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प्रेम हो और साथ ही समर्पित होने की कला तो साहसी प्रेमी का साथ पाते है और कायर प्रेमी की यादे -Sakha
20/08/2026

प्रेम हो और साथ ही समर्पित होने की कला

तो साहसी
प्रेमी का साथ पाते है

और कायर
प्रेमी की यादे

-Sakha

असफल या असफलता से निराशइंसान के लिए धर्म से ज़्यादा ज़रूरी हैधन कमाना-Sakha
16/08/2026

असफल या असफलता से निराश
इंसान के लिए धर्म से ज़्यादा ज़रूरी है
धन कमाना

-Sakha

आज़ादी माँगने की चीज नहीं आज़ादी लेनी पड़ती है और बहुत देश , समाज , सम्पदाएँ , व्यक्ति है जो अपने को आज़ाद कह सकते है। ल...
15/08/2026

आज़ादी माँगने की चीज नहीं
आज़ादी लेनी पड़ती है

और बहुत देश , समाज , सम्पदाएँ , व्यक्ति है जो अपने को आज़ाद कह सकते है।

लेकिन असली सवाल आज़ादी नहीं है बल्कि ये है कि आपने उस आज़ादी का उपयोग क्या किया ?

आज़ादी आनंद का द्वार है

लेकिन उस द्वार से गुज़र कर हमे ऐसा जहाँ भी बनाना है जहाँ आज़ादी की माँग तो क्या ख्याल ही न आता हो !

जिस दिन कोई देश , समाज , सम्प्रदाय या व्यक्ति ऐसा कर पाता है वो सही मायने में आज़ाद है !

-Sakha

आज आज़ादी की इस 80 वे दिवस पर इसी संकल्प के साथ अतीत की गलतियों से सीख नये भविष्य का संकल्प लेना ही इस दिवस को सही अर्थ प्रदान करना है 🙏

सबको पता है ध्यान क्या है 🫵पता सबको है उसको कितना पता है 🤷🏻Sakha
14/08/2026

सबको पता है ध्यान क्या है 🫵

पता सबको है
उसको कितना पता है 🤷🏻

Sakha

क्या धर्म हमारी ज़रूरतें पूरी कर सकता है?अक्सर कहा जाता है कि धर्म की यात्रा मोक्ष की यात्रा है। लेकिन क्या हर व्यक्ति व...
07/08/2026

क्या धर्म हमारी ज़रूरतें पूरी कर सकता है?

अक्सर कहा जाता है कि धर्म की यात्रा मोक्ष की यात्रा है। लेकिन क्या हर व्यक्ति वास्तव में मोक्ष चाहता है?

सच यह है कि अधिकांश लोग धन, प्रेम, सम्मान, स्वास्थ्य, शांति और सफलता चाहते हैं। तब प्रश्न उठता है—क्या धर्म इन ज़रूरतों की पूर्ति कर सकता है?

यहाँ धर्म का अर्थ किसी संप्रदाय से नहीं, बल्कि उस प्राकृतिक नियम से है जो हर मनुष्य पर समान रूप से लागू होता है।

धर्म सबसे पहले हमें हमारे भीतर ले जाता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या और द्वेष—ये केवल नैतिक उपदेश नहीं हैं, बल्कि वे कारण हैं जो हमारी बुद्धि को ढक देते हैं। जब बुद्धि स्पष्ट नहीं रहती, तो निर्णय बिगड़ते हैं। निर्णय बिगड़ते हैं तो कर्म बिगड़ते हैं, और कर्म बिगड़ते हैं तो परिणाम भी वैसे ही मिलते हैं।

यही कारण है कि कई बार अवसर होते हुए भी धन नहीं मिलता, प्रेम होते हुए भी संबंध नहीं टिकते, क्षमता होते हुए भी सफलता नहीं मिलती और सब कुछ होते हुए भी मन अशांत रहता है।

धर्म बाहरी दुनिया बदलने से पहले भीतर की दृष्टि बदलता है। जब मन स्पष्ट होता है, तो निर्णय सही होते हैं। सही निर्णय सही कर्म बनाते हैं और वही धीरे-धीरे जीवन में स्वास्थ्य, सम्मान, संबंध, समृद्धि और शांति के द्वार खोलते हैं।

इसीलिए धर्म केवल मोक्ष का मार्ग नहीं है, बल्कि जीवन को सही ढंग से जीने की कला भी है।

मैं चाहता हूँ कि दुनिया का हर व्यक्ति धार्मिक बने, लेकिन दिखावे वाला नहीं। ऐसा धार्मिक जो अपनी इच्छाओं को स्वीकार कर सके, अपने दोषों को देखने का साहस रखे और दूसरों की जगह स्वयं को बदलने का प्रयास करे।

जिस दिन मनुष्य यह देख लेता है कि उसकी अधूरी इच्छाओं के पीछे सबसे बड़ा कारण स्वयं उसके भीतर है, उसी दिन परिवर्तन शुरू हो जाता है।

और जब चाह पूरी होकर चित्त हल्का हो जाता है, तब व्यक्ति स्वयं को अस्तित्व के हवाले कर पाता है।

तभी कोई वास्तव में मोक्ष का अधिकारी बनता है।

– Sakhaक्या धर्म हमारी ज़रूरतें पूरी कर सकता है?

यूँ तो कहा जाता है कि धर्म की यात्रा मोक्ष की यात्रा है।

लेकिन क्या मोक्ष सबको चाहिए? शायद नहीं।

सच तो यह है कि अधिकांश लोग मोक्ष नहीं, बल्कि अपनी ज़रूरतों की पूर्ति चाहते हैं। कोई धन चाहता है, कोई प्रेम, कोई सम्मान, कोई प्रतिष्ठा, कोई स्वास्थ्य, कोई शांति और कोई सफलता।

ऐसे में प्रश्न उठता है—

क्या धर्म हमारी ज़रूरतें पूरी कर सकता है?

यहाँ मैं उस धर्म की बात नहीं कर रहा हूँ जिसे हम हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई जैसे संप्रदायों के नाम से जानते हैं।

मैं उस धर्म की बात कर रहा हूँ जो हर मनुष्य के लिए समान रूप से लागू होता है। जो प्रकृति का नियम है। जो सबका है, हर किसी के अनुरूप है। अंतर केवल इतना है कि हम उसके अनुरूप नहीं जी पाते।

अब फिर उसी प्रश्न पर लौटते हैं—

क्या धर्म हमारी ज़रूरतों की पूर्ति कर सकता है?

इसका उत्तर जानने से पहले हमें यह समझना होगा कि हमारी ज़रूरतें पूरी क्यों नहीं हो पातीं।

जिस संसार में किसी के पास धन है, किसी के पास प्रेम है, किसी के पास प्रतिष्ठा है, किसी के पास सम्मान है, किसी के पास मानसिक शांति है—वहीं संसार में हम भी रहते हैं।

जब ये सब इस दुनिया में उपलब्ध है, तो फिर हमारे पास क्यों नहीं?

यदि कारण को समझ लिया जाए, तो समाधान भी मिल सकता है।

यहीं से धर्म का वास्तविक कार्य प्रारम्भ होता है।

धर्म की सबसे अद्भुत बात यह है कि वह शुरुआत मोक्ष से नहीं करता।

जब भी आप धर्म के भीतर प्रवेश करेंगे, तो आपको सबसे पहले काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या और द्वेष के बारे में सुनने को मिलेगा।

क्यों?

क्योंकि धर्म जानता है कि मनुष्य की अधिकांश समस्याएँ बाहर से पहले भीतर जन्म लेती हैं।

यदि भीतर का कारण नहीं बदला, तो बाहर का परिणाम भी नहीं बदलेगा।

इसीलिए धर्म सबसे पहले उन आंतरिक कारणों की पहचान कराता है, जो हमारी ज़रूरतों की पूर्ति में बाधा बनते हैं।

उदाहरण के लिए—

* स्वास्थ्य की ज़रूरत कई बार अनियंत्रित इच्छाओं, असंयम और आलस्य के कारण अधूरी रह जाती है।
* धन की कमी केवल अवसरों की कमी से नहीं, बल्कि लोभ, अधैर्य, गलत निर्णय और अनुशासन की कमी से भी उत्पन्न होती है।
* प्रेम और अच्छे संबंध अक्सर क्रोध, अहंकार और स्वार्थ के कारण टूट जाते हैं।
* सम्मान और प्रतिष्ठा ईर्ष्या, छल और दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति से नष्ट होने लगते हैं।
* मानसिक शांति द्वेष, तुलना, अपराधबोध और अनावश्यक इच्छाओं के बोझ तले दब जाती है।
* विकास और सफलता मोह के कारण रुक जाते हैं, क्योंकि व्यक्ति पुरानी धारणाओं, भय और अपनी सुविधा से चिपका रहता है।
* स्वतंत्रता अहंकार और ‘लोग क्या कहेंगे’ जैसी मानसिक कैद में खो जाती है।

ध्यान दीजिए, इन सभी उदाहरणों में ज़रूरतें बाहर मौजूद हैं।

धन भी है, प्रेम भी है, सम्मान भी है, अवसर भी हैं और शांति भी।

फिर भी हर व्यक्ति उन्हें प्राप्त नहीं कर पाता।

इसका कारण केवल परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि मन की वह अवस्था भी है जो सही निर्णय लेने से रोकती है।

यही कारण है कि धर्म काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या और द्वेष को शत्रु कहता है।

इसलिए नहीं कि वे कोई पाप की सूची हैं, बल्कि इसलिए कि वे हमारी बुद्धि को ढक देते हैं।

जब बुद्धि ढक जाती है, तो कर्म बिगड़ जाते हैं।

जब कर्म बिगड़ते हैं, तो परिणाम भी बिगड़ते हैं।

और जब परिणाम बिगड़ते हैं, तो हमें लगता है कि हमारी ज़रूरतें पूरी नहीं हो रहीं।

धर्म इसी क्रम को उल्टा करता है।

वह पहले मन को स्पष्ट करता है।

स्पष्ट मन सही निर्णय लेता है।

सही निर्णय सही कर्म बनाते हैं।

और सही कर्म धीरे-धीरे जीवन में धन, संबंध, सम्मान, स्वास्थ्य, शांति और सफलता के द्वार खोलते हैं।

यही कारण है कि धर्म केवल मोक्ष का मार्ग नहीं दिखाता, बल्कि जीवन को सही ढंग से जीने की कला भी सिखाता है।

और शायद यही धर्म का सबसे बड़ा रहस्य है—

मोक्ष की सबसे बड़ी बाधा हमारी ‘चाह’ है।

लेकिन धर्म चाह का विरोध नहीं करता।

वह चाहता है कि पहले मनुष्य अपनी चाह को समझे, उसके पीछे छिपे कारणों को पहचाने और उन आंतरिक बंधनों से मुक्त हो, जो उसकी चाह को दुख का कारण बना देते हैं।

जब चाह पर अधिकार हो जाता है, तब ज़रूरतें भी संतुलित होने लगती हैं।

और जब ज़रूरतें संतुलित हो जाती हैं, तब मोक्ष कोई लक्ष्य नहीं रह जाता—वह जीवन की एक स्वाभाविक संभावना बन जाता है।

-Sakha

इसलिए मैं चाहता हूँ कि दुनिया का हर व्यक्ति धार्मिक हो , लेकिन उस तरह का झूठा धार्मिक नहीं जो झूठे दिखावे करता हो ,
बल्कि ऐसा धार्मिक जो जानता है कि अभी वो अपनी कुछ इच्छाओं की पूर्ति के लिए आया है।

जिसको स्वीकार करने में उसे कतई भी संकोच न हो , न ही ऐसा धार्मिक व्यक्ति जिसकी निगाह दूसरे की चाह पर अधिक टिकी होती है ,

जिस दिन आप धर्म की गहरायी में जाकर अपनी इच्छाओं को पूरा न हो पाने के पीछे स्वयं के दोषों को देख पाते है और उनको दूर कर अपने जीवन को संकल्प से भर पाते है , आप पाते है कि आपको वो सब उपलब्ध होने लगा जो आपकी गहरी चाह थी ,

और जब वो चाह पूर्ण होती है तब आप अपने चित्त को निर्भार कर अपने को अस्तित्व के हवाले कर पाते है ,

और तब ही कोई वास्तव में मोक्ष का अधिकारी बनता है ।

किताबे पढ़ने वालो को इतना स्मरण सदा होना चाहिये , कि किताब में जो अनुभव लिखे है वो लिखने वाले को पढ़कर नहीं मिले थे ! आप...
06/08/2026

किताबे पढ़ने वालो को
इतना स्मरण सदा होना चाहिये ,

कि किताब में जो अनुभव लिखे है
वो लिखने वाले को पढ़कर नहीं मिले थे !

आप जो पढ़ रहे हो
वो केवल जानकारी है अनुभव नहीं !

-Sakha

धर्म अर्थ काम मोक्ष इन चारों आयामों को चरितार्थ किये बग़ैर कोई पूर्ण नहीं !Sakha
03/08/2026

धर्म
अर्थ
काम
मोक्ष

इन चारों आयामों को
चरितार्थ किये बग़ैर कोई पूर्ण नहीं !

Sakha

केवल पात्र साधकों के लिएयह कोई सामान्य ध्यान शिविर नहीं है।यह उन लोगों के लिए है जिनके भीतर सत्य की प्यास, सुविधा से बड़...
31/07/2026

केवल पात्र साधकों के लिए
यह कोई सामान्य ध्यान शिविर नहीं है।

यह उन लोगों के लिए है जिनके भीतर सत्य की प्यास, सुविधा से बड़ी हो चुकी है।

पहले नियम देख ले 👇

1. केवल वही साधक पात्र होंगे जिन्होंने लगातार तीन मौन शिविर पूरे किए हों।

2. इस शिविर का समय स्वयं सखा निर्धारित करेंगे। इसका कोई सार्वजनिक प्रचार नहीं होगा। केवल उन्हीं लोगों को निमंत्रण दिया जाएगा जो तीनों मौन शिविरों में शामिल रहे हों और सखा की दृष्टि में इस यात्रा के योग्य हों।

3. इस शिविर की कोई निश्चित अवधि नहीं होगी। यह आवश्यकता के अनुसार कुछ दिन या उससे अधिक समय तक चल सकता है।

4. यहाँ आपकी इच्छाओं की पूर्ति नहीं होगी। यदि कुछ होगा, तो इच्छाओं और भ्रमों का सामना होगा।

5. यदि आप किसी विशेष ज्ञान, अनुभव, शक्ति या उपलब्धि की आशा लेकर आ रहे हैं, तो इस शिविर में न आएँ। यहाँ किसी उपलब्धि का वचन नहीं दिया जाता।

6. यह यात्रा उनके लिए नहीं है जो अपने मन के अनुसार सत्य गढ़ना चाहते हैं। यह उनके लिए है जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष और अहंकार के वास्तविक स्वरूप का सामना करने का साहस रखते हैं।

7. इस शिविर में केवल वयस्क (18 वर्ष या उससे अधिक आयु) ही भाग ले सकेंगे।

8. यहाँ स्त्री और पुरुष में कोई भेद नहीं होगा। सभी साधक समान होंगे।

9. यह शिविर पूर्णतः निःशुल्क होगा।

10. यदि किसी भी समय यह प्रतीत होता है कि कोई साधक इस यात्रा के लिए तैयार नहीं है, तो उससे शिविर बीच में ही छोड़ने का अनुरोध किया जा सकता है।

अंत में

यदि आपकी सबसे बड़ी आवश्यकता है—

* आराम,
* भरपूर नींद,
* मनपसंद भोजन,
* मोबाइल,
* सुविधा,
* या भीड़ का सहारा,

तो यह शिविर आपके लिए नहीं है।

लेकिन यदि आपके भीतर अपने ही भ्रमों को टूटते देखने का साहस है, तो संभव है यह यात्रा आपके लिए हो।

-Sakha

मौन में आने की जानकारी के लिए
91-8979415551

_______________________

मेरे लिए
बहुत मुश्किल नहीं होता
शिविर में आये साधकों को पहचानना

संसारी जाते वक़्त अन्य लोगो से दोस्ती बढ़ाता है नम्बर शेयर करता है

साधक
किसी का नहीं होता

-Sakha

27/07/2026

आती जाती सांसों को नहीं
दूर तक देखना होगा..
-Sakha

हर व्यक्ति यहां एक काम के लिए चुना गया है।हर व्यक्ति का एक विशेष काम है।अब जब मैं विशेष कहता हूं तो इसका मतलब यह नहीं कि...
26/07/2026

हर व्यक्ति यहां एक काम के लिए चुना गया है।
हर व्यक्ति का एक विशेष काम है।
अब जब मैं विशेष कहता हूं तो इसका मतलब यह नहीं कि सबको प्रधानमंत्री बनना है।
इस पेड़ में जो फल आते हैं, वही केवल विशेष नहीं हैं। इसके नीचे जो एक छोटी-सी चींटी अपना काम कर रही है, वह भी उतनी ही विशेष है।
अगर वह अपना काम न करे, तो इस पेड़ के फल में भी कहीं न कहीं बाधा आ जाएगी।
लेकिन इतनी लंबी श्रृंखला हम देख नहीं सकते।
हमें केवल मोटा-मोटा दिखाई देता है।
इसलिए जब तक कोई व्यक्ति अपने जीवन के उस लक्ष्य को नहीं पा लेता, जिसके लिए वह बना है, तब तक उसके अंदर का भय समाप्त नहीं हो सकता।

वही भय उसे दौड़ाता रहेगा।

वही भय उसे किसी बाबा के पास ले जाएगा।
कहीं आश्रम ले जाएगा।
किताबें पढ़वाएगा।
खोज करवाएगा।
क्योंकि भय एक ही है-
आखिर हम सब दुखी क्यों हैं?
हमारे दुखों के कारण क्या हैं?
नानक कहते थे-
"नानक दुखिया सब संसार।"
हर व्यक्ति किसी न किसी दुख में है।
जब तक तुम अपना वास्तविक लक्ष्य नहीं पा लोगे, तब तक तुम्हारा भय समाप्त नहीं होगा।
और जब तक भय समाप्त नहीं होगा, तब तक तुम कॉन्शियस के उस रूप से परिचित नहीं हो सकते जिसकी बात संतों ने कही है।
उस रूप को यहां बताया नहीं जा सकता।
ज्यादा से ज्यादा मैं इतना बता सकता हूं कि वह तुम्हें उपलब्ध क्यों नहीं हो रहा।

भयभीत लोगों को वह उपलब्ध नहीं होता।
जो अपनी जिंदगी की समस्याओं के लिए लगातार दूसरों से प्रश्न पूछते रहते हैं, उन्हें भी वह उपलब्ध नहीं होता।
इसीलिए मैं हमेशा कहता हूं कि
मैं आपका कोई गुरु नहीं हूं।
और उस प्रकार का तो बिल्कुल भी नहीं हूं कि आपके माथे पर हाथ रखकर आपको कुछ दे दूं।
क्योंकि जो लोग ऐसा कर रहे थे, वे भी किसी को कुछ नहीं दे पाए।
मैं यहां केवल उतनी ही बात करूंगा जितनी संवाद के माध्यम से आपके अनुभवों के आधार पर समझाई जा सकती है।
कहते हैं-
"गूंगे का गुड़।"
कि गुड़ का स्वाद बताया नहीं जा सकता।
लेकिन यह बात पूरी तरह सही नहीं है।
अगर आपने भी गुड़ खाया है और मैंने भी गुड़ खाया है, तो भले ही मैं उसका स्वाद शब्दों में न बता सकूं, लेकिन केवल "गुड़" शब्द कह देने से हम दोनों समझ जाते हैं कि बात किस अनुभव की हो रही है।
इसी प्रकार यहां संवाद भी केवल उतना ही संभव है जितना आपके अपने अनुभव में आपकी गलतियां, अच्छाइयां और बुराइयां मौजूद हैं।
इसके आगे जो भी बातें की जाती हैं, उन्हीं बातों के आधार पर आज तक धर्म जगत में धंधे किए गए हैं।
मैं भी इससे आगे बहुत सारी बातें कर सकता हूं।
बहुत आती हैं मुझे ऐसी बातें करना।
लेकिन उनका कोई अर्थ नहीं है।

-Sakha

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