01/07/2026
**परमानन्द**
# # # **सनातन विज्ञानं का परिणाम है परमानन्द**
**सीरियल नंबर:** ०१ | **दिनांक:** ०१ जुलाई २०२६ | **समय:** सुबह ०७:१७ AM
1990 से स्वामी सत्यानन्द गिरी जी महाराज के सानिध्य में आरम्भ किए सनातन विज्ञानं के संकल्प के 36 वर्षों के अनुभव के आधार पर सनातन विद्या परिषद् के संस्थापक सदमार्ग वाले गुरुजी डॉ. मनोज शर्मा (संस्थापक अध्यक्ष, सनातन शक्तिपीठं) के अनुसार यह शरीर कोई फिजिकल इंस्ट्रूमेंट (भौतिक उपकरण) मात्र नहीं है। यह परमात्मा की अभिव्यक्ति है, परमानन्द का स्रोत है, जिसके लिए जीव 83,99,999 योनियों की लंबी यात्रा करता हुआ मनुष्य शरीर तक पहुंचता है। यह एक्सीडेंटल (आकस्मिक) नहीं है, यह बहुत सारे एग्जाम्स (परीक्षाओं) का लास्ट रिजल्ट (अंतिम परिणाम) है। इसे भी मनुष्य पशुवत खो रहा है, तो हाय! इससे अभागा कौन है?
मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य और लक्ष्य **परमानन्द की प्राप्ति** है, और वह स्वस्थ शरीर के बिना असंभव है। वहीं स्वस्थ शरीर भी सनातन विज्ञानं के अनुसार परमानन्द के बिना असंभव है, इसे नोट कर लीजिए।
> **परम् + आनन्द = परमानन्द**
> * समग्र अस्तित्व का सर्वोच्च सिद्धान्त
> * चेतना, बुद्धिमत्ता और जीवन का मूल आधार
>
इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी विद्यमान है, उसके दो आयाम हैं—एक दृश्य और दूसरा अदृश्य।
* **दृश्य आयाम:** इसमें पदार्थ, ऊर्जा, कोशिकाएँ, ऊतक, अंग तथा शरीर की समस्त जैविक क्रियाएँ सम्मिलित हैं।
* **अदृश्य आयाम:** इसमें चेतना, व्यवस्था, बुद्धिमत्ता, उद्देश्य, समन्वय तथा जीवन की आंतरिक प्रेरक शक्ति निहित है।
आधुनिक विज्ञान ने दृश्य जगत के अनेक रहस्यों का उद्घाटन किया है, किन्तु वह अदृश्य सिद्धान्त, जो सम्पूर्ण व्यवस्था को एक सूत्र में बाँधता है, आज भी गहन अध्ययन और चिंतन का विषय है। सनातन विज्ञानं इसी सर्वोच्च नियामक सिद्धान्त को 'परमानन्द' के नाम से अभिव्यक्त करता है।
परमानन्द कोई साधारण तत्त्व नहीं, बल्कि वह सर्वोच्च सिद्धान्त है जिससे समस्त तत्त्व उत्पन्न होते हैं, संचालित होते हैं, परस्पर समन्वित रहते हैं और अंततः उसी में विलीन हो जाते हैं।
# # # # # परम् आनंद क्या है?
* **“परम्” का अर्थ है:** सर्वोच्च, परम, अनन्त, सर्वव्यापी, अंतिम सत्य।
* **“आनंद” का अर्थ है:** मूल सिद्धान्त, आधारभूत सत्य, अस्तित्व का वास्तविक स्वरूप।
अतः, प्रथम टीटीवी (TTV) परमानन्द वह सर्वोच्च सार्वभौमिक सिद्धान्त है जो सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन करता है। यह न केवल पदार्थ है, न केवल ऊर्जा, बल्कि वह मूल बुद्धिमत्ता है जो व्यवस्था, समन्वय और जीवन को दिशा प्रदान करती है।
# # # # # प्रथम तत्त्व परमानन्द की मूल विशेषताएँ
परमानन्द ही निम्न व्यवस्थाओं का मूल संचालक है:
* चेतना का स्रोत और बुद्धिमत्ता का आधार।
* व्यवस्था का नियामक और संतुलन का संरक्षक।
* सृजन का प्रेरक और आत्म-संगठन का मूल।
* आत्म-उपचार की प्रेरणा और विकास का आधार।
* समग्र समन्वय का मुख्य केंद्र।
सनातन विज्ञानं में परमानन्द
1990 से स्वामी सत्यानन्द गिरी जी महाराज के सानिध्य में आरम्भ किए सनातन विज्ञानं के संकल्प के 36 वर्षों के अनुभव के आधार पर सनातन विद्या परिषद् के संस्थापक सदमार्ग वाले गुरुजी डॉ. मनोज शर्मा (संस्थापक अध्यक्ष, सनातन शक्तिपीठं) के अनुसार, सनातन विज्ञानं में सम्पूर्ण सृष्टि छह आधारभूत सिद्धान्तों पर आधारित है:
आकाश तत्त्व, वायु तत्त्व, अग्नि तत्त्व, जल तत्त्व, पृथ्वी तत्त्व, प्रथम तत्त्व (या कहें परमानन्द)
प्रथम पाँच तत्त्व भौतिक जगत तथा शरीर की संरचना और क्रियाओं का आधार बनते हैं। परमानन्द इन पाँचों का नियामक एवं समन्वयक सिद्धान्त है, और फलस्वरूप परिणाम है—इसे आप या कोई भी जीवन अनुभव करे या नहीं करे।
इस प्रकार परमानन्द पाँच तत्त्वों के समान एक अतिरिक्त तत्त्व नहीं, बल्कि उन सबको एकीकृत करने वाला सर्वोच्च सिद्धान्त है। परमानन्द के बिना यह शरीर केवल एक फिजिकली प्रूव मैकेनिज्म (भौतिक रूप से प्रमाणित तंत्र) के अतिरिक्त कुछ नहीं है।
मान लीजिए एक विशाल नगर है। वहाँ सड़कें, जल व्यवस्था, विद्युत व्यवस्था, संचार प्रणाली, भवन और नागरिक सब हैं। किन्तु यदि कोई प्रशासन, समन्वय अथवा नियंत्रण प्रणाली न हो, तो सम्पूर्ण व्यवस्था शीघ्र ही अव्यवस्थित हो जाएगी।
इसी प्रकार मानव शरीर में— कोशिकाएँ, ऊतक, अंग, हार्मोन, तंत्रिकाएँ, रक्त, लसीका, एंजाइम और जीन सभी अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं; किन्तु उनका समन्वित संचालन एक उच्च स्तर की जैविक बुद्धिमत्ता द्वारा ही संभव होता है। सदमार्ग वाले गुरुजी डॉ. मनोज शर्मा के अनुसार सनातन विज्ञानं इसी एकीकृत नियामक सिद्धान्त को परमानन्द के रूप में वर्णित करता है।
# # # # # प्रकृति और कोशिका में परमानन्द की अभिव्यक्ति
प्रकृति के प्रत्येक स्तर पर अद्भुत व्यवस्था दिखाई देती है। एक बीज का विशाल वृक्ष बनना, एक निषेचित अण्डाणु से पूर्ण मानव शरीर का निर्माण, घावों का स्वतः भरना, डीएनए का सूक्ष्मता से अपनी प्रतिलिपि बनाना—यह सार्वभौमिक व्यवस्था समग्र दृष्टिकोण में परमानन्द की ही अभिव्यक्ति है।
यदि कोशिका के संदर्भ में देखें, तो प्रत्येक जीवित कोशिका आश्चर्यजनक बुद्धिमत्ता का परिचय देती है। वह जानती है कि कब विभाजित होना है, कब प्रोटीन और ऊर्जा बनानी है, कब अपशिष्ट हटाना है, और कब स्वयं को नष्ट (*Programmed Cell Death*) करना है। ज्ञानी जिसे ब्रह्म, योगी परमात्मा और भक्त जिसे भगवान कहता है, ये सभी परमानन्द स्वयं नहीं हैं, बल्कि उसकी अभिव्यक्तियाँ हैं।
* **मनोवैज्ञानिक आयाम:** मानव मन में यह परम् तत्त्व जागरूकता, विवेक, स्पष्टता, करुणा, धैर्य, आत्म-अनुशासन, रचनात्मकता और अंतर्ज्ञान के रूप में प्रकट होता है।
* **आध्यात्मिक आयाम:** विश्व की अनेक दार्शनिक परम्पराओं ने जिसे ब्रह्म, परम चेतना, या कॉस्मिक चेतना कहा है, सनातन विज्ञानं उन्हीं अवधारणाओं को एक समावेशी वैज्ञानिक-दार्शनिक भाषा में परमानन्द के रूप में प्रस्तुत करता है।
स्वास्थ्य और परमानन्द
स्वास्थ्य केवल रोगों की अनुपस्थिति नहीं है। वास्तविक स्वास्थ्य वह अवस्था है जिसमें शरीर, मन, भावनाएँ, व्यवहार, सामाजिक सम्बन्ध, पर्यावरण, तथा चेतना आपस में संतुलित एवं समन्वित हों।
1990 से स्वामी सत्यानन्द गिरी जी महाराज के सानिध्य में आरम्भ किए सनातन विज्ञानं के संकल्प के 36 वर्षों के अनुभव के आधार पर सनातन विद्या परिषद् के संस्थापक सदमार्ग वाले गुरुजी डॉ. मनोज शर्मा (संस्थापक अध्यक्ष, सनातन शक्तिपीठं) के अनुसार—जब यह समन्वय कमज़ोर होता है, तब असंतुलन और रोग विकसित हो सकते हैं; और जब यह समन्वय पुनः स्थापित होता है, तब वास्तविक उपचार की प्रक्रिया आरम्भ होती है।
इसीलिए, हमारे संपूर्ण स्वास्थ्य और कृषि के मूल संवर्धन के लिए यह आवश्यक है कि हम अपनी जीवनशैली को शुद्ध रखें। इसी उद्देश्य के साथ हमें याद रखना है:
**"फैमिली डॉक्टर नहीं, फैमिली किसान ढूंढिए"**
भारतीय कृषि और स्वास्थ्य की यही शुद्धता **भारतीय देशी गौमाता** (जो बिना गले में रस्सी के वनों या गो-अभ्यारण्यों में स्वच्छंद विचरण करती हैं और कृत्रिम गर्भाधान या इंजेक्शन के बजाय अपने ही वंश के सांडों द्वारा प्राकृतिक रूप से गर्भाधान करती हैं) पर आधारित है। यही सनातन विज्ञानं-आधारित कृषि **सनातन शक्तिपीठं**, **सनातन विद्या परिषद**, और **सनातन विज्ञानम** की नींव है, जो डॉ. मनोज शर्मा और गौमाता के प्राण हैं।
# # # # # सदमार्ग परिवार के पंचप्राण
सदमार्ग मार्ग पर चलने वाले प्रत्येक जिज्ञासु के लिए ये पंचप्राण जीवन का आधार हैं:
1. **ऋषि चिंतन (वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ सनातन का प्रचार)**
2. **गौवंश संवर्धन (भारतीय देशी गौमाता का प्राकृतिक संरक्षण)**
3. **ऋषिकुल शिक्षा पद्धति (सनातन विद्या परिषद के अनुसार चरित्र निर्माण)**
4. **प्राकृतिक व सात्विक कृषि (भूमि और स्वास्थ्य की रक्षा)**
5. **आत्मबोध और परमानन्द की प्राप्ति (जीवन का अंतिम लक्ष्य)**
* परम् तत्त्व सर्वोच्च सार्वभौमिक सिद्धान्त और पंचतत्त्वों का समन्वयक है।
* शरीर, मन और चेतना के संतुलन का आधार ही परमानन्द है।
* **निष्कर्ष:** जहाँ आधुनिक विज्ञान जीवन की संरचनाओं का अध्ययन करता है, वहीं परम् तत्त्व का सिद्धान्त जीवन में विद्यमान समन्वय, संगठन और व्यापक एकता को समझने का एक समग्र वैचारिक दृष्टिकोण प्रदान करता है। यही दृष्टि आगे के अध्यायों में ब्रह्माण्ड, मानव शरीर, कोशिका, मन और पंचतत्त्व के साथ इसके संबंध को क्रमशः स्पष्ट करेगी।
अधिकृत जानकारी एवं संपर्क
सदमार्ग परिवार के सिद्धांतों, 'सदमार्ग पत्रिका' (2006 से प्रकाशित) तथा शिवालिक ऋषिकुल (कैथल, हरियाणा) से जुड़ी प्रामाणिक जानकारियों के लिए आप सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर जुड़ सकते हैं:
* **Facebook, YouTube, X, Instagram:** SADMARG PARIVAR
* **मुख्यालय:** सनातन विज्ञान भवन, ऋषिकेश, उत्तराखंड
* **निर्माणाधीन स्थल:** सनातन शक्तिपीठं, भाना ब्राह्मणान, नरवाना, जींद (हरियाणा), नहर के पास, शिमला रोड।
* **संस्थापक संचालक संपर्क:** डॉ. मनोज शर्मा (9215229687)