सेवा प्रकल्प संस्थान उत्तराखंड एवं प उत्तर प्रदेश

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सेवा प्रकल्प संस्थान उत्तराखंड एवं प उत्तर प्रदेश जनजाति समाज की अस्मिता, सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखते हुए उनके सर्वांगिण विकास के लिए सतत कार्यरत

🌿 नगरीय कार्यकर्ता मिलन समारोह – सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का सुंदर संगम 🌿वनवासी कल्याण आश्रम के नगरीय कार्यकर्ता मिलन समारो...
20/04/2026

🌿 नगरीय कार्यकर्ता मिलन समारोह – सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का सुंदर संगम 🌿

वनवासी कल्याण आश्रम के नगरीय कार्यकर्ता मिलन समारोह, Faridabad में दिनांक 18 अप्रैल को एक प्रेरणादायक एवं भव्य आयोजन संपन्न हुआ।
इस अवसर पर सेवा प्रकल्प संस्थान द्वारा संचालित
आगरा एवं रुद्रपुर छात्रावास की बालिकाओं ने
मनमोहक एवं संस्कारयुक्त सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति दी।

इन प्रस्तुतियों में भारतीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रभाव की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई दी, जिसने उपस्थित सभी कार्यकर्ताओं एवं अतिथियों का मन मोह लिया।

बालिकाओं का आत्मविश्वास, अनुशासन और प्रस्तुति
यह दर्शाती है कि छात्रावासों में केवल शिक्षा ही नहीं,
बल्कि संस्कार, संस्कृति और व्यक्तित्व विकास पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

🙏 ऐसे आयोजन समाज में प्रेरणा का संचार करते हैं
और सेवा कार्यों को नई ऊर्जा प्रदान करते हैं।

#वनवासी_कल्याण_आश्रम
#कार्यकर्ता_मिलन
#सांस्कृतिक_कार्यक्रम


#संस्कार_संस्कृति

18/04/2026
08/03/2026
🌿 कृषि विकास केंद्र द्वारा विविध प्रकार की गोभी का सफल उत्पादन 🌿 कृषि विकास केंद्र के मार्गदर्शन मेंकिसानों द्वारा विभिन...
25/02/2026

🌿 कृषि विकास केंद्र द्वारा विविध प्रकार की गोभी का सफल उत्पादन 🌿 कृषि विकास केंद्र के मार्गदर्शन में
किसानों द्वारा विभिन्न प्रकार की गोभी का
सफलतापूर्वक उत्पादन किया जा रहा है।

🥦 हरी ब्रोकली
🥬 पारंपरिक फूलगोभी
💜 बैंगनी (पर्पल) गोभी

आधुनिक कृषि तकनीक, उन्नत बीज एवं वैज्ञानिक पद्धतियों के माध्यम से
उच्च गुणवत्ता वाली फसल तैयार की जा रही है।
यह प्रयास न केवल किसानों की आय में वृद्धि कर रहा है,
बल्कि क्षेत्र में पोषण युक्त सब्जियों की उपलब्धता भी बढ़ा रहा है।

कृषि विकास केंद्र का उद्देश्य है –
🌱 खेती को लाभकारी बनाना
🌱 किसानों को आत्मनिर्भर बनाना
🌱 नई तकनीकों से जोड़ना

आइए, हम सब मिलकर आधुनिक एवं विविधतापूर्ण कृषि को अपनाएँ और “आत्मनिर्भर किसान – सशक्त भारत” के संकल्प को आगे बढ़ाएँ।

Akhil Bharatiya Vanvasi Kalyan Ashram

🌿 सेवा, संस्कार और समर्पण का मासिक अभ्यास वर्ग 🌿अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम से सम्बद्धसेवा प्रकल्प संस्थान, उत्तराखं...
25/02/2026

🌿 सेवा, संस्कार और समर्पण का मासिक अभ्यास वर्ग 🌿
अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम से सम्बद्ध
सेवा प्रकल्प संस्थान, उत्तराखंड एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश द्वारा संचालित बाल संस्कार केन्द्र एवं आरोग्य रक्षक का मासिक अभ्यास वर्ग श्रद्धेय राजा जगतदेवसिंह जी छात्रावास, काशीपुर में दिनांक 25/02/2026 को सफलतापूर्वक आयोजित किया गया।

इस अभ्यास वर्ग में कार्यकर्ताओं एवं मातृशक्ति की सक्रिय सहभागिता रही। बैठक में सेवा कार्यों की समीक्षा,
संस्कार केन्द्रों की प्रगति, आरोग्य जागरूकता तथा जनजाति समाज के सर्वांगीण विकास पर विस्तृत चर्चा हुई।

ऐसे नियमित अभ्यास वर्ग संगठन की शक्ति को बढ़ाते हैं
और सेवा कार्यों को अधिक प्रभावी, संगठित एवं परिणामकारी बनाते हैं।
हमारा उद्देश्य केवल सेवा करना नहीं, बल्कि समाज में संस्कार, स्वास्थ्य जागरूकता और आत्मनिर्भरता का भाव जगाना है।

🙏 सेवा ही साधना है 🙏
🙏 समाज के सहयोग से सेवा का यह प्रवाह निरंतर बढ़ता रहे 🙏

Akhil Bharatiya Vanvasi Kalyan Ashram

🌿 आस्था, संस्कार और संस्कृति का दिव्य संगम 🌿अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम से सम्बद्धसेवा प्रकल्प संस्थान द्वारा संचालि...
16/02/2026

🌿 आस्था, संस्कार और संस्कृति का दिव्य संगम 🌿
अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम से सम्बद्ध
सेवा प्रकल्प संस्थान द्वारा संचालित बारह राणा स्मारक छात्रावास, सितारगंज में महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर
हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी श्रद्धा, भक्ति और परंपरा के साथ भगवान शिव की आराधना की गई।

इस अवसर पर रुद्राक्ष से निर्मित 11 फीट ऊँचे शिवलिंग का जलाभिषेक एवं विधिवत पूजन-अर्चन कर
जनजाति समाज की सनातन परंपराओं, रीति-रिवाजों और संस्कारों को सजीव रूप दिया गया।

यह आयोजन केवल पूजा नहीं, बल्कि जनजाति समाज की संस्कृति, आस्था और आत्मिक चेतना का प्रतीक है—
जहाँ शिक्षा के साथ-साथ संस्कार और राष्ट्रभाव का भी संस्कार होता है।
महाशिवरात्रि पर यह पावन आयोजन सेवा, साधना और संस्कार के अद्भुत समन्वय का प्रतीक बन गया।

🙏 हर हर महादेव 🙏
🙏 आस्था का यह संगम निरंतर बढ़ता रहे 🙏

Akhil Bharatiya Vanvasi Kalyan Ashram

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3 फरवरी / बलिदान दिवसउमाजी नाईक उमाजी नाइक को सम्मानजनक रूप से विष्ट क्रांतिवीर राजे उमाजी नाइक के रूप में भी जाना जाता ...
04/02/2026

3 फरवरी / बलिदान दिवस
उमाजी नाईक

उमाजी नाइक को सम्मानजनक रूप से विष्ट क्रांतिवीर राजे उमाजी नाइक के रूप में भी जाना जाता है एक भारतीय क्रांतिकारी जिन्होंने 1826 से 1832 के आसपास भारत में ब्रिटिश शासन को चुनौती दी थी। वे भारत के सबसे पहले स्वतंत्रता सेनानी थे। (ईस्ट इंडिया कंपनी और कंपनी के नियम के खिलाफ)
उमाजी नाइक का जन्म 7 सितंबर 1791 को रामोशी जनजाति में हुआ था । वह महाराष्ट्र (तब मराठा साम्राज्य ) में एक स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी नेता थे और रामोशी समुदाय के थे, जो तेलंगाना से चले गए और मराठा काल में महाराष्ट्र में बस गए लेकिन बाद में ब्रिटिश शासन के दौरान चोरों की एक जनजाति के रूप में ब्रांडेड किया गया।
ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन से पहले , रामोश मराठा शासन के तहत काम करते थे। ये रामोशी मराठा क्षेत्र की निगरानी के लिए और मराठा काल में महाराष्ट्र में मराठा किलों की सुरक्षा के लिए काम करते थे। रामोशी (रा) को मराठों द्वारा रात्रि गश्त और पुलिसिंग का काम सौंपा गया था। इस काम के कारण उन्हें कुछ विशिष्ट गांवों से कर लेने का अधिकार था। लेकिन अंग्रेजों द्वारा मराठा साम्राज्य की हार के बाद, इस अधिकार का उल्लंघन हो गया, जिसके कारण रामोशियों ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष शुरू कर दिया।
मराठा साम्राज्य के पतन के तुरंत बाद , उमाजी नाइक ने अंग्रेजों के खिलाफ एक छोटी सेना खड़ी की। 1826 में उमाजी नाइक ने खुद को राजा घोषित किया। 1831 में उन्होंने ब्रिटिश कमांडेंट्री और घुड़सवार सेना को मारने और उनकी संपत्ति को लूटने के लिए एक उद्घोषणा के साथ अपनी कमान का प्रसार किया। उमाजी ब्रिटिश राज के खिलाफ संघर्ष के दौरान सतारा, कुरुद, मंडी देवी कलबाई के पहाड़, खोपोली खंडाला और बोरघाट के पहाड़ों में रहते थे। उन्होंने अपना डाक टिकट जारी किया, जिसमें उन्होंने लिखा 'उमाजीराज नाइक, मुक्कम डोंगर' । उमाजी ने जेजुरी के पुलिस स्टेशन / मुख्यालय पर हमला किया और वहां पुलिसकर्मियों को मार डाला। रामोशी लोग अंग्रेजों और ब्रिटिश राज के प्रति निष्ठावान लोगों को दंडित करते थे। उमाजी ब्रिटिश सरकार का पैसा लूट कर गरीब लोगों को दे देते थीं । अपने अच्छे काम के कारण गरीब लोगों में उमाजी के प्रति आगाध श्रद्धा एवम प्यार था। जब अंग्रेज उमाजी को नियंत्रित नहीं कर पाई तब अंग्रेजों ने उमाजी के साथ एक समझौता किया। जिसके अनुसार अंग्रेजों ने उन्हें 120 बीघा जमीन दी और रामोशी लोगों को सरकारी नौकरी देने का वादा किया। इस समझौते के बाद उमाजी ने कुछ समय के लिए अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध बंद कर दिया। लेकिन शांति लंबे समय तक नहीं चली । उमाजी नाइक रामोशी को पकड़ने के लिए; ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अधिकारी मकिंटोश को नियुक्त किया। मकिंटोश की कमान के तहत कप्तान वाइड, लिविंगस्टन, लुकाण जैसे बड़े ब्रिटिश पुलिस अधिकारियों ने उमाजी को गिरफ्तार करने के लिए योजना बनाई और ऑपरेशन शुरू किया।
उमाजी को पकड़ने के लिए, ब्रिटिश सरकार ने 10,000 रुपये के इनाम की घोषणा की। कालू और नाना कुलकर्णी ने उसे धोखा दिया और उसे पुणे में मुलशी के पास एवलस ले गए और नाना ने 15 दिसंबर 1831 को उमाजी को पकड़ लिया और ब्रिटिश को सौंप दिया। अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार किया, पूछताछ की और फिर उन्हें दोषी ठहराया जिसके बाद 3 फरवरी 1832 को ईस्ट इंडिया कंपनी ने उन्हें पुणे में मृत्युदंड दिया।
पुणे में उमाजी नाइक को ब्रिटिश सरकार ने 3 फरवरी, 1832 को तहसील कार्यालय में फांसी दी थी। जनता के दिलों में दहशत फैलाने के लिए उनके शव को तीन दिनों तक पीपल के पेड़ से लटका दिया गया था।

Akhil Bharatiya Vanvasi Kalyan Ashram

अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम से सम्बद्धसेवा प्रकल्प संस्थान, उत्तराखंड एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेशद्वारा संचालित विभिन्न...
03/02/2026

अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम से सम्बद्ध
सेवा प्रकल्प संस्थान, उत्तराखंड एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश
द्वारा संचालित विभिन्न प्रकल्प उत्तराखंड के जनजाति समाज के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं।

यह सेवा प्रकल्प उत्तराखंड के सितारगंज स्थित सिडकुल क्षेत्र में संचालित है। वर्तमान में यहाँ थारू जनजाति के 56 बालक निवास कर शिक्षा एवं संस्कार ग्रहण कर रहे हैं। यह प्रकल्प केवल शिक्षा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जनजाति समाज के बच्चों को
📚 आत्मनिर्भर,
🇮🇳 देशभक्त,
🌼 संस्कारवान, और 🤝 अच्छा नागरिक
बनाने के संकल्प के साथ संचालित किए जा रहे हैं।

छात्रावासों में बच्चों को अनुशासन, संस्कार, शिक्षा और सेवा का वातावरण मिलता है, जहाँ वे समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को समझते हैं।
ये सभी सेवा प्रकल्प समाज के सहयोग, सद्भाव और सहभागिता से निरंतर चलाए जा रहे हैं—जहाँ हर सहयोग
किसी बच्चे के भविष्य को मजबूत आधार देता है।

आइए, हम सब मिलकर जनजाति समाज के इन बच्चों के साथ खड़े हों और एक आत्मनिर्भर, समरस एवं सशक्त भारत के निर्माण में अपना योगदान दें।

🙏 सेवा ही साधना है 🙏

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#आत्मनिर्भर_भारत
#देशभक्त_नागरिक
#समाज_का_सहयोग


Akhil Bharatiya Vanvasi Kalyan Ashram
विश्व संवाद केंद्र देहरादून उत्तराखंड

अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम से सम्बद्धसेवा प्रकल्प संस्थान, उत्तराखंड एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश द्वारा संचालित श्रद्ध...
02/02/2026

अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम से सम्बद्ध
सेवा प्रकल्प संस्थान, उत्तराखंड एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश द्वारा संचालित श्रद्धेय राजा जगतदेवसिंह जी छात्रावास,
काशीपुर में स्थित है।

यह छात्रावास विशेष रूप से बुक्सा जनजाति के विद्यार्थियों को समर्पित है। वर्तमान में यहाँ 10 बालक अध्ययनरत हैं, जो शिक्षा, संस्कार और आत्मनिर्भरता के पथ पर निरंतर अग्रसर हो रहे हैं।

यह छात्रावास सेवा, समर्पण और राष्ट्रनिर्माण के संकल्प के साथ वनवासी समाज के बालकों के उज्ज्वल भविष्य कीमजबूत नींव रख रहा है।

🙏🙏 जय माँ बालसुंदरी
🙏🙏 जय श्रद्धेय राजा जगतदेवसिंह जी

Akhil Bharatiya Vanvasi Kalyan Ashram

❄️ मुनस्यारी की बर्फबारी और मुस्कराते सपने ❄️वनवासी कन्या छात्रावास, मुनस्यारीहिमालय की गोद में बसे मुनस्यारी मेंजब बर्फ...
29/01/2026

❄️ मुनस्यारी की बर्फबारी और मुस्कराते सपने ❄️
वनवासी कन्या छात्रावास, मुनस्यारी
हिमालय की गोद में बसे मुनस्यारी में
जब बर्फ के सफ़ेद फाहे धरती पर उतरते हैं,
तो वनवासी कन्या छात्रावास भी
खुशियों से खिल उठता है।

❄️ बर्फ से ढके पहाड़
😊 खिलखिलाती बच्चियाँ
📚 और पढ़ाई में जुटे सपने
बर्फबारी के बीच
कभी आँगन में हँसी-ठिठोली,
तो कभी कक्षाओं में
एकाग्र होकर पढ़ाई—
यही है छात्रावास का सुंदर जीवन।

यहाँ बच्चियाँ
प्रकृति के सान्निध्य में
केवल पढ़ना ही नहीं सीखतीं,
बल्कि अनुशासन, आत्मविश्वास और संस्कारों के साथ आगे बढ़ना भी सीखती हैं।
मुनस्यारी की ठंड में भी
इन आँखों में भविष्य के उजाले हैं,
और इन कदमों में
आत्मनिर्भर भारत की आहट।

🙏 सेवा, संस्कार और शिक्षा का यह संगम
निरंतर आगे बढ़ता रहे।










सेवा प्रकल्प संस्थान लालढांग द्वारा राजा जगतदेव स्मारक परिसर में 77वां गणतंत्र दिवस एवं नारी शक्ति दिवस के अवसर पर कार्य...
26/01/2026

सेवा प्रकल्प संस्थान लालढांग द्वारा राजा जगतदेव स्मारक परिसर में 77वां गणतंत्र दिवस एवं नारी शक्ति दिवस के अवसर पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया
कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप प्रज्वलित कर डॉ पवन धामा जी , शांतनु, पार्वती, सुनीता,ज्योति,रजनी एवं मुख्य वक्ता लक्ष्मी चंद जी द्वारा रानी गाइदिन्ल्यू के जीवन और संघर्ष के विषय को विस्तार से रखा
26 जनवरी 1915 -यह तारीख सिर्फ भारत का गणतंत्र दिवस नहीं बल्कि उस वीरांगना का जन्मदिन भी है जिसने अंग्रेज़ी हुकूमत की नींव हिला दी। मणिपुर के गांव में जन्मी रानी गाइदिन्ल्यू जी नागा जनजाति की बेटी थीं। बचपन से ही उनमें असाधारण साहस और नेतृत्व के गुण झलकते थे। परंपरागत शिक्षा के साथ उन्होंने अपनी संस्कृति, भाषा और धर्म को गहराई से समझा। उस दौर में जब महिलाएं घर की सीमाओं तक सीमित मानी जाती थीं, रानी गाइदिन्ल्यू जी ने 13 वर्ष की उम्र में ही अंग्रेज़ों के खिलाफ स्वतंत्रता की जंग में कदम रख दिया।

सिर्फ 17 वर्ष की उम्र में रानी गाइदिन्ल्यू जी ने अपने साथियों को संगठित किया और अंग्रेज़ी सेना के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया।

जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ उनके विरोध ने पूरे क्षेत्र में नई चेतना जगाई। 18 मार्च 1932 को उन्होंने 50-60 साथियों के साथ हान्ग्रुम गांव में अंग्रेज़ों पर हमला बोला। भाले और तीर-धनुष भले ही बंदूकों के आगे कमजोर थे, लेकिन उस युद्ध ने ब्रिटिश सरकार की नींव हिला दी। रानी गाइदिन्ल्यू जी सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि विद्रोह का प्रतीक थीं। अंग्रेज़ सरकार के लिए वह “खतरा” थीं—एक ऐसा खतरा जिसे मिटाना जरूरी समझा गया।

17 अक्टूबर 1932 को अंग्रेज़ों ने हमला किया और रानी गिरफ्तार हो गईं। उन पर हत्या, षड्यंत्र और विद्रोह के आरोप लगाए गए। उम्रकैद सुनाई गई। कोहिमा से लेकर इम्फाल, शिलांग, आइज़ोल, तुरा — हर जेल में उन्होंने सालों बिताए।
1933 से 1947 तक—पूरे 14 वर्ष, उन्होंने सलाखों के पीछे रहकर भी अपने विश्वास को कभी नहीं टूटने दिया। जब भारत आज़ाद हुआ, तब वे भी जेल से मुक्त हुईं—पर उनका संघर्ष जारी था। उनका सपना था — भारत के भीतर नागाओं के जेलियांग्रांग क्षेत्र, जहां उनकी संस्कृति, भाषा और परंपरा सुरक्षित रहे।

1982 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। 17 फरवरी 1993 को जब उन्होंने अंतिम सांस ली, तो पूरा पूर्वोत्तर शोक में डूब गया। लेकिन उनकी गाथा अमर रही.

1996 में उनके सम्मान में डाक टिकट जारी हुआ, और 2015 में उनकी स्मृति में सिक्का भी निकाला गया।

वे न केवल नागालैंड की रानी कहलाईं, बल्कि भारत की उस बेटी के रूप में याद की गईं जिसने कहा था — “मैं अपने धर्म, अपनी संस्कृति और अपनी भूमि के लिए आखिरी सांस तक लड़ूंगी।”

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