30/04/2026
अगर तुमको ओशो से जुड़ने की शुरुआत करनी है तो ये छ: चरण अवश्य पूरे करना।
पहला चरण - ओशो की देशना का मूल उद्देश्य समझो जो कि है "मोक्ष"
दूसरा चरण - सबसे पहले एक ध्यान शिविर में जाओ, लेकिन पहले ही शिविर में ध्यान मत करना बल्कि वहाँ उपस्थित सन्यासियों को देखना, कि वो किस चीज में उत्सुक है।
तीसरा चरण - अपने शहर के किसी पुराने सन्यासी को खोजो जो अपनी बहुत अच्छी छवि बना कर रखता हो, उसके साथ वक्त बिताओ लेकिन सावधानी पूर्वक उसको मानने की बजाय उसका विश्लेषण करो, कि वो किस चीज में ज़्यादा उत्सुक है।
सोशल मीडिया पर ओशो के ग्रुप जॉइन करो उसमे संन्यासियों के बीच होने वाली चर्चाओ को गौर से देखो।
चौथा चरण - अब थोड़े दिन के लिए ओशो संन्यासियों और इनकी दुनिया से दूर हो जाओ, और अपने परिवार और मित्रो के साथ वक्त बिताओ उनकी बातो को भी गौर से सुनो।
पांचवां चरण - अब तुम चिंतन करो कौन वास्तविक जीवन जी रहा है और कौन काल्पनिक,
छटा व सबसे महत्त्वपूर्ण चरण - अब निर्णय लो किस ओर बढ़ना है और जिस ओर भी बढ़ने का निर्णय लो तो दूसरी तरफ़ मुड़ कर भी न देखना।
अगर तुम ये नहीं कर सकते और दोनों हाथों में लड्डू पाने निकले हो
तो अभी सुन लो
पचास साल के होते होते तुम पाओगे कि न संसार मिला न ही आध्यात्म, और साथ ही इतने मक्कार भी हो जाओगे कि ये बात किसी से कह नहीं पाओगे।
इसके उलट तुम ओशो की झूठी तारीफ़े और ध्यानी होने का दिखावा करते घूमोगे कि तुमको कोई सही कहने वाला मिल जाये,
क्यूँकि और तो जो चाहिये था वो तुमको मिलेगा नहीं।
और सबसे महत्वपूर्ण इन ओशो प्रेमियों में भी तुम्हें केवल निंदा मिलेगी, भले ही वो तुमको गले लगाकर मिलते हो,
This is the truth of OSHO WORLD 🌍
इसके उलट साधारणतः जब तुम ओशो से जुड़ना चाहोगे तो तुमको ये कहा जाएगा कि तुम केवल ध्यान में रस लो,
शिविर करो बाक़ी सब व्यर्थ है !
और उस शिविर में तुमको जल्दी से माला और वस्त्र दे दिये जायेंगे, और एक नाम भी, सर्टिविकेट भी मिल सकता है ।
बस फिर तुम हो गए OSHO के गुलाम जो आया तो सत्य बोलने और मोक्ष पाने था
लेकिन उलझ जाएगा ये बताने और जानने में कि ध्यान क्या होता है और मोक्ष पाने वाला कैसा होता है ।
और यदि धोखे से तुमने ये कह दिया कि अब तुम आनंदित हो, तो सारे संन्यासी तुम्हारे आनंद को झूठा बताने के लिए ओशो के ही तर्क खोल कर बैठ जायेंगे।
(हर किसी को ये चिंतन करना आवश्यक है कि वो स्वयं की यात्रा पर निकला है, या कोई संगठन बना कर ओशो ओशो करने?)
मुझसे जब कोई पूछता है कि क्या आप ओशो के प्रेम में है तब मेरा जवाब होता है मैं उसके प्रेम में हूँ जिसके प्रेम में ओशो थे,
मेरे इस जवाब को लोग मेरा अहंकारी होना और ओशो का विरोधी होना समझते है
जबकि मेरे अनुसार ओशो की पूरी देशना का यही एक मात्र उद्देश्य था,
कि तुम उसको प्रेम कर पाओ, जिसके प्रेम में स्वयं ओशो थे।
इस अर्थ में वो परम धर्म का उद्घोष करते है।
लेकिन यदि उनके अंध भक्तों के अनुसार ओशो ओशो करना और अपने होने की उदघोषणा को छोड़ ओशो को जानने की बात करना, और संगठन बना कर दूसरे संगठनों का विरोध करना ही यदि ओशो का उद्देश्य था,
तो ऐसे उद्देश्य वालो से मेरा कड़ा विरोध है।
जो लोग मेरी बात से सहमत है वो मुझसे जुड़े रह सकते है,
अन्यथा आप स्वयं ही मुझे ब्लॉक कर मुझसे दूरी बना ले,
अन्यथा समय समय पर मैं आपके दिमाग़ को झंझोड़ता रहूँगा,
क्यूंकि मेरी दुनियाँ में धरणाये गिराने का काम ज़ोरो पर है, यहाँ अपनी धरणाओ को मजबूत करवाने के लिए न रुके।
-Sakha
( इस पोस्ट का उद्देश्य केवल और केवल सजगता बढ़ाना है ताकि आपकी यात्रा कम भटकाव के साथ उस गन्तव्य की ओर बढ़े जिसके लिए आप निकले है )