20/03/2026
*आंदोलन की मिट्टी से निकलती गीतों की लय!*
*एक ऐसा स्थल जो घर से भी प्यारा हो, जिसमें ना कोई छोटा है, ना कोई बड़ा है। हां, उम्र में जरूर छोटे बड़े हैं, परंतु दिल सभी के बड़े हैं।*
*उनका आपसी मेलजोल एवं आत्मीयता का कोई तोड़ नहीं है।*
*276 दिन में सभी ऐसे हो गए कि जैसे सब एक ही परिवार के हैं।*
*यह यथार्थ है - रामगढ़ भगवानपुर बस स्टैंड पर चल रहे धरने का, आंदोलन का।*
*कई कहते हैं कि लोगों को अपने काम से फुरसत ही नहीं है। कोई कहता है कि लोग सामाजिक कामों में रुचि ही नहीं लेते।* *इसका जवाब किताबों में नहीं ढूंढा जा सकता। लेकिन 276 दिन से 'रामगढ़ भगवानपुर अस्पताल बनाओ संघर्ष कमिटी रेवाड़ी' के बैनर तले चल रहा आंदोलन स्वयं में इसका एक जवाब है, बहुत सारे सवालों के जीवन्त जवाब यहां तलाशे जा सकते हैं।*
*आप आइए और अपनी आंखों से खुद ही देखिए कि उपरोक्त कथन में रत्ती-भर भी कचाई नहीं है।उनकी आत्मीयता और भाई-चारे के किस्से अपने कानों से सुनें।*
*18 मार्च को तेज हवा और बारिश ने धरना-स्थल पर जो कुछ टीन-टप्पर थे, उन सब कुछ को उखाड़ फेंका था। क्या हुआ? बच गया या उखड़ गया? बताओ। एक पर एक फोन बजते रहे। आपस में एक दूसरे को फोन पर फोन करते रहे कि मानों उनका अपना ही घर उजड़ गया हो।*
*महिलाएं घर से निकलकर उसी समय धरना स्थल पर आ गई। पुरुष इकठ्ठा हो गए और रात को ही नर-नारियों ने इकट्ठा होकर टेन्ट-पण्डाल को दोबारा खड़ा करने का काम रात को ही शुरू हो गया। अपने विशाल आशियाने को फिर से खड़ा करने के काम में आस पास के गांवों के लोग भी जुट गए।*
*एक अनूठा, एक विशाल आशियाना! इसलिए कि उसमें जन हित के उद्देश्य से विशाल हृदय लिए लोग हर रोज बैठते हैं।*
*सैकड़ों गांवों के लोग अकेले या जत्थों में इस धरने, आंदोलन में शुरू के दिन से ही शिरकत करते रहे हैं।*
*अपना किराया खुद भरकर, अपने ही स्तर पर आते हैं और चले जाते हैं। उन्हें भाषण का शौक नहीं है। जब हर रोज के हाजिरी रजिस्टर में देखी जाती है तो कभी रेवाड़ी के दूर दराज के गांवों के लोग, कभी रेवाड़ी शहर से, कभी पटौदी, गुड़गांव से, तो कभी बावल से, नूंह से, कभी कनीना से, कभी अटेली से, आम आदमी लगातार शिरकत कर रहे हैं।*
*धरना स्थल पर रखे दानपात्र में अपनी नेक कमाई का कुछ हिस्सा डाल कर चल देते हैं, मानों किसी तीर्थ यात्रा में आए हों।*
*बस! चलते वक्त सब के कण्ठ से एक ही बात निकलती है कि सरकार को शर्म आनी चाहिए!*
*क्या यहाँ का शासन-प्रशासन इतना अन्धा, बहरा और गूंगा हो गया है कि उसे कुछ दिख नहीं रहा है! क्या सुन नहीं पा रहा है।*
*जनता के दिलों से निकली यह सच्ची सोच ही आंदोलन की असली ताकत है।*
*दूर दराज नागरिकों का समर्थन आंदोलन के लिए ऑक्सीजन का काम कर रहा है।*
*कभी कभी देखने में आया करता है कि आंदोलन के लंबे होने के कारण आंदोलनकारियों के चेहरों की मुस्कान धीमी पड़ जाया करती है परंतु यहां चेहरे हर रोज खिलते ही जा रहे हैं क्योंकि यह आंदोलन स्वास्थ्य जैसे मुद्दे - अस्पताल की मांग, अस्पताल की जरूरत को लेकर सच्चाई की बुनियाद पर खड़ा है।*
*इस आंदोलन को किसी ने सोच-समझ कर नहीं गढ़ा है। यह वक्त का तकाजा है, जिन्दा दिलों की अभिव्यक्ति है। यहां से उठते नारे और लोगों के दिल की धड़कन एक दूसरे के साथ मिल गई है, गुथ-मुथ हो गई है।*
*इस आंदोलन में गीत और उनकी लय धरना-स्थल की मिट्टी से निकलती हैं।*
*अब यह आंदोलन टिमटिमाता हुए दिए से एक मशाल का रूप ले चुका है।*
*पता नहीं कितने ही नागरिक रात को नींद उखड़ने पर इसी आंदोलन को तेज करने की बात सोचते-सोचते दोबारा सो जाते हैं और सुबह उठकर धरने की तरफ चल पड़ते है।*
*22 मार्च 2026 को यह धरना 100 ब्लड यूनिट दान कर आम इंसान की जरूरत से जुड़े एक और सामाजिक दायित्व को पूरा करने जा रहा है।*
*आइये, आम और खास के हित में उठाई जा रही आवाज का हम और आप भी हिस्सा बनें।*
कॉमरेड राजेंद्र सिंह एडवोकेट,
*जनांदोलन का एक कार्यकर्ता*
9416149692