Sahitya Suman Manch

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Sahitya Suman Manch Sahitya Suman Manch is a literary organisation formed on 5th January 2018. The organisation is led b

26/08/2026

इस बार हमारे साहित्य सुमन मंच पर लेखन का विषय अथवा शीर्षक है "सावन". इस विषय पर आज की रचना मैं मंच की सम्मानित व लोकप्रिय रचनाकार रश्मि पाठक जी की लिखी हुई प्रेषित कर रही हूं। आशा है आप सब को भी रश्मि जी की लिखी हुई रचना अवश्य अच्छी लगेगी 🙏😊🌹

सावन हर बार
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बूंदों की रिमझिम में गिरते मन की व्यथा के कोरे पारदर्शी तत्व
गिरते धारा पर उकेरते लकीरों पर अड़े - तिरछे जैसे शांत लेकिन शोर के बीच के पल
आक्रामक बादलों के शोर और बिजली की चमकती ज्वाला के बीच झरता सावन
शायद उम्मीदों और एकांत का एक मिलाजुला असर
शायद तेज़ बहती धारा के बीच खड़े रहने का जुनून
और एक लहलहाती धरती का सवेरा जो समय के साथ आएगा
प्रकृति बदलते सावन का एक विस्तार मन के भीतर सूखे समतल जमीन को सींचेगी
हरियाली के गीतों में झूलों का सावन याद आएगा
सखियाँ शोर करेंगी और गीतों में सावन फिर से याद किया जाएगा
सावन हर साल आएगा और अतीत
में लौट जाने की एक और याद दे जाएगा


-रश्मि पाठक✍️

18/08/2026

इस बार हमारे साहित्य सुमन मंच पर लेखन का विषय अथवा शीर्षक है "सावन". इस विषय पर आज की रचना मैं मंच की युवा लोकप्रिय रचनाकार दीपिका कुमारी की प्रेषित कर रही हूं। आशा है आप सभी को भी दीपिका की रचना अवश्य अच्छी लगेगी 🙏😊🌹

सावन की फुहार
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सावन का महीना आया,
मेघों ने गगन पर डेरा जमाया।
बादल काले घनघोर आने लगे,
संग गरजने की आवाजें लाने लगे।
धरती पर हरियाली छाने लगी,
प्रकृति भी जैसे मुस्कुराने लगी।

किशोरियाँ मिलकर मेघ-गीत गाएँ,
सावन के झूलों में मन बहलाएँ।
उधर खेतों में भी छाई हरियाली,
देख प्रकृति लगने लगी मतवाली।

ये मेघ विरह की याद दिलाते,
कभी मन में मीठी आस जगाते।
बूँदें पल में आँचल को भिगो जातीं,
तो अगले ही पल खुशियाँ बरसातीं।

सावन की ये रिमझिम फुहार,
ले आती है खुशियों की बहार।
मेघों की घटा, मिट्टी की खुशबू,
बना देती है हर पल को यादगार।

ये जो सावन का महीना आया,
हरियाली संग खुशियाँ साथ ले आया।

दीपिका कुमारी ✍️

14/08/2026

आज एक उत्कृष्ट कविता मैं साहित्य सुमन मंच की ओर से प्रेषित कर रही हूं, जिसे अपनी लेखनी से मंच के सम्मानित व लोकप्रिय रचनाकार बबन बदिया जी ने सजाया है✍️
आपको भी ये कविता अवश्य अच्छी लगेगी 🙏🌹

अंतिम व्यक्ति
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अंतिम व्यक्ति कौन है..?
परिभाषा क्या है,
इसकी मानक क्या है..?
क्या इसकी पहचान,
जाति से ही तय है..?
यदि ऐसा है, तो
यह देश का दुर्भाग्य है।
आखिर...
अंतिम व्यक्ति की,
पहचान क्या है...?
यदि सरकार की नजर में,
जाति ही मानक है, तो
राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री
दशकों पहले ही उस कतार से,
आगे निकल चुके हैं।
फिर अंतिम व्यक्ति कौन है..?
क्या यह कोई यक्ष-प्रश्न है,
या शोषण के बहाने,
शोषण और राजनीति..?
बेबस उम्र में भी,
दतवन बेचते, कुदाल चलाते, और
भट्ठों पर ईंट ढोती महिला, बच्चे,
रिक्शा खींचते, गुब्बारे बेचते बुजुर्ग,
न जाने वे और उनके परिवार,
किस पंक्ति में आज भी खड़े हैं...?
जो अपनी बारी के,
आने से पहले ही घुट-घुटकर,
दम तोड़ देते हैं।
नेताओं की नजर में,
अंतिम व्यक्ति...
क्षितिज के समान है,
दिखता तो है,
पर कभी मिलता नहीं...

...बबन बदिया✍️
8084595441

11/08/2026

इस बार हमारे साहित्य सुमन मंच पर लेखन का विषय अथवा शीर्षक है "सावन". इस विषय पर आज की रचना मैं स्वयं का लिखा हुआ प्रेषित कर रही हूं। आशा है आप सभी को भी मेरी लिखी रचना अवश्य अच्छी लगेगी 🙏😊🌹

सावन की सरगम
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घिर आए नभ में मेघ सुहाने,
बूँदों ने छेड़े मधुर तराने।
सूखी धरती फिर मुस्काई,
हर डाली ने हरियाली पाई।
माटी की सोंधी खुशबू आई,
मन में नई उमंग जगाई।
पत्तों पर मोती-सी बूँदें,
झूम उठीं वन की सब झाड़ियाँ।
सावन केवल ऋतु नहीं है,
यह जीवन में नव आस जगाता है।
जो तपकर भी धैर्य निभाए,
उसके आँगन सावन आता है।

- डॉ. अनुराधा प्रसाद ✍️

08/08/2026

आज हमारे "साहित्य सुमन मंच" पर प्रेषित है मंच की वरिष्ठ सम्मानित व लोकप्रिय रचनाकार प्रमिला त्रिवेदी जी की लिखी हुई एक बहुत ही सुंदर भावपूर्ण रचना।
आशा है आप सभी को भी प्रमिला जी की लिखी रचना अवश्य अच्छी लगेगी🙏🌹😊

फूलों की डोर से...
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फूलों की डोर से जब
मन का उपवन सज जाता है,
हर पत्ती पर ओस का मोती
प्रेम का संदेश सुनाता है।

मंद समीर की मीठी सरगम,
कलियों का मधुर मुस्काना,
आते-जाते हर पंछी को
अपना-सा घर लग जाना।

हथेली पर बैठता नहीं
केवल नन्हा-सा एक परिंदा,
विश्वास भी पंख पसारकर
हृदय में नीड़ बना लेता है।

नदी की निर्मल धारा जैसे
चुपचाप बहती जाती है,
वैसे ही सच्चे मन की ममता
बिन बोले सब कह जाती है।

जब मुस्कान में स्वार्थ न हो,
शब्द स्वयं झुक जाते हैं,
नयनों के निर्मल दर्पण में
अनगिन भाव उतर आते हैं।

जिस मन में प्रेम का दीप
अविरल, अविचल जलता है,
वहीं प्रभात की प्रथम किरण संग
ईश्वर स्वयं उतरता है।

आओ ऐसा जग रचें,
जहाँ हर मन मधुबन बन जाए,
हर धड़कन में करुणा महके,
हर रिश्ता चंदन बन जाए।

प्रेम, विश्वास और अपनापन ही
जीवन का सबसे सुंदर श्रृंगार है;
जिस हृदय में प्रकृति बसती है,
वहीं साक्षात् ईश्वर का द्वार है।

— प्रमिला त्रिवेदी✍️

28/07/2026

हमारे साहित्य सुमन मंच पर इस बार लेखन का विषय लगातार समाज के गिरते हुए मानवीय मूल्यों पर आधारित है, जिसके तहत आप अलग - अलग शीर्षकों पर अलग - अलग रचनाकारों की संवेदनशील रचनाओं को पढ़ेंगे।
इस क्रम में आज आप पढेंगे हमारे मंच की युवा लोकप्रिय रचनाकार दीपिका कुमारी की लिखी हुई रचना जिसका शीर्षक है "शिक्षा का उद्देश्य".
आशा है आप सभी को दीपिका की यह रचना अवश्य अच्छी लगेगी🙏😊🌹

शिक्षा का उद्देश्य
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शिक्षा वह दीप है, जो जीवन में उजियारा लाती है,
सही और गलत का अंतर समझाकर राह दिखाती है।
ज्ञान, संस्कार और मानवता का जो पाठ पढ़ाती है,
वही शिक्षा जीवन को सच्ची सफलता दिलाती है।
पर आज शिक्षा का उद्देश्य कहीं बदलता जाता है,
ज्ञान नहीं, केवल अंकों का महत्व बढ़ता जाता है।
दिन-रात की मेहनत भी प्रतियोगिता में खो जाती है,
जीवन की सच्ची सीख कहीं पीछे रह जाती है।
शिक्षा का मंदिर अब कई जगह व्यवसाय बन रहा है,
जिसका असर आने वाला हर भविष्य सह रहा है।
ज़रूरत ऐसी शिक्षा की है जो सोच को ऊँचा करे,
हर बच्चे के जीवन में नए विश्वास का जोश भरे।
शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं होनी चाहिए,
बल्कि अच्छे विचार, संस्कार और चरित्र की नींव होनी चाहिए।
जब शिक्षा में ज्ञान और मानवीय मूल्य साथ चलेंगे,
तभी श्रेष्ठ समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण करेंगे।

-दीपिका कुमारी✍️

24/07/2026

हमारे साहित्य सुमन मंच पर इस बार लेखन का विषय लगातार समाज के गिरते हुए मानवीय मूल्यों पर आधारित है, जिसके तहत आप अलग - अलग शीर्षकों पर अलग - अलग रचनाकारों की संवेदनशील रचनाओं को पढ़ेंगे।
इस क्रम में आज आप पढेंगे हमारे मंच की सम्मानित व लोकप्रिय रचनाकार रश्मि बावेजा जी की लिखी हुई रचना जिसका शीर्षक है "सही सोच".
आशा है आप सभी को रश्मि जी की यह रचना अवश्य अच्छी लगेगी🙏😊🌹

सही सोच
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देश की आजादी की खातिर
वे अपनी जान दे गए।
हमारे सुकून की खातिर
वो हर किसी से लड़ गए।
फिर क्यों हम उनके दिए
मानवीय मूल्यों को खो रहे हैं।
जो हमें सच और सही राह पर
चलना सिखा गए।
हमें दुनिया से पहले
खुद से शुरुआत करनी पड़ेगी।
आने वाली पीढ़ियों की खातिर
सोच बदलनी होगी।
नहीं तो यूँ ही उनकी कुर्बानियाँ
व्यर्थ चली जाएँगी।
एक-एक कदम चलकर
ये दूरियाँ खत्म करनी होंगी।

-रश्मि बावेजा ✍️

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