03/03/2026
गरीबी की नई परिभाषा: राष्ट्रीय पुनः सर्वेक्षण की अनिवार्यता
डॉ. मनीष वैद्य
(समाजसेवी, “वृद्ध सेवा आश्रम” के संस्थापक)
भारत आज विकास और कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार के एक महत्वपूर्ण दौर में है। गाँव-गाँव तक सड़क, बिजली, गैस, शौचालय और डिजिटल सेवाएँ पहुँची हैं। यह परिवर्तन स्वागतयोग्य है। किंतु इसी परिवर्तन के बीच एक गंभीर प्रश्न उठ खड़ा हुआ है—देश में वास्तविक गरीब कौन है?
जनवितरण प्रणाली की दुकानों पर 5 किलो अनाज लेने के लिए खड़ी कतारों को देखकर मन में कई बार यह विचार आता है कि क्या वर्तमान पात्रता सूची आज की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करती है? क्या हम उन तक पहुँच पा रहे हैं, जिन्हें वास्तव में सहायता की आवश्यकता है?
झारखंड की जमीनी सच्चाई
झारखंड जैसे राज्य में, जहाँ एक ओर खनिज संपदा है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में आर्थिक असमानता स्पष्ट दिखाई देती है। शहरों में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ रही हैं, परंतु दूरस्थ गाँवों में आज भी कई वृद्धजन, विधवाएँ और दिव्यांग व्यक्ति न्यूनतम सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
मेरे संगठन “वृद्ध सेवा आश्रम” के माध्यम से वर्षों से बुजुर्गों के बीच कार्य करते हुए मैंने देखा है कि अनेक ऐसे वृद्ध हैं जो वास्तव में सरकारी सहायता के पात्र हैं, परंतु या तो उनका नाम सूची में नहीं है या वे जानकारी के अभाव में वंचित रह जाते हैं। दूसरी ओर, कुछ अपेक्षाकृत सक्षम परिवार योजनाओं का लाभ लेते रहते हैं।
यह स्थिति केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न है।
योजनाओं का महत्व और पुनर्मूल्यांकन
देश में गरीबों के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएँ संचालित हैं—
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना
आयुष्मान भारत योजना
इन योजनाओं ने लाखों-करोड़ों परिवारों को राहत दी है। विशेषकर महामारी के समय इनका प्रभाव अत्यंत सकारात्मक रहा। परंतु समय के साथ सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ बदलती हैं। ऐसे में पात्रता की सूची का अद्यतन न होना अनेक विसंगतियों को जन्म देता है।
गरीबी की बहुआयामी परिभाषा
आज गरीबी को केवल आय के आधार पर नहीं मापा जा सकता।
हमें निम्नलिखित पहलुओं पर भी विचार करना होगा—
शिक्षा और कौशल की उपलब्धता
स्वास्थ्य सुरक्षा
सामाजिक सुरक्षा
संपत्ति और आय का वास्तविक स्रोत
परिवार की निर्भरता स्थिति
एक व्यापक राष्ट्रीय सर्वेक्षण, जो डिजिटल सत्यापन और स्थानीय स्तर की सामाजिक भागीदारी से जुड़ा हो, इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।
सर्वेक्षण क्यों अनिवार्य है?
वास्तविक जरूरतमंदों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए
योजनाओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए
संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण के लिए
स्थायी निर्भरता के बजाय आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए
यदि हम समय-समय पर सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण नहीं करेंगे, तो कल्याणकारी योजनाएँ अपने मूल उद्देश्य से भटक सकती हैं।
सहायता से सशक्तिकरण की ओर
मेरा स्पष्ट मत है कि सहायता आवश्यक है, परंतु उसका अंतिम लक्ष्य सशक्तिकरण होना चाहिए।
अनाज वितरण तात्कालिक राहत देता है, किंतु कौशल विकास, रोजगार सृजन और सामाजिक सुरक्षा स्थायी समाधान प्रदान करते हैं।
हमें ऐसे भारत का निर्माण करना है जहाँ लोग जीवनभर “लाभार्थी” न रहें, बल्कि अवसर मिलने पर “योगदानकर्ता” बनें।
सामाजिक नैतिकता की भूमिका
यह केवल सरकार का दायित्व नहीं है। समाज के प्रत्येक सक्षम व्यक्ति का नैतिक कर्तव्य है कि वह अनावश्यक रूप से सरकारी सहायता का लाभ न ले।
यदि हम सक्षम होते हुए भी योजनाओं का लाभ लेते हैं, तो हम किसी अधिक जरूरतमंद के अधिकार में हस्तक्षेप करते हैं।
निष्कर्ष
आज आवश्यकता है एक पारदर्शी, वैज्ञानिक और समयबद्ध राष्ट्रीय गरीबी सर्वेक्षण की, जो वर्तमान सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप हो।
गरीबी उन्मूलन की दिशा में अगला चरण केवल योजनाओं का विस्तार नहीं, बल्कि उनकी सटीक लक्ष्य-निर्धारण प्रक्रिया को सुदृढ़ करना है।
जब सहायता सही हाथों तक पहुँचेगी और सशक्तिकरण की दिशा में ठोस कदम उठेंगे, तभी हम एक न्यायपूर्ण, आत्मनिर्भर और सशक्त भारत का निर्माण कर सकेंगे।