20/09/2026
श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ के वार्षिकोत्सव के छठे दिवस का शुभारम्भ प्रातःकालीन ध्यान एवं योग सत्र के साथ हुआ।
प्रातःकालीन मंचीय सत्र में स्वामी जी ने परब्रह्म के दिव्य शृंगार एवं सौन्दर्य का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक साधना केवल दार्शनिक चिंतन तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रेम और भाव के माध्यम से परब्रह्म के स्वरूप को हृदय में अनुभव करने की यात्रा है। उनके संबोधन में परब्रह्म के सौन्दर्य, माधुर्य और प्रेममय स्वरूप की व्याख्या ने उपस्थित सुंदर साथ को भावविभोर किया।
इस अवसर पर विभिन्न आचार्यगण ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए। वक्ताओं ने विशेष रूप से आध्यात्मिक और धार्मिक क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली आपसी प्रतिस्पर्धा, प्रतिष्ठा की भावना तथा स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की प्रवृत्ति को साधना के मार्ग में बाधक विकार बताया। उन्होंने कहा कि अध्यात्म का मूल उद्देश्य व्यक्ति को अहंकार, तुलना और प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठाकर विनम्रता, समरसता और प्रेम की ओर ले जाना है। आध्यात्मिक जीवन में पद अथवा प्रतिष्ठा से अधिक महत्वपूर्ण परस्पर सम्मान, सहयोग और भीतर की निर्मलता है।
पन्ना से पधारे श्री राहुल जी ने अपनी भावपूर्ण कविता के माध्यम से श्री प्राणनाथ जी की पहचान, उनके संदेश तथा उनके प्रति अपने प्रेम और श्रद्धा को अभिव्यक्त किया। उनकी काव्य प्रस्तुति में भक्ति, प्रेम और आत्मीयता का सुंदर समन्वय देखने को मिला, जिसे उपस्थित सुंदर साथ ने विशेष सराहना के साथ सुना।
दोपहर के सत्र में वरिष्ठ एवं वयोवृद्ध प्रचारिका ज्योति जी ने सुंदर साथ के साथ आध्यात्मिक विषयों पर संवाद किया। अपने दीर्घ अनुभव के आधार पर उन्होंने साधना, समर्पण और ज्ञान को जीवन के व्यवहार में उतारने की आवश्यकता पर बल दिया।
दक्षिण भारत से पधारे श्री वेंकटेश जी ने अपने संबोधन में प्रेम के मार्ग को अपनाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भाषा, क्षेत्र और परम्पराओं की विविधता के बावजूद प्रेम वह सूत्र है जो सभी को एक साथ जोड़ सकता है। आध्यात्मिकता का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देता है जब वह व्यक्ति के व्यवहार में करुणा, आत्मीयता और स्वीकार के रूप में प्रकट हो।
कार्यक्रम में श्री नरेश जी ने भी अपने विचार रखे। क़तेब पक्ष के मर्मज्ञ के रूप में उन्होंने उससे संबंधित विभिन्न आध्यात्मिक एवं वैचारिक पक्षों पर प्रकाश डाला।
दिन के अंतिम चरण में स्वामी श्री राजन स्वामी जी द्वारा विशेष प्रश्नोत्तरी एवं जिज्ञासा-समाधान सत्र आयोजित किया गया। सुंदर साथ द्वारा अध्यात्म, साधना, प्रेम, व्यवहार और जीवन से जुड़े अनेक प्रश्न पूछे गए, जिनका स्वामी जी ने सरल एवं सारगर्भित ढंग से उत्तर दिया। यह सत्र विशेष रूप से संवादात्मक रहा और उपस्थित लोगों को अपनी जिज्ञासाओं का प्रत्यक्ष समाधान प्राप्त करने का अवसर मिला।
इस प्रकार वार्षिकोत्सव का यह दिवस ध्यान, ज्ञान, काव्य, संवाद और प्रेम के संदेश से परिपूर्ण रहा। विभिन्न वक्ताओं के विचारों में एक साझा संदेश स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आया कि आध्यात्मिक यात्रा का सार केवल ज्ञान अर्जित करना नहीं, बल्कि अहंकार और प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर प्रेम, विनम्रता, समरसता और आत्मिक निकटता को जीवन में उतारना है।