23/05/2026
गुरुओं के जन्म जयंती में जो भिन्नता है उसमें
गुरु बालकदास जी के है,
गुरु बालकदास जी के जयंती जो अष्टमी के है जिन्हें पुरखों से मनाते आ रहे है वे एकदम सटीक है , इसमे कोई छेड़छाड़ न हो तो ही बेहतर है, हमारे पुरखा भले ही कम पढ़े लिखे थे या पढ़े लिखे नही थे लेकिन सामाजिक धार्मिक क्षेत्र में बहुत ही उच्च विचार के रहे है जिनका पार आज के साहित्यकार लोग नही पा रहे है और उनके महत्व को नही समझ पा रहे है, जन्माष्टमी के दिन पूरा समाज कृष्ण जन्माष्टमी मनाते थे है लेकिन पहले और अब भी समाज गुरु बालकदास जयंती मनाते है और अपने धार्मिक आयोजन करते हुवे अपने धर्म संस्कृति को आगे बढ़ा रहे है...
अलग से तारिक निकाल कर कही हम पुरखों के विचारों का गला तो नही घोंट रहे है..? विचारणीय है।
गुरुमाता मां मिनीमाता जी,
माता जी के जन्म पुरखा लोग होलिका दहन को मनाते थे , इससे समाज होले होलिका छोड़ अपने पुरखों को याद करता था आरती मंगल कर, फिर समाज में पढ़े लिखे लोग आए और इसे होलिका दहन से 13 मार्च कर दिया.. फिर समाज 13 मार्च स्वीकार लिया...
अब पिछले दो वर्ष हो गए फिर समाज मे 13 मार्च के जगह अब 15 मार्च करने पर तुले हुवे है...
जबकि उचित और सटीक होलिका दहन को ही माता जी के जयंती मनानी चाहिए... इससे समाज अपने धर्म संस्कृति की ओर आगे बढ़ेगा दुनिया भर के दुसरो के तीज त्यौहार से दूर... नशा पान से दूर....
वीर सरहा - जोधाई जयंती,
दोनों जुड़वा भाई की जयंती 14 अप्रैल समाज स्वीकार कर लिए है और जमीनी स्तर में मना रहे है, इसमे कोई और छेड़छाड़ न हो...
ऐसा कही भी किसी भी धर्म ग्रंथ या कानून में नही लिखा है कि एक ही तिथि में सिर्फ एक व्यक्ति के जन्मदिन हो , कइयों का रहते है..
और न ही तो ऐसा कही पर लिखा है कि अपने पुरखों के जयंती हमारे पुरखा के जयंती के दिन नही मना सकते, इसीलिए समाज को सभी जगह आयोजन करने चाहिए.. 14 अप्रैल को ही...
ऐसे ही समाज के पुरखा लोग सोंच विचार कर सब तिथि मनाते आ रहे है, और हम लोग पढ़े लिखे लोग होने के परिचय देने के लिए समाज को भ्रम में डाल रहे है...
यदि आपके लिए समाज आगे है तो समाज हित में आगे आये अपने ईगो साइड में रखकर....