17/04/2026
तो आप शुभकामनाएं लाए, उसके लिए धन्यवाद। लेकिन उस शुभकामना से आप अपने जीवन के प्रति आश्वस्त होकर मत चले जाना। मुझे उससे कोई आश्वासन मिलने की बात नहीं है। लेकिन आप मत सोचते हुए चले जाना कि जीवन है, जन्म है। मृत्यु को अलग काट कर मत रख देना। अच्छी दुनिया हो तो मैं मानता हूं— —हमें मृत्यु—दिन ही मनाना चाहिए।
लेकिन हम तो मृत्यु—दिन तब मनाते हैं जब आदमी मर जाता है। तब मनाने का कोई मतलब नहीं रह जाता। हमें मनाना ही ऐसा चाहिए, आदमी पांच साल का हो गया, तो कहना चाहिए कि मृत्यु पांच साल करीब आ गई। दस साल का हुआ, तो दस साल करीब आ गई। बीस साल का हुआ, तो बीस साल करीब आ गई। और मृत्यु का ही दिन मनाना चाहिए। वह ज्यादा रियलिस्टिक है, यथार्थ है। और शायद हम मृत्यु के दिन मनाने लगें, तो शायद हमारे जीवन में अंतर पड़े। क्योंकि हर वर्ष हमें याद आए कि मौत एक वर्ष करीब आ गई, तो हम वही न हो सकें जो हम बने रहते हैं।
हम मरघटों को, कब्रिस्तानों को गांव के बाहर बनाए हुए हैं, इसी डर से कि वे दिखाई न पड़ जाएं। मेरा वश चले तो गांव के बीच में ही होने चाहिए। हम दिन में दस बार निकलें, हमें मरघट दिखाई पड़े। दस बार खयाल आए कि मौत है। क्योंकि बड़ी दुख की बात है कि मौत ही अकेला एक तत्व है, जिसकी पीड़ा हममें घनी हो जाए, तो हमारा जीवन परिवर्तित हो सकता है, अन्यथा नहीं। मौत ही एकमात्र दंश है, कांटा है, जो गहरा हमारी छाती में चुभ जाए, तो शायद कोई ट्रांसफामेंशन, कोई क्रांति घटित हो जाए, अन्यथा नहीं। मौत ही हमें घेर ले और जोर से पकड़ ले, तो शायद हम कोई छलांग लगाएं, अन्यथा नहीं।
ओशो
जीवन रहस्य-(प्रवचन–13)