02/09/2026
टिहरा बस स्टैंड पर बना नया रेन शेल्टर आजकल एक बार फिर सुर्खियों में है। एक वर्ग का कहना है कि इसे और बेहतर बनाया जा सकता था, जबकि दूसरे वर्ग का मानना है कि पुनर्निर्मित रेन शेल्टर पहले की अपेक्षा बेहतर, व्यवस्थित और पर्याप्त स्पेशियस है।
द्वंद्व विचारों का है और होना भी चाहिए। लोकतंत्र में किसी निर्माण कार्य पर सवाल उठाना भी उचित है और उसकी अच्छाइयों को स्वीकार करना भी।
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हम इसकी विवेचना राजनीतिक चश्मे के बिना कर सकते हैं?
रेन शेल्टर की गुणवत्ता को उसकी उपयोगिता, मजबूती, बैठने की क्षमता, बारिश और धूप से बचाव, यात्रियों की सुविधा तथा निर्माण मानकों के आधार पर परखा जाना चाहिए। यदि कमियां हैं तो उन्हें तथ्य के साथ सामने रखा जाए और यदि काम अच्छा हुआ है तो उसे स्वीकार करने में भी संकोच नहीं होना चाहिए।
काम किसके कार्यकाल में हुआ, किसने करवाया या किस राजनीतिक विचारधारा से जुड़ा है—यह बाद की बात होनी चाहिए।
विचारों का द्वंद्व स्वस्थ है, लेकिन राजनीतिक द्वेष के कारण अच्छी चीज को खराब और कमी को उपलब्धि साबित करना किसी के हित में नहीं है।
तो आइए, विवाद नहीं—विवेचना करें।
आरोप नहीं—तथ्य रखें।
और राजनीति से ऊपर उठकर देखें कि टिहरा के आम यात्री के लिए यह रेन शेल्टर वास्तव में कितना उपयोगी है।
आप क्या कहते हैं?
A : पहले था जो गिराया गया
B : एक वर्ग का कहना कि ऐसा बनता तो अच्छा था
C : ऐसा बना है ,एक वर्ग कहना कि लाइटिंग वगैरह हो जाए तो ऐसा दिखेगा।