25/08/2026
भ्रष्टाचार क्यों नहीं खत्म हो रहा ?
भ्रष्टाचार इस देश की आत्मा को बार-बार छलनी करता रहा है। यह कोई आज की बात नहीं है। पीढ़ियाँ बदल गईं, शासन बदले, नारे बदले, पर यह पीड़ा कहीं गई नहीं। जब भी हम राष्ट्र, धर्म, संस्कृति या भविष्य की बात करते हैं, यह विषय अपने-आप सामने आ खड़ा होता है। हम हिंदुत्व की बात करते हैं, सनातन धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की बात करते हैं, अखण्ड भारत, एकात्म मानववाद और सनातन आर्थिक मॉडल जैसे गम्भीर विषयों पर चर्चा करते हैं। राष्ट्र की एकता और अखण्डता की बात करते हैं। सब कुछ करते हैं, पर हर बार एक जगह आकर बात अटक जाती है—भ्रष्टाचार पर।
हमारे मन में आदर्शों की कोई कमी नहीं है। विचारों के स्तर पर हम बहुत समृद्ध हैं। पर जैसे ही इन विचारों को जीवन में उतारने की बात आती है, कोई न कोई समझौता सामने आ खड़ा होता है। तभी लगता है कि शायद समस्या केवल व्यवस्था की नहीं है, कहीं न कहीं हम सब उससे जुड़े हुए हैं। इसलिए भ्रष्टाचार हर विमर्श के केन्द्र में आ जाता है और वहीं ठहर जाता है।
आज की सरकार में ऐसे लोग हैं जो एकात्म मानववाद और हिंदुत्व की विचारधारा की बात करते हैं। स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसा अनुशासित, सादगीपूर्ण और दृढ़ संकल्प वाला नेतृत्व सामने है। इसके बावजूद जब नीचे तक देखते हैं, तो वही पुरानी शिकायतें, वही पुराने अनुभव सामने आते हैं। तब मन में प्रश्न उठता है—कमी कहाँ रह गई? विचारों में या उन्हें जीने वालों में?हिंदू आध्यात्मिक वस्तुएं खोजना
हम यह भी जानते हैं कि यह स्थिति अचानक नहीं बनी। पहले औपनिवेशिक शासन ने हमारी शिक्षा, संस्कृति और मूल्यबोध को कमजोर किया। उसके बाद तथाकथित स्वतंत्रता के पश्चात समाजवाद के नाम पर ऐसी नीतियाँ बनीं, जिनमें राज्य तो शक्तिशाली होता गया, पर व्यक्ति का नैतिक दायित्व धीरे-धीरे कमजोर पड़ता गया। अधिकार स्वाभाविक होते चले गए और कर्तव्य बोझ लगने लगे। यहीं से भ्रष्टाचार केवल अपराध नहीं रहा, बल्कि व्यवहार का हिस्सा बनता चला गया। आज स्थिति यह है कि यह रोग समाज के रक्त में घुल चुका है।
यदि इस रोग की समय रहते कठोर चिकित्सा नहीं हुई, तो यह देश को गहरे संकट में डाल देगा। हम रामराज्य की बात करते हैं और उसे साकार करने की इच्छा भी प्रकट करते हैं। पर रामराज्य केवल किसी शासन व्यवस्था का नाम नहीं था। वह आचरण की व्यवस्था थी। वहाँ धर्म का अर्थ था—कर्तव्य। आज हम रामराज्य की चर्चा तो करते हैं, पर यह स्वीकार करने से बचते हैं कि भ्रष्टाचार रहते हुए रामराज्य केवल कल्पना ही रह सकता है।...............