08/03/2026
~ महिला दिवस ~
** उसे देखा है मैंने... **
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उसे देखा है मैंने...
बस की रेलम-ठेल में,
कभी रिक्शे पे, कभी ऑटो में,
कभी ट्रेन में, कभी प्लेन में,
बैठते भी, चलाते भी, उड़ाते भी।
उसे देखा है मैंने
एक बड़ी सी इमारत के बाहर भी,
अन्दर भी।
हसरत से निहारते भी,
बनाते भी, सजाते भी,
उसे सुना है मैंने,
भजन में , अज़ान में,
कीर्तन में, कव्वाली में,
किसी राजनैतिक रैली में
और कभी शास्त्रीय शैली में।
उसे जूझते देखा है मैंने
लाइन में ...
रेलवे और राशन की,
दौड़ में विज्ञापन की, और अक्सर
अपने ही चरित्र के सत्यापन की।
उसे दम तोड़ते और भरते भी देखा है;
अस्पताल के बाहर, और अंदर भी,
कभी मुखर होती, कभी बस मन में,
कभी रक स्ट्रेचर पर, कभी कड़क एप्रन में।
उसे देख लेता हूँ,
किसी शीशमहल से मॉल के भीतर,
पेट्रोल पम्प पर, ढाबे पर,
काम करते भी, कराते भी।
देख पाता हूँ उसे मैं,
पीटते कभी गिट्टी, कभी की-बोर्ड,
और कभी किसी लफ़ंगे को।
उसकी साँस को फूलते भी पाया था,
कभी बोझ उठाते, कभी उठवाते,
सहारा लेते और देते भी।
टिफ़िन पहुँचाते भी देखा है,
कभी पिता, भाई, दोस्त, पति और बेटे का भी।
कभी साथ खाते और अक्सर ख़ुद भूखा रहते भी।
वैसे तो देखा है उसे मैंने
दौड़ाते हुए,
कदम भी और कलम भी।
कभी दूरियाँ नापने को,
कभी दूरियाँ पाटने को।
एक अँधेरी गली में
उसे देखा है मैंने,
कभी साँस भरते, खुद में,
और कभी साहस, दूसरे में।
और देखा तो है खेल के मैदान में भी,
एक सीटी की आवाज़ पर
दौड़ते भी, दौड़ाते भी।
हुकुम देते भी और बजाते भी।
बन्दूक उठाये भी तो देखा था उस दिन,
एक सुनसान बीहड़ में, और
एक खाकी वर्दी में।
एकरूप सी अडिग, भीगी बारिश में,
सजग सी खड़ी उस कड़ी सर्दी में।
उसे पाया था एक शाम को
बाल कटवाते हुए,
कि परिवार के लिए वक़्त नही होता।
देखा था बरिस्ता में , और
अचार-चीनी से रोटी खाते भी।
देखा था होली की सफ़ाई में निकले पैसे छुपाते,
और दीपावली में नई साड़ी न लेते हुये भी।
राखी में प्यार लुटाते हुए भी,
और आँसू अपने छुपाते हुये भी।
छलांगतेे पाया था उसे उस रात
आसमान लाँघते उस रॉकेट में,
और प्रौदुनोवा के बार पर भी,
पार करते वो तरणताल भी,
और 26 जनवरी की कदमताल भी।
उसे देखा तो था धुआँ फाँकते भी,
कभी चूल्हे का,
कभी ट्रैफिक सिग्नल
और कभी गैराज का।
वैसे विश्वसुंदरी का ताज पहनते भी तो देखा ही था।
कहते सुना एक दिन कि उठने का कोई तय नही,
कभी 6 तो कभी 4 बजे।
पर सोने का तो कभी पता ही नहीं।
बीमार होना बस में नहीं,
और पड़ने का तो ख़याल ही नही।
मानो धरती फटने को आ जायेगी।
फिर भी वो चलती रहती है।
बिना टिके, थके या रुकेे।
कभी धीमी तो कभी तेज़।
ठीक समय सी।
या फिर उस घड़ी सी।
उस में भी कभी घण्टे की सुई सी, कभी मिनट और कभी सेकण्ड की सी।
बस अनवरत चलती सी,
कभी न रुकती सी...
उसे देखा है मैंने, ऐसे भी,
किसी मोड़ पर,
हाँ, देखा है मैंने...
उसे लगभग ऐसे ही किसी रूप में,
हर मोड़ पर...
हर क्षण किसी न किसी की चिंता करते,
किसी न किसी का ख़याल रखते,
बस अपना छोड़कर!
किसी न किसी का ख़याल रखते,
बस अपना छोड़कर!!
अन्तर राष्ट्रीय महिला दिवस पर नारीशक्ति को नमन। 🙏
#महिला_दिवस
#भईया_उवाच्