31/10/2025
मैं जिस क़स्बे में बड़ा हुआ, वहाँ लड़कियाँ क्रिकेट नहीं खेलती। देखती भी कम ही थी। यह लड़कों का ही खेल था। मैंने ट्विटर पर एक धुंधली तस्वीर देखी, जिसमें एक छोटा लड़का और लड़की समंदर के पास हाफ़-पैंट में खेल रहे थे। प्रश्न था कि यह भारत के किस क्रिकेट कप्तान की तस्वीर है। अधिकांश उत्तर रवि शास्त्री या मोहम्मद अजहरूद्दीन थे। मैंने भी इनमें से ही एक लिखा। बाद में मालूम पड़ा कि यह मिताली राज और उनके भाई की तस्वीर है। किसी का ध्यान इस बात पर था ही नहीं कि तस्वीर में एक लड़की भी मौजूद है।
2009 में महिलाओं की टीम ऑस्ट्रेलिया में विश्व कप खेल रही थी। उस समय भारत की पुरुष टीम कहीं खेल नहीं रही थी, फिर भी मैं ये मैच नहीं देख पा रहा था। पिछले विश्व कप (2005) में पहली बार मिताली राज की कप्तानी में भारत की टीम फ़ाइनल तक पहुँची थी। उम्मीदें बढ़ गयी थी। इस बार कप्तानी झूलन गोस्वामी कर रही थी, और भारत की टीम पाकिस्तान और श्रीलंका को हरा कर सुपर सिक्स तक पहुँच गयी थी। अब मुक़ाबला चैम्पीयन ऑस्ट्रेलिया से था। उस दिन मिताली राज, अनघा देशपांडे और अंजुम चोपड़ा की तिकड़ी ने बेहतरीन खेलते हुए सम्मानजनक स्थिति तक पहुँचा दिया। आख़िरी ओवरों में एक उन्नीस साल की पंजाबी लड़की हरमनप्रीत खेलने आयी। उसने जब आगे बढ़ कर एम्मा सिम्प्सोन को चौके और छक्के लगाए, यह एक अजूबी घटना थी। भले ही वह विश्व कप भारत की टीम नहीं जीत सकी, लेकिन हरमनप्रीत कौर का छक्का दर्ज़ हो गया।
आठ साल बाद 2017 के विश्व कप सेमीफ़ाइनल में यही हरमनप्रीत कौर जब बल्लेबाज़ी करने आयी, भारत का स्कोर 35 रन पर दो विकेट था। दूसरे छोर पर 35 वर्षीय कप्तान मिताली राज थी। जब हरमनप्रीत 41 के निजी स्कोर पर थी, एक नो-बॉल पर ‘फ़्री हिट’ मिली और हरमनप्रीत का छक्का। उसके बाद तो छक्कों की बरसात शुरू हो गयी। पारी ख़त्म होने तक हरमनप्रीत सात छक्के और बीस चौके लगा कर नाबाद 171 रन बना चुकी थी! भारत ने पाँच बार के विश्व चैम्पियन ऑस्ट्रेलिया को एक बार फिर हरा दिया था।
हरमनप्रीत मोगा (पंजाब) से हैं, जो नशे की लत के लिए खबरों में रहा है। पहली बार जब छक्के लगे, हरमनप्रीत का डोप टेस्ट हुआ। लोगों को शक हुआ कि वह ताक़त बढ़ाने के लिए कोई प्रतिबंधित पदार्थ ले रही है। उनके जाँच में ऐसा कुछ नहीं मिला। इतनी ताक़त इस 28 साल की लड़की के पास कहाँ से आयी? उनके प्रशिक्षक यादवेंद्र सिंह सोधी ने इस प्रश्न का सरल उत्तर दिया। उनके घर के पास एक आम का पेड़ था, और हरमनप्रीत का काम उस पेड़ के ऊपर से छक्का मारना था। न जाने इस फेर में कितने आम टूटे होंगे, लेकिन एक खिलाड़ी छक्कों की मशीन में तब्दील हो गयी। हरमनप्रीत कौर तक पहुँचने में महिला क्रिकेट के इतिहास से गुजरने लगा। बात सिर्फ़ भारत की नहीं। विकसित देशों के महिला क्रिकेटरों को ही हम कितना जानते हैं? वे कब से खेल रही हैं?
क्रिकेट के पितामह विलियम गिल्बर्ट ग्रेस की प्रशिक्षक उनकी माँ ही थी। लेकिन, भारत की मेमसाहबों को शायद ही किसी ने यह खेल खेलते देखा हो। ‘लगान’ फ़िल्म की एलिज़ाबेथ की फ़िल्मी छवि भी झीनी टोपी लगाए खेल की फ़ौरी जानकारी देते ही है। महिलाओं ने क्रिकेट में एक महत्वपूर्ण खोज की, जब उन्होंने गेंद को अंडर-आर्म से ओवर-आर्म बनाया। दर-असल इंग्लैंड की महिलाएँ अठारहवीं सदी में घाघरा-नुमा भारी-भरकम स्कर्ट पहन कर खेलती। ऐसे में जब वह झुक कर नीचे से गेंद फेंकती तो गेंद घाघरे में ही उलझ जाती, इसलिए उन्होंने गेंद कंधे के ऊपर से डालनी शुरू की। यह जब महिला खिलाड़ी क्रिस्टीना विल्ज़ के भाई जॉन विल्ज़ ने देखा, तो उन्होंने भी ऐसी ही गेंद डालनी शुरू की। यह बात दर्ज़ की जाए कि महिलाओं ने ही पुरुषों को यह गेंदबाज़ी सिखायी।
ऐतिहासिक रूप से सातवीं सदी में डंडी रचित ‘दशकुमारचरित’ में वर्णित है कि एक राजकुमारी गेंद को फेंकने, पकड़ने, मारने और दौड़ने में निपुण थी। रवि चतुर्वेदी अपनी पुस्तक ‘क्रिकेट इन इंडीयन मिथॉलजी’ में इस संदर्भ में लिखते है, “क्रिकेट के शब्दों में कहें तो राजकुमारी बल्लेबाज़ी, गेंदबाज़ी और क्षेत्ररक्षण में निपुण थी”।
ब्रिटिश भारत में 1913 में कोट्टयम (केरल) में ऐन केल्लेवे नामक एक ऑस्ट्रेल्याई शिक्षिका, बेकर मेमोरीयल स्कूल की लड़कियों को क्रिकेट सिखाती थी। उसके बाद ऐसा कोई उदाहरण मुझे भारत में लम्बे समय तक नहीं मिला। आज के खेल की शुरुआत बस यूँ ही हो गयी। 1971 में भारतीय टीम को सुनील गावस्कर जब जीत दिला रहे थे, उनकी बहन नूतन गावस्कर ने दोस्तों से कहा, “हम भी क्रिकेट खेलते हैं”।
इन लड़कियों ने मुंबई के पार्कों में टेनिस बॉल से खेलना शुरू कर दिया। वहीं रेल्वे कॉलोनी में एक पारसी लड़की डायना एडलजी लड़कों के साथ क्रिकेट खेल रही थी, जिसमें उनके दांत टूट गए। वह नक़ली दांत लगा कर खेलती रही। दक्षिण मुंबई में आलू बमजी नामक पारसी महिला ने भारत का पहला महिला क्रिकेट क्लब स्थापित कर दिया—अल्बीस क्रिकेट क्लब। अगर देखा जाए, तो पुरुष क्रिकेट की तरह महिला क्रिकेट की शुरुआत भी पारसियों ने ही की। पुणे में कुछ विवाहित सम्भ्रांत महिलाएँ क्लब के मैदान में शौक़िया खेलने लगी। कलकत्ता और मद्रास की कुछ एथलीट लड़कियाँ भी खेलने लगी। दो साल बाद लखनऊ जैसे पारम्परिक शहर में एक प्रशिक्षक महेंद्र कुमार शर्मा रिक्शॉ पर घूमते हुए हाथ में माइक लिए घोषणा कर रहे थे,
“आइए आइए! कन्याओं की क्रिकेट आयोजित होगी। ज़रूर आएँ”।
[प्रवीण कुमार झा की पुस्तक ‘स्कोर क्या हुआ’ (वाणी प्रकाशन) से एक अंश। इसके आगे की यात्रा पुस्तक में वर्णित- https://amzn.in/d/9fheeki ]