26/07/2025
श्री लव और श्री कुश के छ भव
जैन रामायण में रामचंद्रजी के पुत्र अनंगलवण व मंदनांकुश नाम था।
(1) प्रथम भव : वामदेव ब्राह्मण पिता, शामला माता, वसुनंद-सुनंद नाम के पुत्र काकंदीनगरी में मासक्षमण के तपस्वी साधु पधारे, उनके तप एवं आचार की अनुमोदना करते करते बोधिबीज की प्राप्त की।
(2) द्वितीय भव : दोनो भाई काल करके युगलिक मनुष्य बने ।
(3) तृतीय भव : दोनो भाई देवलोक में मित्र बने ।
(4) चतुर्थ भव : काकंदीनगरी में वसुदेव राजा के प्रियंकर हितंकर नाम के पुत्र बने । राज्य प्राप्त करके वैराग्य पाने पर संयम ग्रहण किया ।
(5) पंचम भव : दोनो भाई काल करके नव ग्रेवेयक में उत्पन्न हुए ।
(6) छट्ट्ठा भव : दशरथराजा के पुत्र रामचंद्रजी की धर्म पत्नी सीता की कुक्षी में नव ग्रैवेयक में से च्यवन होकर जन्म धारण किया । श्रावण सुद पूर्णिमा के दिन श्रवण नक्षत्र में पुंडरिकीणी नगरी में जन्म हुआ । बडे होकर पिता के साथ युद्ध किया अंत में लक्ष्मण की मृत्यु से वैराग्य पाकर अमृतरस अणगार के पास संयम का शुद्ध पालन करके मोक्ष में गये ।
(पउमचरियम्)