11/08/2026
जिसे श्रीजी बावा की सेवा का अवसर मिल गया, समझो उसे जीवन में कृपा का सबसे बड़ा प्रमाण मिल गया।"
महाप्रभुजी ने हमें ऐसा मार्ग दिया, जिसमें ठाकुरजी को पाने के लिए कोई कठिन साधना नहीं बताई... बस उनके अपने बनकर, उनके सुख के लिए जीना सिखाया।
हम वैष्णवों को ग्वाल-मंडली कहा गया... क्योंकि हम उनके दूर खड़े भक्त नहीं, उनके अपने हैं, उनके सखा हैं।
सोचिए, जिस श्रीजी बावा की सेवा के लिए देवता भी तरसें, उसी सेवा का अवसर हमें मिल रहा है... इससे बड़ी कृपा और क्या होगी?
हवेली में आकर सेवा करना केवल कोई धार्मिक क्रिया नहीं है।
यह तो श्रीजी बावा का अपने घर बुलाना है।
भोग सेवा हो, माला सेवा हो या छोटी-सी कोई
सेवा... अगर मन में भाव है कि
"बावा, यह आपके सुख के लिए है..."
तो वही छोटी-सी सेवा भी हमारे जीवन की सबसे बड़ी कमाई बन जाती है।
और पुष्टिमार्ग की सबसे सुंदर बात तो यही है-ठाकुरजी को हमारे सामर्थ्य की नहीं, हमारे भाव की चिंता है।
हम सोचते हैं कि हम ठाकुरजी की सेवा करने हवेली आए हैं...
लेकिन सच्चाई शायद इससे भी सुंदर है-ठाकुरजी ने ही हमें अपनी सेवा के योग्य समझकर बुलाया है।
महाप्रभुजी और गुरुदेव ने हमें इतना सहज मार्ग दिया...
कि हमें अपने ठाकुरजी को कहीं दूर खोजने की जरूरत ही नहीं।
हवेली में वे विराजते हैं, सेवा में वे मिलते हैं, भोग में वे स्वीकार करते हैं और हमारे भाव में वे बसते हैं।
बस सेवा करते समय मन इतना कहता रहे-"बावा, मुझे कुछ नहीं चाहिए... बस आपकी सेवा मन से होती रहे।
आपको सुख मिले, यही मेरा सुख है।"
फिर लोक के हजार कामों के बीच भी मन अकेला नहीं रहता...
क्योंकि हाथ संसार के काम में होते हैं, लेकिन मन श्रीजी बावा के चरणों में।
यही तो पुष्टिमार्ग है-
कृपा में मिल जाना, सेवा में खो जाना और धीरे-धीरे कृष्णमय हो जाना।
धन चला जाए तो बहुत कुछ नहीं जाता... लेकिन अगर ठाकुरजी मन से चले जाएँ, तो सब होते हुए भी कुछ नहीं रहता।
इसलिए बस एक बात याद रखनी है-
"श्रीजी बावा को अपने जीवन में सबसे ऊपर रखो... बाकी सब अपने आप सहज होता चला जाएगा।"