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जायसवाल एवं कलवार जाति का इतिहास(संक्षिप्त एवं सरल रूप में)🌿 1. परिचयजायसवाल और कलवार — दोनों जातियाँ भारत की प्राचीन वै...
31/12/2025

जायसवाल एवं कलवार जाति का इतिहास
(संक्षिप्त एवं सरल रूप में)
🌿 1. परिचय
जायसवाल और कलवार — दोनों जातियाँ भारत की प्राचीन वैश्य वर्ग से संबंधित मानी जाती हैं। ये परंपरागत रूप से व्यापार, मद्यनिर्माण (अल्कोहल/गुड़-तेल व्यापार), और अन्य आर्थिक कार्यों से जुड़ी रही हैं। कई इतिहासकार इन्हें क्षत्रिय मूल का भी बताते हैं, जिन्होंने समय के साथ व्यापार को अपनाया।
🏛️ 2. जायसवाल जाति का इतिहास
(क) नाम की उत्पत्ति:
“जायसवाल” शब्द “जायस” (Jaunpur के पास एक नगर) से बना है। ऐसा माना जाता है कि जिन कलवारों ने जायस नगर में निवास किया, उन्हें जायसवाल कलवार कहा जाने लगा। आगे चलकर "जायसवाल" नाम स्वतंत्र रूप से प्रयोग होने लगा।
(ख) उत्पत्ति के बारे में मत:
जायसवालों की उत्पत्ति के विषय में दो प्रमुख मत मिलते हैं—
क्षत्रिय मूल मत:
कुछ इतिहासकारों के अनुसार जायसवाल प्राचीन राजपूत वंश से हैं जिन्होंने बाद में व्यापार अपना लिया।
वैश्य मूल मत:
अन्य मत के अनुसार ये वैश्य समुदाय के ही उपवर्ग हैं, जिन्होंने व्यापारिक कार्यों से अपनी पहचान बनाई।
(ग) मुख्य व्यवसाय:
जायसवाल लोग प्राचीन काल में गुड़, तेल, अनाज, शराब आदि के व्यापार में संलग्न थे। बाद में इन्होंने शिक्षा, राजनीति, उद्योग और प्रशासन में भी प्रतिष्ठा अर्जित की।
(घ) विस्तार क्षेत्र:
आज जायसवाल मुख्यतः उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड और राजस्थान में पाए जाते हैं।
⚱️ 3. कलवार जाति का इतिहास
(क) उत्पत्ति:
कलवार जाति का नाम संस्कृत शब्द "कल्ल" (शराब या मद्य) + वार (व्यापारी) से माना जाता है — अर्थात् "मद्य का व्यापार करने वाला"।
ये परंपरागत रूप से मद्य, गुड़, तेल, इत्र, और व्यापारिक वस्तुओं के व्यापारी रहे हैं।
(ख) इतिहासकारों के मत:
कुछ लोग कलवारों को वैश्य वर्ग का अंग मानते हैं।
कुछ मत उन्हें राजपूत वंश से उत्पन्न बताते हैं जिन्होंने युद्धों के पश्चात व्यापार अपनाया।
कुछ पुराणों में इन्हें कश्यप गोत्रीय वैश्य कहा गया है।
(ग) सामाजिक स्थिति:
प्राचीन समाज में मद्यनिर्माण व्यवसाय के कारण इनकी सामाजिक स्थिति मध्यम मानी जाती थी, किंतु आधुनिक काल में ये जाति शिक्षा, उद्योग, व्यापार और राजनीति में काफी उन्नति कर चुकी है।
🌸 4. जायसवाल और कलवार का सम्बन्ध
जायसवाल जाति वास्तव में कलवार समुदाय की एक प्रमुख शाखा मानी जाती है।
"जायस" नगर से आने के कारण इन्हें “जायसवाल कलवार” कहा गया।
समय के साथ "जायसवाल" ने स्वतंत्र सामाजिक पहचान प्राप्त कर ली।
📜 5. वर्तमान स्थिति
आज जायसवाल एवं कलवार समुदाय दोनों ही उच्च शिक्षित, व्यापारिक रूप से समृद्ध, और सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित माने जाते हैं।
भारत के कई प्रमुख उद्योगपति, व्यापारी, और समाजसेवी इन्हीं समुदायों से आते हैं।
🕉️ 6. गोत्र और उपविभाग
दोनों समुदायों में कई गोत्र पाए जाते हैं — जैसे
कश्यप, गर्ग, गौतम, भारद्वाज, अग्निहोत्री, संधिल्य आदि।

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13/12/2025

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13/12/2025

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गरुण जी ने कागभुसुंडि जी से सात प्रश्न किये 1.सबसे दुर्लभ शरीर किसका है।2.सबसे बड़ा दुख और 3.सबसे बड़ा सुख क्या है?4.संत अ...
01/12/2025

गरुण जी ने कागभुसुंडि जी से सात प्रश्न किये
1.सबसे दुर्लभ शरीर किसका है।
2.सबसे बड़ा दुख और
3.सबसे बड़ा सुख क्या है?
4.संत असंत के लक्षण क्या है,
5.कौन सा पुण्य महान है,
6. और कौन सा पाप बड़ा है?,7.मानस रोग क्या होते हैं?
इनके उत्तर --


काकभुसुण्डी जी ने उत्तर दिया,
*नर तन सम नहि कवनिउ देहा* मनुष्य के शरीर से उत्तम कोई शरीर नही है,क्योंकि इसी शरीर से हम ईश्वर तक को जान सकते हैं।इसलिए जो नर तन पाकर हरिभजन नही करते वे बड़े अभागे होते हैं।
*नहि दरिद्र सम दुख जग माही*
दरिद्रता सबसे बड़ा दुख है।
*संत मिलन सम सुख जग माही*
सबसे बड़ा सुख संत मिलन है।
दूसरे का उपकार ही संत का सहज स्वभाव है।
*सन इव खल पर बंधन करई*
असंत सन की तरह होते हैं। सन के बारे में आप न जानते हो तो जान लीजिए,ये एक पौधा होता है,बड़ा होने पर किसान इसे काट कर पानी मे गाड़ देता है,2 दिन बाद उसे पानी पर पीटता है,तब इससे सन निकलता है। सन की रस्सी बनती है जो किसी को भी बाध सकती है। असंत ऐसे ही होते हैं,स्वयं दुख सह कर दूसरे को कष्ट पहचानना उनका काम होता है।
*परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा,पर निंदा सम अघ न गरीसा*
अहिंसा यानी किसी को दुख न देना ,परम धर्म है,
और हे गरुण जी! पर निंदा से बड़ा कोई पाप नही है।
*मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला* सारे व्याधियों का मूल मोह यानी अज्ञान है।इससे बड़े सूल पैदा होते हैं।काम, क्रोध,लोभ ईर्ष्या ,तृष्णा आदि दोष मोह से उत्पन्न होते हैं जो अनेको कष्टों को पैदा करते हैं ।
ये सब मानस रोग है। ऐसी व्याधियां जो अज्ञान के कारण मन मे उत्पन्न हो वे सब मानस रोग की श्रेणी में आते हैं।
इस व्याधि की कुछ औषधि भी है जैसे *नेम धर्म आचार तप ज्ञान जग्य जप दान,भेषज पुनि कोटिन्ह नहि रोग जाहि हरिजान*
पर ये मानस रोग इनसे जाता नही है,फिर! *राम कृपा नसाहि सब रोगा*
एक ही दवा है रामजी की कृपा ,और वो कैसे हो? श्री रामचरित मानस के पढ़ने और फिर मनन करने ,इसकी सीखो को जीवन मे ढारने से ,मनुष्य मानस रोगों को पार कर शांति को प्राप्त होता है।
काक जी कहते हैं पूर्व जन्मों में मैं भी तो मानस रोग से पीड़ित था,पर जब शिव जी की कृपा से रामभक्ति मिली तब से शांति है।
मित्रो हमे भी नित सत्संग करना चाहिए। मानस की सीखो का आचरण करना चाहिए।
निश्चित ही शांति मिलेगी।
श्री शिवाय नमस्तुभयम आपका दिन मंगलमय हो
जय जय सियाराम

कागभुषंडी
कौवे के रूप मे दिखने वाले कागभुषंडी प्रभु श्रीराम के बहुत बडे भक्त थे और इन्हे ये वरदान प्राप्त था कि वो समय और टाइम के बाहर जा सकते थे यानि कि पूर्व मे क्या घटित हुआ और भविष्य मे क्या घटित होगा वो सब देख सकते थे वो समय और टाइम के बनने बिगडने की साइकल को देख सकते थे

इसलिए उन्होंने महाभारत 11 बार और रामायण 16 बार देखा था वो भी बाल्मिकि जी द्वारा रामायण और वेदव्यास जी द्वारा महाभारत लिखे जाने से पहले क्योकि ये अपने पूर्व जन्म मे कौवा थे और सबसे पहले राम कथा भगवान शंकर ने माता पार्वती जी को सुनाया था तो इन्होने भी सुन लिया था और मरने के बाद दूसरा जन्म इनका अयोध्यापुरी मे एक शूद्र परिवार मे हुआ था ये परम शिव भक्त थे लेकिन अभिमान वश अन्य देवताओं का उपहास उडाते थे इसी बात से क्षुब्ध होकर लोमष ऋषि ने इन्हे श्राप दे दिया था जिससे ये फिर कौवा बन गये थे और इसके बाद इन्होने पूरा जीवन कौवे के रूप मे ही जिया
जब रावण के पुत्र मेघनाथ ने श्रीराम से युद्ध करते हुए भगवान श्रीराम को नागपाश से बांध दिया था तब देवर्षि नारद के कहने पर गिद्धराज गरूड़ ने नागपाश के समस्त नागों को खाकर भगवान श्रीराम को नागपाश के बंधन से मुक्त कर दिया था भगवान श्रीराम के इस तरह नागपाश में बंध जाने पर श्रीराम के भगवान होने पर गरूड़ को संदेह हो गया गरूड़ का संदेह दूर करने के लिए देवर्षि नारद उन्हें ब्रह्माजी के पास भेज देते हैं ब्रह्माजी उनको शंकरजी के पास भेज देते हैं भगवान शंकर ने भी गरूड़ को उनका संदेह मिटाने के लिए कागभुषंडी जी के पास भेज दिया अंत में कागभुषंडी जी ने भगवान श्रीराम के चरित्र की पवित्र कथा सुनाकर गरूड़ के संदेह को दूर किया था

और इसीलिए हम हिंदू लोग श्राद्ध पक्ष मे कौवे के रूप में कागभुषंडी जी को भोजन कराते है ताकि वो भोजन हमारे पूर्व के पितरों तक पहुंच सके।

आज विडंबना ये है कि बिना पढे जाने समझे कुछ हमारे सनातनी भाई भी मजाक उडाते है इन चीजों का जबकि सनातन धर्म मे बिना मतलब बिना कारण के कुछ भी नही है ।

05/11/2025
05/11/2025

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