20/09/2025
श्लोक:
सर्वं धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
स्थान: भगवद् गीता, अध्याय 18 (मोक्षसंन्यास योग), श्लोक 66।
अर्थ:
सभी धर्मों (कर्तव्यों, नियमों) को त्यागकर केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूंगा, चिंता मत कर।
यह श्लोक भगवद् गीता का हृदय है, जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को, और उनके माध्यम से समस्त मानवता को, प्रेम और विश्वास का परम संदेश देते हैं।
“सर्वं धर्मान् परित्यज्य” कहकर कृष्ण संसार के जटिल नियमों, कर्तव्यों और पाप-पुण्य के बंधनों से मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं। यह एक प्रेममयी निमंत्रण है—ईश्वर की शरण में आने का, जहाँ भय, संदेह और अपराधबोध का कोई स्थान नहीं।
“मामेकं शरणं व्रज” में कृष्ण का आलिंगन खुला है, जो हर आत्मा को बिना शर्त स्वीकार करता है। यह शब्द मन को झकझोर देते हैं, जैसे कोई माँ अपने भटके बच्चे को गले लगाने को बुला रही हो। “अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि” में उनकी वह करुणा है, जो हर पाप को क्षमा कर देती है, हर बोझ को हल्का कर देती है।
“मा शुचः”—यह आश्वासन आत्मा को शांति देता है, जैसे थके हुए यात्री को घर की छाँव। यह श्लोक केवल शब्द नहीं, बल्कि ईश्वर का प्रेमपत्र है, जो हमें सिखाता है कि सच्ची मुक्ति विश्वास और समर्पण में है। यह हृदय को पिघलाता है, आँखों को नम करता है, और आत्मा को परमात्मा के चरणों में लीन होने को प्रेरित करता है।