21/05/2026
❤️ प्रेम और आनंद - प्रेम मार्ग की पराकाष्ठा ❤️
"मानवीय वाणी के लिए दिव्य प्रेम के आनंद की चरम एकता और उसकी संपूर्ण शाश्वत विविधता को बताना संभव नहीं है। हमारे उच्चतर और निम्नतर अंग दौनों इससे आप्लावित हो जाते हैं, मन और प्राण भी उतने ही जितनी कि आत्मा आप्लावित हो जाती हैः यहाँ तक कि स्थूल शरीर भी इस हर्ष में अपना भाग ग्रहण करता है, स्पर्श महसूस करता है, अपने सभी अंगों, नस-नाड़ियों में सोम-सुरा, अमृत, के प्रवाह से परिपूर्ण हो जाता है। प्रेम और आनन्द सत्ता के अन्तिम शब्द हैं, रहस्यों के रहस्य, गुह्यताओं की परम गुह्यता हैं।
इस प्रकार विश्वमय और व्यष्टिभावापन्न होकर, अपनी तीव्रताओं तक ऊपर उठकर, सर्वग्राही, सर्व-आलिंगनकारी और सर्व-परिपूरक होकर प्रेम और आनन्द का मार्ग परम मुक्ति प्रदान करता है। इसका सर्वोच्च शिखर एक अतिलौकिक मिलन है। किन्तु प्रेम के लिये पूर्ण मिलन ही मुक्ति है; इसके लिये मुक्ति का और कोई अर्थ नहीं है; यह सब प्रकार की मुक्तियों को अपने अन्दर एक साथ समाहित रखता है; और ये सभी मुक्तियाँ अन्ततः, जैसा कि कुछ लोग मानते हैं, ऐसी नहीं हैं जो महज एक-एक करके क्रमशः आती हों और इसलिए परस्पर एक-दूसरी का वर्जन करती हों। हम मानव आत्मा के साथ भगवान् का पूर्ण मिलन, 'सायुज्य' प्राप्त करते हैं; उसमें वे सब तत्त्व अपने को प्रकट करते हैं जो यहाँ भेद पर अवलम्बित हैं, पर वहाँ भेद एकत्व का ही एक रूप है, - इसी प्रकार समीपता, संस्पर्श और परस्पर-सान्निध्य, 'सामीप्य', 'सालोक्य' का आनन्द, परस्पर-प्रतिबिम्बन, जिसे हम 'सादृश्य' कहते हैं, का आनन्द प्राप्त करते हैं, और अन्य अद्भुत वस्तुएँ (मुक्तियाँ) भी प्राप्त करते हैं जिनके लिये भाषा के पास अभी कोई नाम नहीं हैं। ऐसी कोई चीज नहीं है जो ईश्वर-प्रेमी की पहुँच से परे हो या जिसे देने से उसे मना कर दिया जाये; क्योंकि वह दिव्य 'प्रेमी' का प्रिय और 'प्रियतम' का निजस्वरूप है।" (605-06)
-श्री अरविन्द