12/04/2025
*कृपया ध्यान से पढ़े और बुद्धि का प्रयोग करें।*
*क्या हनुमान जी बंदर थे ??* 🕉️
*नीचे प्रमाण दे रहे हैं कि हनुमान जी बंदर नहीं थे इन्हें पढ़ कर जो लोग महाबली, पराक्रमी, बाल ब्रह्मचारी, संस्कृत व वेदों के प्रकांड पंडित #हनुमान जी को अब भी #बंदर ही समझते हैं, ईश्वर उन्हें भी बंदर बना देवे।* 😂😂
➡ बंदरो में कोई नामकरण संस्कार करने की कोई रीति नहीं होती है।
क्या बंदरो का नामकरण संस्कार करने की कोई रीति है
अगर है तो आज भी कुछ अंश में होनी चाहिये थी !
➡ हनुमान नाम तो मनुष्यों में होता है ! बंदरो में आज भी इस तरह की कोई नामकरण परंपरा नहीं होती।
हनुमान जी के दादा जी का नाम प्रह्लाद विद्याधर था वह शूर वीर धर्म प्रेमी थे , विद्याप्रेमी भीबहुत थे तभी उनको :”विद्याधर ” की उपाधि मिली थी।
➡ जनेऊ धारण सिर्फ़ और सिर्फ़ मनुष्यों में होता है। हनुमान जी अपने कन्धे पर जनेऊ धारण किए फिरते थे तथा बन्दर नहीं, अपितु जनेऊ (यज्ञोपवीत) तो मनुष्य ही धारण करते हैं।
➡ हनुमान सच्चे वैदिक धर्मी मनुष्य थे, न कि वे बन्दर थे क्योंकि वानप्रस्थी बनने की बात सोचना तो दूर की बात है, वानप्रस्थ होता है, बन्दरों को यह भी ज्ञात नहीं होता।
➡ वह भी बहुत बुद्धिमान व वीर पुरुष थे ! महर्षी अगस्त्य के आश्रम मे वेद वेदांग की शिक्षा ग्रहण की थी ! आजतक मेरी जानकारी मे कोई भी ऐसा बंदर नहीं जो चारो वेद का ज्ञाता हो व संस्कृत व वेदों का प्रकांड पंडित भी हो।
➡ हनुमान जी के माता पिता भी मनुष्य ही थे। कभी आज तक नहीं सुना कि मनुष्यों से पूँछ वाला बंदर पैदा हुआ हो।
महेन्द्रपुर के राजा महेन्द्र राय की पुत्री अंजना जो स्वयं विद्यावान थी पवन जी का विवाह उनसे हुआ था,
उनसे जन्मे बालक का नामकरण संस्कार हनुमान जी के रूप हुआ था !
ऐसे ही बाली सुग्रीव आदि भी मनुष्य थे वह वानर जाति के जरूर थे लेकिन बंदर नही थे।
बंदरो को भी वानर कह दिया जाता है।
इसलिये इस भ्रम का जन्म हुआ।
जैसे” कोटि” को करोड़, प्रकार , तरह भी कह दिया जाता है!
➡ हनुमान जी का शरीर वज़्र समान था , इसलिये उनको वज्र+ अंग+ बली = वज्रांग बली, अपभ्रंश होकर बजरंग बली कहलाये जाने लगे !
अगर हनुमान जी बंदर होते तो उनके पितामह तक के नामकरण संस्कार क्यों होता ?
➡ अगर हनुमान जी बंदर होते तो उनका सीता जी से संवाद क्यों होता ?
➡ रावण के राज्य में जाकर उनसे भी संवाद क्यों होता ?
अब समाज में हनुमान जी” बंदर” क्यों बने ?
➡ अगर हनुमान जी बंदर होते तो राम जी से लक्ष्मण जी से भरत जी आदि से संवाद क्यों और कैसे संभव होता ?
वर्तमान में भी बंदर मनुष्य की तरह मनुष्यों से वार्तालाप नहीं कर पाता।
अब समाज में हनुमान जी” बंदर” क्यों बने ?
एक तो वह वानर जाति के थे और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के बहुत ज्यादा भक्त होने उनके आज्ञाकारी होते हुये राम जी के दल में हनुमान जी की “पूछ” (महत्व)बहुत ज्यादा थी वही पूछ, अपभ्रंश होकर” पूंछ ” बन गयी !
➡ हनुमान जी ब्रह्मचारी थे जबकि कोई भी बंदर ब्रह्मचर्य को धारण नहीं कर सकता इसके विपरीत बंदर प्रबल कामी होते हैं।
➡ हनुमान जी शाकाहारी थे सात्विक भोजन का आहार करते थे जबकि बंदर मांसाहार भी करते हैं। बंदरों को शाकाहार और मांसाहार में विभेद का विवेक क्यों होगा ??
➡ किसी बन्दर में यह योग्यता हो सकती है कि वह वेदों का विद्वान् बने ? व्याकरण का विशेष ज्ञाता हो ? अपने शरीर की उचित देखभाल भी करे ?
➡ बाली की पत्नी तारा, सुग्रीव की पत्नी रुमा हनुमान की माँ अंजनि मनुष्य योनि की स्त्रियाँ थीं उनके किसी की पूँछ नहीं थी।
➡ मन्त्र का ज्ञान बन्दरों को अथवा बन्दरियों को नहीं होता, न ही हो सकता है। अतः सिद्ध है कि हनुमान का जिन से मिलना-जुलना आदि था, उनकी पत्नियाँ भी मनुष्य ही थीं।
➡ हनुमान दूरस्थ किसी पर्वत पर जाकर मूर्च्छित लक्ष्मण के उपचार के लिए संजीवनी बूटी लाए थे। यह कार्य भी कोई बन्दर नहीं कर सकता अपितु कोई मनुष्य ही कर सकता था जिसे जड़ी-बूटियों का पर्याप्त ज्ञान हो।
इस तरह से वीर हनुमान का अपना ही समाज ज्ञान के आभाव में व असत्य के अधिक प्रचार के कारण उनका “बंदर” के रूप में पेश करके उनका अपमान करता है !
➡ हनुमान को बन्दर मानने वाले लोग तुलसीदास गोस्वामी द्वारा रचित ‘‘हनुमान चालीसा’’ का पाठ करते हैं परन्तु उसमें भी एक प्रमाण ऐसा है जो हमारी बात का समर्थन करता हैः-
हाथ वज्र औ ध्वजा विराजे।
कान्धे मूँज जनेऊ साजे।।
काश! ऐसे लोग इस चालीसा में यह पाँचवा पद बोलते-पढ़ते समय इतना समझ पाते कि इसके अनुसार हनुमान जी अपने कन्धे पर जनेऊ धारण किए फिरते थे तथा बन्दर नहीं, अपितु जनेऊ (=यज्ञोपवीत) तो मनुष्य ही धारण करते हैं।
आज हनुमान भक्त कहलाये जाने मुंह मे तम्बाकू, पान मसाला, अन्य नशा, शराब, मांसाहार, अंडे खाकर के भी उनके गीत गाने मे कोई शर्म भी नही करते है !
हनुमान जी तो राम जी के भक्त थे उनके आज्ञाकारी थे, उनके भक्तों को चाहिये कि हनुमान जी के चित्र, प्रतिमा आदि को न पूजकर हनुमान जी के चरित्र को, उनके गुणों को आत्मसात करें।अश्रद्धा इतनी की बंदरों को भोजन कराते हैं और कहते हैं जय बजरंगबली - हनुमान जी पधारे हैं यह हनुमान जी का सम्मान नहीं अपमान करना है।
उनका जीवन आदर्श ब्रह्मचारी का भी रहा है परन्तु हमारे नादान पौराणिक भाइयों ने उन्हें बन्दर मानकर उनके साथ अन्याय किया है। और इसे धर्म की हानि कहा जाता है।
वे बन्दर न थे, अपितु पूर्णतः ऊपरोक्त गुणों से युक्त एक प्रेरक, आदर्श तथा कुलीन महापुरुष थे।
🌿🌿🌷🌷🚩🚩वैदिक सनातन अमर रहे 🚩🚩🙋♂️🙋♂️🌷🌷🌿🌿