09/05/2026
जाति मिटाओ या आरक्षण? — पहले अक्ल का इलाज करवाओ!
आज सोशल मीडिया पर फिर वही पुराना ढोल पीटा जा रहा है — “आरक्षण हटा दो, जातियां खत्म हो जाएंगी!” “जाति प्रमाण पत्र बंद कर दो, जातिवाद मिट जाएगा!” वाह! क्या क्रांतिकारी विचार है! इसी तर्क से तो रेप का कानून खत्म कर दीजिए — रेप होना अपने आप बंद हो जाएगा। हत्या की धाराएं हटा दीजिए — कत्ल खुद रुक जाएंगे। चोरी का केस दर्ज करना बंद कर दीजिए — चोर साधु बन जाएंगे। यह वही मानसिकता है जो कहती है कि “बीमारी इसलिए है क्योंकि दवाई है।” अरे भाई, थर्मामीटर तोड़ने से बुखार नहीं उतरता! आरक्षण जातिवाद का कारण नहीं, परिणाम है — हजारों साल के सामाजिक अन्याय का संवैधानिक उपचार है।
बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने यह व्यवस्था इसलिए बनाई कि जिन्हें मनु ने मंदिर, शिक्षा और कुएं तक से वंचित रखा, उन्हें संविधान न्याय दे सके। और जो कहते हैं कि “जाति अंग्रेजों की देन है” — उन्हें मनुस्मृति, पुराण और इतिहास के पन्ने पलटने की जहमत उठानी चाहिए। अंग्रेज तो 200 साल पहले आए, जातिवाद तो 2000 साल से इस देश की छाती पर बैठा है।
असली सवाल यह है — क्या आप सच में जातिवाद मिटाना चाहते हैं, या सिर्फ अपने विशेषाधिकार बचाना चाहते हैं? यदि नीयत साफ है तो पहले अंतर्जातीय विवाह को सामान्य बनाइए, सरनेम छोड़िए, मंदिरों में हर जाति के पुजारी स्वीकार कीजिए, अपने बच्चों की शादी “उनसे” कीजिए जिन्हें आज भी घोड़ी पर चढ़ने पर पीटा जाता है। तब बात कीजिए जाति मिटाने की।
“व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण होता है।” लेकिन व्यक्ति का निर्माण तब होगा जब उसकी सोच में न्याय हो, सुविधा नहीं। जातिवाद बीमारी है, आरक्षण उसकी दवाई है — और जो दवाई बंद करवाकर बीमारी मिटाने का दावा करते हैं, वे या तो डॉक्टर नहीं, या मरीज को मारना चाहते हैं। संविधान का रास्ता ही इस देश का रास्ता है, बाकी सब बहाने हैं, बातें हैं, बातों का क्या?
आप क्या सोचते हैं — असली समस्या जाति है, या जाति देखने वाली नज़र?
— डॉ. पुरुषोत्तम मेघवाल
मेघवाल्स IAS एवं भू-ज्ञान कंसल्टेंसी सर्विसेज
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