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The hope ..
16/09/2026

The hope ..

26/08/2026

के फेसबुक पोस्ट से कॉपी....

ईद मिलाद-उन-नबी:- थम्मा थम्मा लोगे

आज ईद मिलाद-उन-नबी है , अर्थात आज ही आप हज़रत मुहम्मद ﷺ की इस दुनिया में आमद हुई थी...... ख़ुशी का दिन है...

इस्लाम में खुशी के दिनों को मनाने की व्यवस्था दी गई है जिसमें गरीबों की अलग-अलग तरीके से मदद है ... अर्थात, बहुत खुश हो ? तो यह खुशी गरीबों में बांट दो जिससे वह भी खुश हो जाएं और तुम्हारी खुशी में शामिल हो जाएं।

ईद उल फितर की खुशी में नमाज़ के पहले तक अपनी कमाई और सोने चांदी, संपत्ति इत्यादि का 2.5% ज़कात और फितरा इत्यादि गरीबों में बांट देने का हुक्म है तो ईद उल अजहा में कुर्बानी का एक हिस्सा गरीबों में बांट देने का हुक्म है... अर्थात किसी की खुशी का दिन मतलब गरीबों को खुशी दो..

ना हल्ला ना गुल्ला , बिल्कुल सादगी से , चुपचाप, खामोशी से...यही कारण है कि हुज़ूर हज़रत मुहम्मद ﷺ का पसंदीदा रंग था सफेद

अबू दाऊद और तिर्मिज़ी में इब्न अब्बास رضي الله عنهما से रिवायत है कि नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ ने फ़रमाया कि

“सफेद कपड़े पहना करो, क्योंकि वे तुम्हारे कपड़ों में सबसे अच्छे हैं, और अपने मुर्दों को भी उनमें कफ़न दो।”— सुनन अबू दाऊद 4061, जामे तिर्मिज़ी 994

इसीलिए अमूमन मुसलमान खुशी के दिनों में सफ़ेद कपड़े ही पह़नता है.. कफ़न भी सफ़ेद कपड़े में होता है क्योंकि सफ़ेद सादगी का रंग है।

मगर वक्त के साथ साथ देश के मुसलमानों ने इस दिन "ईद उल मिलाद-उन-नबी" को भी डीजे , हाईवोल्टेज साउंड सिस्टम की थाप पर "थम्मा थम्मा लोगे" के शोर में "रामनवमी" और "गणेश चतुर्थी" की तरह मनाने का सिलसिला शुरू कर दिया...

देवरिया के मझौलीराज कस्बे में "ईद मिलाद-उन-नबी" के अवसर पर एक घर पर "इस्लामिक झंडा" लगा , जिसमें आरोप है कि एक पर AK-47 की तस्वीर और दूसरे पर तलवार की तस्वीर थी।

24 अगस्त 2026 को पुलिस ने झंडे उतरवाए और तीनों अशरफ अली, मोबीन अली और अब्दुल वाहिद को गिरफ्तार कर लिया। तीनों के खिलाफ धारा 170 BNSS के तहत कार्रवाई/गिरफ्तारी की गई।

अभी और ऐसे मामले सामने आएंगे और कुछ लोगों पर से ईद उल मिलाद-उन-नबी रामनवमी और गणेश चतुर्थी की तरह मनाने का भूत उतर जाएगा।

परसों एक कंपनी के लोग आफिस आए , उन्हें लंच कराने मैं लेकर जा रहा था तब लगभग हर घर पर इस्लामिक झंडा, देखकर कंपनी का अधिकारी बोला, ज़ाहिद भाई यह हर घर में "पाकिस्तानी" झंडा क्यों लगा है ?

मैंने समझाया कि "यह पाकिस्तानी झंडा नहीं है इस्लामिक झंडा है , ईद उल मिलाद-उन-नबी है दो दिन बाद तो लोग लगाए हुए हैं।" कहने का अर्थ यह है कि हम ऐसे समाज में रहते हैं जिन्हें इस्लाम का "इ" भी नहीं मालूम तो हमारी जिम्मेदारी बढ़ जाती है क्योंकि हम जो अच्छा और बुरा करते हैं उसे ही इस्लाम मान लिया जाता है।

पांच वक्त की नमाज़, रोज़ा , ज़कात अदा नहीं कर पाने वाले लोग इस दिन "थम्मा थम्मा लोगे" की थाप पर आखिरत में अपनी सीट रिज़र्व करते हैं, बेवकूफ।

दरअसल मुसलमान "अल्लाह" से डरता है, मगर अपने प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ से बेपनाह मुहब्बत करता है, और इसमें भी उन्हें सामाज में हक दिलाने के लिए मुस्लिम औरतों की नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ के लिए मुहब्बत मुसलमान मर्दों से अधिक होती है

वजह साफ़ है , इमान है कि आखिरत के दिन अल्लाह उसके दुनिया में किए गलत कामों पर दंड देगा और काली कमली‌ वाले नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ उस दिन गुनाहगारों की बख्शाइश कराएंगे...

तो जज़्बात में बह कर इस दिन कुछ लोग हज़रत मुहम्मद ﷺ की दुनिया में आमद की खुशी में "थम्मा थम्मा लोगे" पर डांस करने लगे हैं...

नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ से मुहब्बत अनिवार्य है, लेकिन मुहब्बत व्यक्त करने का धार्मिक तरीका वही होना चाहिए जिसका शरीअत में प्रमाण हो।

सहीह बुखारी 2697 में हज़रत आयशा रजि• से रिवायत है कि

“जिसने हमारे इस मामले (दीन) में ऐसी चीज़ निकाली जो इसमें नहीं है, वह अस्वीकार है।”

नबी ﷺ ने अपना वार्षिक जन्मोत्सव नहीं किया , सहाबा ने नहीं किया। चारों इमामों ने नहीं मनाया , तीन चार पीढ़ियों तक नहीं मनाया गया, शुरुआती सदियों में ऐसा धार्मिक त्योहार नहीं था।
और सहीह बुखारी 2697 की उपरोक्त हदीस तो ऐसी धार्मिक चीज़ों को अस्वीकार करती है।

दरअसल हज़रत मुहम्मद ﷺ की वफात के बाद चार और इमाम हुए...

1-इमाम अबू हनीफ़ा (699–767 ई.)
2-इमाम मलिक इब्न अनस (711–795 ई.)
3-इमाम मुहम्मद इब्न इदरीस अल-शाफ़ई (767–820 ई.)
4-अहमद इब्न हंबल (780–855 ई.)

इन चारों इमामों ने इस्लाम में रोज़ा , नमाज़, ज़कात इत्यादि की विस्तृत व्याख्या की और विस्तार दिया...यह चारो इमाम लोग क़ुरआन और पैगंबर मुहम्मद ﷺ की सुन्नत को मूल स्रोत मानते थे..

इन चारों इमामों ने क़ुरआन से नियम निकाले। हदीस‌ और सुन्नत का इस्तेमाल किया और जिन मामलों पर स्पष्ट लिखित प्रमाण नहीं था, वहाँ क़ियास, इज्मा, सहाबा के फैसले और अन्य फ़िक़्ही सिद्धांतों से निर्णय निकाला।

नमाज़, रोज़ा, ज़कात, निकाह, तलाक, व्यापार, विरासत आदि के व्यावहारिक नियमों को व्यवस्थित किया और इस तरह एक ही मुद्दे पर कभी-कभी थोड़ा बहुत अलग अलग निष्कर्ष निकला।

कलांतर में सुन्नी मुसलमान धार्मिक रूप से इन्हीं चारों मसलक में बंट गये और इमाम अबू हनीफ़ा की इस्लामिक व्याख्या मानने वाले "हनफ़ी मसलक"

इमाम मालिक इब्न अनस की इस्लामिक व्याख्या को मानने "मालिकी मसलक"

इमाम मुहम्मद अल-शाफ़ई की इस्लामिक व्याख्या "शाफ़ई मसलक'

और इमाम अहमद इब्न हंबल की इस्लामिक व्याख्या को मानने "हंबली मसलक" के कहे गए।

हालांकि देश के 90% मुसलमानों को पता ही नहीं होगा कि उनका "मसलक" क्या है ?..

चारों सुन्नी मसलकों के चारों मूल इमामों अबू हनीफ़ा, मालिक, शाफ़ई और अहमद इब्न हंबल के वक्त भी आज के रूप वाला वार्षिक मीलाद समारोह प्रचलित नहीं था।

हालांकि इसी चारों मसलक के बाद के मौलानाओं में किसी ने ईद मिलाद-उन-नबी को बिद्दत कहा तो किसी ने शर्तों के साथ मीलाद उल मिलाद-उन-नबी को जायज़ माना।

बिद्दत अर्थात, "जिसने हमारे इस मामले (दीन) में ऐसी चीज़ निकाली जो इसमें नहीं है, वह अस्वीकार है।” (सहीह बुखारी 2697)

चारों मसलक के बाद के इस्लामिक विद्वानों में किसी ने कभ से कम यह तो नहीं कहा कि मुसलमान इस दिन सुन्नत छोड़कर मामले को आगे बढ़ाएं और बढ़ते बढ़ते यह मामला "थम्मा थम्मा लोगे" पर आ गया।

मसलक चाहे जो हैं, चारों इमामों के बाद के इस्लामिक विद्वानों ने क्या कहा ? वह एक बात है मगर सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इस मामले में क़ुरआन और हदीस क्या कहते हैं?

قُلْ بِفَضْلِ اللَّهِ وَبِرَحْمَتِهِ فَبِذَٰلِكَ فَلْيَفْرَحُوا
(क़ुरआन 10:58)

अर्थात “कह दीजिए: अल्लाह के फ़ज़्ल और उसकी रहमत पर उन्हें खुश होना चाहिए।”

وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا رَحْمَةً لِّلْعَالَمِينَ
(क़ुरआन 21:107)

अर्थात, और हमने आपको तमाम संसारों के लिए रहमत बनाकर ही भेजा है।”

अर्थात, कुरान में ख़ुश होने का हुक्म है तो सवाल यह है कि जो मुसलमान अपने नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ की ज़िंदगी पर अमल करने की कोशिश करता है जिसे "सुन्नत" कहते हैं, तो नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ ने अपना जन्मदिन कैसे मनाया ?

नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ ने अपने जन्म के दिन को याद किया , उस सोमवार के दिन इबादत की और रोज़ा रखा , और अपने जन्म की नेमत पर शुक्र अदा किया लेकिन साल में एक बार जन्मदिन का समारोह नहीं किया।

हालांकि बाद के दिनों में एक राय के अनुसार पैगंबर हज़रत मुहम्मद ﷺ के जन्म के अवसर पर लोगों द्वारा सदक़ा निकाला गया, अच्छे काम किए गए और खुशी व्यक्त करने के लिए सीरत पढ़ी, क़ुरआन पढ़ी ,दरूद पढ़ा, गरीबों को खाना खिलाया, नाजायज़ काम नहीं किया गया।

यही इस्लाम का तरीक़ा है, थम्मा थम्मा लोगे, जुलूस, हंगामा , अजीबोगरीब झंड़े, यह सब तो किसी मसलक के इस्लामिक विद्वानों ने भी नहीं कहा ? तुम कौन? मैं थम्मा थम्मा...

01/03/2026
20/02/2026

Ranchi1

23/05/2025

کیا آپ نے وہ دعا سیکھ لی ہے جو چالیس سال کی عمر کو پہنچنے کے بعد پڑھی جاتی ہے؟؟!
ایک والد کا کہنا ہے کہ میں نے اپنی بیٹی سے ایک بڑا سبق سیکھا۔ ہوا یوں کہ وہ ایک مرتبہ سورہ احقاف حفظ کر رہی تھی۔ اچانک مجھ سے سوال کر بیٹھی:
ابو جان! آپ کی عمر کتنی ہے؟
میں نے اسے مسکراتے ہوئے جواب دیا: 44 سال۔

کہنے لگی گویا آپ چار سال پہلے ہی 40 سال کے ہو چکے ہیں۔ پھر کیا آپ وہ دعا پڑھتے ہیں جو چالیس سال کی عمر کو پہنچنے کے بعد پڑھی جاتی ہے؟
میں نے بڑی حیرت سے پوچھا: کیا ایسی بھی کوئی خاص دعا ہے جو چالیس سال کی عمر کو پہنچنے کے بعد کی جاتی ہے؟
بیٹی نے مسکراتے ہوئے جواب دیا:
ابو جان! ہماری ٹیچر نے سورہ احقاف کی ان آیات کی تفسیر کرتے ہوئے ہمیں یہ دعا سکھائی ہے:

*وَوَصَّيْنَا الْإِنسَانَ بِوَالِدَيْهِ إِحْسَانًا ۖ حَمَلَتْهُ أُمُّهُ كُرْهًا وَوَضَعَتْهُ كُرْهًا ۖ وَحَمْلُهُ وَفِصَالُهُ ثَلَاثُونَ شَهْرًا ۚ حَتَّىٰ إِذَا بَلَغَ أَشُدَّهُ وَبَلَغَ أَرْبَعِينَ سَنَةً قَالَ رَبِّ أَوْزِعْنِي أَنْ أَشْكُرَ نِعْمَتَكَ الَّتِي أَنْعَمْتَ عَلَيَّ وَعَلَىٰ وَالِدَيَّ وَأَنْ أَعْمَلَ صَالِحًا تَرْضَاهُ وَأَصْلِحْ لِي فِي ذُرِّيَّتِي ۖ إِنِّي تُبْتُ إِلَيْكَ وَإِنِّي مِنَ الْمُسْلِمِينَ (15) أُولَٰئِكَ الَّذِينَ نَتَقَبَّلُ عَنْهُمْ أَحْسَنَ مَا عَمِلُوا وَنَتَجَاوَزُ عَن سَيِّئَاتِهِمْ فِي أَصْحَابِ الْجَنَّةِ ۖ وَعْدَ الصِّدْقِ الَّذِي كَانُوا يُوعَدُونَ (16)..*
ترجمہ: اور ہم نے انسان کو اپنے ماں باپ کے ساتھ حسن سلوک کرنے کا حکم دیا ہے اس کی ماں نے اسے تکلیف جھیل کر پیٹ میں رکھا اور تکلیف برداشت کرکے اسے جنا ۔ اس کے حمل کا اور اس کے دودھ چھڑانے کا زمانہ تیس مہینے کا ہے یہاں تک کہ جب وہ اپنی پختگی اور چالیس سال کی عمر کو پہنچا تو کہنے لگا اے میرے پروردگار مجھے توفیق دے کہ میں تیری اس نعمت کا شکر بجا لاؤں جو تو نے مجھ پر اور میرے ماں باپ پر انعام کی ہے اور یہ کہ میں ایسے نیک عمل کروں جن سے تو خوش ہو جائے اور تو میری اولاد کو بھی صالح بنا ۔ میں تیری طرف رجوع کرتا ہوں اور میں مسلمانوں میں سے ہوں ۔
یہی وہ لوگ ہیں جن کے نیک اعمال تو ہم قبول فرما لیتے ہیں اور جن کے بد اعمال سے درگزر کر لیتے ہیں ( یہ ) جنتی لوگوں میں ہیں ۔ اس سچے وعدے کے مطابق جو ان سے کیا جاتا ہے ۔

ہماری ٹیچر نے ہمیں یہ بھی بتایا کہ ان کے والد صاحب صاحب 30 سال سے پابندی کے ساتھ یہ دعا پڑھ رہے ہیں اور اب 80 سال پہنچنے کے قریب ہیں اس کے باوجود وہ اچھی صحت و تندرستی کے ساتھ جی رہے ہیں۔
اس بہترین نصیحت کے لئے میں نے اپنی بیٹی کا شکریہ ادا کیا اور اس کے سر کو بوسہ دیتے ہوئے ہوئے اللہ کی تعریف کی کہ اس نے مجھے ایسی بیٹی سے نوازا ہے جس کے ذریعے مجھے یہ سبق سیکھنے کا موقع مل رہا ہے۔

بیٹی نے کہا: ابو جان! آپ بھی یہ دعا برابر ہر پڑھے رہا کریں:

*رَبِّ أَوْزِعْنِي أَنْ أَشْكُرَ نِعْمَتَكَ الَّتِي أَنْعَمْتَ عَلَيَّ وَعَلَىٰ وَالِدَيَّ وَأَنْ أَعْمَلَ صَالِحًا تَرْضَاهُ وَأَصْلِحْ لِي فِي ذُرِّيَّتِي ۖ إِنِّي تُبْتُ إِلَيْكَ وَإِنِّي مِنَ الْمُسْلِمِينَ .*
(اے میرے پروردگار! مجھے توفیق دے کہ میں تیری اس نعمت کا شکر بجا لاؤں جو تو نے مجھ پر اور میرے ماں باپ پر انعام کی ہے اور یہ کہ میں ایسے نیک عمل کروں جن سے تو خوش ہو جائے اور تو میری اولاد کو بھی صالح بنا ۔ میں تیری طرف رجوع کرتا ہوں اور میں مسلمانوں میں سے ہوں۔)

عربی سے منقول
آپ کے ایک شئیر سے کتنے والد پڑھیں گے
اور ہر ایک کی نسل سنور جائے تو آپ کا آخرت کا ڈیپارٹمنٹ کلئیر ہونے میں آسانی ہو گی.

03/05/2025

Call of duty

01/03/2025

On behalf of the Ranchi1 team we wish you and your loved ones Ramadan Mubarak !!! Do remember us in your precious prayers 🤲🏻 ❤️

15/08/2024

जमीयतुल इराकीन रांची में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया!

11/04/2024

🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊
May the blessings of Allah fill our
life with joy and prosperity on this Eid.

On this joyous occasion, may Allah accept
our prayers and bless us with His divine grace.

🌱 تقبل الله منا ومنكم🌱

19/03/2024

इमाम साहब का खुतबे में सवाल था की आपकी फैमली में चार मेंबर हो तो एक महीने का खर्च कितना होगा ? जवाब में बीस से तीस हजार रुपए बताए गए।

इमाम साहब का फिर से सवाल था की अगर आपकी सैलरी 5 से 10 हजार रुपए हो तो आप कैसे इसको मैनेज करेंगे ? महफिल में सन्नाटा।

आपके मस्जिद के इमामों और मुअज्जिनों की तनख्वाह पांच से 10 हजार रुपए रहती है इससे वह अपना गुजारा कैसे करते है यह वही जानते है या अल्लाह बेहतर जानता है।

इस महंगाई के दौर में हम इन्हें और अपनी मस्जिद में पांच सौ हज़ार रुपए अलग से देने से भी कतराते हैं ।

हमें चाहिए की हम अपने इमामों और मुअज्जिनों का खयाल रखे।

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