26/01/2026
सेवा प्रकल्प संस्थान लालढांग द्वारा राजा जगतदेव स्मारक परिसर में 77वां गणतंत्र दिवस एवं नारी शक्ति दिवस के अवसर पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया
कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप प्रज्वलित कर डॉ पवन धामा जी , शांतनु, पार्वती, सुनीता,ज्योति,रजनी एवं मुख्य वक्ता लक्ष्मी चंद जी द्वारा रानी गाइदिन्ल्यू के जीवन और संघर्ष के विषय को विस्तार से रखा
26 जनवरी 1915 -यह तारीख सिर्फ भारत का गणतंत्र दिवस नहीं बल्कि उस वीरांगना का जन्मदिन भी है जिसने अंग्रेज़ी हुकूमत की नींव हिला दी। मणिपुर के गांव में जन्मी रानी गाइदिन्ल्यू जी नागा जनजाति की बेटी थीं। बचपन से ही उनमें असाधारण साहस और नेतृत्व के गुण झलकते थे। परंपरागत शिक्षा के साथ उन्होंने अपनी संस्कृति, भाषा और धर्म को गहराई से समझा। उस दौर में जब महिलाएं घर की सीमाओं तक सीमित मानी जाती थीं, रानी गाइदिन्ल्यू जी ने 13 वर्ष की उम्र में ही अंग्रेज़ों के खिलाफ स्वतंत्रता की जंग में कदम रख दिया।
सिर्फ 17 वर्ष की उम्र में रानी गाइदिन्ल्यू जी ने अपने साथियों को संगठित किया और अंग्रेज़ी सेना के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया।
जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ उनके विरोध ने पूरे क्षेत्र में नई चेतना जगाई। 18 मार्च 1932 को उन्होंने 50-60 साथियों के साथ हान्ग्रुम गांव में अंग्रेज़ों पर हमला बोला। भाले और तीर-धनुष भले ही बंदूकों के आगे कमजोर थे, लेकिन उस युद्ध ने ब्रिटिश सरकार की नींव हिला दी। रानी गाइदिन्ल्यू जी सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि विद्रोह का प्रतीक थीं। अंग्रेज़ सरकार के लिए वह “खतरा” थीं—एक ऐसा खतरा जिसे मिटाना जरूरी समझा गया।
17 अक्टूबर 1932 को अंग्रेज़ों ने हमला किया और रानी गिरफ्तार हो गईं। उन पर हत्या, षड्यंत्र और विद्रोह के आरोप लगाए गए। उम्रकैद सुनाई गई। कोहिमा से लेकर इम्फाल, शिलांग, आइज़ोल, तुरा — हर जेल में उन्होंने सालों बिताए।
1933 से 1947 तक—पूरे 14 वर्ष, उन्होंने सलाखों के पीछे रहकर भी अपने विश्वास को कभी नहीं टूटने दिया। जब भारत आज़ाद हुआ, तब वे भी जेल से मुक्त हुईं—पर उनका संघर्ष जारी था। उनका सपना था — भारत के भीतर नागाओं के जेलियांग्रांग क्षेत्र, जहां उनकी संस्कृति, भाषा और परंपरा सुरक्षित रहे।
1982 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। 17 फरवरी 1993 को जब उन्होंने अंतिम सांस ली, तो पूरा पूर्वोत्तर शोक में डूब गया। लेकिन उनकी गाथा अमर रही.
1996 में उनके सम्मान में डाक टिकट जारी हुआ, और 2015 में उनकी स्मृति में सिक्का भी निकाला गया।
वे न केवल नागालैंड की रानी कहलाईं, बल्कि भारत की उस बेटी के रूप में याद की गईं जिसने कहा था — “मैं अपने धर्म, अपनी संस्कृति और अपनी भूमि के लिए आखिरी सांस तक लड़ूंगी।”