताकद — नीताची गोष्ट

आजच्या Girls Club च्या बैठकीत मुली थोड्या अस्वस्थ दिसत होत्या. कारण गंभीर होते. १६ वर्षांच्या नीताने तिचा जीवनसाथी निवडला होता. तिच्या पालकांना हा निर्णय मान्य नव्हता, पण “आता पर्याय नाही” असे म्हणत त्यांनी तिचे लग्न ठरवले.

नीताच्या घरात मुलींना स्वातंत्र्य देण्याला कडाडून विरोध होता. “मुलींना स्वातंत्र्य दिलं तर त्या त्याचा गैरवापर करतात,” अशी त्यांची धारणा. याच विचारातून तिच्या मोठ्या बहिणीचंही १७–१८ व्या वर्षी लग्न लावण्यात आलं. नीतालाही अनेक बंधनं होती. दहावी पूर्ण होण्यापूर्वीच तिचं शिक्षण थांबलं. तिला खूप वाईट वाटलं, पण विरोध करण्याचं धाडस तिच्यात नव्हतं.

Girls Club च्या बैठकीलाही तिला बंदी होती. त्यामुळे इतर मुली काय शिकतात, काय अनुभवतात, हे तिला कधी समजलंच नाही. पण आज ती बैठकीला आली होती.

संस्थेच्या कार्यकर्त्यांनी तिच्याशी संवाद साधला. विरोध न करता त्यांनी तिच्या बहिणीच्या आयुष्याविषयी चर्चा केली. लहान वयात लग्न झाल्यामुळे बहिणीला स्वतःच्या पायावर उभं राहता आलं नव्हतं. ती पूर्णपणे इतरांवर अवलंबून होती. हीच परिस्थिती नीताच्या आयुष्यातही येऊ शकते, हे तिच्या लक्षात आलं.

संवादातून नीताला एक नवा विचार मिळाला — खरं प्रेम असेल, तर थांबता येतं. आधी स्वतःच्या पायावर उभं राहणं महत्त्वाचं आहे. तिला मुक्त शिक्षणाच्या संधींबद्दल माहिती मिळाली. तिच्या मैत्रिणी शिक्षणात पुढे जात असताना आपण घाईत चुकीचा निर्णय घेतोय, याची तिला जाणीव झाली.

त्या दिवशी नीताने मोठं धाडस केलं. घरी जाऊन तिने पालकांशी ठामपणे सांगितलं — “मी आधी माझं शिक्षण पूर्ण करेन, मग लग्नाचा विचार करू.” विरोध झाला, पण तिचा निर्णय ठाम होता. “त्याचं माझ्यावर प्रेम असेल, तर तो थांबेल,” असं सांगत तिने बालविवाहाला नकार दिला.

✨ Girls Club मुलींना योग्य निर्णय घेण्याची ताकद देते. मैत्रिणींचा आधार, योग्य मार्गदर्शन आणि संवाद — यामुळे अनेक मुलींचं आयुष्य बदलत आहे.

तुमच्या गावातही असे Girls Club स्थापन करून मुलींना बालविवाह, शिक्षणातून गळती आणि शोषणापासून वाचवण्यासाठी आमच्यासोबत या.
अधिक माहितीसाठी भेट द्या: www.workforequality.org

#बालविवाहमुक्तभारत #शिक्षणहक्क

“रोटी बनाना महिलाओं का काम है। अगर हम करेंगे तो लोग हम पर हँसेंगे।”ये प्रतिक्रियाएँ हाल ही में किशोरावस्था में पहुँचे कु...
15/03/2026

“रोटी बनाना महिलाओं का काम है। अगर हम करेंगे तो लोग हम पर हँसेंगे।”

ये प्रतिक्रियाएँ हाल ही में किशोरावस्था में पहुँचे कुछ लड़कों की हैं। जब उनसे पूछा गया कि वे घर का काम क्यों नहीं करते, तो उन्होंने कहा—यह काम महिलाओं का है, अगर हम करेंगे तो समाज क्या कहेगा, पुरुषों का काम बाहर का होता है, उन्हें घर का काम नहीं आता, और अगर काम करते समय गलती हो गई तो माँ डाँटेंगी या लड़कियाँ हँसेंगी।

ये प्रतिक्रियाएँ जितनी ईमानदार थीं, उतनी ही उन्होंने एक बार फिर यह स्पष्ट किया कि हमारे समाज में स्त्री और पुरुष के लिए बनाई गई सामाजिक सीमाएँ आज भी उतनी ही मज़बूती से मौजूद हैं। और अनजाने में हम ही ऐसा माहौल बना रहे हैं, जिसमें आने वाली पीढ़ी भी इसी सोच को उतनी ही कठोरता से आगे बढ़ा रही है।

पुरुष घर के कामों में भागीदारी क्यों नहीं करते, इसके कई पहलू हैं। उनमें से एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि घर के काम या घर संभालने की ज़िम्मेदारी महिलाओं की ही है, और यह काम घर के किसी और व्यक्ति—खासकर पुरुषों—से नहीं हो सकता, ऐसी धारणा समाज में बचपन से ही गहराई से बैठा दी जाती है।

बचपन से ही लड़कियाँ घर और समाज में जो दृश्य देखती हैं, उनसे उनके मन में यह संस्कार बनता है कि अगर महिलाएँ घर संभालें, परिवार के लोगों की देखभाल करें, तो उन्हें घर में सम्मान मिलता है। इसी कारण कई बार यह डर भी पैदा हो जाता है कि यदि घर के कामों में अन्य लोग, खासकर पुरुष, सहभागी हो गए तो कहीं उनके महत्व या पहचान पर असर न पड़े।

दरअसल, यह केवल किसी एक व्यक्ति या महिला-पुरुष का सवाल नहीं है, बल्कि समाज में लंबे समय से बनी सोच का परिणाम है। इसी सोच के कारण अक्सर बच्चों—खासकर लड़कों—को बचपन से घर के काम सीखने और करने का अवसर ही नहीं मिलता।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर सभी के लिए हमारा यही संदेश है कि यदि हम चाहते हैं कि पुरुष भी घर के कामों में सहभागी बनें, तो उन्हें स्नेह और सहयोग के साथ इन कामों में शामिल करें। बचपन से ही बच्चों—खासकर लड़कों—को घर के काम सीखने और करने की आदत डालना ज़रूरी है।

यह केवल इतना भर मुद्दा नहीं है कि पुरुष घर के कामों में मदद करें। यह मुद्दा महिलाओं के श्रम को समान सम्मान और मान्यता देने का है। साथ ही यह जीवन कौशल का भी प्रश्न है, क्योंकि जीवन को संतुलित और जिम्मेदारी के साथ जीने के लिए घर के काम आना हर व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है। 🌱








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08/03/2026

आंतरराष्ट्रीय महिला दिनानिमित्त लिंगभेदी भूमिकांची अदलाबदल – महिलांच्या श्रमाला सन्मान देणारा ‘वर्क फॉर इक्वॅलिटी’चा अनोखा उपक्रम
आंतरराष्ट्रीय महिला दिनानिमित्त स्त्री आणि पुरुष करत असलेल्या स्टिरिओटाईप जेंडर रोलची अदलाबदल करून मुलांनी समतेचा सामाजिक संदेश दिला. आजच्या या विशेष दिवशी महिलांच्या श्रमाला सन्मान मिळावा, तसेच घरकामाचा महिलांवर पडणारा अतिरिक्त बोजा याविषयी घरातील पुरुष आणि मुलांमध्ये संवेदनशीलता निर्माण व्हावी आणि घरकामाला समाजात प्रतिष्ठा मिळावी या उद्देशाने वर्क फॉर इक्वॅलिटी संस्थेने हा अनोखा उपक्रम राबवला.
स्त्रिया कुटुंबाच्या आर्थिक गरजा भागवण्यासाठी आणि पुरुषांना मदत करण्यासाठी घराबाहेर पडून पुरुषांची भूमिका स्वीकारतात. मात्र त्याचवेळी पुरुषांना त्यांच्या तथाकथित ‘मर्दानगी’च्या ओझ्यामुळे घरकामात मदत करण्यापासून सामाजिक बंधने रोखून धरतात. ही बंधने गळून पडावीत आणि स्त्रियांच्या श्रमाच्या ओझ्याविषयी संवेदनशीलता निर्माण होऊन पुरुषांनीही घरकामात हातभार लावावा यासाठी ज्या वयात मुलांवर ‘मर्दानगी’ची अपेक्षा लादली जाऊ लागते, त्याच वयात त्याला छेद देणारी कृती करून महिला दिन साजरा करण्याची अनोखी पद्धत आम्ही स्वीकारली.
या निमित्ताने घरकाम, जेंडर स्टिरिओटाईप भूमिका आणि मुलांना घरकाम करण्यापासून कोणत्या सामाजिक समजुती रोखतात यावर सखोल चर्चा करण्यात आली आणि ही बंधने तोडण्यासाठी मुलांना प्रेरित केले गेले. तसेच मुलींना इलेक्ट्रिशियनचे काम शिकवून स्त्रिया सर्व क्षेत्रांत, विशेषतः पुरुषांचे वर्चस्व असलेल्या क्षेत्रांतही पुढे येऊ शकतात हा संदेश देण्यात आला.
हा उपक्रम खेड आणि फलटण तालुक्यात Cummins Foundation च्या मदतीने तर तळेगाव येथे FM Foundation च्या सहकार्याने राबविण्यात आला. या उपक्रमात खेड राजगुरू नगर मधील कुंडेश्वर विद्यालय, कला, वाणिज्य व विज्ञान महाविद्याल पाईट , फलटण मधून ज्योतिर्लिंग इंग्लिश स्कूल आणि जिल्हा परिषद शाळा चव्हाणवाडी, नगरपरिषद शाळा क्रमांक 2 तळेगाव दाभाडे अशा अनेक शाळांचा सक्रिय सहभाग होता.
#महिलादिन #





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