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23/02/2026

#वकालत की दुनिया में एक प्रजाति बड़ी दुर्लभ होती है, पर मिलती हर जिले में है। नाम है “ #चतुर_मुवक्किल”। यह जीव न्यायपालिका के महासमुद्र में उतरने से पहले #चार_घाटों का पानी पीता है।

कहानी कुछ यूँ चलती है।

सबसे पहले #मुवक्किल उस #वकील के पास जाता है, जिसे वह मन ही मन “ #ज्ञान_का_भंडार” मानता है। वहां वह बड़ी #श्रद्धा से बैठता है, #फाइल खोलता है, #दुखड़ा सुनाता है, और हर वाक्य के बाद पूछता है, “सच बताइएगा।”
वकील साहब पूरी गंभीरता से #कानून की धाराएं, संभावनाएं, जोखिम और रणनीति समझाते हैं। फीस की बात आते ही मुवक्किल के चेहरे पर वैसी ही गंभीरता आ जाती है जैसी अदालत में जज के सामने आती है। वह कहता है, “अभी तो मैं सिर्फ सलाह लेने आया था।”

#ज्ञान लेकर वह बाहर निकलता है। अब वह #अर्धज्ञानेश्वर बन चुका होता है। कानून की दो धाराएं, तीन सुप्रीम कोर्ट के फैसले और चार अंग्रेजी शब्द उसकी जेब में होते हैं।

अब वह #दूसरे #वकील के पास जाता है। वहां वह आधा सच, आधा अपना संशोधन और आधा पहले वकील की राय मिलाकर चर्चा करता है। उद्देश्य एक ही है कि पहले वाले की बात की पुष्टि हो जाए। जब दूसरा वकील भी लगभग वही बात कह देता है, तो #मुवक्किल के चेहरे पर संतोष उतर आता है। उसे लगता है कि अब वह #स्वयं भी #आधा_अधिवक्ता हो चुका है।

फिर आता है #तीसरा_चरण। अब मुकदमा किसी तीसरे वकील को सौंपा जाता है। कारण? “वो कोर्ट में बहुत घूमते हैं।” यह तीसरे वकील का परिचय है। फाइल उनके हाथ में आती है, फीस का बड़ा हिस्सा भी।

लेकिन कहानी यहीं रोचक होती है। तीसरे वकील को पता चलता है कि तैरना तो ठीक है, नाव चलानी भी पड़ेगी। तब प्रवेश होता है चौथे वकील का, जो असल में पटवार संभालना जानता है। उसे फाइल पकड़ाई जाती है, साथ में #आश्वासन भी, “आप निश्चिंत रहिए, सब देख लिया जाएगा।”

मगर #आर्थिक #लाभ का बंटवारा ऐसा होता है कि नाव चलाने वाले को चप्पू पकड़ने लायक मेहनताना ही मिलता है। अब वह भी सोचता है कि न्यायपालिका के इस महासमुद्र में डुबकी तो लगा दी, पर मझधार में यदि मेहनत और मेहनताना का अनुपात बिगड़ जाए तो उत्साह भी किनारे लग जाता है।

उधर तीसरा वकील अपना हिस्सा सुरक्षित कर चुका होता है। मुवक्किल भी सोचता है कि उसने बड़ी समझदारी से खर्च नियंत्रित किया।

फिर जब #केस मझधार में डगमगाता है, तारीखें बढ़ती हैं, दलीलें कमजोर पड़ती हैं, और फैसला प्रतिकूल आता है, तब वही #मुवक्किल पुनः #पहले #वकील के पास लौटता है। चेहरे पर वही पीड़ा, वही प्रश्न, “अब क्या किया जाए?”

पहला वकील फाइल देखता है, गहरी सांस लेता है, और सोचता है कि इस न्याय चक्र में पिस कौन रहा है। कानून नहीं, अदालत नहीं, वकील नहीं। पिस तो वही चालाकी है, जो हर बार थोड़ी बचत के लालच में पूरी रणनीति गँवा देती है।

और इस पूरी यात्रा में सबसे बड़ा व्यंग यही है कि मुवक्किल को अंत में लगता है कि उसे न्याय ने नहीं, वकीलों ने निराश किया। जबकि सच यह होता है कि नाव में चार मल्लाह बदलते बदलते उसने पतवार का भरोसा ही खत्म कर दिया।

न्याय की चक्की धीरे चलती है, यह सब जानते हैं। पर जब चक्की के बीच में ही हम अपने हाथ डाल दें, तो उंगलियां तो अपनी ही पिसती हैं।

03/07/2025
07/04/2025
18/02/2025

Senior vakeel saheb se aur judge saheb se
charche ke dauran ek baat hi spast hui ,
system hi aisa hai ,
Ab mai system ki talash me huh ,

Mr / MRS system ka koi pata bata sakta hai, mujhe toh mil nahi Raha

Indian judiciary system

15/09/2024
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08/04/2024

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