Sahitya Suman Manch

Sahitya Suman Manch Sahitya Suman Manch is a literary organisation formed on 5th January 2018. The organisation is led b

08/08/2026

आज हमारे "साहित्य सुमन मंच" पर प्रेषित है मंच की वरिष्ठ सम्मानित व लोकप्रिय रचनाकार प्रमिला त्रिवेदी जी की लिखी हुई एक बहुत ही सुंदर भावपूर्ण रचना।
आशा है आप सभी को भी प्रमिला जी की लिखी रचना अवश्य अच्छी लगेगी🙏🌹😊

फूलों की डोर से...
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फूलों की डोर से जब
मन का उपवन सज जाता है,
हर पत्ती पर ओस का मोती
प्रेम का संदेश सुनाता है।

मंद समीर की मीठी सरगम,
कलियों का मधुर मुस्काना,
आते-जाते हर पंछी को
अपना-सा घर लग जाना।

हथेली पर बैठता नहीं
केवल नन्हा-सा एक परिंदा,
विश्वास भी पंख पसारकर
हृदय में नीड़ बना लेता है।

नदी की निर्मल धारा जैसे
चुपचाप बहती जाती है,
वैसे ही सच्चे मन की ममता
बिन बोले सब कह जाती है।

जब मुस्कान में स्वार्थ न हो,
शब्द स्वयं झुक जाते हैं,
नयनों के निर्मल दर्पण में
अनगिन भाव उतर आते हैं।

जिस मन में प्रेम का दीप
अविरल, अविचल जलता है,
वहीं प्रभात की प्रथम किरण संग
ईश्वर स्वयं उतरता है।

आओ ऐसा जग रचें,
जहाँ हर मन मधुबन बन जाए,
हर धड़कन में करुणा महके,
हर रिश्ता चंदन बन जाए।

प्रेम, विश्वास और अपनापन ही
जीवन का सबसे सुंदर श्रृंगार है;
जिस हृदय में प्रकृति बसती है,
वहीं साक्षात् ईश्वर का द्वार है।

— प्रमिला त्रिवेदी✍️

28/07/2026

हमारे साहित्य सुमन मंच पर इस बार लेखन का विषय लगातार समाज के गिरते हुए मानवीय मूल्यों पर आधारित है, जिसके तहत आप अलग - अलग शीर्षकों पर अलग - अलग रचनाकारों की संवेदनशील रचनाओं को पढ़ेंगे।
इस क्रम में आज आप पढेंगे हमारे मंच की युवा लोकप्रिय रचनाकार दीपिका कुमारी की लिखी हुई रचना जिसका शीर्षक है "शिक्षा का उद्देश्य".
आशा है आप सभी को दीपिका की यह रचना अवश्य अच्छी लगेगी🙏😊🌹

शिक्षा का उद्देश्य
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शिक्षा वह दीप है, जो जीवन में उजियारा लाती है,
सही और गलत का अंतर समझाकर राह दिखाती है।
ज्ञान, संस्कार और मानवता का जो पाठ पढ़ाती है,
वही शिक्षा जीवन को सच्ची सफलता दिलाती है।
पर आज शिक्षा का उद्देश्य कहीं बदलता जाता है,
ज्ञान नहीं, केवल अंकों का महत्व बढ़ता जाता है।
दिन-रात की मेहनत भी प्रतियोगिता में खो जाती है,
जीवन की सच्ची सीख कहीं पीछे रह जाती है।
शिक्षा का मंदिर अब कई जगह व्यवसाय बन रहा है,
जिसका असर आने वाला हर भविष्य सह रहा है।
ज़रूरत ऐसी शिक्षा की है जो सोच को ऊँचा करे,
हर बच्चे के जीवन में नए विश्वास का जोश भरे।
शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं होनी चाहिए,
बल्कि अच्छे विचार, संस्कार और चरित्र की नींव होनी चाहिए।
जब शिक्षा में ज्ञान और मानवीय मूल्य साथ चलेंगे,
तभी श्रेष्ठ समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण करेंगे।

-दीपिका कुमारी✍️

24/07/2026

हमारे साहित्य सुमन मंच पर इस बार लेखन का विषय लगातार समाज के गिरते हुए मानवीय मूल्यों पर आधारित है, जिसके तहत आप अलग - अलग शीर्षकों पर अलग - अलग रचनाकारों की संवेदनशील रचनाओं को पढ़ेंगे।
इस क्रम में आज आप पढेंगे हमारे मंच की सम्मानित व लोकप्रिय रचनाकार रश्मि बावेजा जी की लिखी हुई रचना जिसका शीर्षक है "सही सोच".
आशा है आप सभी को रश्मि जी की यह रचना अवश्य अच्छी लगेगी🙏😊🌹

सही सोच
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देश की आजादी की खातिर
वे अपनी जान दे गए।
हमारे सुकून की खातिर
वो हर किसी से लड़ गए।
फिर क्यों हम उनके दिए
मानवीय मूल्यों को खो रहे हैं।
जो हमें सच और सही राह पर
चलना सिखा गए।
हमें दुनिया से पहले
खुद से शुरुआत करनी पड़ेगी।
आने वाली पीढ़ियों की खातिर
सोच बदलनी होगी।
नहीं तो यूँ ही उनकी कुर्बानियाँ
व्यर्थ चली जाएँगी।
एक-एक कदम चलकर
ये दूरियाँ खत्म करनी होंगी।

-रश्मि बावेजा ✍️

21/07/2026

हमारे साहित्य सुमन मंच पर इस बार लेखन का विषय लगातार समाज के गिरते हुए मानवीय मूल्यों पर आधारित है, जिसके तहत आप अलग - अलग शीर्षकों पर अलग - अलग रचनाकारों की संवेदनशील रचनाओं को पढ़ेंगे।
इस क्रम में आज आप पढेंगे हमारे मंच की सम्मानित व लोकप्रिय रचनाकार डॉ. गरिमा त्यागी जी की लिखी हुई रचना जिसका शीर्षक है "रिश्तों की परिभाषा".
आशा है आप सभी को गरिमा जी की यह रचना अवश्य अच्छी लगेगी🙏😊🌹

रिश्तों की परिभाषा
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समाज का ताना-बाना जितना हल्का होगा, परिवार की तराजू का पलड़ा उतना हल्का होगा।

खुद को आधुनिक बताकर खुश जब हम होंगे, रिश्तों-नातों का धागा उतना ही कमजोर होगा।

परिवार बिखर रहे हैं, रिश्ते टूट रहे हैं,
अपनों से अपनों के बंधन छूट रहे हैं।

निजता हमारा टैग बन गया है,
बुजुर्गों और बच्चों के प्यार रूठ रहे हैं।

देहरी छूट गई है, आँगन सूने हो गए, दीपक होकर भी घर अँधियारे रह गए।

होली और दीवाली की जो रौनक थी हर घर की, अधिकारों का हक दिखाकर माली से पौधे छिन गए।

-डॉ. गरिमा त्यागी✍️

18/07/2026

हमारे साहित्य सुमन मंच पर इस बार लेखन का विषय लगातार समाज के गिरते हुए मानवीय मूल्यों पर आधारित है, जिसके तहत आप अलग - अलग शीर्षकों पर अलग - अलग रचनाकारों की संवेदनशील रचनाओं को पढ़ेंगे।
इस क्रम में आज आप पढेंगे हमारे मंच की सम्मानित व लोकप्रिय रचनाकार रश्मि पाठक जी की लिखी हुई रचना जिसका शीर्षक है "विडंबना".
आशा है आप सभी को रश्मि जी की यह रचना अवश्य अच्छी लगेगी🙏😊🌹

विडंबना ..........
अपेक्षाकृत उन बीहड़ रास्तों पर चलते हुए भी अचानक
रास्ते की ओर मुड़ जाना व्यथा नहीं है
और न ही चलती आ रही
व्यवस्था के विरोध में आवाज उठाना
तब भी जब आवाज़ें किसी कोने में अपनी जगह बनाती हैं
और दूर से कोई घोषणा अपना सर उठाती है
पहले अवसरवाद की नींव
और फिर मूल्यों संस्कारों उपलब्धियों की बात आड़े आती है
सबसे पहले कौन होगा यह बाद की बात है
क्योंकि चलताऊ संस्कृति में कुछ बातें पीछे छूट जाती हैं
जन्म और मृत्यु के बीच
बस यही संबंध रह जाता है कि उपलब्धियां
देखी नहीं बल्कि गिनाई जाती हैं
मानव जीवन चलता जाता है
बदलाव की घड़ी बदलती और वापस
वहीं आकर रुक जाती है
जीने का अधिकार नई संस्कृति में
अपनी योजनाओं को आकार देना है
एक सीमित व्यवस्था के बीच
जीवन खोजा जाता है दुनिया कहीं
और दिखाई देती है
भागों में बंटा जीवन आजकल समझने की बजाए
जीने में व्यस्त है तभी तो प्रारूप की व्यवस्था मशीनों में है।
मानवीय अवधारणा
अब सांस लेने की जगह आज़ादी को तलाशती है
और आजादी... वह तो अपना वजूद भूल चुकी है
शायद इतनी सरल हो चुकी है
कि आजादी भी अपना मानवीय मूल्य खो चुकी है।

-- रश्मि पाठक ✍️

09/07/2026

हमारे साहित्य सुमन मंच पर इस बार लेखन का विषय लगातार समाज के गिरते हुए मानवीय मूल्यों पर आधारित है, जिसके तहत आप अलग - अलग शीर्षकों पर अलग - अलग रचनाकारों की संवेदनशील रचनाओं को पढ़ेंगे।
इस क्रम में आज आप पहली रचना मेरी पढेंगे, जिसका शीर्षक है "जागृत समाज की पुकार".
आशा है आप सभी को मेरी यह रचना अवश्य अच्छी लगेगी🙏😊🌹

जागृत समाज की पुकार
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कहाँ गुम हो गया वो देश जो देवी रूप माना जाता था,
जहाँ नारी का आदर ही परम गौरव कहाता था?
हवाओं में घुली जो खौफ की ये आज परछाई,
लहू रोती है भारत की किसी कोने में तरुणाई।
​मगर इस अंधियारे में हमें चुप अब नहीं रहना,
सहे जो जुल्म सदियों से, उसे अब और नहीं सहना।
सुरक्षा और मर्यादा ही असली मूल्य हैं अपने,
पूरे करेंगे देश की बेटियों के सपने।
​बदलनी है हमें वो सोच जो कमजोर करती है,
लड़ें मिलकर उसी से, जहाँ कुंठा यह बहती है।
दिलाकर न्याय हर बेटी को, पावन धर्म निभाएँ,
फिर से पावन मानवीय मूल्यों को देश में वापस लाएँ।

-डॉ. अनुराधा प्रसाद ✍️

16/06/2026

आप सभी को यह सूचित करते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि दिनांक 20.6.2026 को जयराज पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित साझा काव्य संग्रह "स्वरागिनी" का लोकार्पण समारोह आयोजित किया जा रहा है🌹
आपकी शुभकामनाएं अपेक्षित है 🙏

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