14/04/2026
'समन्वय', सहारनपुर द्वारा वैशाखी पर्व और डॉ भीमराव अम्बेडकर जी के जन्मदिन की पूर्व संध्या पर डा रामेश्वर प्रसाद सारस्वत, सचिव के निवास पर एक भावनात्मक काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमें मुजफ्फरनगर से पधारीं बहन सुशीला शर्मा 'सुवर्ण किंशुक' विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। कुशल संचालन संस्था के कोषाध्यक्ष डा भुवनेश कुमार गुप्ता जी ने किया।
शुभारंभ माँ वाणी के विग्रह पर माल्यार्पण, दीप प्रज्ज्वलन तथा नरेंद्र मस्ताना जी की वंदना से हुआ।
गोष्ठी भावनात्मक इसलिए कि जहाँ एक ओर जलियांवाला बाग की बर्बरता को याद कर श्रोताओं ने आँखें नम कर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की तो दूसरी ओर वैशाखी पर्व को हर्षोल्लास से मनाया तथा संविधान निर्माता डॉ बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर जी को श्रृद्धा पूर्वक नमन कर जन्म दिन मनाया।
गोष्ठी में नगर और ग्रामीण अंचल से पधारे कवियों ने अपने विचार इस प्रकार प्रकट किए -
हरिराम 'पथिक'-
भौतिकता की अंधी दुनिया,
सही तुम्हें पहचान न पाई।
तुम तो थे योद्धा जीवन के,
यह सच दुनिया मान न पाई।।
'पथिक' जी ने एक चौथा पक्ष भी यह कहकर रखा कि आज पंजाब नेशनल बैंक का स्थापना दिवस भी है तथा उनके द्वारा रखा गया नाम -'प्रकृति नारायण बाबा' - पंजाब नेशनल बैंक -को कहकर रेखांकित किया।
डा रामेश्वर प्रसाद सारस्वत ने यह दोहा पढ़ा -
"देश प्रेम की बुझ रही, जिसके दिल में आग।
वह फिर जाकर देख ले, जलियांवाला बाग।।"
चंद्रभान मैनवाल ने -
"तेरे जैसा कोई गुलाब नहीं,
भीम बाबा तेरा जवाब नहीं।" पढ़ कर अपने शब्द-पुष्प अर्पित किए।
वहीं डाॅ सुमेधा नीरज नागवान ने अपनी इच्छा इस प्रकार व्यक्त की -
"मैं चाहती हूँ धरती पर
कोई युद्ध न हो!
ज्वाला-सी जलें हिंसा की
आँखें क्रुद्ध न हों!!"
सुभाष वर्मा ने संविधान की खूबियों को रेखांकित किया -
"भारत की संविधान है।
जो भी यहाँ पैदा होता है
भारत माता का लाल,
कोई मरे न भूख-प्यास से
इसका प्रावधान है।
भारत का संविधान है।।
डा विजेंद्र पाल शर्मा, सचिव 'विभावरी' ने यह घनाक्षरी पढ़ कर -
"दिया संविधान, किया जन कल्याण, हुआ अपना विधान, फूल खिल उठे मन के।
तोड़े जाति-धर्म के, तमाम तटबंध, भीमराव तुम श्रेष्ठ महामानव वतन के।
बोलना सिखाया उन्हें जो थे बेजुबान, उन्हें पढ़ना सिखाया जो थे अनपढ़ जनम के -
मानव की जाति भेद-भाव को मिटाया और जग को बताया भेद होते हैं कर्म के!!"
तथा दर्शको के अनुरोध पर अपना सिग्नेचर गीत -"बेटियाँ चली गईं ससुराल!" सुनाकर सबके नयनों को द्रवित कर दिया।
जब नयन की बात चली तो फिर मौ आसिम पीरजादा ने यह हिंदी का ग़ज़ल पढ़ी-
"नयन के नीर की पावन नदी में,
तेरी यादें विसर्जित कर रहा हूँ।"
तथा सभी की वाहवाही बटोरी।
नरेंद्र मस्ताना ने यह माहिया सुनाया -
"मिट्टी से गद्दारी,
नहीं मिलेगी रे-
ऐसी गोदी प्यारी।।"
पहली बार घर पर पधारे बृजमोहन शर्मा ने यह दोहा प्रस्तुत किया -
"मन में संशय पाल कर, व्याकुल है दिन- रैन।
मन निर्मल कर बावले, पाएगा सुख-चैन।।"
ग्रामीण अंचल से पधारे वीरेश त्यागी ने बड़ा ही सरस गीत सस्वर पढ़ा-
"जीवन को हतप्राण देखकर,
वरुणा सरस पड़ी।
एक देवता के अंतस् की
करुणा बरस पड़ी।।"
गोष्ठी में रामवीर सिंह 'राहगीर' और अशोक जैन सिंघल ने भी अपनी प्रस्तुतियाँ देकर सबको प्रभावित किया।
अंत में बहन सुशीला शर्मा 'सुवर्ण किंशुक' ने दो गीत प्रस्तुत किए। एक गीत का मुखड़ा देखिए -
" डाल डाल पात झड़ गए,
अमराई महकने लगी।
गंध साँस-साँस में घुली,
मलय पवन बहकने लगी।।"
सभी को भाव-विभोर कर दिया।
गोष्ठी में कुलदीप शर्मा, नीता शर्मा, रैनू रस्तोगी, संजुल गुप्ता,हमारी सबकी लाड़ली बेटी भूमि और नीरज नागवान ने सबकी कविताओं का भरपूर आनंद लिया।
अंत में स्वर साधिका आशा भोंसले को 'समन्वय' और 'विभावरी' संस्थाओं की की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
संस्था अध्यक्ष डॉ ओ पी गौड़ जी ने सबका धन्यवाद दिया तथा सभी ने श्रीमती वीणा सारस्वत का आतिथ्य स्वरूप सूक्ष्म जलपान ग्रहण किया।
डा सारस्वत ने सभी का आभार व्यक्त किया।
डा रामेश्वर प्रसाद सारस्वत
सचिव, 'समन्वय', सहारनपुर