गाँव-घर फाउंडेशन/Gaon-Ghar Foundation

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Official page of "Hamara Gaon Ghar Foundation"
Library Village Maniguh, Rudraprayag, Uttarakhand
(A Himalayan Village Where Every Path Leads to Books)
https://www.libraryvillage.in/
https://en.wikipedia.org/wiki/Maniguh

पुस्तकालय गाँव क्यों: उत्तराखण्ड के सांस्कृतिक भूगोल में एक आवश्यक हस्तक्षेपउत्तराखण्ड के पहाड़ों को समझना केवल उनके भौग...
27/04/2026

पुस्तकालय गाँव क्यों: उत्तराखण्ड के सांस्कृतिक भूगोल में एक आवश्यक हस्तक्षेप

उत्तराखण्ड के पहाड़ों को समझना केवल उनके भौगोलिक विन्यास को समझना नहीं है। यह उन सूक्ष्म संबंधों को पढ़ने का प्रयास है जो मनुष्य, प्रकृति, स्मृति और भाषा के बीच निरंतर बनते-बिगड़ते रहते हैं। पिछले कुछ दशकों में यह संतुलन जिस प्रकार विचलित हुआ है, उसने यहाँ के सामाजिक जीवन को भीतर से बदल दिया है। गाँव खाली हो रहे हैं, घर बंद हो रहे हैं, और जो बचे हैं, उनके भीतर भविष्य का एक अनकहा संकोच घर कर गया है।

इस परिदृश्य में “पुस्तकालय गाँव” का विचार किसी रोमांटिक कल्पना के रूप में नहीं, बल्कि एक आवश्यक हस्तक्षेप के रूप में उभरता है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब मूलभूत सुविधाएँ ही अनेक स्थानों पर अपर्याप्त हैं, तब पुस्तकालय की बात क्यों की जाए। किंतु शायद यही वह बिंदु है जहाँ हमें समस्या की जड़ों की ओर देखना होगा।

उत्तराखण्ड की समस्या केवल आर्थिक या अवसंरचनात्मक नहीं है। यह एक गहरी सांस्कृतिक विस्थापन की समस्या भी है। जब किसी समाज की भाषाएँ हाशिये पर चली जाती हैं, जब उसके युवाओं के सामने अपने परिवेश में अर्थपूर्ण जीवन की संभावना क्षीण हो जाती है, तब पलायन केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्यता बन जाता है।

ऐसी स्थिति में पुस्तकालय गाँव एक वैकल्पिक प्रतिपक्ष प्रस्तुत करता है। यह प्रतिपक्ष प्रत्यक्ष रूप से सड़क, रोजगार या बाज़ार की भाषा में नहीं बोलता, बल्कि वह उस आधारभूमि को सुदृढ़ करने का प्रयास करता है जिस पर कोई भी समाज अपनी दीर्घकालिक स्थिरता निर्मित करता है-अर्थात् विचार, भाषा और ज्ञान की निरंतरता।

पुस्तकालय यहाँ एक सांस्कृतिक केंद्र है जहाँ गाँव स्वयं को पुनः पढ़ना प्रारंभ करता है। जब एक बालक अपने ही गाँव में बैठकर विश्व-साहित्य से परिचित होता है, तब उसके भीतर केवल जानकारी नहीं, बल्कि संभावना का एक नया क्षितिज खुलता है। जब एक बुज़ुर्ग किसी पुस्तक के माध्यम से अपनी स्मृतियों को पुनः व्यवस्थित करता है, तब वह अतीत और वर्तमान के बीच एक संवाद स्थापित करता है।

पुस्तकालय गाँव पलायन का प्रत्यक्ष समाधान प्रस्तुत नहीं करता, किंतु वह उस मानसिक परिदृश्य को बदलने का प्रयास करता है जिसमें पलायन एकमात्र विकल्प प्रतीत होता है। यदि गाँव में विचार की उपस्थिति बनी रहती है, यदि संवाद की परंपरा जीवित रहती है, तो धीरे-धीरे वही स्थान नए प्रकार की संभावनाओं के लिए भी खुलने लगता है-चाहे वह शिक्षा-पर्यटन हो, सांस्कृतिक अध्ययन हो, या स्थानीय ज्ञान पर आधारित उद्यम।

उत्तराखण्ड में लंबे समय से विकास की जो धारा चली है, वह प्रायः बाहरी मॉडल पर आधारित रही है। उसमें गाँव को या तो संसाधन के रूप में देखा गया है या फिर समस्या के रूप में। पुस्तकालय गाँव इस दृष्टि को पलटता है। वह गाँव को एक जीवित सांस्कृतिक इकाई के रूप में देखता है, जिसकी अपनी बौद्धिक परंपराएँ हैं, अपनी भाषाई विविधता है, और अपनी जीवन-दृष्टि है।

उत्तराखण्ड के संदर्भ में यह राह शायद यहीं से होकर जाती है- जहाँ पहाड़ की चुप्पी में शब्द फिर से बसने लगते हैं, और गाँव केवल भौगोलिक इकाई न रहकर एक विचार बन जाता है।

वनमंत्री
27/04/2026

वनमंत्री

पुस्तकालय गाँव मणिगुह में आज किसी परिवार में शादी है और बाहर से अतिथि आए हुए हैं। गाँव को देखने की इस यात्रा में अब पुस्...
26/04/2026

पुस्तकालय गाँव मणिगुह में आज किसी परिवार में शादी है और बाहर से अतिथि आए हुए हैं। गाँव को देखने की इस यात्रा में अब पुस्तकालय भी शामिल हो गया है। जैसे किसी समय लोग खेत, मंदिर और पुरखों के घर दिखाते थे, वैसे ही अब उन्हें पुस्तकों का यह संसार भी दिखाया जाता है। यह केवल एक स्थान का परिचय नहीं, बल्कि उस बदलती हुई चेतना का संकेत है जिसमें ज्ञान भी अतिथि-सत्कार का हिस्सा बन गया है।

गाँव-घर महोत्सव की तैयारियाँ फिर से उसी शांत और धैर्यपूर्ण लय में आरम्भ हो चुकी हैं, जैसे पहाड़ों में ऋतुएँ अपने समय पर ...
25/04/2026

गाँव-घर महोत्सव की तैयारियाँ फिर से उसी शांत और धैर्यपूर्ण लय में आरम्भ हो चुकी हैं, जैसे पहाड़ों में ऋतुएँ अपने समय पर लौटती हैं। हर वर्ष की तरह इस बार भी पुस्तकालय स्वयं को संवार रहा है और अपने अतिथियों के स्वागत की प्रतीक्षा में है।
इस बार उसका श्रृंगार कुछ अधिक गाढ़ा होगा-किताबों की संख्या बढ़ी है, उनके साथ स्मृतियों और विचारों की परतें भी और गहरी हुई हैं। शेल्फ़ों पर सजी पुस्तकें केवल ज्ञान का संग्रह नहीं, बल्कि उस संवाद की तैयारी हैं जो आने वाले दिनों में यहाँ घटित होगा।
इधर हिमालय की चोटियों पर जमी बर्फ़ हवा में एक हल्की ठंडक घोल रही होगी, और नीचे ढलानों पर हिसालू, काफल और किल्मोड़ा अपने पकने की ख़बर दे रहे होंगे। प्रकृति अपने ढंग से महोत्सव की प्रस्तावना लिख रही है, और उसी के बीच यह छोटा-सा गाँव भी अपने भीतर एक सांस्कृतिक उत्सव को आकार दे रहा है।
पुस्तकालय गाँव मणिगुह, अपनी किताबों और अपनी चुप्पी में छिपे असंख्य शब्दों के साथ, एक बार फिर आपकी प्रतीक्षा में है-कि आप आएँ, बैठें, और इस गहरे अनुभव का हिस्सा बनें।

गाँव-घर महोत्सव 2026 🥰🌹🙏
24/04/2026

गाँव-घर महोत्सव 2026 🥰🌹🙏

पुस्तकालय गाँव मणिगुह के पुस्तकालय में एक स्वतंत्र अध्ययन-कक्ष की स्थापना की प्रक्रिया अब आरम्भिक चरण से आगे बढ़ चुकी है...
24/04/2026

पुस्तकालय गाँव मणिगुह के पुस्तकालय में एक स्वतंत्र अध्ययन-कक्ष की स्थापना की प्रक्रिया अब आरम्भिक चरण से आगे बढ़ चुकी है। आवश्यक फर्नीचर, जैसे मेज़ और कुर्सियों, के लिए आदेश दिए जा चुके हैं तथा कक्ष की आंतरिक साज-सज्जा के संबंध में भी निर्देश निर्धारित कर दिए गए हैं। वर्तमान में इस कक्ष में सीलन की समस्या विद्यमान है, किंतु यह आशा की जा रही है कि उपयुक्त रंग-रोगन के पश्चात इस स्थिति में पर्याप्त सुधार संभव होगा। प्रस्तावित है कि यह अध्ययन-कक्ष आगामी गाँव-घर महोत्सव के अवसर पर पाठकों के लिए उद्घाटित कर दिया जाए, जहाँ प्रारंभिक रूप से लगभग दस पाठकों के एक साथ अध्ययन करने की व्यवस्था होगी।

वर्तमान समय में पुस्तकालय के दो कक्ष पूर्णतः पुस्तक-संग्रह के लिए प्रयुक्त हो रहे हैं। प्रत्येक कक्ष में नौ आलमारियाँ स्थापित हैं और मध्य भाग में बच्चों के लिए भूमि पर बैठकर पढने की व्यवस्था की गई है। प्रथम कक्ष में इतिहास, आत्मकथा, कथा-साहित्य, अध्यात्म, कविता और उपन्यास के साथ-साथ श्री शशिभूषण द्विवेदी, श्री अज्ञेय तथा श्री ललित मोहन थप्लयाल के निजी संग्रह उपलब्ध हैं। द्वितीय कक्ष में प्रतियोगी परीक्षाओं से संबंधित साहित्य, उर्दू एवं फ़ारसी की पुस्तकें, शब्दकोश, पत्रिकाएँ तथा उत्तराखंड का साहित्य संगृहीत है, जिसमें श्री रमेश पहाड़ी के निजी संग्रह का भी समावेश है।

पुस्तकों की निरंतर बढ़ती संख्या को ध्यान में रखते हुए प्रथम कक्ष में भूमि पर बैठने की व्यवस्था को क्रमशः समाप्त कर वहाँ अतिरिक्त आलमारियाँ स्थापित करने की योजना बनाई जा रही है। वर्तमान में पुस्तकालय में इक्कीस हज़ार से अधिक पुस्तकें उपलब्ध हैं और लगभग एक हज़ार नई पुस्तकें शीघ्र ही संग्रह में जुड़ने वाली हैं। इस विस्तार के लिए न्यूनतम आठ अतिरिक्त आलमारियों की आवश्यकता अनुमानित है। दूसरे कक्ष में नीचे बैठने की व्यवस्था यथावत रहेगी ताकि कुछ छात्र यहाँ बैठकर भी अध्ययन कर सकें।

इन सभी योजनाओं को साकार रूप देने के लिए व्यापक सामाजिक सहयोग की आवश्यकता है। आपका आर्थिक योगदान न केवल इस प्रयास को गति प्रदान करता है, बल्कि इससे जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के उत्साह को भी सुदृढ़ करता है। इच्छुक सहयोगी प्रतिमाह मात्र पाँच सौ रुपये की राशि के माध्यम से भी इस पहल का हिस्सा बन सकते हैं। इस ग्रामीण परिवेश में, जहाँ आवश्यकताएँ सीमित हैं, छोटा से छोटा सहयोग भी एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का आधार बन जाता है।

विश्व पुस्तक दिवस के मौके पर उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों से एक साफ तस्वीर सामने आती है. पहाड़ के गांवों और कस्बों में प...
23/04/2026

विश्व पुस्तक दिवस के मौके पर उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों से एक साफ तस्वीर सामने आती है. पहाड़ के गांवों और कस्बों में पढ़ने-लिखने की संस्कृति को फिर से जीवित करने के लिए लगातार प्रयास हो रहे हैं. सिटीजन लाइब्रेरी, पुस्तकालय गांव, दून लाइब्रेरी और स्थानीय समूहों की पहल अब किताबों को समाज के केंद्र में ला रही है.
community

यूनेस्को की पहल पर दुनिया में 1995 से 23 अप्रैल को विश्व पुस्तक दिवस मनाया जा रहा है. इस अवसर पर हिमालयी राज्य उत्तराखंड...

पुस्तकालय गाँव मणिगुह, उत्तराखण्ड में आरम्भ हुआ यह प्रयास किसी साधारण पुस्तक-संग्रह का विस्तार नहीं है, बल्कि एक गहरे सा...
23/04/2026

पुस्तकालय गाँव मणिगुह, उत्तराखण्ड में आरम्भ हुआ यह प्रयास किसी साधारण पुस्तक-संग्रह का विस्तार नहीं है, बल्कि एक गहरे सांस्कृतिक पुनर्स्मरण की प्रक्रिया है। यहाँ पुस्तकों को केवल संरक्षित नहीं किया जा रहा, बल्कि स्मृति, भाषा, विचार और मनुष्यता की उस परम्परा को पुनर्स्थापित करने का प्रयास हो रहा है जिसके बिना कोई भी समाज दीर्घकाल तक जीवित नहीं रह सकता। यह एक ऐसा उपक्रम है जो ज्ञान को शहरों की सीमाओं से मुक्त कर गाँव के जीवन में प्रतिष्ठित करना चाहता है, ताकि गाँव का बालक भी विश्व साहित्य और व्यापक बौद्धिक परम्पराओं से संवाद कर सके और पठन एक क्रिया न रहकर एक जीवित संस्कृति का रूप ले सके।
इस समय इस गाँव में बीस हज़ार से अधिक पुस्तकों का संग्रह है और बच्चों तथा युवाओं के लिए नियमित पठन गतिविधियाँ संचालित हो रही हैं। इन प्रयासों के माध्यम से धीरे-धीरे ऐसा वातावरण निर्मित हो रहा है जहाँ पुस्तकें जीवन के बाहरी उपकरण नहीं बल्कि उसके आंतरिक स्वभाव का हिस्सा बनती जा रही हैं। यह परिवर्तन धीमा है, परन्तु स्थायी है, और इसी स्थायित्व के लिए एक व्यापक सामाजिक सहभागिता की आवश्यकता है।
यदि सौ सहयात्री प्रतिमाह पाँच सौ रुपये का संकल्प लें तो यह पुस्तकालय गाँव आत्मनिर्भरता की दिशा में स्थिरता प्राप्त कर सकता है। हम सहयोग को दान के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे एक सांस्कृतिक यात्रा में सहभागिता के रूप में देखते है। यह सहभागिता बच्चों के लिए पुस्तकों और पठन सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करती है, पुस्तकालय के संचालन, प्रकाश, रख-रखाव और गतिविधियों को निरंतर बनाए रखती है, और इस स्वप्न को दीर्घकालिक आधार प्रदान करती है।
यह योगदान केवल आर्थिक सहयोग नहीं है, बल्कि यह भाषा, विचार और भविष्य की पीढ़ियों में किया गया एक गंभीर निवेश है। यह उस संभावना में विश्वास का संकेत है कि भारत का बौद्धिक केन्द्र केवल महानगरों में ही नहीं, बल्कि गाँवों में भी विकसित हो सकता है। इस प्रयास का उद्देश्य एक भवन तक सीमित नहीं है, बल्कि एक ऐसे पुस्तकालय ग्राम की परिकल्पना को साकार करना है जहाँ पुस्तकें मनुष्य के दैनिक जीवन का स्वाभाविक विस्तार बन जाएँ।
अगर आप हमारी इस यात्रा से जुड़ना चाहते हैं, तो प्रतिमाह मात्र पाँच सौ रुपये के संकल्प के साथ इस प्रयास के सहयात्री बन सकते हैं और इस प्रक्रिया को अपने व्यापक सामाजिक दायित्व का हिस्सा बना सकते हैं। भविष्य में यह केवल एक गाँव की कथा नहीं होगी, बल्कि उन लोगों की सामूहिक स्मृति होगी जिन्होंने मिलकर एक पुस्तक संस्कृति के पुनर्जागरण को संभव बनाया।
सादर,
हमारा गाँव घर फाउंडेशन परिवार
पुस्तकालय गाँव मणिगुह, उत्तराखण्ड

गाँव-घर पुस्तकालय की यात्रा केवल पुस्तकों, दीवारों और अलमारियों की कहानी नहीं है; यह उन अनगिनत हाथों की साझी आस्था का पर...
21/04/2026

गाँव-घर पुस्तकालय की यात्रा केवल पुस्तकों, दीवारों और अलमारियों की कहानी नहीं है; यह उन अनगिनत हाथों की साझी आस्था का परिणाम है, जो चुपचाप आगे बढ़कर इसे थाम लेते हैं। हमें जो भी सहयोग प्राप्त होता है, वह एक विचार के प्रति विश्वास होता है, जिसमें गाँव के बच्चे, पाठक और समाज साथ-साथ विकसित होते हैं।
इन्हीं सहयोगों के माध्यम से हम पुस्तकालय में एक समर्पित रीडिंग रूम का निर्माण कर रहे हैं, जहाँ अब तक बच्चे फ़र्श पर बैठकर पढ़ते थे। यह कक्ष ऐसा स्थान होगा जहाँ हर पाठक को एक सम्मानजनक और एकाग्र वातावरण मिल सकेगा।
आपके योगदान से ही गाँव-घर महोत्सव जैसे प्रयास संभव हो पाते हैं-जहाँ गाँव, ज्ञान और संस्कृति एक साथ उत्सव में परिवर्तित होते हैं। यह महोत्सव उस संवाद का माध्यम है जो पीढ़ियों, परंपराओं और नए विचारों के बीच सेतु बनाता है।
इसी सहयोग से पुस्तकालय की दैनिक गतिविधियाँ चलती हैं-नई किताबों का क्रय, बच्चों के लिए अध्ययन सामग्री, और वे छोटे-छोटे प्रयास जो मिलकर एक बड़े परिवर्तन का आधार बनते हैं।
हम यह मानते हैं कि हर सहयोगी इस पुस्तकालय के निर्माण में सहभागी है। यह पुस्तकालय किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक सामूहिक स्वप्न है-जो धीरे-धीरे आकार ले रहा है।
आप सभी का यह विश्वास ही हमारी सबसे बड़ी पूँजी है।

डिजिटल युग में ज्ञान की धाराएँ प्रायः इंटरनेट के माध्यम से प्रवाहित होती हैं, परन्तु हमारे पुस्तकालय गाँव मणिगुह में यह ...
20/04/2026

डिजिटल युग में ज्ञान की धाराएँ प्रायः इंटरनेट के माध्यम से प्रवाहित होती हैं, परन्तु हमारे पुस्तकालय गाँव मणिगुह में यह धारा अभी तक पूर्ण रूप से नहीं पहुँच पाई है। यहाँ पुस्तकों की सुगंध तो है, पाठकों की जिज्ञासा भी है, परन्तु डिजिटल संसार से जुड़ने का सेतु अभी अधूरा है।
इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए हमने उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय से औपचारिक अनुरोध किया है कि वे इस दिशा में पहल करते हुए संबंधित विभागों तक हमारी आवाज़ पहुँचाएँ। हमें विश्वास है कि यह प्रयास केवल एक तकनीकी सुविधा की स्थापना नहीं होगा, बल्कि ज्ञान के एक नए आयाम का उद्घाटन होगा-जहाँ पुस्तक और डिजिटल जगत एक-दूसरे के सहचर बन सकें।
पुस्तकालय गाँव आज एक विचार से आगे बढ़कर एक साझा स्वप्न बन चुका है। यदि यहाँ इंटरनेट की सुविधा स्थापित होती है, तो यह स्वप्न और व्यापक होगा-शिक्षा, संवाद और अवसरों के नए द्वार खुलेंगे।
हम आशान्वित हैं कि यह विनम्र पहल एक दिन उस बिंदु तक पहुँचेगी, जहाँ मणिगुह केवल पुस्तकों का ही नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रत्येक रूप का केंद्र बन सके।

इस वर्ष गाँव-घर महोत्सव के लिए “अपना पहाड़–अपना विज्ञान” की थीम प्रस्तावित है। इसका मूल उद्देश्य हिमालयी क्षेत्र में विक...
20/04/2026

इस वर्ष गाँव-घर महोत्सव के लिए “अपना पहाड़–अपना विज्ञान” की थीम प्रस्तावित है। इसका मूल उद्देश्य हिमालयी क्षेत्र में विकसित उस समृद्ध ज्ञान-परंपरा को समझना, संरक्षित करना और पुनर्स्मरण करना है, जो उत्तराखंड, हिमाचल, तिब्बत से लेकर मध्य एशिया तक विस्तृत सांस्कृतिक और बौद्धिक धारा के रूप में प्रवाहित रही है।
यह ज्ञान-परंपरा केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि जीवन-व्यवहार, प्रकृति-बोध, कृषि-पद्धति, जल-संरक्षण, औषधीय परंपराओं और सामाजिक संरचनाओं में गहराई से निहित है। पुस्तकालय गाँव इस अवसर को एक ऐसे मंच के रूप में देखता है, जहाँ इस विरासत को न केवल अभिलेखित किया जाए, बल्कि उसे संवाद, सहभागिता और अनुभव के माध्यम से जीवंत रूप में अभिव्यक्त भी किया जाए।

आज Archana Jha जी के सौजन्य से पुस्तकालय गाँव मणिगुह स्थित गाँव-घर पुस्तकालय के लिए ये किताबें प्राप्त हुईं !
16/04/2026

आज Archana Jha जी के सौजन्य से पुस्तकालय गाँव मणिगुह स्थित गाँव-घर पुस्तकालय के लिए ये किताबें प्राप्त हुईं !

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