20/08/2026
#बाज सिंह बंजारा (बाज सिंह पंवार बंजारा ) 18वीं सदी के एक पराक्रमी योद्धा, सेनापति और खालसा राज के तहत सरहिंद के पहले गवर्नर (सूबेदार) थे। सिख इतिहास और लोक-परंपराओं में उनके साहस और प्रशासनिक कुशलता की प्रमुख गाथाएं दर्ज हैं।
प्रारंभिक जीवन एवं पृष्ठभूमि
मूल और वंश: बाज सिंह का संबंध मालवा के परमार (पंवार) क्षत्रिय वंश से माना जाता है, जिनके पूर्वज पंजाब क्षेत्र (अमृतसर जिले के मीरपुर पट्टी गांव) में आकर बसे थे। बंजारा और राजपूत समुदाय में उनके ऐतिहासिक योगदान को बड़े सम्मान से देखा जाता है।
पारिवारिक संबंध: वे अमर शहीद भाई मनी सिंह जी के चचेरे भाई थे। उनके भाई भी गुरु गोबिंद सिंह जी और बाबा बंदा सिंह बहादुर की सेना में प्रमुख पदों पर कार्यरत थे।
गुरु गोबिंद सिंह जी और बंदा सिंह बहादुर का साथ
बाज सिंह ने दशमेश पिता गुरु गोबिंद सिंह जी से अमृत छककर खालसा पंथ धारण किया था।
जब गुरु गोबिंद सिंह जी ने बाबा बंदा सिंह बहादुर को मुगलों के अत्याचारों का अंत करने के लिए पंजाब भेजा, तो उन्होंने सहायता और मार्गदर्शन के लिए जिन पंज प्यारों (सलाहकारों) को साथ भेजा था, उनमें सरदार बाज सिंह प्रमुख थे।
चप्पड़चिड़ी का युद्ध और सरहिंद के गवर्नर
मई 1710 का युद्ध: चप्पड़चिड़ी की ऐतिहासिक लड़ाई में बाज सिंह ने सिख सेना के दाहिने हिस्से की कमान संभाली और सरहिंद के सूबेदार वज़ीर खान की सेना के खिलाफ अभूतपूर्व पराक्रम दिखाया।
सरहिंद पर अधिकार: जीत के बाद बाबा बंदा सिंह बहादुर ने बाज सिंह की वीरता और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए उन्हें सरहिंद का पहला गवर्नर (शासक) नियुक्त किया।
उन्होंने इस क्षेत्र में किसानों को भूमि के अधिकार दिए, कर व्यवस्था सुधारी और निष्पक्ष शासन की स्थापना की।
शहादत (1716)
गिरफ्तारी: 1715 में गुरदास नांगल की भीषण घेराबंदी के बाद मुगलों ने बाबा बंदा सिंह बहादुर और बाज सिंह सहित प्रमुख सिख योद्धाओं को बंदी बना लिया और दिल्ली ले गए।
दिल्ली में बलिदान: 9 जून 1716 को दिल्ली में यमुना तट के पास मुगल सम्राट फर्रुखसियर के आदेश पर उन्हें शहीद कर दिया गया। फांसी से पूर्व भी उन्होंने अंतिम क्षणों तक अपनी वीरता और धर्मनिष्ठा का अद्भुत परिचय दिया।
#सुनील कुमार/ मीडिया प्रभारी/बंजारा युवा सेना संगठन (उत्तर प्रदेश)